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****अरुण करमरकर****

 अपने देश के समृध्द, प्राचीन तथा उदात्त पूर्वोत्तर एवं वहां के बंधुओं की हर तरह से रक्षा और संवर्धन करने की दिशा में, शासन, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं, विद्वत्जनों तथा देश के सामान्य जनों द्वारा समन्वित प्रयास किए जाने की आज अत्यंत आवश्यकता है।

      रत का उत्तर-पूर्वी छोर नेफा  के नाम से जाना जाता था। इस नाम से ही ध्यान में आता है कि यह क्षेत्र देश की उत्तर-पूर्व दिशा में सीमाओं से सटा हुआ है। सीमावर्ती प्रदेश हमेशा से ही संवेदनशील बने रहते हैं। उत्तर दिशा में चीन तथा पूर्व-दक्षिण दिशा में बांग्लादेश और म्यांमार देशों की सीमाएं इन सात प्रदेशों की भूमि के साथ जुड़ी हुई हैं। सीमावर्ती होने के साथ साथ और भी ऐसी कुछ विशेषताएं हैं। जिनके कारण इस क्षेत्र को संवेदनशीलता तथा भू-सामरिक (ॠशे-डींीरींशसळल) पहलुओं की ओर विशेष ध्यान देना आवश्यक हो गया है।

 बर्फीली वादियों, ऊंची पहाड़ियों तथा घने जंगलों से व्याप्त होने के कारण यह क्षेत्र भौगोलिक दुर्गमता से व्याप्त है। आवागमन में कठिनाइयों के साथ-साथ यहां के बंधुओं का नित्य-दैनंदिन जीवन भी जटिलताओं से भरा हुआ है।

 बह्मपुत्र का अतिविशाल प्रवाह और बर्फीले पहाड़ों का निकट सानिध्य इस क्षेत्र में साल में दो बार भयंकर जल प्रलय को आमंत्रित करता है।

 भारत की मुख्य भूमि के साथ यह क्षेत्र ‘सिलीगुडी नेक’ कहलाने वाली बहुत ही संकरी (केवल ७० कि.मी.) भूपट्टीकी के माध्यम से जुड़ा है।

 आवागमन की इन कठिनाइयों के कारण एक ओर जहां प्रशासनिक नियंत्रण कष्टकारक हो जाता है, वहीं दूसरी ओर विकल्प और आंंतरिक सुविधाओं का, जैसे- रेल्वे, सड़कें, विमानपत्तन आदि निर्माण भी कठिन होता है। परिणामस्वरुप यहां का क्षेत्र पिछड़ता है और जनता पिछड़ापन महसूस करने लगती है। पिछड़ेपन की भावना असंतोष को जन्म देती है।

 जंगलों और पहाड़ों के सहारे से रहने वाली, कई जनजातियों में बंटी हुई जनसंख्या यहां आबाद है। हर एक जनजाति की अपनी बोली, अपनी भाषा तथा अपनी-अपनी संस्कृति है। इस बात को वैविध्यपूर्ण सुंदरता की दृष्टि से देखने के बजाय, अलगाव की भावना को बढावा देने के प्रयास ब्रिटिश काल से ही गैर-सामाजिक तत्वों की ओर से किए गए। इन प्रयासों के कारण इस क्षेत्र में विघटन की गंभीर समस्या निर्माण हुई है।

 दक्षिण एशिया के बीचो-बीच बसे होने के कारण सत्ता की प्रतिस्पर्धा के अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी यह क्षेत्र महत्वपूर्ण बन गया है। न केवल चीन-पाकिस्तान जैसे भारत के शत्रु राष्ट्र, किंतु दुनिया की अन्य ताकतें भी इस क्षेत्र पर नजर लगाए बैठी हैं। प्राकृतिक सम्पदा की विपुलता, खनिजों तथा वनोपज सम्पदा का विपुल मात्रा में उपलब्ध होना तथा पर्यावरण की स्वच्छता के कारण इस ओर सब की नजरें हैं।

 राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से देखें तो इस क्षेत्र का विगत ६५-७० वर्षों का अनुभव वेदनामय है। १९६२ का चीनी आक्रमण इसी क्षेत्र से हुआ था। इस आक्रमण में भारतीय सेना को अपमानास्पद पराजय स्वीकार करनी पड़ी और लद्दाख तथा अरुणाचल प्रदेश की विस्तृत भूमि पर चीनी ड्रैगन द्वारा अपना अधिकार जमाने की प्रक्रिया शुरू हुई। निरंतर असुरक्षा की इस अवस्था में ‘भारत की केंद्र सत्ता का रवैया हमारी ओर उपेक्षा का रहा’ इन भावनाओं ने यहां के बंधुओं के मन-मस्तिष्क पर गहरा परिणाम किया है। पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से निरंतर हो रही घुसपैठ, उसके माध्यम से घुसे हुए मुस्लिमों के कारण यहां के जनजीवन में अस्वस्थता निर्माण होना यह भी लोगों के मन में असंतुष्टता निर्माण करने वाली बातें हैं। घुसपैठ को रोकने जैसी राष्ट्रीय मांग करने पर भी सत्ताधारियों द्वारा यहां के सामान्य जनों पर दीर्घ काल से अन्याय ही किया गया। उधर इस भूमि को भारत की मुख्य भूमि से जोड़ने की दृष्टि से आवश्यक पुल ब्रह्मपुत्र पर बांधने के लिए भी यहां की जनता को आंदोलन करना पड़ा था। इन सब बातों के कारण स्वयं को अन्यायग्रस्त तथा उपेक्षाग्रस्त मानने की भावना ने यहां की जनता के मन पर गहरी चोट की है। इस असंतुष्टता का लाभ उठाते हुए ईसाईयत, उग्रवाद, आदि जैसी विदेशी ताकतों ने यहां अलगाव की भावना को पनपाने के भरकस प्रयास किए हैं। मिजोरम, त्रिपुरा जैसे प्रदेश तथा नगाभूमि और असम का सीमावर्ती (करीमगंज इ.) क्षेत्र आदि में इस अलगाव और विघटनवादियों का प्रभाव दिखाई देता है। देशभर की जनसाधारण की मानसिकता में भी इस क्षेत्र और वहां रहने वाले बंधुओं के बारे में बहुत सारी गलत धारणाएं घर कर बैठी हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु दिल्ली, बंगलुरु, मुंबई, चेन्नई आदि शहरों में आए पूर्वोत्तर के लोगों को इन गलत धारणाओं का दुष्परिणाम सहना पड़ता है।

 इस प्रकार की, सारी जटिल तथा समस्याग्रस्त पृष्ठभूमि को गंभीरतापूर्वक ध्यान में लेते हुए पूर्वोत्तर क्षेत्र के बारे में विशिष्ट नीतियों का निर्धारण करने की बहुत आवश्यकता है। शासकीय और राजनैतिक स्तर पर इसके बारे में जितनी गंभीरता से सोचा जाना चाहिए उतनी ही गंभीरता पूरे देश के जनसाधारण का उचित प्रबोधन तथा प्रयासों का आयोजन करने में भी बरतने की आवश्यकता है – और यह काम स्वयंसेवी स्तर पर प्रभावी ढंग से हो सकता है।

 राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक सभी उपाय बारीकी से करने की और कड़ाई से उनको निरंतर निभाने की जरूरत सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सीमाओं को सुरक्षित करना, संवेदशील इलाकों में कड़ी निगरानी, घुसपैठ की किसी भी कोशिश को निरस्त करने की व्यवस्था तथा चौबीसों घंटे सतर्कता आदि जैसे इंतजाम तो शासन और सेना की ओर से ही हो सकते हैं। उसी के साथ मूलभूत सुविधाओं की योजना आदि बातों के बारे में इस क्षेत्र को प्राथमिकता देने का दृष्टिकोण शासन-प्रशासन की ओर से अपनाया जाना भी आवश्यक है। शिक्षा, स्वास्थ्य आदि व्यवस्थाओं का पर्याप्त निर्माण तथा रोजगार, उद्योग-प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने से युवा-आकांक्षाओं की पूर्ति की ओर भी अधिक ध्यान दिया जाना जरूरी है।

शिक्षा-स्वास्थ्य एवं संस्कारों के क्षेत्र में शासन के साथ ही स्वयंसेवी संस्थाएं भी कारगर उपायों का निर्माण कर सकती हैं। विवेकानंद केंद्र तथा जनकल्याण समिति जैसी संस्थाओं द्वारा इस दिशा में कुछ अच्छे प्रयास गत कुछ वर्षों से किए जा रहे हैं। १९८० के दशक से विवेकानंद केंद्र की ओर से अरूणाचल तथा पूर्वोत्तर के अन्य प्रदेशों में कई विद्यालय चलाए जा रहे हैं। इन विवेकानंद केंद्र के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कई विद्यार्थी आज वहां के समाज जीवन के हर क्षेत्र में उच्चा के पदों तक पहुंच कर अच्छा काम कर रहें हैं। जनकल्याण समिति की ओर से महाराष्ट्र के आठ-दस शहरों में पूर्वोत्तर के विद्यार्थी आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर अपने गांवों को लौटते हैं और वहां के जनजीवन में घुल मिलकर राष्ट्रीय भावना जगाने का काम करते हैं।

 पूर्वोत्तर के क्षेत्र में विविध विकास कार्य तथा सुरक्षा के इंतजाम करने के साथ-साथ देश के अन्य भागों में भी पूर्वोत्तर की सुंदरता और शांति-भाईचारे की संस्कृति के बारे में अच्छी धारणाएं निर्माण करने की दृष्टि से प्रबोधन के प्रयास चलाना भी अत्यंत आवश्यक है। त्रिपुरा, मणिपुर, मेघालय की नृत्यकला, चित्रकला तथा अन्य कलाओं का प्रसार करने वाले विज्ञापन हमें दूरदर्शन पर कई बार दिखाई देते हैं। पूर्वोत्तर की कलाओं को पूरे देश में प्रसारित करने और उनकी ओर देशभर के लोगों को आकर्षित करने की दृष्टि से यह एक अच्छा कदम सरकार की ओर से उठाया गया है। इसी प्रकार से पूर्वोत्तर में पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास शासन की ओर से भी किया जा सकता है और पर्यटन, व्यावसायिक तथा स्वयंसेवी संस्थाएं भी उसमें अपना सहयोग दे सकती हैं। पर्यटन के माध्यम से देश के सभी प्रदेशों से लोग पूर्वोत्तर में आने-जाने लगे तो आपसी स्नेह और सामंजस्य को बढ़ावा मिलेगा तथा पर्यटकों की अलग-अलग व्यवस्थाओं के निमित्त से वहां रोजगार के अवसरों में भी विृध्द होगी।

 अंतर-राष्ट्रीय छात्र जीवन दर्शन नामक उपक्रम के माध्यम से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ओर से भी गत ५०सालों से एक अत्यंत उपयोगी प्रकल्प चलाया जा रहा है। इस प्रकल्प के माध्यम से लगभग हर वर्ष पूर्वोत्तर के विभिन्न प्रांतों के ५० से १०० छात्र और छात्राओं के दल का देश के अन्य प्रदेशों में प्रवास आयोजित किया जाता हैं। इस प्रवास में इन छात्रों का निवास स्थानीय परिवारों में रहता है तथा उन्हें प्रेक्षणीय स्थलों, विज्ञान केंद्रों और उद्योगों का दर्शन कराया जाता है। शहर की गणमान्य संस्थाओं और व्यक्तियों की ओर से इन छात्रों का सम्मान आयोजित किया जाता है। इस आत्मीयतापूर्ण कार्यक्रम की बहुत भावभीनी प्रतिक्रियाओं के साथ छात्र अपने गांव लौटते हैं। इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का बहुत ही मधुर प्रतिफल मिलता है, जो राष्ट्रीय एकात्मता की आंतरिक भावना को छात्रवर्ग में प्रबल कर देता है।

 ऐसे सभी अभिनव आयोजनों को सक्षमता प्रदान करना तथा उनके माध्यम से पूर्वोत्तर में अलग-अलग कारणों से विद्यमान अलगाव की भावना को दूर करने से राष्ट्रीय भावना तथा एकात्मता की आंतरिक अनुभूति परिपुष्ट होती है।

 पूर्वोत्तर के सातों प्रांतों की भूमि उगते सूरज की भूमि है। प्राकृतिक सौंदर्य और सम्पदा से भरपूर इस भूमि में भी शंकरदेव जैसे तत्वज्ञानी, लाचिन बड़फुकन जैसे स्वातंत्र्य योध्दा, रानी मां गाईंदिल्यू जैसी देशभक्त, भूपेन हजरिका जैसे महान कलाकार, मेरी कोम जैसे देश को गौरव दिलाने वाले खिलाड़ियों ने जन्म लिया है। यहां की जनजातियां पीढ़ियों से जिस परंपरा का पालन करती आई है, उन परंपराओं में ऐसी कई प्रथाएं हैं जो आधुनिक प्रगति, मानवी जीवन की समृद्धि और आपसी सद्भावना की निर्मिति के सभी पहलुओं से ओतप्रोत हैं। यहां उपलब्ध वन सम्पदा में कई उपयोगी औषधि वनस्पतियां हैं। उनकी परम्पराएं समृद्ध हैं। उन सभी परंपराओं एवं प्रथाओं के बारे में, उनके सामाजिक जीवन के बारे में, खेती करने की वैशिष्टपूर्ण पध्दति के बारे में गहन संशोधन होने की आवश्यकता है। अपने देश में कई प्रांतों में फैली हुई जनजातियों, उनके जीवन, उनकी परंपराओं के बारे में गहरा अध्ययन हो तो, पूरे मानव समाज के लिए वह पथ प्रदर्शक हो सकता है। पूर्वोत्तर के जनजाति बंधु भी इसका अपवाद नहीं है।

 पूर्वोत्तर की जनजातियों द्वारा कई प्रकार की जनभाषाएं बोली जाती हैं। दुर्भाग्य से इन भाषाओं का अध्ययन और विकास करने के कोई प्रयास अभी तक नहीं हुए हैं।

 उनकी कई भाषाओं को लिपिबध्द नहीं किया गया है। स्वाभाविक है कि इन भाषाओं में कोई साहित्य निर्माण नहीं हो सका है। इसी कारण वहां के जीवन, परंपरा, इतिहास तथा अतीत के बारे में दस्तावेजीकरण (ऊेर्लीाशपींरींळेप) नहीं हो पाया है। दूसरी ओर ईसाइयों ने इन सभी भाषाओं को रोमन लिपि में परिभाषित करने का काम किया है। परिणाम स्वरुप, पाश्चात्य जीवन के सभी भले-बुरे पहलुओं को जनजाति बंधुओं में प्रसारित करना उनके लिए आसान हो गया है। आधुनिकता के नाम पर हिंसाचार, पॉप म्युजिक तथा मादक पदार्थो की लत युवा पीढ़ी को लगाई जा रही है।

 संक्षेप में केवल यही कहा जा सकता है कि अपने देश के इस समृद्ध, प्राचीन तथा उदात्त भूभाग एवं वहां के बंधुओं की हर तरह से रक्षा और संवर्धन करने की दिशा में, शासन, प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं, विद्वत्जनों तथा देश के सामान्य जनों की ओर से समन्वित प्रयास की आज आवश्यकता है।

 मो.ः ९३२१२५९९४९

 

 

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