मूल संस्कृति से जोड़नेवाली – सिंधु दर्शन यात्रा

इतिहास साक्षी है कि मानवीय सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है। विश्व में जहां-जहां नदियां बहीं हैं उनके किनारे-किनारे मानवीय सभ्यताओं का विकास हुआ है। भारतीय सभ्यता भी नदी की ही देन है। वैसे तो हमारे यहां कई नदियां हैं। कुछ हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं, कुछ इन नदियों की उपनदियां हैं, कुछ नर्मदा जैसी मैदानी भागों से निकलनेवाली नदियां हैं परंतु भारतीय सभ्यता जिस नदी के कारण पहचानी जाती है वह नदी है सिंधु नदी। सिंधु भारत की सबसे प्राचीन नदियों में से एक है। यह न केवल भारतीय सभ्यता की जननी है, भारत के पंजाब और हिमाचल प्रदेश को हरा-भरा रखने वाली झेलम, चिनाब तथा सतलुज नदियों की भी जननी है। केवल इतना ही नहीं सिंधु नदी ने हमें विश्व की सबसे प्रचीन सभ्यता होने का गौरव भी प्रदान किया है।

सिंधु नदी के किनारे विकसित हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की संस्कृति और समाज व्यवस्था ने सम्पूर्ण विश्व को समाज व्यवस्था के मायने समझाए थे। सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों का क्रमिक विकास जिस गति से हुआ था, उन लोगों ने जो अविष्कार किए थे, वास्तु कला और शिल्पकला के क्षेत्र में उन्होंने जो काम किया था, वह आज भी लोगों को विस्मित कर देता है। आज भी खुदाई करने पर जब इन सभ्यताओं के अवशेष मिलते है, तो समझ में आता है कि इतनी पुरानी सभ्यताएं होने के बावजूद भी वे कितनी उन्नत और सम्पन्न थीं।

जैसे-जैसे सभ्यता का विकास हुआ, आबादी बढी, युग परिवर्तित हुए वैसे-वैसे भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभरने लगा था। भारत को सोने की चिड़िया कहा जाने लगा और फिर धीरे-धीरे भारत पर आक्रांताओं की नजर पड़ने लगी। रोचक बात यह है कि शुरुआत में भारत पर आक्रमण करने वाले लोग भी सिंधु नदी से होकर अर्थात उसे पार करके ही आए थे। सिंधु नदी ने इन आक्रांताओं को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। परंतु भारत के भाग्य में शायद पराधीनता लिखी थी। कई सौ वर्षों की पराधीनता ने भारत को उसके इतिहास और संस्कृति से दूर कर दिया था। जब भारत को स्वतंत्रता मिली तो केवल देश ही नहीं सिंधु नदी भी विभाजित स्वरूप में मिली थी। भारत के लद्दाख से निकलकर पाकिस्तान से होते हुए अरब सागर में मिलने वाली सिंधु नदी का कुछ किलोमीटर का प्रवाह ही अब भारत में शेष है। शायद इसलिए ही भारतवासी सिंधु नदी को भूलते जा रहे हैं। अत: भारत के जनमानस को अपनी संस्कृति की याद दिलाने के लिए स्वतंत्रता के पश्चात कई प्रयत्न किए गए, उन्हीं में से एक है विगत 25 वर्षों से चलने वाली सिंधु दर्शन यात्रा।

भारत को भारत की सभ्यता देनेवाली नदी के प्रति अपनी आस्था और समर्पण प्रकट करने के उद्देश्य से सन 1997 में सिंधु दर्शन यात्रा प्रारंभ की गई थी। एक वृहद विषय, वृहद आयाम पर शुरू किया गया परंतु दुविधा यह थी कि इसे तत्कालीन केंद्र सरकार अर्थात कांग्रेस का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ। कांग्रेस ने इसे राजनैतिक दृष्टिकोण से देखना शुरु किया, इस यात्रा का नाम बदल दिया गया यहां तक कि इसे जो सरकारी आर्थिक सहायता मिलती थी उसे भी रोक दिया गया। परंतु 2004 में जब केंद्र में भाजपा की सरकार आई तब इस यात्रा को पुन: संजीवनी प्राप्त हुई। आयोजकों ने उसी समय यह तय कर लिया था कि इस यात्रा को सरकारी अनुदान के भरोसे न चलाकर वृहद भारतीय समाज की जनयात्रा के रूप में स्थापित किया जाएगा। आयोजकों के प्रयासों को सफलता मिलने भी लगी। अब लोगों ने इस यात्रा में अपने पैसों से आना भी शुरू कर दिया है। यह यात्रा अब केवल सिंधु दर्शन यात्रा तक सीमित न होकर 5 दिन के सिंधु दर्शन महोत्सव में परिणित हो चुकी है, जिसमें देशभर से ही नहीं दुनिया भर से लोग आने लगे हैं। इस यात्रा से न सिर्फ सांस्कृतिक दृष्टि से एकात्मता की भावना बढेगी वरन यह यात्रा लद्दाख के व्यावसायिक विकास में भी सहायक सिद्ध होगी। चुंकि पर्यटन लद्दाख का मुख्य व्यवसाय है इसलिए जब लोग वहां जाएंगे तो निश्चित ही वहां के विभिन्न व्यवसायों को चालना मिलेगी।

तेईस वर्षों की अविरत परंपरा को पिछले वर्ष कोरोना महामारी ने अर्धविराम लगा दिया था। परंतु इस वर्ष जबकि यह यात्रा अपने 25 वर्ष पूर्ण कर रही है, आयोजकों ने इसे कुंभ के रूप में आयोजित करने का निर्णय लिया है। संख्यात्मक दृष्टि से यह यात्रा भले ही छोटी हो परंतु गुणात्मक रूप से यह बहुत बड़ी होगी क्योंकि इसमें देश के विभिन्न राज्यों से लोग आएंगे। विभिन्न धर्माचार्य इस महोत्सव में समन्वय साधने की दृष्टि से अपने विचार रखेंगे। साथ ही यात्रा में आए लोग सिंधु नदी का जल अपने हाथ में लेकर देश को अखंडित रखने का संदेश भी देंगे। इस अवसर पर चांदी का सिक्का भी जारी किया जाएगा जो भविष्य में लोगों को सिंधु नदी, सभ्यता तथा यात्रा की गवाही देगा। कोरोना के प्रभाव का विचार करके ही आयोजकों के द्वारा इस वर्ष यात्रा को दो महीने आगे बढ़ाया गया था परंतु सरकार की ओर से अमरनाथ यात्रा को इस वर्ष रद्द करने का निर्णय लेने के बाद आयोजकों के सामने सिंधु दर्शन यात्रा को लेकर भी असमंजस की स्थिति होगी। परंतु जिस वृहद आकांक्षा से यह यात्रा शुरू की गई है, आशा है उस पर विराम नहीं लगेगा।

अपनी पारमार्थिक उन्नति के लिए आध्यात्मिक यात्राएं करना जितना आवश्यक है, उतनी ही आवश्यक है अपने देश की भौगोलिक संरचना, उसका इतिहास और अपनी संस्कृति को जानने के लिए यात्रा करना। सिंधु दर्शन यात्रा की गिनती इसी यात्रा के रूप में की जानी चाहिए और प्रत्येक भारतीय को इसका अंग बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

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