अखंड भारत की अवधारणा भूगोल गौण, संस्कृति प्रधान

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पश्चिमी परिवेश में रंगी वर्तमान पीढ़ी के लिए राष्ट्र का अर्थ जमीन का टुकड़ा मात्र है इसीलिए उन्हें अखंड भारत अप्रासंगिक लगता है जबकि राष्ट्र व राष्ट्र-राज्य के बीच के अंतर को समझने की आवश्यकता है। अखंड भारत का अर्थ जमीन का टुकड़ा नहीं है बल्कि जिन देशों में पहले सनातन संस्कृति प्रवाहमान थी, वहां एक बार फिर से सनातन संस्कृति जीवन का आधार बन सके।

डॉ. हेडगेवार का वैचारिक अधिष्ठान और संघ

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हिंदू संस्कृति हिंदुस्थान की जीवन-सांस है। यह इसलिए स्पष्ट है कि यदि हिंदुस्थान की रक्षा करनी है तो हमें पहले हिंदू संस्कृति का पोषण करना होगा। अगर हिंदू संस्कृति हिंदुस्थान में ही नष्ट हो जाती है और अगर हिंदू समाज का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो यह उचित नहीं होगा कि हम केवल भौगोलिक सीमाओं की बात करें, जो हिंदुस्थान के नाम पर बची रह जाएंगी। केवल भौगोलिक पिंड कोई राष्ट्र नहीं बनाते।

एक अनवरत सांस्कृतिक प्रवाह है अखंड भारत

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कुल मिलाकर अगर हम अखंड भारत चाहते हैं तो भारतीय संस्कृति जो हिंदू संस्कृति है उसे अपना मानदंड बनाकर चलना होगा। दीनदयाल जी के अखंड भारत के स्वप्न् को साकार करने के आह्वान का आज पुन: स्मरण करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा था, ... हमें हिम्मत हारने की जरूरत नहीं। यदि पिछले सिपाही थके हैं तो नए आगे आएंगे।

बांग्लादेश में हिन्दू उत्पीड़न सदियों पुरानी व्यथा-कथा

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क्या शिक्षा वाकई कट्टरपंथ की प्रभावी काट है? शायद नहीं। कम से कम बंगाल के मामले में तो ऐसा नहीं लगता है। 19वीं सदी में बंगाल के दो प्रमुख अलगाववादी मुस्लिम संगठनों का गठन हुआ। साल 1863 में मुहम्मडन लिटरेरी सोसायटी और 1877 में सेंट्रल मोहम्मडन एसोसिएशन। इन दोनों को चलाने वाले मुस्लिम अभिजात्य वर्ग के लोग थे।

संघ प्रवाही है अत: प्रासंगिक है

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सामान्य तौर पर लोग इस वटवृक्ष को संघ परिवार भी कहते हैं, परंतु संघ का स्वयं का मानना है कि ऐसा कोई संगठनों का समूह उसने तैयार नहीं किया जिसे संघ परिवार कहा जाए। संघ समाज में एक संगठन नहीं है बल्कि समाज का संगठन करने वाला एक सतत प्रवाह है। इसीलिए समय के साथ-साथ इसकी प्रासंगिकता भी बढ़ती रही है।

अमेरिकी समाज में हिंदू विचार क्यों हुआ इतना प्रतिष्ठित

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कई अमेरिकी राज्यों ने अक्टूबर माह को हिंदू विरासत माह घोषित किया है। उनका मानना है कि हिंदू धर्म ने अपनी अद्वितीय विरासत से अमेरिका के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 1960 के दशक में बहुत से अमेरिकियों का हिंदू धर्म से परिचय 'ध्यान' व 'साधना' के माध्ये से…

वैश्विक हिंदुत्व ख़त्म करने का षड़यंत्र

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इनके इस पूरे क्रियाकलाप को यदि आप टुकड़ों में देखेंगे तो वामपंथ समझ में नहीं आएगा परंतु जब अनेक घटनाओं, अलग-अलग परिदृश्य को एकसाथ जोड़कर देखेंगे तो समझ आएगा कि जो स्वयं पर सिविल सोसाइटी लबादा ओढ़े हैं। उस लबादे के पीछे कबीलाई या कहिए वहशी जानवर छिपे हैं। ये सभ्य समाज का हिस्सा नहीं है।

सीपीईसी को लेकर पाकिस्तान में असंतोष और विरोध

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इस गलियारे को ऊपरी तौर पर केवल व्यापारिक दृष्टि से एक व्यापार संबंधी नया रूट खोलने के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है मगर तथ्य यह है कि सीपीईसी के कारण चीन की पकड़ इस क्षेत्र में जबरदस्त ढंग से मजबूत हो जाएगी और इससे सामरिक संतुलन बिगड़ेगा। खासकर अरब सागर में चीनी विस्तारवाद के लिए ग्वादर एक नया आधार बनेगा। 

ठेंगड़ी, बोकरे व स्वदेशी अर्थशास्त्र

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ठेंगड़ी ने बोकरे को प्रेरित किया कि वह हिंदू धर्मशास्त्रों का अध्ययन कर यह जानने का प्रयास करें कि वहां अर्थशास्त्र अथवा आर्थिक सिद्धांतों के बारे में कितनी जानकारी है तथा वर्तमान में ये जानकारी अथवा शास्त्रीय सिद्धांत कितने प्रासंगिक हैं। बतौर वामपंथी बोकरे ने हिंदू शास्त्रों का गहन अध्ययन आरंभ किया और कुछ ही समय में उनकी सोच ही बदल गई। अंतत: अथक परिश्रम के बाद उन्होंने 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों में एक पुस्तक प्रकाशित की जिसका शीर्षक था  ‘हिंदू अर्थशास्त्र: एक अनवरत आर्थिक व्यवस्था’। इस पुस्तक में स्वदेशी मॉडल की बड़ी स्पष्ट रूपरेखा दी गई है।

संघ का गुरु भगवाध्वज

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ध्वज हिंदुओं को त्याग, बलिदान, शौर्य, देशभक्ति आदि की प्रेरणा देने में सदैव सक्षम रहा है। यह ध्वज हिंदू समाज के सतत् संघर्षों और विजयश्री का साक्षी रहा है। ‘भगवा ध्वज’ के बिना हम हिंदू संस्कृति, हिंदू राष्ट्र और हिंदू धर्म की कल्पना नहीं कर सकते।

सावरकर के कालजयी विचार

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कभी ‘धर्मनिरपेक्षता’के नाम पर हिंदुत्व को सांप्रदायिक करार देने वाले, आज मंदिरों में जाकर माथा नवा रहे हैं। राजनीतिक दलों में स्वयं को अधिक से अधिक हिंदुत्वनिष्ठ सिद्ध करने की होड़ है। ऐसे में स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर का स्मरण आवश्यक है।

देशी व विदेशी मीडिया की भारत विरोधी जुगलबंदी

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देश में कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें मोदी सरकार, भाजपा व राष्ट्रीय विचार रखने वाले व्यक्तियों व संगठनों के खिलाफ अभियान चलाना ही है। दुर्भाग्य की बात यह है कि इस राजनीतिक खेल को पत्रकारिता का आड़ में अंजाम दिया जा रहा है।

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