अमेरिकी समाज में हिंदू विचार क्यों हुआ इतना प्रतिष्ठित

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कई अमेरिकी राज्यों ने अक्टूबर माह को हिंदू विरासत माह घोषित किया है। उनका मानना है कि हिंदू धर्म ने अपनी अद्वितीय विरासत से अमेरिका के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1960 के दशक में बहुत से अमेरिकियों का हिंदू धर्म से परिचय 'ध्यान' व 'साधना' के माध्ये से…

वैश्विक हिंदुत्व ख़त्म करने का षड़यंत्र

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इनके इस पूरे क्रियाकलाप को यदि आप टुकड़ों में देखेंगे तो वामपंथ समझ में नहीं आएगा परंतु जब अनेक घटनाओं, अलग-अलग परिदृश्य को एकसाथ जोड़कर देखेंगे तो समझ आएगा कि जो स्वयं पर सिविल सोसाइटी लबादा ओढ़े हैं। उस लबादे के पीछे कबीलाई या कहिए वहशी जानवर छिपे हैं। ये सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है।

सीपीईसी को लेकर पाकिस्तान में असंतोष और विरोध

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इस गलियारे को ऊपरी तौर पर केवल व्यापारिक दृष्टि से एक व्यापार संबंधी नया रूट खोलने के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है मगर तथ्य यह है कि सीपीईसी के कारण चीन की पकड़ इस क्षेत्र में जबरदस्त ढंग से मजबूत हो जाएगी और इससे सामरिक संतुलन बिगड़ेगा। खासकर अरब सागर में चीनी विस्तारवाद के लिए ग्वादर एक नया आधार बनेगा। 

ठेंगड़ी, बोकरे व स्वदेशी अर्थशास्त्र

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ठेंगड़ी ने बोकरे को प्रेरित किया कि वह हिंदू धर्मशास्त्रों का अध्ययन कर यह जानने का प्रयास करें कि वहां अर्थशास्त्र अथवा आर्थिक सिद्धांतों के बारे में कितनी जानकारी है तथा वर्तमान में ये जानकारी अथवा शास्त्रीय सिद्धांत कितने प्रासंगिक हैं। बतौर वामपंथी बोकरे ने हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन आरंभ किया और कुछ ही समय में उनकी सोच ही बदल गई। अंतत: अथक परिश्रम के बाद उन्होंने 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका शीर्षक था  ‘हिंदू अर्थशास्त्र: एक अनवरत आर्थिक व्यवस्था’। इस पुस्तक में स्वदेशी मॉडल की बड़ी स्पष्ट रूपरेखा दी गई है।

संघ का गुरु भगवाध्वज

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ध्वज हिंदुओं को त्याग, बलिदान, शौर्य, देशभक्ति आदि की प्रेरणा देने में सदैव सक्षम रहा है। यह ध्वज हिंदू समाज के सतत् संघर्षों और विजयश्री का साक्षी रहा है। ‘भगवा ध्वज’ के बिना हम हिंदू संस्कृति, हिंदू राष्ट्र और हिंदू धर्म की कल्पना नहीं कर सकते।

सावरकर के कालजयी विचार

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कभी ‘धर्मनिरपेक्षता’के नाम पर हिंदुत्व को सांप्रदायिक करार देने वाले, आज मंदिरों में जाकर माथा नवा रहे हैं। राजनीतिक दलों में स्वयं को अधिक से अधिक हिंदुत्वनिष्ठ सिद्ध करने की होड़ है। ऐसे में स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर का स्मरण आवश्यक है।

देशी व विदेशी मीडिया की भारत विरोधी जुगलबंदी

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देश में कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें मोदी सरकार, भाजपा व राष्ट्रीय विचार रखने वाले व्यक्तियों व संगठनों के खिलाफ अभियान चलाना ही है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इस राजनीतिक खेल को पत्रकारिता का आड़ में अंजाम दिया जा रहा है।

चीन की प्रवृत्ति को समझें – श्रीगुरुजी

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चीन की ओर से विश्वासघात के रूप में कुछ हुआ नहीं, क्योंकि उसने तो कभी विश्वास दिलाया ही नहीं था। यह कहना ठीक नहीं कि चीन ने विश्वासघात किया। कहना यह चाहिए कि हम लोगों ने ही चीन की प्रकृति को समझा नहीं।

किसान आंदोलन या कोई बड़ा खेल

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किसान आंदोलन का आरंभ तो संभवत: पंजाब में मोदी विरोध के कारण कांग्रेस ने किया, पर लगता है कि अब यह हाइजैक होकर उन्हीं शक्तियों के हाथों में चला गया जिन्हें हम टुकड़े-टुकड़े गैंग के नाम से जानते हैं।

मदरसे: आतंकवाद की नर्सरी

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कट्टरपंथ और मदरसे के सम्बन्धों पर लंबे समय से बहस चल रही है, लेकिन इनके प्रति राजनीतिक नेतृत्व की नरम स्थिति के कारण, कानून प्रवर्तन एजेंसियां हमेशा कोई कड़ी जांच करने और किसी भी गंभीर कार्रवाई करने में संकोच करती रही हैं।

विश्व बाजार में उभरता भारतीय वस्त्र उद्योग

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सकारात्मक संकेत यह है कि मौजूदा सरकार वस्त्रोद्योग क्षेत्र में ढांचागत सुधार कर इसे फिर से पटरी पर लाकर तेज गति देने की दिशा में प्रयास कर रही है। ’मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के माध्यम से भारत को निर्माण तथा निर्यात का हब बनाने का अभियान चल ही रहा है।

आत्मनिर्भर भारत का वैचारिक अधिष्ठान

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हमें पश्चिमी प्रतिमानों या उदाहरणों का गहराई से अध्ययन विश्लेषण करना चाहिए और यदि संभव हो तो उनसे लाभ भी उठाना चाहिए। लेकिन उन्हें अपने भावी विकास का आदर्श प्रतिमान मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। आत्मनिर्भरता का वैचारिक अधिष्ठान यही है।

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