गृहयुद्ध की आग में झुलसता म्यांमार

इन सारे सवालों से जुड़ा सवाल है कि भारत चुप क्यों है? इस समय भारत उतनी शिद्दत के साथ सैन्य शासन के विरुद्ध क्यों नहीं बोल रहा, जैसा 1988 में बोलता था? सवाल यह भी है कि उससे हमें मिला क्या? हमारे रिश्ते खराब हुए, जिनका लाभ चीन को मिला। म्यांमार में चीन की दिलचस्पी किसी से छिपी नहीं है।

म्यांमार की फौज ने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार का तख्ता-पलट करके दुनियाभर का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। सेनाध्यक्ष मिन आंग लाइंग के हाथों में सत्ता है और देश की सर्वोच्च नेता आंग सान सू ची तथा राष्ट्रपति विन म्यिंट समेत अनेक राजनेता नेता हिरासत में हैं, संसद भंग कर दी गई है और सत्ताधारी नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) के ज्यादातर नेता गिरफ्तार कर लिए गए हैं या घरों में नजरबंद हैं।

दूसरी तरफ़ पूरे देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का आंदोलन चल रहा है। एक तरह से गृहयुद्ध की स्थिति है। हिंसा में अबतक सात सौ ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है। पिछली 9 अप्रैल को सुरक्षाबलों ने यंगून शहर के पास प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं, जिससे 80 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई। सेना का कहना है कि उसने देश में तख़्तापलट इसलिए किया क्योंकि नवंबर में आंग सान सू ची की पार्टी ने हेरफेर से चुनाव जीता था। एनएलडी ने नवंबर में हुए चुनाव में भारी जीत हासिल की थी। चुनाव के आधार पर नवगठित संसद का अधिवेशन 1फ़रवरी से होना था। सेना कह रही थी कि चुनाव में धांधली हुई है, जो हमें मंजूर नहीं। सेनाध्यक्ष मिन आंग लाइंग ने नई संसद का सत्र शुरू होने के एक हफ़्ते पहले धमकी दी थी कि संसद को भंग कर देंगे। एनएलडी ने इस धमकी की अनदेखी की।

सैनिक शासन

सत्ता से बेदख़ल कर दिए गए नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् से सेना के ख़िलाफ़ कार्रवाई की अपील की।बेदख़ल सांसदों की ओर से कार्यवाहक विदेशमंत्री के रूप में काम कर रही ज़िन मार आंग ने कहा, हमारे लोग अपने अधिकार और आज़ादी पाने के लिए कोई भी क़ीमत चुकाने को तैयार हैं। देश में एक साल का आपातकाल घोषित करने के बाद सेना ने कहा है कि साल भर सत्ता हमारे पास रहेगी। फिर चुनाव कराएंगे।

विदेश-नीति से जुड़े अमेरिकी थिंकटैंक कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस की वैबसाईट पर जोशुआ कर्लांज़िक ने लिखा है कि सेना एक साल की बात कह तो रही है, पर अतीत का अनुभव है कि यह अवधि कई साल तक खिंच सकती है। सेना के लिखे संविधान में लोकतांत्रिक सरकार का तख्ता-पलट करके सैनिक शासन लागू करने की व्यवस्था है।

जोशुआ कर्लांज़िक के अनुसार तात्मादाव (यानि सेना) का विचार है कि धीरे-धीरे लोकतांत्रिक विरोध दब जाएगा। उसके बाद दुनिया के लोकतांत्रिक देश फौजी शासन को स्वीकार करने पर बाध्य होंगे। उसके बाद एक ऐसी व्यवस्था कायम की जाए, जो सीमित लोकतांत्रिक हो और जिसमें सेना से जुड़ी पार्टी की विजय सुनिश्चित हो। ऐसा पड़ोसी देश थाईलैंड में है और एक ज़माने में इंडोनेशिया में भी ऐसी ही व्यवस्था थी। कमोबेश पाकिस्तान में भी इसी किस्म का लोकतंत्र कायम करने की कोशिश है।

बिखरा हुआ देश

इस पूरे परिदृश्य में दो-तीन सवाल महत्वपूर्ण हैं। क्या सेना अपने इरादे में सफल होगी?क्या म्यांमार के समाज में लोकतांत्रिक-व्यवस्था के प्रति आग्रह इतना जबर्दस्त है कि वह सेना की साजिशों को विफल कर सके। वर्तमान आंदोलन की शिद्दत को देखते हुए लगता है कि सेना ने लोकतांत्रिक-भावना का अनुमान लगाने में ग़लती की है। अब उसने देश के विभिन्न जनजातीय समूहों को अपने पक्ष में करने की कोशिशें की हैं।

देश में कई तरह के जनजातीय आंदोलन लम्बे अर्से से चल रहे हैं। इन जनजातीय समूहों की अपनी सेनाएं हैं, जिनके सैनिकों की संख्या 75,000 के आसपास है, जबकि तात्मादाव यानि म्यांमार सेना का संख्याबल साढ़े तीन लाख का है। इनमें सबसे बड़ी संयुक्त व राज्य-सेना है, जिसका देश के पूर्वोत्तर पर कब्ज़ा  है। इसके पास करीब 30,000 सैनिक है। नशे की तिज़ारत करने वाला यह दुनिया का सबसे बड़ा संगठन माना जाता है।

एक और सवाल, भारत सहित पड़ोसी देशों, वैश्विक जनमत और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़ा है। क्या म्यांमार की सेना पर दुनिया इतना दबाव डाल सकती है कि वह अपने तौर-तरीकों को बदले?क्या लोकतंत्र और सेना की मिली-जुली व्यवस्था अब भी सम्भव है, जिसका नेतृत्व आंग सान सूची के हाथ में हो। ध्यान देने वाली बात है कि आंग सान सूची ने पिछले दस साल में सेना के साथ सहयोग बनाए रखने की कोशिश की है। वस्तुतः देश में लोकतांत्रिक भावनाएं भी एक सीमित दायरे में हैं और लोकतांत्रिक संस्थाओं का विकास भी नहीं हुआ है।

आंग सान सूची सरकार की प्रशासनिक कुशलता पर भी सवाल थे। देखना होगा कि सेना व्यवस्था को अपने काबू में लाने में कामयाब होती है या नहीं। यदि सेना भी विफ़ल रही, तो म्यांमार विफ़ल देश भर रह जाएगा। यह स्थिति कम से कम भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए ख़तरनाक होगी, जिसके पूर्वोत्तर पर उग्रवादी गतिविधियां चल रही हैं।

भारत की भूमिका

इन सारे सवालों से जुड़ा सवाल है कि भारत चुप क्यों है?इस समय भारत उतनी शिद्दत के साथ सैन्य शासन के विरुद्ध क्यों नहीं बोल रहा, जैसा 1988 में बोलता था?सवाल यह भी है कि उससे हमें मिला क्या?हमारे रिश्ते खराब हुए, जिनका लाभ चीन को मिला। म्यांमार में चीन की दिलचस्पी किसी से छिपी नहीं है।

भारत एकदम चुप भी नहीं है। एक फ़रवरी को तख़्तापलट के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी करके म्यांमार के घटनाक्रम पर ‘गहरी चिंता’व्यक्त की थी।बयान में कहा गया था, म्यांमार में लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए भारत हमेशा अपना दृढ़ समर्थन देता रहा है। हमारा मानना है कि क़ानून के शासन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बरकरार रखा जाना चाहिए।

इसके अलावा 26 फ़रवरी को संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार के मामले पर एक बहस में संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने इसी आशय का बयान दिया था। पर्यवेक्षक मानते हैं कि, भारत आंग सान सू ची का समर्थक है, लेकिन हमारे हित इसमें है कि म्यांमार सीमा पर सक्रिय अलगाववादी समूहों को खुली छूट न मिले। ‘द हिंदू’ से जुड़ी पत्रकार सुहासिनी हैदर ने लिखा है कि भारत की भी वैसी ही प्रतिक्रिया आती जैसी अमेरिका ने दी है, तो म्यांमार का चीन की ओर झुकाव बढ़ता। सीमा पर उग्रवादी गतिविधियों और चीन के बरअक्स रिश्तों को संतुलित बनाए रखने के अलावा भारत कई परियोजनाओं पर म्यांमार के साथ काम कर रहा है। इनमें इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे और कालादन मल्टी-मॉडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट नेटवर्क के साथ-साथ सित्वे डीप वॉटर पोर्ट पर विशेष आर्थिक ज़ोन कार्य-योजना शामिल है।

दूसरा जनांदोलन

म्यांमार के इतिहास में यह दूसरा बड़ा जनांदोलन है। पहला 1988 में सैन्य शासन के ख़िलाफ़ छात्रों ने बड़ा आंदोलन शुरू किया था। उस आंदोलन में आंग सान सू ची एक राष्ट्रीय नेता बनकर उभरीं थीं। इसके बाद जब 1990 में सैन्य प्रशासन ने चुनाव कराया, तो उनकी पार्टी, नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी ने ज़बरदस्त जीत हासिल की। सैन्य प्रशासन ने चुनाव के नतीजों को खारिज कर दिया और आंग सान सू ची को उनके घर पर नज़रबंद कर दिया गया।

यह नज़रबंदी 2010 में ख़त्म हुई। इसके बाद से उन्होंने देश में लोकतंत्र लाने की कोशिशों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वे 2016 से लेकर 2021 तक म्यांमार की स्टेट कौंसलरपद पर (प्रधानमंत्री के बराबर) और विदेश मंत्री भी रहीं। इस साल नवंबर में हुए चुनाव में सू ची की पार्टी को जबर्दस्त जीत मिली और सेना-समर्थक पार्टी की हार हुई। सेना को डर था कि सूची के नेतृत्व में एनएलडी इतनी ताकतवर हो जाएगी कि हमारी ताकत को संवैधानिक तरीके से खत्म कर देगी।

विडंबना है कि सू ची ने शक्तिशाली नेता होने के बावजूद सेना को हाशिए पर लाने और लोकतांत्रिक सुधारों को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का काम नहीं किया। उन्होंने अपनी जगह तो मजबूत की, पर लोकतांत्रिक संस्थाओं का तिरस्कार किया। इतना ही नहीं सेना की तरफ़दारी भी की।

चीनी भूमिका

इस परिघटना से जुड़े दो तीन ख़तरे हैं। एक तो यह दौर कोविड-19 से लड़ाई का है। सत्ता परिवर्तन के बाद बड़े स्तर पर लोग देश के भीतर ही या बाहर पलायन करने लगेंगे, तो संक्रमण बढ़ने का खतरा है। बैंकों तथा कारोबारों पर सेना बंदिशें लगाएगी, जीवन दुरूह होगा। यों भी देश में कई प्रकार के जनजातीय-सांप्रदायिक टकराव हैं, वे बढ़ेंगे। इस घटनाक्रम का असर पाकिस्तान जैसे देश पर भी पड़ेगा, जहां विरोधी दलों का आंदोलन चल रहा है और सेना अपनी भूमिका को तोल रही है। चीन के ‘बॉर्डर रोड इनीशिएटिव’ के तार भी इस घटनाक्रम से जुड़े हो सकते हैं।

चीन पर आरोप लगता रहा है कि वह म्यांमार के अलगाववादी समूहों की मदद करता है। पिछले साल एम्स्टर्डम स्थित थिंक टैंक यूरोपियन फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज (ईएफएसएएस) की एक रिपोर्ट में कहा गया कि चीन जातीय समूहों और सेना के जरिए म्यांमार में लोकतंत्र को खत्म कर अपनी कमज़ोर होती पैठ मजबूत करने की फिराक में है। ‘वन बेल्ट, वन रोड’ कार्यक्रम की चीनी शर्तों को लेकर म्यांमार में चिंता हैं। चीन अपनी परियोजनाओं को हर शर्त पर लागू कराना चाहता है।

कच्चा लोकतंत्र

म्यांमार का कथित लोकतंत्र यों भी चूं-चूं का मुरब्बा है। संसद की चौथाई सीटें सेना के लिए आरक्षित हैं। ‘दोहरी या संकर प्रणाली’ खासी अलोकतांत्रिक है। असली ताकत ‘तात्मादाव’ यानि सेना के पास है। संविधान की रचना भी 2008 में सेना ने ही की थी। इसमें उसने लोकतांत्रिक रूपांतरण का एक रोडमैप दिया था, जिसकी परिणति है फौजी शासन। इस ‘लोकतांत्रिक’ व्यवस्था में सेना और जनता के चुने हुए प्रतिनिधि मिल-जुलकर सरकार चलाते हैं।

संसद के दोनों सदनों की 25 प्रतिशत सीटों के अलावा प्रांतीय सदनों में यह आरक्षण एक तिहाई सीटों का है। तीन अहम् मंत्रालय, गृह, रक्षा, और सीमा मामले सेना के पास हैं। सेना समर्थक राजनीतिक दल ‘यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी’ (यूएसडीपी) को खुलकर खेलने का अधिकार है। सेना को आपातकाल की घोषणा करने का अधिकार भी है।

नवम्बर के चुनाव में एनएलडी ने संसद के दोनों सदनों में 397 सीटें जीतीं, जो सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत के आंकड़े 322 से काफी अधिक थीं। सेना समर्थित मुख्य विपक्षी दल ‘यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी’ (यूएसडीपी) को 28 और अन्य दलों को 44 सीटें मिलीं। यूएसडीपी ने चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाया और परिणामों को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया, लेकिन चुनाव आयोग ने उसके आरोप और मतदान फिर से कराने की मांग को खारिज़ कर दिया।

राष्ट्रीय स्तर पर इन्हीं दो दलों के बीच प्रतिद्वंद्विता है। यूएसडीपी में सेना के पूर्व अधिकारी भरे पड़े हैं। चुनाव में मिली इस भारी पराजय को सेना पचा नहीं पाई। विडंबना है कि सन 2015 के चुनाव में भारी बहुमत से जीतने के बावजूद सू ची राष्ट्रपति नहीं बन पाईं। इस दौरान उनकी पार्टी संसद में वह संवैधानिक संशोधन भी पास नहीं करा पाई, जिसकी वजह से वे राष्ट्रपति नहीं बन पाती हैं। वे देश की राष्ट्रपति नहीं बन सकतीं, इसलिए उन्हें स्टेट कौंसलर जैसा पद दिया गया।

संविधान के अनुच्छेद 59 (एफ) के अनुसार जिस व्यक्ति का जीवनसाथी या बच्चे विदेशी होंगे, वह सर्वोच्च पद नहीं ले सकता। सू ची के दिवंगत पति ब्रितानी नागरिक थे और उनके दोनों बेटे भी ब्रितानी ही हैं। आंग सान सू ची निश्चित रूप से देश की सबसे लोकप्रिय नेता हैं, यह बात चुनाव परिणामों से स्पष्ट है। हैरत है कि इसके बावजूद उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसकी वे हक़दार हैं।

 

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