देशी व विदेशी मीडिया की भारत विरोधी जुगलबंदी

देश में कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें मोदी सरकार, भाजपा व राष्ट्रीय विचार रखने वाले व्यक्तियों व संगठनों के खिलाफ अभियान चलाना ही है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इस राजनीतिक खेल को पत्रकारिता का आड़ में अंजाम दिया जा रहा है।

भारतीय मीडिया संभवत: कभी इतना विभाजित नहीं रहा जितना आज हो गया है। एक ओर राष्ट्रीय विचार रखने वाले पत्रकार हैं, दूसरी ओर इन विचारों की आलोचना करने वाले पत्रकार हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमने हाल ही में किसान आंदोलन में देखा है। 26 जनवरी को जिस दिन किसान आंदोलन के नाम पर दिल्ली में अराजकता का माहौल फैलाया जा रहा था, मीडिया के एक हिस्से ने इस आग में घी डालने का काम किया। उनमें से कुछ ने अफवाहों को समाचार के रूप में चलाया। बाद में जब जनता का दबाव बढ़ बया तो उसके संस्थान ने उसे बाहर का रास्ता दिखाया, पर आज भी वह एक प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्र के संपादकीय पृष्ठ पर इकतरफा व पक्षपातपूर्ण लेखन कर रहे हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण हमारे सामने हैं।

देश में कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें मोदी सरकार, भाजपा व राष्ट्रीय विचार रखने वाले व्यक्तियों व संगठनों के खिलाफ अभियान चलाना ही है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इस राजनीतिक खेल को पत्रकारिता का आड़ में अंजाम दिया जा रहा है। एडिटर्स गिल्ड जैसे संगठन भी इन्हीं के द्वारा इस्तेमाल किए जाते हैं। ये सभी वामपंथी विचारधारा से ताल्लुक रखते हैं। ये विशुद्ध रूप से अवसरवादी हैं। इन्हें सरकार में जोड़-तोड़ कर पैसे कमाने या अपने प्रभाव का दुरूपयोग करने का अवसर न मिले तो उन्हें कष्ट होता है। कोई भी सरकार, संस्था या संगठन अगर उन्हें यह सब करने से रोकती है तो वह अनुदारवादी हो जाती है।

ऐसे पत्रकारों की गिरोहबंदी भी जबरदस्त है। उनके पीछे भारत-विरोधी अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का समर्थन भी है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि लगभग आधा दर्जन पत्रकार ऐसे हैं जिनकी दुकानें जब भारत में बंद हो गईं तो उन्हें अचानक ही कई विदेशी समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं में कॉलम लिखने को मिल गए। न तो उनके लेखन का स्तर ऐसा है और न ही उनकी प्रतिष्ठा भारतीय मीडिया जगत में कभी विद्वानों के रूप में रही। पर फिर भी उन्हें ऐसे कॉलम मिल गए। डायशे वैले, बीबीसी, वाशिंगटन पोस्ट, वॉल स्ट्रीट जर्नल सहित मध्यपूर्व के कई अखबार उनके भारत विरोधी कॉलमों को धड़ाधड़ छाप रहे हैं। सोचने की बात है कि निष्पक्षता व संतुलित पत्रकारिता की दुहाई देने वाले इन अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को  पूरे भारत से लिखवाने के लिए राष्ट्रीय विचारों का पक्षधर एक भी पत्रकार क्यों नहीं मिला?

अंतरराष्ट्रीय मीडिया की असलियत

इन दिनों भारत विरोध करने वाले प्रमुख विदेशी मीडिया संस्थान हैं- अल-जज़ीरा, ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कारपोरेशन यानी बीबीसी, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, वॉल स्ट्रीट जनरल, लंदन से निकलने वाला ’द गार्जियन’ आदि।

पहले अल-जज़ीरा के बारे में। इस मीडिया समूह के मालिक हैं कतर के अमीर हामिद बिन खलीफा अल थानी। ज्ञात रहे कि कतर कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का सबसे बड़ा समर्थक और सरपरस्त है। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अल-जज़ीरा भी इसी कट्टरपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाने का एक और माध्यम है। अल जज़ीरा की शुरूआत पश्चिमी देशों और खासकर यहूदियों तथा इजराइल और उसके समर्थकों के खिलाफ प्रोपेगैंडा के लिए की गई थी। पिछले कुछ समय से भारत भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गया है। खासकर 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद भारत को लेकर पूरी तरह से नकारात्मक रिपोर्टिंग इस नेटवर्क द्वारा की जा रहा है। अल-जज़ीरा में सभी भाजपा विरोधी पत्रकारों को खुलकर अपने विचार रखने की जगह दी जा रही है। उनका एक ही एजेंडा है- पूरी दुनिया में यह प्रचारित करो कि भाजपा सरकारों के शासनकाल में मुस्लिम समुदाय की हालत खस्ता है। इस नेटवर्क की तीन शाखाएं हैं- एक अरबी भाषा में, एक अंग्रेजी भाषा में तथा एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है जो मुख्यत: युवाओं में प्रोपेगैंडा के लिए केंद्रित है।

अब बात करते हैं बीबीसी के बारे में। सन् 2013 में ब्रिटेन के थिंक टैंक ’सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज़’ ने  बीबीसी की रिपोर्टिंग पर ’बायस एट द बीब’ नामक विस्तृत शोध रपट जारी की थी। इसके निष्कर्ष कुछ इस प्रकार थे-बीबीसी में वामपंथियों की विचारधारा को खुला समर्थन मिलता है, वामपंथी थिंक टैंक को स्वतंत्र थिंक टैंक बताकर उनके विचारों को बीबीसी के माध्यम से निष्पक्ष विचारों का झूठा लबादा पहनाकर प्रसारित किया जाता है। डा. ओलिवर लाथम की इस रिपोर्ट में इससे पूर्व के भी कई अध्ययनों का जिक्र है जिन सबके निष्कर्ष भी यही थे कि बीबीसी की रिपोर्टिंग पूरी तरहं से पक्षपातपूर्ण है।

हटन रिपोर्ट: इराक में अमेरिका और ब्रिटेन के हमले के बाद ब्रिटेन में लार्ड हटन की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी का गठन किया गया था जिसने बीबीसी को पक्षपातपूर्ण व झूठी रिपोर्टिंग के लिए पूरी तरह से कटघरे में खड़ा कर दिया। हटन रिपोर्ट में कहा गया कि बीबीसी की संपादकीय व्यवस्था नाकारा है। इस रिपोर्ट के बाद बीबीसी के चेयरमैन गेविन डेविस और महानिदेशक ग्रेग डाइक को इस्तीफा देना पड़ा था। इराक में परमाणु व रसायनिक हथियारों को लेकर विवादास्पद रिपोर्टिंग करने वाले रिपोर्टर एंड्रयू गिलिगन को भी बीबीसी से इस्तीफा देना पड़ा था। उस दौर में ब्रिटेन के कई अखबारों ने यह साफ लिखा था कि बीबीसी की पत्रकारिता पूरी तरहं पक्षपातपूर्ण है। बीबीसी की फंडिंग एक मानक लाइसेंस फीस से होती है। ब्रिटेन में जो भी टीवी दशर्क लाइव प्रोग्राम टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल आदि पर देखना चाहता है यां इन्हें डाउनलोड करना चाहता है उसे एक तय लाइसेंस फीस सरकार को देनी पड़ती है जो बीबीसी के लिए बने कोष में जाती है। जरा सोचिए कि सरकारी पैसे से फंडिंग वाली संस्था भला किसी भी तरहं निष्पक्ष मीडिया संस्थान की श्रेणी में कैसे आ सकती है। फंडिंग के इस पैटर्न के बाद यह समझना आसान हो जाता है कि क्यों बीबीसी की रिपोर्टिंग उन देशों में सरकारों और समाजों के खिलाफ है जो कभी ब्रिटेन के उपनिवेश थे। औपनिवेशिक मानसिकता पर आधारित बीबीसी की पत्रकारिता इस बात को सिद्ध करने की प्रयास करती है कि कभी ब्रिटेन के उपनिवेश रहे देशों में ब्रिटेन के हटने के बाद आज अराजकता का माहौल है। ये देश और समाज खुद को संभालने के काबिल नहीं हैं।

एक और प्रत्यक्ष उदाहरण 2015 में पेरिस में आतंकवादी हमले के बाद सामने आया। बीबीसी के रिपोर्टर टिम विलकॉक्स ने हमले के बाद एक ट्वीट किया जिसमें उस आतंकवादी हमले को एक प्रकार से जायज़ ठहराते हुए इसका ठीकरा इजरायल पर फोड़ दिया गया। तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद विलकॉक्स ने इस ट्वीट को तो हटा दिया पर बीबीसी ने सैंकड़ों शिकायतें आने के बाद भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की और न ही इस प्रकरण के लिए खेद तक जताया।

इसी प्रकार बीबीसी ने 2015 में ’द ट्रेन दैट डिवाइड्स जेरूसलम’ शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री का प्रसारण किया जिसमें पक्षपातपूर्ण ढंग से इज़रायल को खलनायक के रूप में तथा फिलिस्तीनियों को पीड़ितों के रूप में प्रदर्शित किया गया। लंदन में इस्रायली दूतावास ने अधिकारिक तौर पर पर डॉक्यूमेंट्री की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।

कश्मीर में भी 27 अगस्त, 2019 को स्थानीय पुलिस अधिकारी इम्तियाज़ अली ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर दंगाइयों के हाथों मारे गए एक गरीब ट्रक ड्राइवर को लेकर बीबीसी की झूठी रिपोर्टिंग का खुलासा करते हुए कहा था, ”बीबीसी उर्दू की स्टोरी में रिपोर्टर ने दंगाइयों की ओर से यह दलील दी कि चूंकि एक ट्रक में सुरक्षा बलों के होने की संभावना है, इसलिए उस ट्रक के चालक को मार देना चाहिए। एक प्रबुद्ध पत्रकार द्वारा इस प्रकार एक हत्या को न्यायोचित ठहराना शर्मनाक है।..” अफवाहों और सूत्रों के आधार पर झूठी व मनगढ़ंत रिपोर्टिंग करने वाले विदेशी मीडिया का यही काला सच है और अब भारतीय मीडिया का एक हिस्सा भी इसमें शामिल हो गया है।

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