‘मेक इन इंडिया’ और कौशल विकास

‘मेक इन इंडिया’ मानव संसाधनों के कौशल विकास पर अधिक बल देता है। इससे युवा पीढ़ी को नई प्रौद्योगिकियों को अवगत करने और उद्योगों की नींव मजबूत होने में सहायता मिलेगी। जरूरी है कि सरकार उद्योगों से सहयोग लेकर इसे भलीभांति लागू करने पर अधिक बल दें।

भारतीय उद्योगों के लिए ‘मेक इन इंडिया’ की प्रभावी पहल का उद्देश्य भारतीय उद्योगों को वैश्विक स्पर्धा का सामना करने के लिए तैयार करना है; ताकि वे न केवल स्वदेशी बल्कि वैश्विक बाजारों में अपना स्थान बना सके। इसके लिए विश्व स्तर की कुशल श्रमशक्ति की अत्यंत आवश्यकता है। ‘मेक इन इंडिया’ के कारण कार्पोरेट जगत को अपने मानव संसाधन कार्याें को लेकर सक्षम बनना होगा; ताकि वर्तमान कारोबार तो जारी रहे ही, भविष्य में उसका विकास हो। इसके लिए आवश्यक प्रतिभाओं की पहचान करनी होगी, और यह भी देखना होगा कि प्रतिभाओं को किस तरह आकर्षित करें, उन्हें अपने साथ कैसे बनाए रखें और उनका किस तरह संवर्धन हो।

विनिर्माण क्षेत्र अब प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए आईटी/आईटीईएस, सेवा आदि क्षेत्रों से स्पर्धा में उतर गया लगता है। विनिर्माण के क्षेत्र में प्रतिभाओं को आकर्षित करना, उन्हें रोजगार देना और सेवा में बनाए रखना लगातार जटिल होता जा रहा है।

छोटे और मध्यम प्रतिष्ठानों (एसएमई) के लिए सभी स्तरों पर सर्वोच्च प्रतिभाओं को आकर्षित करना दिक्कत का काम होता है। इन प्रतिष्ठानों में प्रतिभाओं को सेवानियोजित करने की प्रक्रिया ऐसी है कि सही प्रतिभा, सही कौशल एवं सही बर्ताव वाले लोगों को सेवा में लाना संभव नहीं होता। यही नहीं, ये प्रतिष्ठान उच्च श्रेणी के कौशल वाले व्यक्तियों को अपने यहां बनाए रखने में भी कठिनाई अनुभव करते हैं। इसके कुछ कारण निम्न हैं-

* योग्यताप्राप्त प्रतिभाओं की मांग उपलब्धता से अधिक है।
* उच्च कार्य निष्पादन करने वाले लोग बड़े प्रतिष्ठानों/ओईएम में जाना पसंद करते हैं ताकि अधिक पारिश्रमिक, व्यापक एवं चुनौतीपूर्ण अवसर पा सकें।
* डीलरों एवं छोटे कारोबारियों के पास करिअर के सीमित आकर्षण होते हैं। इन स्थानों पर करिअर प्रगति के अवसर एवं कार्य करने का माहौल बहुत अनुकूल नहीं होता।

अतः मानव संसाधन प्रक्रिया को, विशेष रूप से सेवानियोजन, वेतन स्तर, करिअर प्रगति के अवसरों तथा कार्य-माहौल के मामले में, और मजबूत बनाना होगा, ताकि उपर्युक्त चुनौतियों का सामना किया जा सके।
‘मेक इन इंडिया’ के तहत लोगों का कौशल विकास कर कुशल लोगों का एक विशाल वर्ग कायम करना महत्वपूर्ण कार्य है। हालांकि, उद्योग क्षेत्र उनसे सम्बंधित कौशल विकास के मामले में कई बड़ी चुनौतियां अनुभव करता है, जो निम्न हैं-

* क्या उपलब्ध मानव संसाधनों का उपयोग करने के लिए उद्योग तैयार हैं, और क्या विनिर्माण एवं आरएण्डडी क्षेत्र में वीयूसीए (इसे आगे स्पष्ट किया गया है) माहौल में उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए उद्योग क्षेत्र के पास आवश्यक कौशल है?
* क्या ऐसे नए कौशल हैं जो उद्योगों के लिए अब अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं?
* क्या वर्तमान सरकार एवं उद्योगों की पहल पर्याप्त है?

वीयूसीए शब्द अंग्रेजी शब्दों का संक्षेपीकरण है। इसमें पहला अक्षर वी वोलाटिलिटी अर्थात तीव्र बदलाव (परिवर्तन के स्वरूप एवं प्रभावोत्पादकता, तथा परिवर्तित बल के स्वरूप एवं गति और परिवर्तन प्रेरक) की ओर संकेत करता है। दूसरा अक्षर यू अनसर्टनिटी अर्थात अनिश्चितता (अंदाजा लगाना असंभव, अचानक घटित की संभावना, और मुद्दों व घटनाओं के प्रति समझ एवं सतर्कता की भावना) का संकेत करता है। तीसरा अक्षर सी काम्प्लेक्सिटी अर्थात जटिलता (विभिन्न बलों का संमिश्रण, विभिन्न समस्याओं का बोलबाला एवं संगठन के बारे में अस्तव्यस्तता तथा संभ्रम) का द्योतक है, जबकि अंतिम अक्षर ए एम्बिग्यूटी अर्थात संदिग्धता (वास्तविकता के प्रति अस्पष्टता, ठीक से न समझना, विषयों के अर्थों की घालमेल, कारण एवं परिणामों के बारे में संदेह) को इंगित करता है। वीयूसीए का आम उपयोग 1990 के दशक में आरंभ हुआ। मूलतया यह संक्षिप्तिकरण फौजी शब्दकोश से आया है और रणनीतिक नेतृत्व के समक्ष उपस्थित नई कल्पनाओं के लिए इसका उपयोग किया जाता रहा है, जिसमें लाभप्रद उत्पादन से लेकर शिक्षा समेत संगठनों की व्यापक परिधि तक शामिल है।

प्रौद्योगिकी का स्वीकार

वर्तमान में लगातार बढ़ते वीयूसीए माहौल में वही बचेंगे या विकसित होंगे जो नई प्रौद्योगिकियों को स्वीकार करेंगे जैसे कि बाहरी प्रौद्योगिकियों का अपने उद्यमों में लगातार उपयोग करना एवं नई कल्पनाओं को लागू करना। दुनिया अब सीधी लकीर में चलने वाली नहीं रही है और वह जटिल व्यावहारिक प्रणाली में बदलती जा रही है। फलस्वरूप उद्योगों को बेहतर समन्वित रूप लेना होगा, विशेष रूप से स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास तथा सम्बंधित ज्ञान सीमित रखने वाले छोटे एवं मध्यम प्रतिष्ठानों को इस बारे में सतर्क रहना होगा। इसके जरिए उच्च तकनीकी ज्ञान रखने वाली युवा पीढ़ी को इस तरह विकसित करना होगा ताकि वह क्षेत्रविशेष के लिए उपयुक्त विशेष कौशल को प्राप्त करें।

साइबरनॉमिक्स

यह केवल नई प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की क्षमता हासिल करना है, विशेष रूप से वेब 2.0, विशाल डाटा क्षमता एवं डिजिटायजेशन। यहां भी, छोटे एवे मध्यम प्रतिष्ठान इस पांचवें क्षेत्र में अपने कौशल से निर्णायक लाभ पा सकते हैं और अपने प्रतिष्ठान को तत्पर मॉड्यूलर ढांचे के साथ मजबूत एवं मूल्यवान बनाकर अधिक सम्पन्न बना सकते हैं।

विशेष शक्तियां

छोटे एवं मध्यम प्रतिष्ठानों को अब परम्परागत पैतृक ढांचे की अपेक्षा एक निश्चित समय में किसी लक्ष्यविशेष को प्राप्त करने वाली छोटी, बहुक्षेत्रीय, स्वायत्त एवं समर्पित टीम पर अधिकाधिक निर्भर होना पड़ेगा। ऐसी टीमों, या उसके एक बड़े भाग को, आवश्यकता के अनुसार अस्थायी तौर पर काम पर लगाकर निश्चित रूप से मूल्य-निर्माण किया जा सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में उनकी विशेषता, प्रतिबद्वता प्रेरणा का उपयोग कर श्रमशक्ति का महत्तम उपयोग किया जा सकता है।

बेहद तत्परता

वीयूसीए की दुनिया में, प्रतिष्ठानों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे परिस्थितियों में किसी भी परिवर्तन का ध्यान रखें और स्वयं को अविलम्ब उसके साथ समायोजित करें। इसके लिए बड़े पैमाने पर विकेंद्रीकरण की आवश्यकता होगी- स्थानीय इकाइयों को अपने निर्णय स्वयं करने की स्वतंत्रता देते हुए एक सशक्त निर्णय-कमान का होना आवश्यक है। इससे विकेंद्रीत इकाइयों को आदेश की प्रतीक्षा की अपेक्षा स्वयं सोचना और निर्णय करना होगा।

खुलापन

आज की बढ़ती जटिलताओं की दुनिया में, इसमें आश्चर्य नहीं है कि वे ही लोग अधिक सफल रहे हैं जिन्होंने विभिन्न फर्मों, ग्राहकों, सार्वजनिक सेवाओं, स्थानीय भागीदारों, एवं अन्यों से मजबूत सहयोगी भागीदारी कायम की है। ऐसा सहयोग केवल कारोबार तक ही सीमिन नहीं रहना चाहिए तथा दैनिक व्यवहारों में भी इस ‘सहयोगी प्रतिभा’ का अधिकाधिक उपयोग किया जाना चाहिए।

अंतर को पाटनाः वर्तमान पहल

वर्ष 2015 की अर्नेस्ट एण्ड यंग की रिपोर्ट में कहा गया है कि आईटीआई जैसे संस्थान कुशल श्रमशक्ति की उद्योगों की मांग को पूरा करने में असमर्थ हैं, जिससे निजी एवं डिप्लोमा संस्थानों पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है। इसके कारण हैं- उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुसार तकनीकी पाठ्यक्रमों का न होना, प्रौद्योगिकी में हुए बदलाओं से अध्यापकों का अपरिचित होना तथा आईटीआई संस्थानों में ढांचागत सुधार न होना आदि। सरकार ने इन महत्वपूर्ण मुद्दों के मद्देनजर प्रशिक्षणार्थी कानून में संशोधन की दिशा में कदम उठाए हैं-

* व्यवसायगत एवं इकाईगत निर्धारित संख्या खत्म करना।
* प्रशिक्षणार्थियों को लेने के लिए न्यूनतम एवं अधिकतम सीमा निर्धारित करना।
* प्रशिक्षणार्थियों की छात्रवृत्ति को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ना।
* सभी स्नातकपूर्व, स्नातकोत्तर एवं अन्य मान्यताप्राप्त व्यावयायिक पाठ्यक्रमों को शामिल करना।
* उद्योगों की आवश्यकता के अनुसार प्रशिक्षणार्थियों के पाठ्यक्रमों में संशोधन करना।
* सरकार की ओर से दण्डात्मक उपायों के जरिए योजना को लागू करने की अपेक्षा उद्योगों द्वारा स्वयं नियमन एवं निरीक्षण को बढ़ावा देना।
* मंजूरियों में गति एवं पारदर्शिता लाने के लिए ऑन-लाइन पोर्टल
योग्यता-वेतन ग्रिड का विकास।

किसी व्यक्ति के लिए जरूरी योग्यता को परिभाषित करने एवं उनका आदर्श वेतन के साथ सहसम्बंध स्थापित करने के सामान्यतः स्वीकृत मानकों का अभाव एक और चुनौती है, जिस पर नेशनल स्किल क्वालिफिकेशन फ्रेमवर्क (एनएसक्यूएफ) विचार कर रहा है। एनएसक्यूएफ ने उद्योगों में कई व्यवसायों के लिए योग्यता ढांचा एवं मानक इस तरह तैयार किए हैं-

* सेक्टर स्किल काउंसिल (एसएससी) द्वारा विभिन्न जॉब के लिए नेशनल आक्युपेशनल स्टैण्डर्ड (एनओएस) का निर्माण।
* 10 योग्यता स्तरों की स्थापना, जिससे कौशल स्तर पर सीधे विकास की संभावना।
* ऐसे योग्यता स्तर को शामिल किया गया जिससे शैक्षणिक रूप से पीछे रहने वाले/स्कूल छोड़ चुके, 10वीं/12वीं पास करने वाले अपनी आजीविका चलाने के लिए कोशल को प्राप्त कर सके।

लिहाजा, ऊपर उल्लेखित कदम तभी सफल साबित होंगे जब सरकार उद्योगों के सहयोग से इन्हें यथोचित रूप से लागू करने पर अधिक बल दें। उद्योगों को अकादमिक क्षेत्र के सहयोग से विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने एवं लागू करने की पहल करनी होगी। प्रौद्योगिकी का उपयोग एवं ओटीजी के पूरक के रूप में नई प्रणालियों का इस्तेमाल करना होगा। बड़े प्रतिष्ठानों को अपने कर्मचारियों एवं पर्यावरण सहयोगियों के लिए प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना का करनी होगी। ये कुछ ऐसी बातें हैं जो ‘मेक इन इंडिया’ को सफल बनाएगी।

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