बी स्कूल : समय की आवश्यकता

स्वतंत्रता के बाद जब देश में उच्च शिक्षा की नींव पड रही थी तब विज्ञान, तमनीकी चिकित्सा के बाद कामर्स विषय को भी उच्च शिक्षा की एक महत्वपूर्ण शाखा के रुप में पहचान प्रदान की गयी। कामर्स शिक्षा के लिये प्रावधान करने के पीछे उद्देश्य यह था कि उद्योंग धंधो व व्यापार की समझ तथा शोध देश के तीव्र विकास को बल देगा। स्वतंत्रता के बाद के दो दशकों में हुए वैज्ञानिक व तकनीकी विकास की तीव्र गति की जटीलता को पेशेवा टच देने की आनिवार्यता सर्वप्रथम देश के लब्ध प्रतिष्ठा वैज्ञानिक डॉ. विक्रम साराभाई ने समझा। इसी अनिवार्य आवश्यकता व पेशेवर प्रबंधकों की भविष्य में बढने वाली अनिवार्य भाग को ध्यान में रखते हुए विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में भारतीय प्रबंध संस्था की स्थापना का निर्णय लिया। परन्तु अन्तराष्ट्रिय स्तर के प्रबंधनीय संस्थान की स्थापना में आनेवाली समस्याओं, सर्वोच्च गुणवत्ता वाले शोधपरक आचार्यो की नियुक्ति से जुडे प्रश्नों के स्थितीप्रत व देश की आवश्यकता के अनुकूल उत्तर पाने के उद्देश्य से अमेरीका के उस समय के सर्वाधिक लब्ध प्रतिष्ठित प्रबंधकिय संस्थान हार्वर्ड विजनेस स्कुल से संपर्क साधकर एक एम. ओ. यु साईन करने का निर्णय लिया। उसी के अनुरुप सन 1960 से भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद भारतवर्ष में प्रबंधनीय शिक्षण प्रशिक्षण की महती जिम्मेदारी अमेरीका के हार्वड बिजनेस स्कुल के सहकार्य व मार्गदर्शन के साथ प्रारंभ कर सका। आगे चलकर एक-दो दशकों में अन्य भारतीय प्रबंध संस्थान की विश्व के दुसरे नामी गिरामी संस्थानों से जुडकर बैंगलोर, कलकत्ता, व लखनऊ में भी स्थापित हुए। उन्नीसवी शताब्दी के अन्त तक इन सभी भारतीय प्रबंध संस्थानो के लहराते परचम जो इनसे निकले प्रबंधकों के प्रबंधनीय कौशलव इनके उच्च गुणवत्तापरक शिक्षण -प्रशिक्षण के कारण था, यह निर्विवाद रुप से स्थापित हो गया की अगर भारत के तीव्र विकास गति को और आगे बढाना है तो ऐे ही अन्य नये संस्थानों की स्थापना शाघ्रतिशीघ्र की जानी चाहिए, खाकर उन राज्यों व क्षेत्रों में वहां विकास की किरणे अनेक कारणों से पहुंचने में विलंब हुआ है। परिणामीस्वरुप विभिन्न सरकारों ने बजटीय प्रावधानों व अन्य निर्णय माध्यमों सें अतिरिक्त प्रबंधनीय व तकनीकी संस्थानों जो खखच व खखढ के तर्क पर ही हों निरंहर खोले गये। इस प्रकार ‘अब तक देश में आठ प्रबंधकीय संस्थान खुल चुके हैं जो बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक सोलह तक खुल जायेंगे।

दुसरी तरफ ,राज्य सरकारों को भी आनेवाली नयी सदीं थी तैयारे के लिए प्रबंधकीय संस्थाओं की बढती तादात अनेक कारणों से अत्यंत भावना प्रस्ताव प्रतित होने लगा। एक तरफ लब्धा प्रतिष्ठित बडे व्यवसायिक घरानों को विनियोजन के अच्छे अवसर उपलब्ध कराने का तो दुसरी ओर जनता को प्रदेश के विकास के जीते जागते सबुत न तीव्र विकास के नये उपकरण के रुप में नये नये नीजी प्रबंध इन्स्टीट्युस खोलने की अनुमति भी राजनितीज्ञों की दोहेर फायदों वाला सौदा नजर आये इस कारण से भी संपूर्ण देश में न्तिय नये प्रबंध इन्स्टीट्युस जो एक बार उन्नीसवी शदी के अन्त में तेजी से खुलना प्रारंभ हुए तो नयी सदी के दुसरे सदी में ही आकर थमे जब इनकी संख्या 3000 को भी पार कर गयी। इतनी बडी संख्या में प्रबंध का शिक्षण प्रशिक्षण प्रदान करने वाले इन्स्टीट्युस खुले हो गये परन्तु इनकी गुणवत्ता पर बिना कोई ध्यान दिये सिर्फ एक तेजी से पैसा कमाने वाला बिजनेस भर जाने के परिणाम स्वरुप शीघ्र ही इनसे पास होकर निकलने वाला ग्रेजयुएट बी. ए और एम. ए से भी बहतर साबित होने लगा। जो बिना किसी स्किल के बाज के लिए पुर्णत: अनुपयोगी सिद्ध होने लगा। तब इन डिग्रीयों का मुल्य रोजगार के दृष्टिकोन से शुन्य हो गया। अत्यंत स्वाभाविक भी था। ऐसी स्थिति में 2014-15 तक दोनों अभिवाव को और यहां तक रोजगार दाताओं का भी एम वी ए से पूर्णत: मोहभंग हो गया। एक बार पुन: शिक्षा व शैक्षणिक संस्थाओं से लेकर नितीनियमों तथा सत्ता के गलियारों तक इस प्रश्न पर गंभीर चर्चा प्रारंभ हो गई। कि आखिर वी स्कूल की तेजी से खडी की गई इस सेना का क्या कोई भविष्य संभव है?

दरअसल कसी की पेशवर पाठ्य क्रम की यह पहली आवश्यकता होती है कि यह ज्ञान की तुलना में कौशल उत्पन्न कर सके जो बाजार की मांगे को अनुरुप समस्याओं का समुचित समाधान प्रस्तुत कर सकने में सफल हो सके। अन्यथा इन्हे दिला जाने वाला वेतन अनुत्पादक व्यय बनकर रह जायेगा और रोजगारदाता शीघ्रतिशीघ्र इस अनुत्पादक अनुबती व्यय से छुटकार पाने को अधीर हो जायेगा। प्रबंधकीय संस्थान जो तेजी से धन व लाभ कमाने के लिये खोले गये थे उनकी सुची में पाठ्यक्रम गुणवत्तापुर्ण शिक्षण प्रशिक्षण के लिए योग्य फेकल्टी योग्य आवेदनक का चुनाव आदि जैसे महत्वपुर्ण पहलू व प्रश्न कहीं थे ही नही अत: प्रबंधकीय कोर्स एम.बी.ए की जंगल की आग जैसी बडी मांग को छडाम होने मात्र दो साल ही लगें जो बिलकुल ही स्वाभाविक था। इन प्रबंधकीय संस्थाओं व इनकी उत्पादेयता के इस स्वाभाविक दुर्दशा का और महत्वपुर्ण कारण नीती नियमों को की अदुरदर्शिता भी रही । गैर एकडामिक सोचपर अधारित राज्य सरकारों की नये संस्थाओं की नितीयां आवश्यक व अनावश्यक को ठीक ढंग से फिल्टर न कर सकी और न केवल संस्थशए वरण एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक व पेशवर शैक्षणिक क्षेत्र की अनावश्यक दुर्दशा हुयी।

अनावश्यक दचर्दशा कहने के पीछे कारण यह है कि नि:संदेश प्रबंधशास्त्र शिक्षण व प्रशिक्षण का एक ऐसा महत्वपूर्ण क्षेत्र है जिसकी कमी अथवा गुणवत्ता की कमी किसी भी विकासशील देश के विकास के अत्यंत महत्वपुर्ण योजनाओं को धुल धुसरित करके रख देगा। दूसरे शब्दों में योग्य प्रबंधक एक तरह से उत्पादन व विकास के ऐसे अदृश्य कारक हैं जिनका अभाव अन्य समस्त संसाधनों व प्रयास को वास्तविकता व लक्ष्य में परिवतित होने से बहुत पहले ही रोक देगा। इस प्रकार यह तो निर्विवाद रुप से सत्य है कि किसी भी देश अर्थव्यवस्था, संस्थान, बाजार या इण्डस्ट्री को उसके अपन्तिय लक्ष्य तक योग्य प्रबंधक ही पहुंचा सकते हैं, जो उत्पादन के मानवीय व गैर मानवीय सभी संसाधनों की अगुवाई करता है। जब तक यह अगुवाई या लीडरशीप इस योग्य नही होगा जो आज के वैश्विक परिवेश में भी भविष्य का सटीक अनुमान लगाकर आज ही ऐसी राजनितीयां बनाले जिनका सफल क्रियान्वयन किसी भी योजना को उसके लक्ष्य तक पहुंचाने में आने वाली प्रत्येक संभावित, असंभावित बाधाओं को चीर कर सफलता को ही गले लगाये।

ऐसे कुशल व अनेक कौशलयुक्त प्रबंधक ही सदैव से सफलता के वाहक बनते रहे हैं जिन्होंने एक दो बार नही बल्कि बार बार और हर बार प्रत्येक अच्छे बुरे परिस्थिति में अपने लक्ष्य तक पहुंच कर अपनी प्रबंधकीय क्षमता व कौशल का लोहा पूरे विश्व को अनेक बार मनवाया है। अब प्रश्न यह है कि संसार के अन्य देशों के और भारत के भी सफल प्रबंधकीय संस्थाओं से सीख लेकर किस प्रकार की नीतीयां बनाई जाएं जिससे भारतीय परिवेश व बाजार के अनुरुप आगामी वर्षो में ऐसे प्रबंधकों की फसल जा सके जो मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया स्टैड अप इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसी अत्यंत लुभावनी नीतीयां बना देना तो आसान है लेकिन इन्हें वास्तविकता में बदल देना उतना ही कठिन लक्ष्य को तभी साधा जा सकता है जब की इसके साधक के रुप में अत्यंत मजबुत, कौश्यल्ययुक्त ऐसे प्रबंधक इन्हें क्रियान्वीत करें जिनके शब्दकोश में असफलता अथवा अकौशल्य होता ही न हो।

इसके लिए आवश्यक होगा की –

1. संस्थाओं को प्रारंभ करने, संचालित करने, संसाधन प्राप्त करने व इनके बाजार की मांग के अनुरुप कार्य करने संबधी राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय प्रबंध संस्थानों की अगुवाई में नीती बनाई जाये जो संधीय व्यवस्था होने के बावजुद अन्तर्राष्ट्रीय परिणामों का नीती की दशा में अनदेखा न कर सके।

2. अन्तराष्ट्रीय रैंक होल्डर प्रबंधकीय संस्थानों के साथ साइन किए जांए जो स्थानिय संस्थानों को अन्तराष्ट्रीय पैमाने पर खरा उतरने के योग्य बनाए की व धुलें मिले थी

3. केस स्टडी नेथड, ऑन जाब ट्रेनिंग, शिक्षण पूर्व अनुभव, फैकल्टी व छात्र विनिमय कार्यक्रम अनिवार्य कौशल विकास सुनिश्चित हो, मात्र डीग्री देकर युवा पीढी व अभिवावके में भ्रम पैदा कर मात्र धन कमाना प्रबंधकीय संस्थाओं का उद्देश्य नीती भी दशा में न बनने पाये, इसका समय समय पर अकादमिक आडिट हो।

4. योग्य शिक्षकों का चयन कर सभी शैक्षनिक रिक्तियों को भरें व पहले से ही सफल संस्थाओं की पूर्ण प्रवेश क्षमता का न केवल उपयोग करें, बल्कि जहां भी संभव हो सीट्स बढाकर भी हम उपलब्ध भी हम उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम प्रयोग सुनिश्चित करें।

5. इन संस्थानों में प्रवेश परिक्षा एक ही परिक्षा प्रणाली व व्यवस्था के अन्तर्गत हो जो संस्थानों के प्रत्यायन व मूल्यांकन का भी आधार बने। इससे कालान्तर में अन्तर संस्थान स्वस्थ प्रतियोगिता का प्रदुर्भाव हो सकेगा जो प्रत्येक स्टेकहोल्डर के हित में भी होगा और पारदर्शिता का मार्गे भी प्रशस्त करेगा।

आशा ही नही वरन पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि वर्तमान में बी स्कूल जो निरंतर अपना मूल्य खोटे जा रहे हैं, समाज में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा कने के बावजुद उन्हें आंकडो में भी अपनी उपादेयताहासिल करनी हैगी जो बगैर उपरोक्त वार्णित पांच अनिवार्य के बगैर हासिल नही हो सकता।
प्रा.अजय गुप्ता

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