जटिल समस्या फलस्तीन-इजराइल संघर्ष

अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरूशलम को इजराइल की राजधानी बनाने का खुला समर्थन किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि हम अपने दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करेंगे। हालांकि जो बाइडेन का वर्तमान प्रशासन उस हद तक इजराइल का समर्थक नहीं है, पर सं.रा. सुरक्षा परिषद में जरूरी हुआ, तो उसके हितों की रक्षा करेगा।

फलस्तीनी उग्रवादी संगठन हमास और इजराइली सेना के सैनिक टकराव ने एक अर्से बाद दुनिया का ध्यान इस तरफ खींचा है। हालांकि इस टकराव को युद्ध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें आसपास का कोई देश शामिल नहीं हैं पर इससे वैश्विक-राजनीति में आ रहे परिवर्तनों पर प्रभाव पड़ेगा। खासतौर से अरब देशों और इजराइल के रिश्तों में आ रहे सुधार को धक्का लगेगा। इस परिघटना का असर अरब देशों और ईरान के बीच सम्बंध बेहतर होने की प्रक्रिया पर भी पड़ेगा

वर्तमान संकट प्रत्यक्ष रूप से फलस्तीनियों और इजराइल का टकराव लगता है, पर वस्तुतः यह सऊदी अरब और ईरान, सऊदी अरब और कतर तथा मिस्र और तुर्की के टकरावों की परिणति इसके साथ ही इसके पीछे फलस्तीनियों के फतह गुट और हमस के बीच की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी है। हमास सुन्नी मुसलमानों का संगठन है, पर उसे ईरान का समर्थन हासिल है। उसके पास जो हथियार हैं, उनमें से काफी ईरान से मिले हैं। हमस ने गाज़ा पट्टी में महमूद अब्बास के नेतृत्व वाले फतह को पीछे कर दिया है, जिसके कारण इजराइल के साथ समझौता करना मुश्किल हो गया है।

कैसे रुके टकराव

फिलहाल दुनिया की दिलचस्पी टकराव को रोकने में है। अमेरिका ने इजराइल में अपना दूत भेजा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि हम सऊदी अरब और मिस्र से संपर्क में हैं, ताकि तनाव को कम करने का कोई रास्ता निकाला जा सके। रविवार को सुरक्षा परिषद की विशेष बैठक भी हुई, जिसके नाम अपने संदेश में सं.रा. महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने इस लड़ाई को अत्यन्त दर्दनाक बताया और कहा, लड़ाई तुरन्त बन्द करनी होगी। इसे तत्काल रोकना होगा।

हालांकि बैठक में कोई प्रस्ताव पास नहीं हुआ, पर इस टकराव को रोकने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। बैठक में शामिल होने के बाद भारत के दूत टीएस तिरुमूर्ति ने कहा कि भारत हर तरह की हिंसा की निंदा करता है। यानी इजराइली कार्रवाई और हमस के हमले दोनों को रोकने की अपील भारत ने की। भारत ने ग़ाजा पट्टी से हो रहे रॉकेट हमलों की निंदा भी की है। भारतीय दूत ने कहा कि तत्काल तनाव घटाना समय की मांग है, ताकि स्थिति न बिगड़े और नियंत्रण से बाहर न हो जाए।

इस्लामिक देशों के संगठन ने इजराइल को गम्भीर परिणामों की चेतावनी दी है। यह चेतावनी इससे पहले भी दी जाती रही है। ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने रविवार को हुई आपात बैठक में फ़लस्तीनियों पर हमलों के लिए इजराइल की आलोचना की। बैठक के बाद ओआईसी के बयान में कहा गया है कि अल-़कुद्स (यरूशलम) और अल-अक़्सा मुसलमानों के पवित्र स्थान हैं। इस्लामी दुनिया के लिए यह लाल रेखा है। इजराइल इस रेखा को पार करेगा, तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

इस वर्चुअल बैठक में इजराइल के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी कार्रवाई की मांग भी की गई है। इस हिंसा से उन देशों को ख़ासी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने इजराइल से रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें की थीं। इनमें सूडान, मोरक्को, यूएई और बहरीन शामिल हैं। बैठक के दौरान फ़लस्तीनी क्षेत्र के विदेश मंत्री रियाद अल-मलिकी ने इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले अरब देशों को भी आड़े हाथों लिया।

अमेरिका की भूमिका

इस टकराव को रोकने में वास्तविक भूमिका अमेरिका की ही हो सकती है, जो इजराइल का सबसे बड़ा पक्षधर है। अमेरिका के पिछले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यरूशलम को इजराइल की राजधानी बनाने का खुला समर्थन किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि हम अपने दूतावास को यरूशलम में स्थानांतरित करेंगे। हालांकि जो बाइडेन का वर्तमान प्रशासन उस हद तक इजराइल का समर्थक नहीं है, पर सं.रा. सुरक्षा परिषद में जरूरी हुआ, तो उसके हितों की रक्षा करेगा। इस टकराव के संदर्भ में भारत के रुख को लेकर भी कई प्रकार के कयास लगाए गए हैं। एक बात साफ है कि भारत इजराइली कार्रवाई का खुलकर समर्थन नहीं करेगा, साथ ही हम हमास की आतंकी गतिविधियों के समर्थक भी नहीं हैं। भारत के रिश्ते इजराइल और फलस्तीनी प्रशासन दोनों के साथ अच्छे हैं और हम इस क्षेत्र में स्थायी समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

टकराव की पृष्ठभूमि

अधिकतर इजराइली यरूशलम को अपनी अविभाजित राजधानी मानते हैं। हाल में इजराइली सुप्रीम कोर्ट ने पूर्वी यरूशलम के शेख जर्राह इलाके में चार फलस्तीनी परिवारों को जमीन से बेदखल करने के आदेश दिए हैं। यह इलाका 1948 में इजराइल की स्थापना के समय जॉर्डन के अधीन था। इस इलाके में ज्यादातर लोग अरब मूल के फलस्तीनी हैं, पर इसरायली कानूनों के मुताबिक यदि कोई यहूदी परिवार यह साबित कर सके कि सन 1948 में इजराइल की स्थापना के पहले उसकी जमीन यहां थी, तो उन्हें उस पर कब्जे का अधिकार दिया जा सकता है। शेख जर्राह में जो चार सम्पत्तियों के मामले हैं। यह इलाका अनौपचारिक रूप से इजराइली कब्जे में है, पर यह विवादित क्षेत्र है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार यह उस व्यापक फलस्तीन का हिस्सा है, जिस पर अंतिम रूप से कोई फैसला नहीं हो सकता है।

गत 6 मई को यरूशलम में कुछ फलस्तीनियों ने प्रदर्शन किया। इन प्रदर्शनों ने देखते ही देखते बड़ा रूप ले लिया। दूसरी तरफ इन्हीं दिनों दक्षिणपंथी यहूदियों का एक प्रदर्शन भी इस इलाके में होना था, जिसकी अनुमति नहीं दी गई। फिर भी इस दौरान यहूदियों और फलस्तीनियों के बीच टकराव भी हुए। इसके बाद यहूदियों और मुसलमानों के पवित्र स्थल, टेम्पल माउंट के परिसर पर इजराइली पुलिस ने धावा बोला। इसे अल-अक्सा मस्जिद परिसर भी कहा जाता है। वह मुसलमानों के रमज़ान के महीने की कद्र-रात थी और इसराइलियों का राष्ट्रीय दिवस भी था।

इजराइल पर रॉकेट प्रहार

दूसरी तरफ 10 मई को हमास और फलस्तीनी इस्लामिक जेहाद ने गाज़ा पट्टी से इसरायल पर रॉकेटों से हमले बोले। सैकड़ों रॉकेट एक साथ छोड़े गए, जिनमें से 90 फीसदी को इजराइली सुरक्षा प्रणाली आयरन डोम ने रोक लिया, पर कुछ रॉकेट नागरिक इलाकों में भी गिरे। इजराइली वायुसेना ने जवाबी कार्रवाई में गाज़ा पट्टी के अनेक ठिकानों को धराशायी कर दिया। हालांकि ग़ाजा पट्टी पर दोनों पक्षों के बीच टकराव पहले भी चलता रहा है, पर इस बार की सैनिक कार्रवाई सन 2000 के बाद से सबसे बड़ी है। इजराइली वायुसेना ने खासतौर से ऐसे प्रिसीशन बमों का इस्तेमाल किया है, जो अचूक वार करते हैं।

उन्हें इस बात की सटीक जानकारी थी कि हमास के लड़ाके कहां छिपे हैं। उन्होंने उन जगहों पर निशाना लगाकर वार किया। हमास के सैनिक सड़कों के नीचे बनी सुरंगों में छिपे थे। इसके लिए विशेष बंकर बस्टर बमों का इस्तेमाल किया गया, जिन्होंने जमीन के नीचे तक गहरे छेद कर दिए। यह कार्रवाई इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। लगता नहीं कि यह आसानी से रुकेगी। इसके रुकने के बाद काफी लम्बे समय तक इससे हुए नुकसानों का पता लगेगा। इस दौरान हमास के कई सैनिक कमांडर मारे गए हैं।

हमास की भूमिका

हमास मूलतः उग्रवादी संगठन है, पर 2005 के बाद से उसने गाज़ा पट्टी के इलाके में राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। वह फलस्तीनी अथॉरिटी के चुनावों में शामिल होने लगा। गाज़ा में फतह को चुनाव में हराकर उसने प्रशासन अपने अधीन कर लिया है। अब फतह गुट का पश्चिमी तट पर नियंत्रण है और गाज़ा पट्टी पर हमास का। अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिमी तट के इलाके की अल फतह नियंत्रित फलस्तीनी अथॉरिटी को ही मान्यता देता है।

हमास की स्थापना सन 1987 में हुई थी। मूलतः इसका चार्टर इजराइल के अस्तित्व को स्वीकार ही नहीं करता, साथ ही इस इलाके में शांति-स्थापना के प्रयासों को वक्त की बरबादी और बेहूदगी मानता था। पर सन 2017 में उसने अपने चार्टर में कुछ बदलाव किया है। अब उसका चार्टर कहता है कि हमारी लड़ाई यहूदियों से नहीं, बल्कि ज़ियनवादियों के फलस्तीन पर कब्जे के विरुद्ध है। इसकी पेशकश है कि यदि इजराइल 1967 में किए गए कब्जे से पीछे हट जाए, तो हम शांति-समझौता कर सकते हैं।

इजराइल की स्थापना के लिए 1948 में सं.रा. ने एक प्रस्ताव तैयार किया था। पर इसे अरब देशों ने स्वीकार नहीं किया, पर इजराइल ने अपनी घोषणा कर दी। घोषणा होते ही लड़ाई छिड़ गई थी। संघर्ष विराम होने तक इजराइल का काफी इलाके पर नियंत्रण हो चुका था। जॉर्डन के क़ब्ज़े वाली ज़मीन को वेस्ट बैंक (यर्दन नदी का पश्चिमी किनारा) और मिस्र के क़ब्ज़े वाली जगह को गाज़ा के नाम से जाना गया। यरूशलम को पश्चिम में इजराइल और पूर्व को जॉर्डन के बीच बांट दिया गया।

सन1967 में अगला युद्ध लड़ा गया, जिसमें इजराइल ने पूर्वी यरूशलम और वेस्ट बैंक पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। यही नहीं इजराइल ने सीरिया के गोलान हाइट्स, गाज़ा और मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के अधिकतर हिस्सों पर भी क़ब्ज़ा जमा लिया। इजराइल दावा करता है कि पूरा यरूशलम उसकी राजधानी है जबकि फ़लस्तीनी पूर्वी यरूशलम को भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र की राजधानी मानते हैं। अमेरिका उन चंद देशों में से एक है जो पूरे शहर पर इजराइल के दावे को मानता है। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में यरूशलम को अंतरराष्ट्रीय नगर के रूप में अलग रखने की व्यवस्था थी।

असहमतियां

इजराइल और मिस्र गाज़ा की सीमा का कड़ाई से नियंत्रण करते हैं ताकि हमास तक हथियार न पहुंचें। गाज़ा और वेस्ट बैंक में रहने वाले फ़लस्तीनियों का कहना है कि वे इजराइली कार्रवाइयों और पाबंदियों से पीड़ित हैं। वहीं, इजराइल कहता है कि वह फ़लस्तीनियों की हिंसा से ख़ुद को बचा रहा है।
ऐसे कई मुद्दे हैं जिस पर इजराइली और फ़लस्तीनियों के बीच सहमति नहीं है। जैसे कि फ़लस्तीनी शरणार्थियों के साथ क्या होना चाहिए, क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों का क्या किया जाएगा, वे हटाई जाएंगी या नहीं। यरूशलम को दोनों पक्ष कैसे बांटेंगे और इसके साथ ही सबसे मुश्किल समस्या यह है कि फ़लस्तीनी राष्ट्र इजराइल के साथ बनाया जाएगा या कहीं और डोनाल्ड ट्रंप जब राष्ट्रपति थे तब अमेरिका ने एक शांति समझौता तैयार किया था और ट्रंप ने इजराइल प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ इसे ’सदी का सौदा’ बताया था। फ़लस्तीनियों ने इसे एकतरफ़ा कहकर ख़ारिज कर दिया था। किसी भी समझौते के लिए दोनों पक्षों को कई जटिल मुद्दों पर सहमत होना होगा, जो आसान नहीं लगता।

आपकी प्रतिक्रिया...