विश्व पर्यावरण दिवस: एक पेड़ जरुर लगाएं

5 जून 1974 को विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत हुई। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसकी शुरुआत की इसके पीछे कोशिश यह थी कि लोगों को पर्यावरण के लिए जागरूक किया जाए लेकिन करीब 46 वर्ष बाद भी अभी भी लोगों को पर्यावरण के लिए जागरूक करना पड़ रहा है। हम किसी आंकड़े को प्रस्तुत तो नहीं कर रहे है लेकिन यह दावे के साथ कह सकते है कि इन बीते 46 वर्षों में पर्यावरण को लेकर कोई खास सुधार नहीं हुआ बल्कि विकास के नाम पर तमाम जंगलों को काटा गया है। सरकार और कुछ प्राइवेट एनजीओ पौधा रोपण करते है लेकिन उनके आंकड़े जरूरत से बहुत ही कम है।
प्राइवेट कंपनियां लगातार सरकार के साथ मिलकर जंगलों को काट रही है। देश के युवाओं को भी अब पर्यावरण नहीं बल्कि मॉल चाहिए जिसके चलते जंगलों की कटाई लगातार चालू है। इंसान भौतिक सुख की तरफ तेजी से भाग रहा है जबकि उसे यह समझना जरूरी है कि पर्यावरण और आयुर्वेद के बिना जीवन ही संभव नहीं है।   
 
विश्व पर्यावरण दिवस पेड़ों को बचाने और उसके प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए मनाया जाता है क्योंकि आने वाला समय हमारे लिए बहुत ही चुनौती पूर्ण होने वाला है। कोरोना काल में पर्यावरण की कमी को सभी ने महसूस किया कोरोना काल में लोगों को यह अनुभूति करा दी कि अगर इस तरह से ही पेड़ों की कटाई होती रही तो आने वाले समय में ऑक्सीजन की बोतल भी बाजारों में नजर आने लगेगी। इस गंभीर समस्या को देखते हुए पौधारोपण का काम तेजी से होना चाहिए। खुले मैदान, पार्क और घर के अंदर भी गमले में पेड़ जरूर लगाए। इससे आप के आसपास कभी भी ऑक्सीजन की कमी नहीं होगी। सभी से यह अपील है कि विश्व पर्यावरण के दिन एक पेड़ जरूर लगाएं। एक कटु सत्य यह है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति से ही है और उसके बिना हम कुछ भी नहीं है हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए और प्रकृति के महत्व को समझना चाहिए।
  
अगर हम त्यौहार की बात करें तो यहां कई ऐसे त्यौहार है जिनके माध्यम से हम प्रकृति की रक्षा करते है और पेड़ों को काटने से बचाते है। हिन्दू धर्म में पेड़ों को भगवान के रूप में देखा गया है और उनकी पूजा का दिन भी निश्चित किया गया है। इस धार्मिक कर्म के द्वारा हम कभी भी पेड़ों को काटने की सोच नहीं सकते है। सनातन धर्म में पीपल, नीम, बरगद, आम और ऐसे तमाम पेड़ों को शामिल किया गया है जिसकी पूजा की जाती है और पूजा के लिए उपयोग में आने वाले फूलों के पेड़ों को भी नहीं काटा जाता है क्योंकि वह फूल भगवान के चढ़ाने के काम में आता है। प्रकृति के पंचतत्व जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश की हमेंशा से हम लोग पूजा करते आ रहे है। देश के अलग अलग राज्यों में पेड़, पहाड़ और फसलों की पूजा होती है और इनके संरक्षण के लिए त्योहार भी मनाए जाते है। इस तरह से अगर देखा जाए तो प्रकृति को बचाने का प्रयास बहुत पहले से ही चला आ रहा है और इसे अभी और आगे ले जाना है। हरे भरे जंगलों को काटकर कंक्रीट के जंगल तैयार किये जा रहे है।
मानव और पर्यावरण एक दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर है किसी एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं है। वैज्ञानिकों ने यह दावा बहुत पहले ही कर दिया है कि पेड़ पौधों में भी जीव होता है और इसलिए ही वह हमें जीवन देने वाली ऑक्सीजन का निर्माण करते है। प्रकृति से मिलने वाली ऑक्सीजन को हम कोई खास महत्व नहीं देते है लेकिन अगर यह कुछ सेकेंड के लिए बंद हो जाते तो हमें इसकी कीमत समझ में आने लगती है।

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