बंगाल में भाजपा का उदय

गृहमंत्री अमित शाह की रैली एवं रोड शो में उमड़ी जबरदस्त भीड़ और मेदिनीपुर व उसके आस-पास के 50 विधानसभा सीटों पर अच्छा-खासा प्रभाव रखने वाले शुवेंदु अधिकारी समेत लगभग 10 विधायकों एवं अनेक सांसदों का बीजेपी में शामिल होना आगामी विधानसभा चुनाव की तस्वीरें साफ़ करता है।

बंगाल की प्रतिभा एवं बौद्धिकता को देखकर उसे जानने वाला देश-दुनिया का प्रायः हर जागरूक व्यक्ति सहसा अचंभित रह जाता है। पर कैसी विचित्र विडंबना है कि जो बंगाल कला, सिनेमा, संगीत, साहित्य, संस्कृति की समृद्ध विरासत और बौद्धिक श्रेष्ठता के लिए देश ही नहीं पूरी दुनिया में विख्यात रहा हो, वह आज चुनावी हिंसा, अराजकता, रक्तपात, राजनीतिक हत्याओं के लिए जाना-पहचाना जाने लगा है। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो जब वहां होने वाली हिंसक राजनीतिक झड़पें अख़बारों की सुर्खियां न बनती हों। राज्य विधानसभा के लिए चले रहे चुनाव-प्रचार के दौरान इस बार वहां भाषा की मर्यादा का जमकर उल्लंघन हुआ, नैतिकता एवं मनुष्यता को ताक पर रख दिया गया, संसदीय परंपराओं की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की झड़ी लगा दी गई, कोविड के संक्रमण से बचाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा निर्गत निर्देशों की घनघोर उपेक्षा एवं अवमानना की गई और सख़्ती किए जाने पर चुनाव-आयोग एवं केंद्रीय सुरक्षा बल जैसी संस्थाओं की साख़ एवं विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचाई गई। चौथे चरण के मतदान के दौरान कूचबिहार में भड़की हिंसा के लिए तो सीधे तौर पर देश के गृहमंत्री तक पर आरोप मढ़ दिया गया। यहां तक कि चुनावी रंजिशों से उठती हिंसक लपटों ने स्त्री-पुरुष-बाल-वृद्ध-जवान किसी को नहीं बख़्शा। 82 वर्षीय शोभा मजूमदार के सूजे हुए होंठ और चोटिल चेहरा को भुला पाना कदाचित किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए संभव नहीं। चुनावी हिंसा की इससे क्रूर, विद्रूप एवं भयानक तस्वीर कोई अन्य नहीं याद आती। उस बूढ़ी मां का दोष केवल इतना था कि उसका बेटा सत्तारूढ़ दल की विचारधारा और नीतियों से असहमत था। अपने बेटे के इस (दुः)साहस का दंड उसे अपने प्राणों की बलि देकर चुकाना पड़ा। ऐसे कितने ही निर्दोषों या बदलाव की कामना रखने वाले भद्र मानुषों को सत्तारूढ़ दल से असहमत होने की क़ीमत  जान देकर चुकानी पड़ी। त्रिलोचन महतो, अशोक सरकार, गोकुल जेना, गणपति मोहता, मनीष शुक्ला, देवेंद्र नाथ राय, गणेश राय, चंद्र हलदर, पूर्ण चरणदास, रॉबिन पाल, सुखदेव प्रामाणिक जैसे दर्जनों बीजेपी कार्यकर्त्ताओं-नेताओं की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। चाहे वह वामपंथी दल का शासन हो या उसके बाद सत्ता पर आरूढ़ तृणमूल कांग्रेस का, दोनों ने हिंसा और हत्या को राजनीतिक उपकरण की तरह इस्तेमाल किया। क्या ऐसे ही बंगाल की कल्पना बंकिम-रवींद्र-सुभाष ने की होगी? क्या यह महाप्रभु चैतन्य, परमहंस रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का बंगाल है? क्या इन मनीषियों में अपार श्रद्धा रखने वाले तमाम बंगालियों एवं समस्त भारतवासियों ने सपने में भी ऐसे बंगाल की कल्पना की होगी? वामपंथियों के शासन-काल से भी अधिक भयावह-रक्तरंजित वर्तमान परिवेश में ममता बनर्जी द्वारा दिया गया ‘मां, माटी, मानुष’ का लोकप्रिय नारा क्या केवल छलावा नहीं लगता? क्या पश्चिम बंगाल की कथित बौद्धिकता पर ऐसी क्रूर एवं वीभत्स हिंसा प्रश्नचिह्न नहीं लगाती? बंगाली अस्मिता के नाम पर सत्ता की मंजिलें तय करने वाले दलों एवं नेताओं को क्या ऐसी हिंसा एवं अराजकता पर ग्लानि एवं पश्चाताप नहीं होना चाहिए?

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक चाल-चरित्र में बीते छह दशकों से व्याप्त हिंसा के उत्तरदायी मूल कारणों और कारकों की कभी खुली, स्पष्ट एवं ईमानदार विवेचना भी नहीं करते? क्योंकि इस देश के अधिकांश बुद्धिजीवियों में वामपंथी झुकाव या वैचारिक ख़ेमेबाजी के कारण उसके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं है। ऐसा करते ही उन्हें सत्ता-संस्थान में वर्षों से प्रतिष्ठापित वामपंथी ‘दिग्गजों’ का कोप-भाजन बनने या प्रशंसा-प्रसिद्धि-पहचान-पुरस्कार से वंचित होने का डर सताने लगता है। इसलिए वे हिंसा एवं ख़ूनी क्रांति में विश्वास रखने वाले वामपंथियों को कठघरे में खड़ा करने या उनसे तीखे सवाल पूछने से बचते हैं? तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी निरंकुश एवं सर्वाधिकारवादी वामपंथियों के शासन को उखाड़ जब 2011 में सत्तासीन हुईं तो एक उम्मीद जगी। वे खुद अनेक बार वामपंथी हिंसा का शिकार  हुईं थीं। लोगों को लगा कि वे अवश्य वहां वांछित परिवर्तन लाते हुए आम जनता को राजनीतिक हिंसा से मुक्ति दिलाएंगीं, हिंसक दौर का निश्चित अंत एवं अवसान होगा। पर हुआ इसके ठीक विपरीत। सत्ता से बेदख़ल होने के बाद सरकारी सुविधाओं एवं पैसों की मलाई खाने के अभ्यस्त वामपंथी कैडरों और स्थानीय नेताओं-दबंगों ने तृणमूल का दामन थाम लिया। परिणामतः बंगाल की राजनीति का हिंसक रक्तचरित्र यथावत बना रहा। सत्ता बदली, पर सत्ता का कम्यूनिस्टिक चरित्र नहीं बदला। सत्ता को मिलने वाली चुनौती यथास्थितिवादियों को न तब स्वीकार थी, न अब। वस्तुतः नेतृत्व के पास यदि नीति, नीयत और दृष्टि हो तो कार्यकर्त्ताओं को दिशा मिलती है। पर दिशा और दृष्टि तो दूर, ममता बनर्जी का तल्ख़ तेवर, आक्रामक अंदाज़ और गुस्सैल मिज़ाज उनके कार्यकर्त्ताओं को हिंसा के लिए ही उकसाता है। और कोढ़ में खाज जैसी स्थिति हाल के वर्षों में तेज़ी से बदलती वहां की डेमोग्राफी, रोहिंग्याओं व बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती तादाद, सत्तारूढ़ दल द्वारा वोट-बैंक के लालच में उनका भयानक पोषण-संरक्षण-तुष्टिकरण से निर्मित होती चली गई। दरअसल, आज वहां जो संघर्ष दिख रहा है, वह प्रतिगामी-यथास्थितिवादी और प्रगत-परिवर्तनकामी शक्तियों के मध्य है।

भाजपा की सक्रिय उपस्थिति, बढ़ते जनाधार, केंद्रीय मंत्रियों के लगातार दौरे, तृणमूल में मची टूट-फूट व भगदड़ और प्रधानमंत्री की रैलियों में उमड़ने वाली अपार भीड़ के पश्चात् यह संघर्ष और खुले रूप से सतह पर आने लगा है। ममता को अपनी राजनीतिक ज़मीन का इतनी तेज़ी से दरकना और खिसकना स्वीकार्य नहीं। पहले तो भय दिखाकर उन्होंने अपने विरोधियों को रोकने की भरसक कोशिश की। राज्य में सत्ताधारी तृणमूल का ऐसा खौफ़ रहा है कि 2018 में हुए पंचायत चुनाव में उसके लगभग 35 प्रतिशत उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए थे, क्योंकि तब उनके ख़िलाफ़ जाकर पर्चा दाख़िल करने का साहस तक कोई नहीं जुटा सका था। पर, 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तृणमूल से केवल 3 प्रतिशत कम यानि 40.3 प्रतिशत वोट हासिल करके राज्य की 42 में से 18 सीटों पर जीत दर्ज़ की। इस ऐतिहासिक जीत के बाद भाजपा कार्यकर्त्ताओं में भी साहस एवं उत्साह का संचार हुआ है। वे सरकारी संरक्षण में फल-फूल रहे तृणमूल कार्यकर्त्ताओं और नेताओं का खुलकर प्रतिकार करने लगे हैं। अल्पसंख्यकों के भयावह तुष्टिकरण और बहुसंख्यकों की घनघोर उपेक्षा का अब वहां डटकर विरोध किया जाने लगा है। ममता के काफिलों के गुज़रने पर स्थानीय लोगों द्वारा जय श्रीराम के नारे लगाए जाने लगे हैं। जो तल्ख़ तेवर एवं बाग़ी अंदाज़ कभी ममता की ताक़त हुआ करती थी, आज उनकी कुढ़न और कमज़ोरी मानी जाने लगी है। ‘दीदी, ओ दीदी’, कहे जाने तक पर वे प्रतिक्रिया देने लगी हैं। पिछले साल अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा, कुछ समय पूर्व हुई अनेक बीजेपी नेताओं-कार्यकर्त्ताओं की हत्या और हाल ही में बीजेपी अध्यक्ष जे.पी.नड्डा और कैलाश विजयवर्गीय के काफ़िले पर हुए हमले ने पश्चिम बंगाल में सियासी पारे को परवान चढ़ाया है।

गृहमंत्री अमित शाह की रैली एवं रोड शो में उमड़ी जबरदस्त भीड़ और मेदिनीपुर व उसके आस-पास के 50 विधानसभा सीटों पर अच्छा-खासा प्रभाव रखने वाले शुवेंदु अधिकारी समेत लगभग 10 विधायकों एवं अनेक सांसदों का बीजेपी में शामिल होना आगामी विधानसभा चुनाव की तस्वीरें साफ़ करता है। पर, राजनीति की बिसात पर तब तक न जाने और कितने मासूमों-बेगुनाहों को वहां अपनी कुर्बानी देनी पड़े? यह कम-से-कम बंकिम का सुजलाम, सुफलाम् …शस्यश्यामलाम् या टैगोर का 1906 में लिखा आमार शोनार बांग्ला वाला बंगाल तो बिलकुल नहीं है। कोई भी भद्र बंगाली मानुष या भारतीय ऐसे हिंसक सत्ता-तंत्र की दुःस्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता। देखना रोचक होगा कि पश्चिम बंगाल में हिंसा एवं अराजकता की राजनीति का यह खेल यों ही दिनानुदिन चलता रहेगा या वांछित एवं सुखद परिवर्तन आएगा?

 

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