कार्यदक्ष जीवन की प्रेरणास्पद यादें

 ऐसी एक धारणा है कि प्राचीन भारतीय विचारसंपदा याने संसार से दूर भागना, सक्रिय जीवन की अपेक्षा निवृत्त जीवन बिताना, मृत्यु का- मोक्ष का विचार करना, निष्क्रियता को प्रधानता देने वाला तत्त्वज्ञान है| वास्तव में यह गलत धारणा है| सक्रियता, उद्यमशीलता,दीर्घोद्योग, पुरुषार्थ एवं पराक्रम इन गुणों का समर्थन तो प्राचीन भारतीय विचारकों ने न केवल किया ही वरन वैसा जीवन प्रत्यक्ष में जी कर दिखाया|

ऐतरेय सूक्त में स्वयं देवराज इंद्र एक राजा को उपदेश देते हुए कहते हैं, ‘‘जो सतत चलता है, उसका भाग्य भी चलता है| जो सोता रहता है, उसका भाग्य भी सोता है| चरैवेती-चर एव इति-सतत कार्यशील रहो|’’

आधुनिक काल में यह मंत्र सामुदायिक – सार्वजनिक रूप से अमल में लाया राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने| हजारों सामान्य व्यक्ति इस मंत्र पर निष्ठा रख कर काम कर रहे हैं| इससे वे व्यक्तिगत रूप से महान तो हुए ही परंतु देश एवं समाज भी परमवैभव के मार्ग पर चल पड़ा है| आज उत्तर प्रदेश जैसे भारत के सबसे बड़े राज्य के राज्यपाल माननीय राम नाईक या सही अर्थों में तमाम मुंबईकरों के रामभाऊ नाईक ऐसे ही कार्यकर्ताओं में से एक हैं|

प्रस्तुत ‘‘चरैवेति, चरैवेति’’ नामक यादों के इस संग्रह में माननीय रामभाऊ ने अपने कार्यकर्ता जीवन को सामने रखा है| रामभाऊ मूलत: सांगली जिले के आरपाडी गांव के हैं| उस समय यह गांव औंध रियासत के अंतर्गत था| वहां के राजा बालासाहब पंतप्रतिनिधि का शिक्षा एवं सूर्य नमस्कार पर बहुत जोर था| और ऐसी रियासत की शाला के मुख्य शिक्षक रामभाऊ के पिताजी थे| इस कारण सूर्य नमस्कारों से शरीर बलवान बना| ऊर्जा में संघ शाखा की साथ मिली| देखते-देखते एक उत्कृष्ट कार्यकर्ता का निर्माण होता गया|

और फिर संघ प्रेरणा से, राजनीतिक क्षेत्र में एक स्थानीय कार्यकर्ता के रूप में जो शुरुआत हुई वह वर्ष प्रतिवर्ष अधिक मजबूत होती गई| दल के मुंबई संगठन मंत्री, मुंबई के दल के अध्यक्ष, महाराष्ट्र विधान सभा के लगातार तीन वर्षों तक सदस्य, लोकसभा के लगातार पांच बार सदस्य, केंद्र में रेल्वे राज्यमंत्री, पेट्रोलियम विभाग के केबिनेट मंत्री और अब जुलाई २०१४ से उत्तर प्रदेश के माननीय राज्यपाल हैं|

कांग्रेस ने इस देश में राजनीति सहित सभी क्षेत्रों में निष्क्रियता, भ्रष्टाचार, सिफारिश जैसे दुर्गुणों की बड़ी परंपरा निर्माण की है व उनका जतन किया है| उसे ‘कांग्रेस कल्चर’ कहा जाता है| इस कांग्रेस कल्चर के अलिखित संकेतों के अनुसार राज्यपाल, राष्ट्रपति ये पद याने बचा हुआ जीवन शानोशौकत, आराम एवं आलस्य से बिताने का पद है|

परंतु रामभाऊ नाईक ये कांग्रस कल्चर के नहीं हैं| संघ परंपरा से सराबोर राष्ट्रीय विचारों का एक कार्यकर्ता जब सत्ता स्थान पर पहुंचता है तो वह आराम से निवृत्त जीवन व्यतीत न करते हुए, स्वत: भी कार्यशील रहता है एवं शासन को भी कैसे कार्यप्रवृत्त करता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण आज माननीय रामभाऊ लखनऊ के राजभवन में प्रस्तुत कर रहे हैं|

कहते हैं कि जो इतिहास बनाते हैं उन्हें वह लिखते नहीं बनता| कारण उन्हें लिखने के लिए समय ही नहीं होता| अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके कुछ अपवाद हैं| विंस्टन चर्चिल, हेरॉल्ड मेकमिलन, चार्ल्स डि-गाल ने अपनी आत्मकथाएं लिखी हैं| बीसवीं शताब्दी की बहुत सी घटनाएं या तो उन्होंने प्रत्यक्ष देखी थीं या तो वे उसका हिस्सा थे|

हमारे यहां भी वर्तमान में कुछ प्रसिद्ध राजनीतिज्ञों ने अपनी आत्मकथाएं या यादें लिखी हैं| परंतु अत्यंत सामान्य स्तर से प्रारंभ कर सतत उद्योग परिश्रम व कष्ट करके राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचे, राजनीति जैसे फिसलन वाले क्षेत्र में रह कर भी स्वच्छ रहे, राष्ट्रीय दृष्टि सतत जागरूक रखते हुए रामभाऊ जैसे एक कार्यकर्ता का जीवन अन्य कार्यकर्ताओं, पत्रकार, नेता, राजनितिक इन सभी के लिए प्रेरक, पठनीय एवं अनुकरणीय है|

माननीय रामभाऊ को जानने वाले एक कार्यकर्ता के रूप में मेरा स्वत: का उनकी इन यादों पर प्रेम से एक आक्षेप है| रामभाऊ ने स्वत: किए कुछ कार्यों पर इतनी सहजता से लिखा है कि मानो वे कार्य रामभाऊ की बांट जोह रहे थे! रामभाऊ ने उन कार्यों को हाथ में लिया एवं वे संपन्न हो गए|

परंतु प्रत्यक्ष में ऐसा कुछ नहीं हुआ| संघ, जनसंघ, भाजपा के राष्ट्रीय विचारों के विरोधक, स्वार्थी हितसंबंधी, सुस्त प्रशासन, एवं जलने वाले अपने लोगों ने भी, रामभाऊ के प्रत्येक कार्य में सेंध लगाने की भरपूर कोशिश की| ‘बांबे’ से ‘मुंबई’ करने के  साधारण से काम का भी जिम्मा किसका? तो हमारे लोगों का ही! प्रत्येक काम करने के लिए रामभाऊ को बहुत मेहनत करनी पड़ी है|

अर्थात यह ‘कंटकाकीर्ण मार्ग’ रामभाऊ ने कैसे पार किया यह रामभाऊ नहीं बताएंगे, यह अपेक्षित ही था| इसके अतिरिक्त ये बातें अखबारों की स्वतंत्रता में आ चुकी हैं और शब्द-मर्यादा का पालन करना पड़ता है| रामभाऊ के बाद केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री मणिशंकर अय्यर ने मंत्रालय को न केवल नुकसान पहुंचाया अपितु कांग्रेस कल्चर के अनुसार बहुत गड़बड़ियां कीं| उसके बारे में रामभाऊ ने इतना संयमित लिखा है जो एक स्वयंसेवक कार्यकर्ता ही लिख सकता है|

कुल मिलाकर ‘‘चरैवेति, चरैवेति’’ सभी अवश्य पढ़े| डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे की सापेक्षी प्रस्तावना और उनके छायाचित्रों के कारण प्रस्तुति में और चार चांद लग गए हैं| इंकिंग इनोवेशन्स की यह उत्कृष्ट निर्मिति है|

 

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