मोदी की कूटनीति दलाई लामा को बधाई, चीन को संदेश!

दलाई लामा खुद को भारत माता का बेटा कहते हैं। तिब्बत के लोग भी चाहते हैं कि भारत को अब तिब्बत के प्रति अपने कूटनीतिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है, जिसमें दोनों ही देशों का कल्याण छिपा है। उम्मीदें इसलिए भी हैं क्योंकि मोदी राज में भारत की विदेश नीति नई दिशा के साथ नए दौर में है। हाल के दिनों में भारत ने इजराइल से लेकर ताइवान तक कई नए दोस्त बनाए हैं। जिन देशों एवं शासन से राजनयिक संबंधों को लेकर कभी भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में संशय और संकोच था, मोदी सरकार के अनेक तथ्यों पर सकारात्मक पहल के कारण वह बदल चुका है।

हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में चल रही तिब्बत की निर्वासित सरकार के सर्वोच्च नेता और बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा को उनके जन्मदिन 6 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक तौर पर बधाई क्या दी, चीन को उससे मिर्ची लग गई। मिर्ची इतनी तेज लगी कि चीन की सरकारी वेबसाइट ग्लोबल टाइम्स के संपादक ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से दलाई लामा को दिए गए बधाई संदेश पर एक लेख लिख डाला और इस लेख के जरिए यह जताने की कोशिश की है कि चीन को इससे फर्क नहीं पड़ता और वह दलाई लामा को भूल चुका है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि दलाई लामा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बधाई से अगर चीन को फर्क नहीं पड़ता तो फिर यह लेख लिखने की जरूरत क्यों पड़ी। अपने लेख में ग्लोबल टाइम्स के संपादक ने तिब्बत और धर्मशाला की तुलना भी कर दी और कहा कि तिब्बत में चीन की सरकार ने तिब्बत में रेल और सड़क का संपर्क पहुंचाया है जो हमेशा ट्रैफिक के लिए खुला रहता है। शायद ग्लोबल टाइम्स के संपादक को यह जानकारी नहीं थी कि धर्मशाला रेल और सड़क के अलावा आम लोगों के लिए हवाई संपर्क से भी जुड़ा हुआ है। दलाई लामा को उनके जन्मदिन पर वैसे तो दुनिया भर से बधाई संदेश मिलते हैं लेकिन पूरी दुनिया की नजर प्रधानमंत्री मोदी के संदेश पर टिकी हुई थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ट्वीट संदेश में शुभकामनाएं देते हुए कहा कि, “86वें जन्मदिन पर मैंने दलाई लामा से फोन पर बात की और उन्हें शुभकामनाएं दीं। हम उनके लंबे व स्वस्थ जीवन की कामना करते हैं।” दलाई लामा का जन्म छह जुलाई 1935 को उत्तरी तिब्बत में आमदो के एक छोटे से गांव तकछेर में एक कृषक परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम ल्हामो दोन डुब था। उन्हें 1989 में शांति का नोबेल सम्मान मिला था। दलाई लामा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुभकामना संदेश के गहरे निहितार्थ भी हैं। इसे सीमा पर तनाव के हालात पैदा करने वाले चीन के लिए एक कूटनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। चीन भारत में दलाई लामा की निर्वासित सरकार को स्वीकार नहीं करता है। हालांकि प्रधानमंत्री ने पिछले साल तिब्बती आध्यात्मिक गुरु को उनके बर्थडे पर शुभकामनाएं नहीं दी थी, जब लद्दाख में भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा था। दलाई लामा 86 वर्ष के हो गए हैं। दुनियाभर के तिब्बती लोग 6 जुलाई का दिन विश्व तिब्बत दिवस या फिर संकल्प दिवस के तौर पर भी मनाते हैं। वर्ष 2015 तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार धर्मगुरु दलाई लामा को ट्विटर पर बधाई देते रहे हैं, लेकिन वर्ष 2016 के बाद से सार्वजनिक तौर पर प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें बधाई नहीं दी है। वर्ष 2019 में पीएम मोदी की ओर से दलाई लामा को बधाई भेजी गई थी लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया था। वर्ष 2020 में बधाई नहीं दी गई थी और 2021 में अब खुले तौर पर पीएम मोदी ने दलाई लामा को जन्मदिन की बधाई दी है यानी वर्ष 2015 के बाद पीएम मोदी ने पहली बार सार्वजनिक तौर पर दलाई लामा से बात की और उसकी जानकारी ट्विटर पर लोगों से शेयर की है। चीन के साथ फिलहाल भारत के जो रिश्ते हैं, ऐसे में वक्त दलाई लामा से हुई बातचीत को एक बड़ी हलचल माना जा रहा है, लेकिन पिछले करीब एक-दो साल में भारत और चीन के संबंधों में बड़ा बदलाव हुआ है। लद्दाख में जारी तनाव की वजह से भारत ने अपनी नीति बदली है।

 

दरअसल,दलाई लामा को भारत में मिल रही शरण से चीन को आपत्ति रही है। वर्ष 1959 में चीन के अत्याचारों को झेलने के बाद वहां से निर्वासित हो चुके तिब्बतियों को भरोसा है कि वो एक दिन अपने घर जरूर लौटेंगे। यही उनका एकमात्र संकल्प है। दलाई लामा पिछले छह दशकों से अपने देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उनके साथ उनके लाखों अनुयायी भी हैं। ये संघर्ष तिब्बत के लोगों के लिए बहुत पीड़ादायी रहा है, लेकिन इसके बावजूद दलाई लामा के अनुयायियों ने हमेशा खुश रहने का तरीका सीख लिया है। तिब्बत में रहने वाले लाखों लोग आज भी दलाई लामा का बहुत सम्मान करते हैं। आज भी जब दलाई लामा से अपने देश वापस जाने की बात पूछी जाती है तो वो शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए स्वदेश वापसी की बात दोहराते हैं। इस दौरान वो भारत में लोगों को मिली स्वतंत्रता और धार्मिक आजादी की तारीफ भी करते हैं। चीन की सेना ने जब तिब्बत पर कब्जा किया था, तो उस समय चीन दलाई लामा की भी हत्या कराना चाहता था और इसी वजह से वर्ष 1959 में दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए। पिछले करीब 62 वर्षों से भारत दलाई लामा के दूसरे घर जैसा है। दलाई लामा और उनके समर्थक आज भी हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं।

माना जाता है दलाई लामा ऐसे धर्मगुरु हैं, जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म का फैसला किया। तिब्बत में दलाई लामा का इतिहास करीब 600 वर्ष पुराना है। तिब्बत के लोग मानते हैं कि दलाई लामा अपने पुनर्जन्म को भी तय कर सकते हैं और उनके पास उस शरीर को चुनने की क्षमता है, जिसमें वो पुनर्जन्म लेना चाहते हैं। इससे पहले वर्ष 1933 में 13वें दलाई लामा का निधन हुआ था। उस समय 14वें दलाई लामा की खोज में चार वर्षों का समय लगा था। 14वें दलाई लामा इस समय 86 वर्ष के हैं अब उनके समर्थक अगले दलाई लामा की खोज कर रहे हैं। हालांकि चीन दलाई लामा के नाम पर एक ऐसे व्यक्ति को चुनना चाहता है जो कठपुतली की तरह उसके सभी आदेशों का पालन करे।पारंपरिक तौर पर दलाई लामा खुद ही अपना उत्तराधिकारी चुनते हैं और अपने निधन से पहले वो अपने अनुयायियों को बता देते हैं कि अगले दलाई लामा कहां और किस स्थान पर मिलेंगे, लेकिन चीन चाहता है कि वो इस परंपरा को न मानते हुए खुद ही नए दलाई लामा की घोषणा कर दे। कहने के लिए चीन के द्वारा चुने गए दलाई लामा तिब्बत के होंगे, लेकिन उनकी विचारधारा सौ प्रतिशत चाइनीज होगी। तिब्बत में अगर किसी व्यक्ति के पास 14वें दलाई लामा की तस्वीर भी मिल जाए तो उसे जेल भेज दिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि, चीन उन्हें अलगाववादी मानता है। तिब्बत में दलाई लामा के बाद दूसरे सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति पंचेन लामा होते हैं। उनका पद भी दलाई लामा की तरह पुनर्जन्म पर आधारित है। वर्ष 1995 में तिब्बत में छह वर्ष के एक बच्चे को पंचेन लामा का अगला अवतार माना गया था हालांकि पंचेन लामा और उसके पूरे परिवार को उसके बाद से आज तक देखा नहीं गया।

दुनिया के किसी वैश्विक मंच से जब भी तिब्बत की चर्चा छिड़ती है तो ड्रैगन दलाई लामा के गांव के रास्ते बंद करता नजर आता है। हर बार उत्तर पूर्व तिब्बत के ताकस्तेर स्थित उनके गांव में उनके करीबियों पर निगरानी बढ़ा दी जाती है। स्वतंत्र तिब्बत के अहिंसक अभियान के सामने चीन की कुटिल योजना नए नए रूप में सामने आती रहती है। बीजिंग की बर्बरता ने तिब्बतियों की पहचान को कुचलने के लिए उनके धार्मिक जीवन से दलाई लामा की पहचान को जड़ से उखाड़ने की अनेक कोशिशें की हैं। लेकिन भारत में दलाई लामा और तिब्बत की पहचान एक नये रूप में बची हुई है और इस बात का उल्लेख दलाई लामा कई मंचों से स्वंय भी कर चुके हैं। असल में भारत और तिब्बत के रिश्ते सदियों पुराने हैं। अगर 1959 में विस्तारवादी चीन ने हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित खूबसूरत तिब्बत पर गैर-कानूनी कब्जा न किया होता तो आज भारत और चीन के बीच कोई सीमा विवाद ही न होता। भारत और चीन के बीच आज अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम से लेकर लद्दाख तक जितने भी सीमा विवाद हैं, उसकी वजह सिर्फ और सिर्फ यही है कि तिब्बत पर चीन ने जबर्दस्ती कब्जा कर रखा है और तिब्बत की कानूनी सरकार पिछले 6 दशकों से भी ज्यादा वक्त से भारत में निर्वासितों का जीवन बिता रही है। सच्चाई ये है कि भारत और चीन के बीच ऐसी कोई सीमा ही नहीं है, जिसको लेकर दोनों देशों में ऐसा कोई विवाद हो। सीमा तो भारत और तिब्बत के बीच की है, जो आज की नहीं हजारों वर्षों पुरानी है। भारत ने कभी भी चीन के साथ सीमा साझा नहीं की, यह तो भारत-तिब्बत सीमा है। 1950 के दशक में तिब्बत पर चीन के आक्रमण के बाद यह स्थिति बदल गई है।

असल में तिब्बती उस बौद्ध परंपरा से जुड़े हैं, जिसकी पैदाइश तकरीबन ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत में हुई है। यह देश ऐतिहासिक रूप से, भौगोलिक रूप से, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक रूप से हमेशा-हमेशा से भारत से जुड़ा हुआ है। जब से तिब्बत पर चीन ने अवैध कब्जा किया है, तिब्बत की पूरी की पूरी निर्वासित सरकार और लोग भारत में भारतीय के रूप में अपनी विशेष पहचान बनाए रखकर निवास कर रहे हैं। दलाई लामा खुद को भारत माता का बेटा कहते हैं। तिब्बत के लोग भी चाहते हैं कि भारत को अब तिब्बत के प्रति अपने कूटनीतिक नजरिए में बदलाव की जरूरत है, जिसमें दोनों ही देशों का कल्याण छिपा है। उम्मीदें इसलिए भी हैं क्योंकि मोदी राज में भारत की विदेश नीति नई दिशा के साथ नए दौर में है। हाल के दिनों में भारत ने इजराइल से लेकर ताइवान तक कई नए दोस्त बनाए हैं। जिन देशों एवं शासन से राजनयिक संबंधों को लेकर कभी भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान में संशय और संकोच था, मोदी सरकार के अनेक तथ्यों पर सकारात्मक पहल के कारण वह बदल चुका है।

दुनिया को लेकर अब भारत का नजरिया पहले से ज्यादा पुख्ता और प्रबल दिखने लगा है। इस कड़ी में बीते दिनों वियतनाम के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री से भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत कर शुभकामनाएं दी। कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री मोदी ने दलाई लामा से भी फोन पर बातचीत की थी। दलाई लामा और वियतनाम के अपने समकक्ष से की गई ये बातचीत अपने आप में एक स्पष्ट संकेत है कि भारतीय विदेश नीति नई करवट ले रही है। कल तक जिन मसलों पर भारतीय विदेश नीति मौन या झिझक के साथ आगे बढ़ रही थी,अब उन्हीं मसलों पर भारतीय विदेश नीति मुखर है। अब हम किसी एक देश की कीमत पर दूसरे देश से संबंध स्थापित करने की विदेश नीति को पीछे छोड़ कर अलग अलग देश, अलग अलग संबंध पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। अब हम अफगानिस्तान-म्यांमार की कीमत पर अमेरिका से और पूर्व सोवियत संघ के देशों से रूस की कीमत पर संबंध नहीं रखते हैं। इसके हालिया उदाहरण भारतीय विदेश मंत्री के वर्तमान जॉर्जिया दौरे और संयुक्त राष्ट्र में म्यांमार को लेकर भारत की नीति से हम समझ सकते हैं। इसके अलावा, भारत अब इजराइल की कीमत पर इस्लामिक मुल्कों से संबंध नहीं रखता। अब हम इजराइल से अलग और अरब देशों से अलग संबंध रखते हैं। वहीं बात अगर भारत के पड़ोसी देशों की करें तो अब तक हमारी विदेश नीति पर चीनी प्रभाव-दबाव स्पष्ट तौर पर दिखता था। परंतु केंद्र की वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार ने इस दिशा में दृढ़ता से आगे बढ़ते हुए ताइवान और वियतनाम से लेकर तिब्बत और मंगोलिया तक अपनी नीतियां बिल्कुल स्पष्ट तरीके से रखी है। इसी कड़ी में हमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दलाई लामा से जन्मदिन पर फोन कूटनीति और भारत की तिब्बत नीति को देखना समझना होगा।

 

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