चीन के मकड़जाल में फंसता श्रीलंका

श्रीलंका को चीन ने इतने भारी भरकम कर्ज के बोझ से लाद रखा है कि उसके अंदर चीन का विरोध करने का साहस ही नहीं बचा है। श्रीलंका की इसी मजबूरी का फायदा उठा कर उसने श्रीलंका से पहले हम्बनटोटा बंदरगाह हथिया लिया और अब श्रीलंका में कोलंबो पोर्ट सिटी बनाने की मंशा भी पूरी होने जा रही है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव में गोतबाया राजपक्षे की जीत के बाद जब उन्होंने अपने बड़े भाई महिंद्रा राजपक्षे को अपनी सरकार में प्रधानमंत्री मनोनीत किया था तब ही यह यह अनुमान लगाए जाने लगे थे कि अब श्रीलंका में चीन को अपने पांव पसारने के लिए अनुकूल वातावरण मिलने का रास्ता साफ़ हो गया है। यूं तो चीन पिछले कई सालों से श्रीलंका के साथ अपनी निकटता बढ़ाने की को कोशिशों में जुटा हुआ है, परंतु श्रीलंका में सत्ता की बागडोर पूरी तरह से राजपक्षे बंधुओं के पास आ जाने से श्रीलंका को अपने मकड़जाल में फंसाना चीन के लिए और आसान हो गया है। क्योंकि चीन के मकड़जाल में फंसने में ही राजपक्षे सरकार को श्रीलंका की भलाई दिखने लगी है। गौरतलब है कि महिंद्रा राजपक्षे के पास जब श्रीलंका के राष्ट्रपति पद की बागडोर थी तब से ही श्रीलंका का झुकाव चीन की ओर होने लगा था। यही कारण है कि जब श्रीलंका में सत्ता पर पूरी तरह से राजपक्षे बंधुओं का कब्जा हुआ तो सबसे ज्यादा खुशी चीन को ही हुई थी। चीन की ओर राजपक्षे बंधुओं के झुकाव से भारत के हित प्रभावित होने की आशंका को देखते हुए ही मोदी सरकार ने श्रीलंका में चुनाव परिणामों की घोषणा के तत्काल बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर को कोलंबो भेजा था, जहां उन्होंने श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे से मिलकर उन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से बधाई और शुभकामनाएं दी थीं। साथ ही उन्हें भारत यात्रा के लिए आमंत्रित भी किया था। इसके बाद राष्ट्रपति गोतबाया भारत के दौरे पर आए थे और यहां राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। यहां यह विशेष उल्लेखनीय है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति पद पर निर्वाचित होने के बाद गोतबाया ने अपने विदेशी दौरों की शुरुआत भारत से ही की थी। परंतु, जल्दी ही उनके कदमों से यह संकेत मिलने लगे कि वे चीन को ही श्रीलंका का सबसे बड़ा हितैषी मानते हैं। इसका ताजा सबूत यह है कि राजपक्षे सरकार ने श्रीलंका में कोलंबो पोर्ट सिटी के निर्माण का चीन का प्रस्ताव न केवल खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया बल्कि आनन-फानन में इसके लिए संसद में एक विधेयक पारित कराकर चीन की ही कंपनी को उसका ठेका भी दे दिया। अब श्रीलंका में राजपक्षे सरकार के इस फैसले का भारी विरोध हो रहा है। उधर चीन अब यह दिखावा कर रहा है कि श्रीलंका में कोलंबो पोर्ट सिटी का निर्माण वह केवल अपने मित्र राष्ट्र की आर्थिक समृद्धि की मंशा से करना चाहता है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि यह चीन की विस्तारवादी नीति का एक छोटा सा उदाहरण है। गौरतलब है कि श्रीलंका इससे पहले अपने हम्बनटोटा बंदरगाह को पहले ही चीन को 99 साल की लीज़ पर दे चुका है। कोलंबो पोर्ट सिटी परियोजना भी चीन ने 99 सालों की लीज़ पर हासिल की है। जिस तरह हम्बनटोटा बंदरगाह चीन के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है उसी तरह प्रस्तावित कोलंबो पोर्ट सिटी के जरिए वह अपने आर्थिक हितों को साधने की मंशा रखता है। यह भी अचरज की बात है कि श्रीलंका के राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे, हम्बनटोटा बंदरगाह चीन को लीज़ पर देने के लिए तो पिछली सरकार की आलोचना करते हैं और उस समझौते की शर्तों को बदलने पर जोर दे रहे हैं परंतु, कोलंबो पोर्ट सिटी के निर्माण का ठेका चीन की कंपनी को देने के अपनी सरकार के फैसले को सही ठहरा रहे हैं। जबकि श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय ने राजपक्षे सरकार को इससे संबंधित विधेयक को संसद में पारित कराने के पूर्व उसमें न केवल संशोधन करने बल्कि उस पर जनता की राय जानने के लिए जनमत संग्रह कराने का निर्देश भी दिया था। लेकिन, राजपक्षे बंधुओं ने विवादास्पद विधेयक में दिखावे के लिए मामूली संशोधन करके उसे संसद में पारित करा लिया। संसद में राजपक्षे सरकार को उक्त विधेयक पारित कराने में कोई परेशानी होने का तो कोई सवाल ही नहीं था क्योंकि वहां राजपक्षे सरकार के पास विशाल बहुमत की ताकत है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि चीन श्रीलंका की राजधानी के 290 हेक्टेयर क्षेत्र में जो कोलंबो पोर्ट सिटी बनाने जा रहा है वह भारत के दक्षिण में स्थित कन्या कुमारी से महज़ 269 किलोमीटर दूर होगी।

दरअसल हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाने की मंशा से चीन इस बंदरगाह को श्रीलंका से हथियाना चाहता था। श्रीलंका के ऊपर उसका भारी भरकम कर्ज होने के कारण उसे अपनी चाल में कामयाब होने में कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। 2014 में महिंद्रा राजपक्षे ने चीन को 99 साल के लिए हम्बनटोटा बंदरगाह सौंपने का समझौता किया, जिसका अगली सरकार ने भी अनुमोदन कर दिया। आज महिंद्रा राजपक्षे श्रीलंका के प्रधानमंत्री हैं और उनके छोटे भाई गोतमाया राजपक्षे राष्ट्रपति बन चुके हैं जो राजनीति में आने के पूर्व श्रीलंकाई सेना के अधिकारी थे। जब देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पद की बागडोर दो सगे भाइयों के हाथ में हो तो सत्ता पर उनकी पकड़ कितनी मजबूत होगी यह समझना कठिन नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि श्रीलंका को चीन ने इतने भारी भरकम कर्ज के बोझ से लाद रखा है कि उसके अंदर चीन का विरोध करने का साहस ही नहीं बचा है। श्रीलंका की इसी मजबूरी का फायदा उठा कर उसने श्रीलंका से पहले हम्बनटोटा बंदरगाह हथिया लिया और अब श्रीलंका में कोलंबो पोर्ट सिटी बनाने की मंशा भी पूरी होने जा रही है। श्रीलंका की राजपक्षे सरकार जब संसद में इससे संबंधित बिल पेश करने वाली थी तब श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय में इसे चुनौती देने के लिए 24 याचिकाएं पेश की गईं थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने देश में इस बिल का भारी विरोध देखते हुए इसमें व्यापक बदलाव करने और इस पर जनमत संग्रह कराने का आदेश राजपक्षे सरकार को दिया था। राजपक्षे सरकार ने इस बिल में संशोधन तो किए परंतु वे इतने मामूली थे कि उससे बिल के मूल स्वरूप में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ। राजपक्षे सरकार ने चंद मामूली संशोधनों के साथ इस विवादित बिल को संसद में पास करा लिया। संसद में राजपक्षे सरकार के पास विशाल बहुमत होने के कारण यह बिल आसानी पारित हो गया। बिल के पक्ष में 149 तथा विपक्ष में मात्र 54 मत पड़े। चीन को कोलंबो पोर्ट सिटी के निर्माण में इतनी दिलचस्पी है कि श्रीलंका की संसद में 20 मई को यह बिल पारित होने के चार दिन बाद ही श्रीलंका की एक कंपनी ने कोलंबो पोर्ट सिटी बनाने का ठेका भी हासिल कर लिया। बताया जाता है कि कोलंबो पोर्ट सिटी के निर्माण हेतु चीन के साथ श्रीलंका ने करार किया है उसके अनेक प्रावधान श्रीलंका को चीन के उपनिवेश जैसी स्थिति में पहुंचाने वाले हैं। चीन इसे अपने स्पेशल इकानामिक जोन के रूप में विकसित करना चाहता है जहां आर्थिक लेन-देन के लिए सभी देशों की मुद्राओं का उपयोग किया जा सकेगा। सुनने में तो यह भी आया है कि चीन की मंशा कोलंबो पोर्ट सिटी के लिए अलग पासपोर्ट जारी करने की भी है। श्रीलंका के प्रधानमंत्री महिंद्रा राजपक्षे ने कोलंबो पोर्ट सिटी परियोजना को अपने देश के लिए बहुत लाभकारी बताया है। उनका कहना है कि कोलंबो पोर्ट सिटी के माध्यम से आगामी पांच सालों में श्रीलंका के दो लाख़ लोगों को रोज़गार के अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। यह परियोजना श्रीलंका की आर्थिक प्रगति के नए द्वार खोलेगी। राजपक्षे बंधु श्रीलंका के लिए कोलंबो पोर्ट सिटी परियोजना के चाहे जितने लाभ गिनाएं परंतु हकीकत तो यह है कि यह चीन की विस्तारवादी नीति का हिस्सा है। इस नीति के तहत वह पहले छोटे छोटे देशों को भारी भरकम कर्ज देकर उपकृत करता है और जब वे देश चीन का कर्ज चुकाने में खुद को असमर्थ पाते हैं तो वह उन देशों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें अपने उपनिवेश के रूप में इस्तेमाल करने लगता है। पाकिस्तान को वह इसी तरह अपने मकड़ जाल में फंसाने में सफ़ल हुआ। धीरे-धीरे बंग्लादेश और नेपाल भी उसके चंगुल में आ रहे हैं।

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