फादर स्टेन की मृत्यु के बहाने …

एल्गार परिषद मुकदमे में माओवादी आरोपी फादर स्टेन स्वामी की 5 जुलाई 1921 को मृत्यु हो गई। वह 84 वर्ष की उम्र के थे। जांच दल एवं कारागार व्यवस्थापन की ओर से उन्हें सभी प्रकार की मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थी। उन्हें तलोजा जेल के अस्पताल या किसी सरकारी अस्पताल में नहीं रखा गया था वरन् उनके द्वारा चुने गए, सभी आधुनिक सुविधाओं से युक्त होली फैमिली मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। उनकी बढ़ती उम्र के कारण निसर्ग के नियमानुसार उनकी मृत्यु हुई परंतु वामपंथी और तथाकथित प्रगतिशील लोगों द्वारा प्रचार माध्यमों के माध्यम से ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे कि फादर स्टेन निर्दोष थे और व्यवस्था ने एक निर्दोष बूढ़े व्यक्ति की बलि ले ली। झूठा प्रचार करने में वामपंथी एवं तथाकथित प्रगतिशील व्यक्ति निष्णात होते हैं और अत्यंत निर्लज्जता से प्रसार माध्यमों का उपयोग करते हैं। उनके इस प्रचार में सामान्य व्यक्ति सहजता से फंस सकता है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए फादर स्टेन कौन था, वह माओवादी संगठन में किस प्रकार सक्रिय था, इसके सबूत और वस्तुस्थिति सामने रखना आवश्यक है।

एल्गार परिषद मामले में कुल 16 लोगों की गिरफ्तारी की गई थी। इन सभी आरोपियों ने जमानत हेतु सर्वोच्च न्यायालय तक प्रयत्न किए। जांच दल  द्वारा प्रस्तुत सबूत तथा मुकदमे की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने प्रत्येक बार सभी आरोपियों को जमानत देने से इंकार कर दिया। यहां सभी बातों का उल्लेख करना संभव नहीं है केवल उदाहरण हेतु कुछ बातें प्रस्तुत कर रहा हूं जिससे फादर स्टेन की सच्ची पहचान हो सकेगी। आरोपी फादर स्टेन और इस मुकदमे के अन्य आरोपियों के मध्य हुए 140 से अधिक ईमेल संवाद उपलब्ध हुए हैं ।इन संवादों से स्पष्ट होता है कि आरोपी फादर स्टेन को माओवादियों की ओर से यह जवाबदारी दी गई थी कि उसे माओवादियों को खत्म करने के उद्देश्य से सुरक्षा बलों द्वारा चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के विरुद्ध प्रचार तंत्र को सक्रिय करना है। उसके लिए उन्होंने एक समिति की स्थापना भी की थी।

आरोपी फादर स्टेन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के फ्रंट संगठन वीवीजेवीए (विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन), पीयूसीएल (पीपल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज) के माध्यम से सक्रिय था। इस विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन की ओर से फरवरी 2016 में हैदराबाद में एक राष्ट्रीय परिषद आयोजित की गई थी। इस परिषद से संबंधित दस्तावेज इस मुकदमे के सह आरोपी सुरेंद्र गढ़लिंग से जप्त  साहित्य में प्राप्त हुए हैं। इस परिषद में जो लोग उपस्थित थे उनकी सूची आरोपी महेश राउत से जप्त साहित्य से प्राप्त हुई है। इस परिषद का प्रतिवेदन भाकपा (माओवादी) के सेंट्रल रीजनल ब्यूरो को दिया गया है और यही प्रतिवेदन माओवादियों के डीकेएसजेडसी (दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी) की प्रमुख एवं माओवादियों की सेंट्रल कमेटी की सदस्य नर्मदाक्का के पास से जप्त किया गया है।

विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन इस संगठन को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने माओवादी फ्रंट संगठन घोषित किया है। फादर स्टेन के पास से जप्त ‘विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन’ इस शीर्षक की पुस्तिका से यह दिखाई पड़ता है कि वह इस संगठन का संस्थापक सदस्य था। इससे यह स्पष्ट है कि आरोपी फादर स्टेन यह प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन भाकपा (माओवादी) के फ्रंट संगठनों के माध्यम से सक्रिय था। आरोपी फादर स्टेन यह माओवादी फ्रंट संगठन पीपीएससी (परसेक्यूटेड प्रिजनर्स सॉलिडेरिटी कमेटी) में भी सक्रिय था। इन संगठनों के माध्यम से फादर स्टेन पर यह जवाबदारी दी गई थी कि वह जिन माओवादियों पर मुकदमे चालू हैं उन्हें वकील और अन्य सहायता उपलब्ध कराए।NIA के पास इसके बहुत से सबूत उपलब्ध है कि पीपीएससी यह माओवादी फ्रंट संगठन होकर वह  भाकपा (माओवादी) के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सक्रिय है।

वैसे ही आरोपी फादर स्टेन जिस बगीचा नामक एक अन्य संस्था के माध्यम से आदिवासी समाज में सक्रिय था वह भी भाकपा (माओवादी) का फ्रंट संगठन होने के पूरे सबूत उपलब्ध हैं। इतना ही नहीं तो आरोपी फादर स्टेन द्वारा भाकपा (माओवादी) की गतिविधियों को चलाने के लिए मोटी रकम स्वीकारने के सबूत भी उपलब्ध हैं।

फादर स्टेन भूमिगत माओवादी कामरेड अरुण के संपर्क में था। उनका जो संवाद प्राप्त हुआ है उसमें उसने कहा है कि देश भर में विशेषकर महाराष्ट्र में माओवादी कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई है। उससे संगठन का नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। गुप्त पद्धति से काम करने वाले हमारे सदस्यों को भविष्य मे इस प्रकार की गलतियों को टालना चाहिए। कामरेड अरुण ने फादर स्टेन को एक अन्य पत्र भेजा है जिसमें प्रारंभ में ‘लाल जोहर’ इस प्रकार अभिवादन किया है। इस प्रकार के अभिवादन सामान्यतः जंगलों में सशस्त्र माओवादी करते हैं। इस पत्र में कहा गया है कि कामरेड दीपक (एक अन्य भूमिगत माओवादी) को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह फादर स्टेन को दिए गए कार्य का प्रतिवेदन भेजें। एक अन्य प्रशांत नाम के माओवादी (माओवादी सिद्ध होने के कारण उसे सजा भी सुनाई गई है)  द्वारा फादर स्टेन को भेजा गया एक ईमेल है जिसमें माओवादी गतिविधियों के लिए पैसों के लेनदेन से संबंधित संवाद है। इतना ही नहीं उसमें माओवादी प्रशांत यह फादर स्टेन से कहता है कि जब याचिका दाखिल की जाएगी (माओवाद से संबंधित एक प्रकरण में) तब सुरक्षा तंत्र के खिलाफ जोरदार प्रचार अभियान चलाना होगा। वैसे ही उसने फादर स्टेन को आगे सुझाया है कि पीपीएससी इस फ्रंट संगठन के कार्यक्रम में आप कुछ ख्याति प्राप्त चेहरे आमंत्रित करें ताकि जनता की मान्यता प्राप्त हो।( कार्यक्रम को जनता की मान्यता प्राप्त हो इसलिए ख्याति प्राप्त चेहरों का उपयोग करना  यह शहरी माओवादियों की रणनीति का हिस्सा है) उस पत्र में अन्य सह आरोपी सुधा भारद्वाज और गौतम नौलखा का भी उल्लेख है। इसके उत्तर में फादर स्टेन  कहता है कि वह सूचनाओं का पालन करेगा। उसी पत्र में माओवादी प्रशांत ने पी पी एस सी फ्रंट संगठन के लिए किए गए काम हेतु फादर स्टेन की प्रशंसा की है। यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रशांत यह माओवादी है यह सिद्ध हो गया है और उसके लिए उसे सजा भी हो गई।

एक अन्य पत्र भी है जो कामरेड सुधा भारद्वाज ने कामरेड प्रकाश (भूमिगत) को लिखा है। इस पत्र के पहले भाग में 19 मार्च 2017 को नागपुर में संपन्न बैठक के बारे में बताया गया है। उसमें हैदराबाद से कामरेड सुरेश, कामरेड दशरथ और महाराष्ट्र से कामरेड महारुख, और कामरेड अंकित उपस्थित थे, यह बताया गया है की इस पत्र में आगे नागपुर की बैठक में कामरेड सुरेंद्र गढ़लिंग तथा कामरेड शोभा सेन की ओर से सहायता मिलने का जिक्र किया गया है। आगे महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ के अंतर्गत भागों में माओवादियों ने सुरक्षा तंत्र के विरोध में जो कार्यवाहीयां की हैं उसकी कामरेड सुरेंद्र ने प्रशंसा की है और कहा है कि माओवादी सेना शत्रु के (पुलिस तथा सुरक्षा बलों के जवान) विरोध में जमीनी स्तर पर जोरदार कार्यवाही कर रही है। इसी पत्र में आगे कहा गया है कि बैठक में इस प्रकार निर्णय हुआ है कि जिस प्रकार कश्मीर में इस्लामी अलगाववादियों को जिहादी संगठनों की ओर से रकम दी जाती है उसी प्रकार, कामरेड साईं बाबा को सजा होने के बाद माओवादी संगठन में निर्मित निराशा को दूर करने के लिए शहरी एवं जंगल के भाग में माओवादियों को उनके काम के अनुसार रकम देना ठीक रहेगा। इसके कारण जंगल भाग के कामरेड पूर्ण समर्पण करने हेतु तैयार नही होंगे एवं किसी भी कार्यवाही का सामना करने के लिए तैयार रहेंगे। इसी पत्र में आगे कहा गया है कि कामरेड अंकित तथा कामरेड गौतम नौलखा कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में रहेंगे। आगे कहा गया है कि ‘एंटी ऑपरेशन ग्रीन हंट डेमोक्रेटिक फ्रंट’ इस संस्था के माध्यम से काम करने वाले वकील पंकज त्यागी तथा उसके साथी, कामरेड साईं बाबा (जिसे सजा हो चुकी है और वह जेल में है) तथा अन्य कामरेडो की सजा के विरोध में प्रदर्शन कर सकें इसके लिए 12 मार्च 2017 को ₹50000 दिए गए हैं। इसी पत्र में फादर स्टेन के बाबत भी एक मुद्दा है। इसमें कामरेड सुधा भारद्वाज ने स्पष्ट रूप से कहा है कि फादर स्टेन को पीपीएससी इस फ्रंट संगठन का कामकाज देखने हेतु नियुक्त किया गया है एवं उससे सुधा भारद्वाज ने कुछ रकम की मांग भी की थी परंतु निधि उपलब्ध कराने हेतु फादर स्टेन ने कुछ भी नहीं कहा। फादर स्टेन ने कामरेड सुधा भारद्वाज को रकम देने विषयक हां या ना कुछ भी नहीं कहा। इस संपूर्ण व्यवहार से यह स्पष्ट होता है कि फादर स्टेन तथा अन्य सभी आरोपियों का भूमिगत माओवादियों से संपर्क था। वे समन्वय रखकर माओवादियों की कार्यवाही में सक्रिय थे।

फादर स्टेन से जो अन्य साहित्य जप्त किया गया उसमें नक्सलवादी/  माओवादी संगठन के 50 वर्ष पूर्ण होने से संबंधित साहित्य, भाकपा (माओवादी) के बुलेटिन, केवल संगठन के लिए जारी पत्रक, सुरक्षा तंत्र से कैसा संघर्ष किया जाए इससे संबंधित पत्रक /साहित्य, माओवादी सदस्यों द्वारा एक दूसरे को भेजे गए पत्र, जीएसएम नेटवर्क के माध्यम से एक-दूसरे के साथ सांकेतिक भाषा में कैसा संवाद स्थापित किया जाए इससे संबंधित मार्गदर्शिका, शहरी क्षेत्र में करने वाली विरोधी कार्यवाहीयों से संबंधित नियम पुस्तिका, भाकपा (माओवादी) का लिखित संविधान, माओवादी सेना के संबंध में ब्यौरेवार जानकारी की एक्सेल शीट और माओवादी क्रांतिकारी युद्ध की रणनीति तथा दांवपेचों से संबंधित दस्तावेजों का समावेश है।

यह जो साहित्य, पत्र व्यवहार, मेल और संवाद प्राप्त हुए हैं उसकी अन्य आरोपियों से प्राप्त साहित्य और सशस्त्र माओवादियों से प्राप्त साहित्य से पुष्टि की गई है। इस संपूर्ण पत्र व्यवहार, ईमेल और संवाद को देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आरोपी फादर स्टेन यह भाकपा (माओवादी) का सक्रिय सदस्य था। इस लेख को शब्द मर्यादा होने के कारण उदाहरण के रूप में फादर स्टेन के विरुद्ध कुछ सबूतों का उल्लेख किया गया है। जब इस मुकदमे की कार्यवाही पूर्ण होगी तब संपूर्ण सबूत सामने आएंगे ही।

फादर स्टेन के निर्दोष होने का हल्ला मचाने वाले वामपंथी -प्रगतिशील कहते हैं कि फादर स्टेन ने किसी माओवादी हिंसक गतिविधि में भाग नहीं लिया। उसके पास केवल साहित्य बरामद हुआ है और केवल साहित्य होने से कोई गुनाहगार नहीं हो जाता। यही तर्क न्यायालय के सामने भी रखा गया था। परंतु उस संबंध में न्यायालय ने कहा कि यह प्रकरण केवल साहित्य पर ही नहीं रुकता। जांच दल द्वारा प्रस्तुत सभी साहित्य का अवलोकन करने से यह दिखाई देता है कि आरोपी फादर स्टेन माओवादी संगठन की कार्यवाही में सक्रिय रुप से सहभागी था। प्रथम दृष्टया यह दिखाई देता है कि आरोपी फादर स्टेन ने माओवादी संगठन के अन्य सदस्यों के साथ मिलीभगत कर संपूर्ण देश में अशांति निर्माण करने एवं देश की लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था को बलपूर्वक उखाड़ने का गंभीर षड्यंत्र रचा। जांच दल द्वारा प्रस्तुत किए गए साहित्य से यह दिखाई देता है कि फादर स्टेन यह माओवादी संगठन का केवल निष्क्रिय सदस्य ना होकर वह माओवादी संगठन की देश के लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था को सशस्त्र क्रांति के माध्यम से उखाड़ने की पूर्ति के लिए कार्य कर रहा था। इसलिए वामपंथी एवं प्रगतीशीलों की ओर से जो यह हल्ला किया जा रहा है कि केवल प्रतिबंधित संस्था का सदस्य होने के कारण जेल में नहीं रखा जा सकता है, उसके बारे में न्यायालय ने बिल्कुल स्पष्ट किया है कि इस मुकदमे के आरोपी यह केवल निष्क्रिय नामधारी सदस्य ना होकर वे विभिन्न स्तरों पर माओवादी संगठन के संगठन में सक्रिय है।

आरोपी फादर स्टेन को जमानत क्यों नहीं दी जा रही, इस प्रश्न के उत्तर मे न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि जमानत की अर्जी पर विचार करते समय आरोपी द्वारा किए गए गुनाह का स्वरूप, गुनाह की गंभीरता, सजा की अवधि तथा अन्य संबंधित बातें ध्यान में ली जानी चाहिए। केवल उम्र या स्वास्थ्य के आधार पर माओवादी आतंकवाद से जुड़े आरोपियों को जमानत नहीं दी जा सकती। उनके स्वास्थ्य का, जहां तक संभव होगा, पूरा ध्यान रखा जाएगा परंतु जमानत देना संभव नहीं है। आरोपी के स्वास्थ्य का हक तथा समाज/ देश का हित इन में संतुलन रखना होगा। आतंकवादी कार्रवाइयों के आरोपियों /अपराधियों के स्वास्थ्य के हक की तुलना में समाज/ देशहित हमेशा ऊपर रहेगा।  वामपंथी एवं तथाकथित प्रगतिशीलों के किसी भी प्रचार को बलि न जाते हुए समझदार नागरिकों ने इस मुकदमे के तथ्यों सबूतों और न्यायालय के निरीक्षण के आधार पर अपना मत बनाना चाहिए।

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