विश्वविद्यालय : अराष्ट्रीय गतिविधियों की प्रयोगशाला?

संसद के दोनों सदनों में पारित हुए नागरिकता संशोधन कानून को लेकर दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय में जिस प्रकार की हिंसक घटना घटी, उस घटना को देखकर यह सवाल मन में आने लगा है कि आज के छात्र देश के अपमान में अपना योगदान क्यों देने लगे है? भारत मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद, हिंदुओं की कब्र खुदेगी एएमयू की धरती पर, भारत तेरे टूकड़े होंगे, हम चाहते हैं… आजादी वगैरे नारों से आजकल जामिया, जेएनयू, एएमयु, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसी शिक्षा संस्थाओं का परिसर गूंजने लगा है।

शिक्षा संकीर्णता से मुक्त करती है, ज्ञान देती है, विनय देती है। शिक्षा और अनुशासन का चोलीदामन का साथ है। अनुशासन से ही राष्ट्र महान बनता है। ऐसे अनेक वाक्य शिक्षा को लेकर बार-बार दोहराए जाते हैं। लेकिन आज ठीक इसी के विपरीत दृश्य शिक्षा के क्षेत्र में हम सब देख रहे हैं। आज जेएनयू, दिल्ली, एएमयु, लखनऊ, जामिया, हैदराबाद जैसे अनेक विश्वविद्यालयों के परिसरों के वातावरण हिंसक क्यों हो गए हैं? इसके क्या कारण हैं? जहां पर ज्ञान, विनय, अनुशासन की शिक्षा होनी चाहिए वहां पर तनाव क्यों फैला हुआ है? आज देश का हर अभिभावक हैदराबाद, जेएनयू, दिल्ली, बनारस, जामिया विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक वातावरण बिगाड़े जाने को लेकर चिंतित है। अभिभावकों को इस बात से चिंता हो रही है कि सत्ता से दूर जा चुकी वामपंथी, समाजवादी एवं मुस्लिम बुद्धिजीवियों की जमात देश के शिक्षा क्षेत्र में छात्रों को भड़का कर अपनी राजनीतिक रोटी सेकने का षडयंत्र  रच रही है। शिक्षा संस्थानों की राजनीति, पर प्रतिबंध क्यों नहीं होना चाहिए? ऐसा प्रश्न चिंतित अभिभावकों के मन में निर्माण हो रहा हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में दादा भाई नौरोजी, महात्मा गांधी जी के आवाहन पर युवा छात्रों ने देश की आजादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। आजादी के बाद भी छात्र राजनीति जारी रही। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने छात्र संगठन खड़े किए। जिससे विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का महत्व बढ़ा। 1975 में इंदिरा गांधी सरकार द्वारा थोपे गए आपातकाल के विरोध में भारत के युवा छात्रों ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी। भारत के विरोध में गलत धारणाएं रखने वाले राजनीतिक संगठनों ने युवाओं को केंद्र में रखकर विश्वविद्यालय को भारत विरोधी विचारों की राजनीति की प्रयोगशाला बनाना आरंभ किया। छात्र राजनीति के नाम पर विश्वविद्यालय के परिसर में भारत विरोधी गतिविधियों की राजनीति का जन्म हुआ। पिछले कुछ दशकों में भारत के कुछ विश्वविद्यालय भारत विरोधी गतिविधियों के राजनीतिक अड्डे बनते दिखाई दे रहे हैं? उनके लिए न राष्ट्र का कोई अर्थ है, न भारतीय संस्कृति का। आज विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के विरुद्ध षडयंत्र रचने का कार्य हो रहा है। समाज की शांति भंग करने से लेकर धार्मिक द्वेष फैलाने एवं राष्ट्र विरोधी नारे लगाए जाने तक की गतिविधियां यहां पर होती है। दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय के परिसर में विद्यार्थियों के पास पेट्रोल मिलता है। संसद के दोनों सदनों में पारित हुए नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उत्पात की पूरी तैयारी के साथ वे आए थे। उन्होंने एक योजना के तहत यूनिवर्सिटी की संपत्ति को और यूनिवर्सिटी की बाहर के रास्ते पर वाहनों में आगजनी कर अपने नापाक मंसूसबों को अंजाम दिया गया। छात्राओं को आगे कर पुलिस पर पथराव किया गया। जवाबी कार्रवाई के लिए पुलिस को विवश किया गया। लाठीचार्ज और भगदड़ में कुछ हिंसक विद्यार्थियों को चोटें भी लगी।

वर्तमान समय में विश्वविद्यालयों को इन भारत विरोधी गतिविधियों से बचाना अत्यंत जरूरी है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन विश्वविद्यालयों को बचाना किससे है? इन विश्वविद्यालयों को उन राष्ट्रविरोधी विचारधाराओं के लोगों से बचाना है, जिन्होंने विश्वविद्यालय के परिसर का इस्तेमाल उस भारत विरोधी ’आइडिया ऑफ इंडिया’ के प्रचार के लिए किया। विश्वविद्यालय को राष्ट्रविरोधी, वामपंथी विचारधाराओं के शिक्षकों से बचाना जरूरी है, जिनकी नियुक्ति ही विश्वविद्यालय में भारत विरोधी तत्व को स्थापित करने के लिए हुई है। इसीके कारण विश्वविद्यालयों के छात्रों द्वारा कभी कश्मीर की आजादी का समर्थन होता है, कभी मां दुर्गा को वेश्या और महिषासुर को राजा बताया जाता है, कभी गोमांस खाने का समर्थन किया जाता है, कभी सशस्त्र माओवादियों का पुरजोर समर्थन किया जाता है, कभी देश मेें आतंक फैलाने के आरोप में फांसी की सजा पा चुके आतंकी अफजल गुरु को शहीद का दर्जा दिया जाता है, आतंकी याकूब मेमन की फांसी का विरोध किया जाता है। इन जैसे अनेकानेक देश विरोधी कार्यक्रम यहां पनपते रहते हैं। जब कभी भी भारत विरोध या हिंदू धर्म पर आघात करने की बात आती है, तो सभी मुख्यधारा के वामपंथी दल, राष्ट्र विरोधी विचारों से जुड़े मुस्लिम संगठन इन विद्यार्थियों के पीछे खड़े दिखाई देते हैं। जिन संगठनों के माध्यम से विश्वविद्यालयों में युवाओं को आंदोलन के लिए उकसाया जाता है, उन संगठनों का इतिहास उठाकर हम देखें  तो विश्वविद्यालय और छात्रों से जुडी मांगें कम और भारत विरोधी गतिविधियों की भरमार ही अधिक दिखाई देती है। वामपंथी एवं देशविरोधी वैचारिक विचारधारा से जुड़े हुए युवा छात्र ’भारत के टुकड़े’ करने की ललकार लगाते हैं और ’इंशाल्लाह इंशाल्लाह’ के नारे लगाते हैं। तब उनकी नाराजगी प्रशासन से नहीं होती, तो उनकी नाराजगी का असली मकसद देश के विरोध में गलत धारणाएं रखने वाली गतिविधियों से जुड़ी हुई होती है। भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को हमेशा महत्व दिया गया है। लेकिन युवा आंदोलन और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वामपंथी और देश विरोधी संगठनों के माध्यम से पुरस्कृत इस प्रकार से हिंसक आंदोलन की इजाजत कभी नहीं दी जा सकती। वामपंथ से जुड़ाव रखने वाली छात्रों की मानसिकता लगातार देश के शिक्षा क्षेत्र में असंतोष निर्माण करने का प्रयास कर रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन और भारत सरकार को इन संगठनों की छात्र आंदोलन में भूमिका की तत्काल जांच करनी चाहिए। अगर अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश के विरोध में युवा छात्र गलत काम करते हैं तो वह देश से बेईमानी है।

 

आपकी प्रतिक्रिया...