स्टार्टअप, उद्यमिता और बैंकिंग को मिलेगी मजबूती

नए केंद्रीय बजट में ऐसे अनुकूल प्रावधान हैं, जिनसे कोरोना महामारी के नकारात्मक प्रभावों से बैंकिंग क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुत जल्द उबारने में मदद मिलेगी। स्टार्टअप, उद्यमिता, कृषि, रोजगार और बैंकिंग क्षेत्र की मजबूती के लिए उठाए जा रहे कदमों से अर्थव्यवस्था और अधिक गतिशील होगी।

कोरोना महामारी के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को बजट में संजीवनी की जरूरत थी, ताकि वह कोरोना महामारी के नकारात्मक प्रभावों से जल्द ही उबर सके। कोरोना महामारी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। सबसे ज्यादा प्रतिकूल प्रभाव पर्यटन, होटल, निर्माण, सूक्ष्म, लघु एवं मंझौले उद्यम (एमएसएमई) आदि पर पड़ा है। बड़ी संख्या में आमजन और कारोबारी बेरोजगार हो गए हैं। इन कारणों से वित्त वर्ष 2021-22 का बजट सरकार के लिए कई मायनों से महत्वपूर्ण है। बजट पर रोजगार सृजन और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने का दारोमदार है। इसलिए, बजट में कई सुधारात्मक प्रावधान किए गए हैं। इसी वजह से पिछले सालों में केंद्र सरकार ने विनियामक शर्तों के अनुपालन हेतु एवं आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने के लिए सरकारी बैंकों को विविध माध्यमों से लगभग 3,50,000 करोड़ रुपये की पूंजी मुहैया कराई है। इस क्रम में सरकार ने 10 बैंकों का विलय करके चार बैंकों के गठन को भी मंजूरी दी है। अर्थव्यवस्था के दूसरे मानक, जैसे उद्योग एवं वाणिज्य क्षेत्र के विकास व संवर्धन के लिए भी वित्त वर्ष 2020-21 के बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं।

स्टार्टअप

हमारे देश में एक बड़ी आबादी युवाओं की है, जिनमें कई हुनरमंद हैं, लेकिन अर्थाभाव एवं जानकारी के अभाव में वे बेरोजगार हैं। इसलिए, देश में स्टार्टअप इंडिया योजना शुरू की गई है, जिसका मकसद युवाओं को रोजगार मुहैया कराना और रोजगार सृजन के अवसर पैदा करना है। इस योजना के तहत युवाओं को मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इस योजना का फायदा लेने के लिए औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) के आधिकारिक बेबसाइट या एप के माध्यम से ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। इसमें वैसे लोगों को योजना का लाभ दिया जाता है, जिनका कारोबार 7 या 10 वर्षों में 25 करोड़ से कम रहा है या फिर आवेदक नया उद्यमी है। नए उद्यमियों को कारोबार शुरू करने के लिए सरकार वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। साथ ही, कारोबार शुरू करने से पहले उद्यमी को प्रशिक्षण भी दिया जाता है। नए कारोबारी से कारोबार लागत के 20 प्रतिशत की राशि पर कर नहीं वसूल किया जाता है। साथ ही साथ अगर नया कारोबार सही से नहीं चलता है तो सरकार नए कारोबारियों को 90 दिनों के अंदर अपने कारोबार को बंद करने की भी छूट देती है।

आज स्टार्टअप स्व-रोजगार शुरू करने और दूसरों को रोजगार मुहैया कराने का एक महत्वपूर्ण जरिया बना हुआ है। स्टार्टअप की मदद से बड़ी संख्या में लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। स्वाभाविक रूप से अगर लोग आत्मनिर्भर होंगे तो देश में समावेशी विकास को सुनिश्चित करना आसान होगा। स्टार्टअप के महत्व को समझकर ही वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में टैक्स हॉलिडे की मौजूदा सुविधा को एक साल तक के लिए और बढ़ा दिया गया है। इसका यह अर्थ हुआ कि स्टार्टअप को 31 मार्च 2022 तक कोई कर नहीं देना होगा। इसके अलावा स्टार्टअप को दिए गए कैपिटल गेन्स की छूट को भी एक और साल के लिए बढ़ा दिया गया है।

बजट में स्टार्टअप के लिए 830 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। सरकार एकल व्यक्ति वाली कंपनियों (ओपीसी) के गठन को भी प्रोत्साहन देगी। इसके तहत किसी भी समय किसी भी श्रेणी की कंपनी के रूप में बदलाव करने, एक भारतीय नागरिक के लिए ओपीसी बनाने में निवास की समय सीमा को 182 दिन से घटाकर 120 दिन करने तथा अनिवासी भारतीयों को देश में ओपीसी बनाने जैसी सुविधाएं दी जाएगी। पूर्व में कंपनी की श्रेणी में बदलाव के लिए 2 वर्ष की समय-सीमा की व्यवस्था थी। स्टार्टअप कंपनियों को अब पेडअप कैपिटल और टर्नओवर पर बिना पाबंदी के बढ़ोतरी करने की भी छूट दी जाएगी। पहले ऐसे स्टार्टअप कंपनियों का पेड-अप कैपिटल 50 लाख रुपए और सालाना टर्न-ओवर 2 करोड़ रुपए होना चाहिए था।

सरकार ने नए स्टार्टअप को शुरू और विकसित करने में मदद करने के लिए 1,000 करोड़ रूपये स्टार्टअप को दिए हैं, जिसे सीड फंड का नाम दिया गया है। इसकी मदद से नए कारोबारियों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। आमजन के जीवन में बेहतरी लाने और स्टार्टअप की राह में पूंजी की कमी बाधा नहीं बने इसके लिए इस फंड की घोषणा की गई है, क्योंकि मौजूदा समय में अनेक स्टार्टअप पूंजी की कमी की वजह से अपने सफर की शुरूआत में ही दम तोड़ दे रहे हैं। बजट में स्टार्टअप के लिए किए गए प्रावधान 1 अप्रैल 2021 से प्रभावी होंगे।

स्टार्टअप को वित्तीय सहायता

स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने क्रेडिट गारंटी स्कीम फॉर स्टार्टअप (सीजीएसएस) की स्थापना की है, जिसके लिए सरकार ने 2000 करोड़ रुपए की पूंजी उपलब्ध कराई है। स्टार्टअप को ऋण मुहैया कराने के लिए वित्तीय संस्थानों को डीआईपीपी के शर्तों का अनुपालन करना होगा। डीआईपीपी से मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थान ही स्टार्टअप को ऋण मुहैया करा सकेंगे। स्टार्टअप को वित्तीय सहायता कार्यशील पूंजी, डिबेंचर, मियादी ऋण आदि के रूप में दी जाएगी। डीआईपीपी के सदस्य ऋण संस्थान बिना तीसरे पक्ष की गारंटी या संपार्श्विक प्रतिभूति के स्टार्टअप को 5 करोड़ रूपये तक की ऋण राशि प्रदान कर सकते हैं। अगर कोई स्टार्टअप इस योजना के तहत 1.5 करोड़ रूपये का ऋण लेना चाहता है तो उसका 75 प्रतिशत वित्तीय सहायता संस्थान देगा और बची हुई 25 प्रतिशत राशि का इंतजाम उद्यमी को खुद से करना होगा। वहीं, 5 लाख रूपये से कम ऋण मांगने वाले उद्यमियों को 85 प्रतिशत तक ऋण वित्तीय संस्थान देगा और 15 प्रतिशत राशि की व्यवस्था उद्यमी को स्वयं करनी होगी। इस योजना का लाभ लेने के लिए उद्यमी को केवाईसी की शर्तों को पूरा करना होगा। साथ ही, वित्त लाभ प्राप्त करने के लिए आवेदक को आधार कार्ड भी वित्तीय संस्थान को देना होगा। गौरतलब है कि सीजीएसएस नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट कंपनी के ट्रस्टीशिप प्रबंधन की शर्तों के अनुसार कार्य करेगा।

उद्यमिता

किसी उद्यमी द्वारा किसी भी क्षेत्र में किसी नए व्यवसाय को शुरू करना उद्यमिता कहलाता है। कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय देश में कौशल विकास और उद्यमशीलता को बढ़ाने के प्रतिबद्ध है। इसके लिए सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के द्वारा भारतीय उद्यमिता संस्थान (आईआईई) का भी गठन किया गया है, जिसका कार्य उद्यमशीलता को बढ़ावा देना है। इसी आलोक में सरकार द्वारा शुरू की गई दीनदयाल अंत्योदय योजना का उद्देश्य कौशल विकास और अन्य उपायों के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि कर शहरी और ग्रामीण गरीबी को कम करना है।

वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में कई ऐसे प्रावधानों की घोषणा की गई है, जिसकी मदद से देश में उद्यमशीलता को बढ़ावा दिया जा सकता है। बजट में सरकार ने ढांचागत सुविधाओं को बढ़ाने, कृषि क्षेत्र व स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने एवं वित्तीय क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए अनेक प्रावधान किए हैं। बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए 69,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें से प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) के लिए 6,400 करोड़ रुपये रखे गए हैं। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत 20,000 से अधिक सूचीबद्ध अस्पताल हैं, लेकिन 2 से 3 स्तर वाले शहरों में गरीबों के इलाज के लिए अधिक अस्पतालों की जरूरत है। लिहाजा, आयुष्यमान भारत योजना के तहत मशीन लर्निंग और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का प्रयोग करते हुए सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) आधार पर और भी ज्यादा अस्पतालों की स्थापना का प्रस्ताव है। बजट में कृषि, ग्रामीण विकास, सिंचाई और सम्बद्ध कार्यों पर 2.83 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है। बजट में वित्त वर्ष 2022-23 तक मत्स्य उत्पादन बढ़ाकर 200 लाख टन करने का प्रस्ताव है। साथ ही, वित्त वर्ष 2024-25 तक मछली का निर्यात बढ़कर 1 लाख करोड़ रुपये करने का प्रस्ताव है। दीनदयाल अंत्योदय योजना गरीबी उन्मूलन के तहत 50 लाख परिवारों को 58 लाख स्वसहायता समूहों के साथ जोड़ने का प्रस्ताव है।

स्वास्थ्य, कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों आदि में उद्यमिता के विकास की अभूतपूर्व संभावनाएं हैं, क्योंकि इन क्षेत्रों में उद्यमी नए कारोबार शुरू करके अपना जीवनयापन भी कर सकते हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी बन सकते हैं। साथ ही, दूसरों को भी रोजगार मुहैया करा सकते हैं। इस राह में आने वाली पूंजी की कमी को प्रधानमंत्री मुद्रा योजना की मदद से दूर किया जा सकता है। इसके तहत छोटे कारोबारियों को 10 लाख रुपये तक का ऋण बिना जमानत के दिया जाता है। मुद्रा ऋण की ब्याज दरें दूसरे तरह के ऋणों के मुकाबले कम हैं। इस योजना का मकसद एमएसएमई उद्योगों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है। यह एक ऐसी योजना है, जो अपने आगाज के दिनों से ही असंगठित क्षेत्र में लाखों की संख्या में रोजगार सृजन करने का कार्य कर रही है। इस योजना को तीन वर्गों- यथा शिशु, किशोर और तरुण में बांटा गया है। शिशु के तहत 50 हजार रूपये, किशोर के तहत 50 हजार से 5 लाख रूपये और तरुण के अंतर्गत 5 लाख से 10 लाख रूपये तक के ऋण दिए जाते हैं। इस योजना का लाभ सभी कारोबारी इकाइयों, जैसे खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, मशीन ऑपरेटर, पेशेवर जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, सेवा क्षेत्र से जुड़े लोग, लघु एवं छोटे कारोबारी, मसलन, किराना एवं जनरल स्टोर चलाने वाले दुकानदार, फल या सब्जी विक्रेता, रेहड़ी व खोमचे वाले, हेयर कटिंग सैलून व ब्यूटी पार्लर वाले, शिल्पकार, पेंटर, रेस्त्रां चलाने वाले, साइकिल व बाइक रिपेयर करने वाले आदि उठा सकते हैं।

बाजार से पूंजी उगाही

पिछले कुछ महीनों में बैंकों ने बाजार से 40,000 करोड़ रुपये की उगाही की है, जिसमें से केनरा बैंक के 1635 करोड़ रूपये और पंजाब नेशनल बैंक के 3788 करोड़ रूपये शामिल हैं। बजट में दो सरकारी बैंकों में विनिवेश का भी प्रस्ताव है। विनिवेश से दोनों बैंकों को नीतिगत निर्णय लेने में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी और सरकार को भी गैर कर राजस्व की प्राप्ति होगी।

कृषि ऋण को बढ़ाने का लक्ष्य

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने के लिए वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपये किया है। कृषि ऋण में किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) सबसे लोकप्रिय ऋण है। किसानों की आर्थिक क्षमता बढ़ाने में यह संजीवनी का काम कर रहा है। वर्तमान में 11.5 करोड़ किसान प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 6.5 करोड़ किसानों के पास ही केसीसी ऋण की सुविधा है। बचे हुए 5 करोड़ किसानों को केसीसी ऋण दी जा सकती है और जो किसान इस ऋण को पाने के पात्र नहीं हैं, उन्हें स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के तर्ज पर बैंकों से जोड़कर किसानों को आर्थिक रूप से सबल बनाया जा सकता है।

डिजिटलीकरण

बजट में डिजिटल भुगतान को बढ़ाने के लिए 1,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इस राशि से डिजिटल भुगतान की प्रक्रिया को सरल, सहज एवं प्रभावी बनाया जाएगा। सरकार के इस कदम से बैंकों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जाने में आसानी होगी, जिससे बचे हुए समय का इस्तेमाल वे बैंक का कारोबार बढ़ाने में कर सकेंगे। बजट में दो सरकारी बैंकों के विनिवेश का प्रस्ताव है। इस प्रावधान को मूर्त रूप देने के लिए संसद के चालू सत्र में कानून में संशोधन किया जाएगा। इससे बैंकों को नीतिगत निर्णय लेने में ज्यादा स्वतंत्रता मिलेगी और सरकार को भी गैर कर राजस्व की प्राप्ति होगी।

जमा बीमा कवरेज में इजाफा

पिछले साल के बजट में, जमा बीमा कवरेज को 1 लाख प्रति जमाकर्ता से बढ़ाकर 5 लाख रुपये प्रति जमाकर्ता कर दिया गया था। इस साल के बजट में, सरकार ने घोषणा की है कि यदि कोई बैंक वित्तीय संकट की वजह से विफल होता है तो जमाकर्ता तुरंत जमा बीमा और क्रेडिट गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) के तहत बीमित 5 लाख रुपये तक की निकासी कर सकता है। इसके लिए कानून में संशोधन किया जाएगा। यह सरकार द्वारा उठाया गया एक सराहनीय कदम है, क्योंकि इस प्रावधान से बैंक डूबने की स्थिति में जमाकर्ताओं को तत्काल अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी, जिससे बहुत सारे छोटे जमाकर्ताओं की ज़िंदगी भर की कमाई डूबने से बच जाएगी। गौरतलब है कि डीआईसीजीसी भारतीय रिज़र्व बैंक की सहायक कंपनी है, जो जमाकर्ताओं की जमा को सुरक्षित करती है।

बुनियादी सुविधाओं के लिए डीएफआई

बजट में सरकार ने एक डेवलपमेंट फाइनेंस इंस्टीट्यूशन (डीएफआई) शुरू करने का प्रस्ताव किया है, जिसे नेशनल बैंक फॉर फाइनेंसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर एंड डेवलपमेंट के नाम से जाना जाएगा।  इसके स्टेकहोल्डर सरकारी और निजी बैंक होंगे। सरकार की योजना डीएफआई के साथ इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी लिमिटेड को विलय करने की भी है। नए डीएफआई का नियामक भारतीय रिजर्व बैंक होगा। इसमें केंद्र सरकार 20,000 करोड़ रुपये निवेश करेगी और आगामी 3 सालों में प्राइवेट प्लेयर्स की मदद से इसमें 5 लाख करोड़ रूपये की पूंजी डाली जाएगी। वैसे, डीएफआई कोई नई संकल्पना नहीं है, यह उदारवाद शुरू होने से पहले मौजूद थी। उस कालखंड में इसकी मदद से लंबी अवधि की जमा को 10 से 15 सालों वाले आधारभूत से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश किया जाता था और यह परियोजनाओं को तब तक मदद करता था, जब तक वह कार्यशील न हो जाए। साथ ही, डीएफआई देनदारी और लेनदारी के बीच संतुलन बनाए रखने का भी काम करता था, ताकि अचानक से पूंजी की कमी का संकट पैदा नहीं हो। हालांकि, उदारवाद के दौर में डीएफआई की प्रासंगिकता खत्म हो गई। नए डीएफआई का उद्देश्य है आधारभूत संरचना वाली परियोजनाओं में लंबी अवधि के लिए जमा की गई राशि का निवेश करना। आज आधारभूत संरचना का विकास बहुत ही जरूरी है। इसकी मदद से ही विकास की गाड़ी को आगे बढ़ाया जा सकता है।

ऋण वितरण में हुई वृद्धि

तालाबंदी को चरणबद्ध तरीके से खोलने के बाद आवास ऋण, वाहन ऋण और अन्य व्यक्तिगत ऋण जैसे सभी उप ऋण खंडों में ऋण की मांग में बढ़ोतरी हुई है, जिससे आर्थिक गतिविधियों में इजाफा हो रहा है। हालांकि, इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी (ईसीएलजीएस) योजना की मदद से ऋण वितरण में और भी तेजी लाई जा सकती है, क्योंकि यह योजना मार्च 2021 तक वैध है। इसके तहत 8 जनवरी 2021 तक एमएसएमई क्षेत्र को 3 लाख करोड़ रुपये का ऋण वितरण किया जा चुका है। फिर भी, इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है। अभी भी बैंक नए मियादी ऋण नहीं दे रहे हैं, क्योंकि इसकी मांग कम है। लिहाजा, कोरोना महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों- जैसे रियल एस्टेट, निर्माण, टेक्साइल आदि क्षेत्रों को कार्यशील और मियादी दोनों तरह के ऋण देने की जरूरत है। सरकारी बैंकों के ऋण वितरण के आंकड़ों से पता चलता है कि कोरोना महामारी के दौरान 40 प्रतिशत ऋण वितरण खुदरा एवं कृषि क्षेत्र को किया गया है, जबकि 52 प्रतिशत ऋण वितरण उद्योग और अन्य कारोबार को किया गया है।

निष्कर्ष

आज रोजगार सृजन के लिए स्टार्टअप और उद्यमिता का विकास बहुत ही जरूरी है। इसलिए, वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में इन दोनों क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। पूंजी होने पर ही बैंक जरूरतमंदों को ऋण दे सकते हैं। इसी वजह से बैड बैंक की जरूरत बैंकिंग क्षेत्र में एक लंबे समय से महसूस की जा रही थी। साथ ही, ग्राहक सेवा में भी सुधार कर सकेंगे, जिससे बैंकों के मुनाफे में वृद्धि तो होगी ही साथ ही साथ ग्राहकों, निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों का भरोसा भी उन पर बढ़ेगा। सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए भी प्रावधान किए हैं, जिससे कमजोर बैंकों को राहत मिलेगी। कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 16.5 लाख करोड़ रुपये करने से किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी साथ ही साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने से ग्राहकों एवं बैंकों को तो फायदा होगा ही साथ ही साथ इससे लेनदेन में पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार में भी कमी आएगी। डीआईसीजीसी के तहत जमाकर्ताओं की जमा को 5 लाख रुपए तक बीमित करना सरकार द्वारा उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे बैंकों के विफल होने पर आमजन को बड़ी राहत मिलेगी। डीएफआई की जरूरत बुनियादी ढांचा को खड़ा करने के लिए जरूरी है। इसकी मदद से लंबी अवधि की परियोजनाओं को मूर्त रूप दिया जा सकता है। खास करके इसकी मदद से सड़क, बिजली, रेल लाइन, संचार आदि जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा को खड़ा किया जा सकता है, जिन्हें विकास की धमनी कहा जाता है।

बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इस क्षेत्र की उपेक्षा करके देश के समावेशी विकास की कल्पना नहीं की जा सकती है। तालाबंदी को चरणबद्ध तरीके से खोलने के बाद यह जरूरी है कि सभी क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए आमजन और कारोबारियों को ऋण दिया जाए। सरकार द्वारा बैंकिंग क्षेत्र में किए जा रहे सुधारों की वजह से बैंकों ने अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। कारपोरेट्स और खुदरा क्षेत्र में ऋण की मांग बढ़ने लगी है। सभी अनुसूचित व्यवसायिक बैंकों (एएससीबी) का वृद्धिशील ऋण वितरण सकारात्मक हो गया है और ऋण वितरण में लगातार मजबूती से वृद्धि हो रही है। ऋण की वर्ष से तारीख (वाईटीडी) वृद्धि अप्रैल, 2015 से जनवरी 2021 के दौरान 2.6 प्रतिशत रही, जबकि पिछले साल की समान अवधि के दौरान यह 2.4 प्रतिशत रही थी। उल्लेखनीय है कि वाईटीडी, कैलेंडर वर्ष के पहले दिन या वित्तीय वर्ष की वर्तमान तिथि तक कीअवधि को संदर्भित करता है। नवंबर, 2020 के बाद से बैंकों का वृद्धिशील ऋण वितरण लगभग 3 लाख करोड़ रुपये रहा है। ऐसे में कहना अनुचित नहीं होगा कि कोरोना महामारी के नकारात्मक प्रभावों से बैंकिंग क्षेत्र और भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत जल्द बाहर आने में हम समर्थ हो सकते हैं।

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