वर्तमान युग के मानव सम्बंधों का दर्पण

‘निरीह’ मानवीय भावों के कुशल चितेरे, शब्दशिल्पी डॉ.दिनेश पाठक‘शशि’ का नव प्रकाशित कहानी संग्रह है। इस संग्रह में कुल बाईस कहानियां संग्रहीत हैं। ये सभी कहानियाँ आकाशवाणी से प्रसारण को ध्यान में रखते हुए रची गई हैं इसलिए इनका आकार, समय सीमा के अनुरूप है। इन कहानियों में ‘निरीह’ शीर्षित कहानी का क्रमांक दस है परन्तु कथा कृति की सभी कहानियों में कहीं न कहीं पात्र निरीहता की स्थिति में अवश्य द़ृष्टिगोचर होते हैं। अत: इस कृति का शीर्षक, विषय एवं परिस्थितियों के आधार पर ‘निरीह’ पूर्णत: उपयुक्त है।

इस कहानी संग्रह की सभी कहानियों के पात्र, कहानी के विषय एवं उद्देश्य के सापेक्ष सटीक और पूर्ण औचित्यवान हैं।

पहली कहानी ‘और कितने मोड़’ एक ऐसे बेरोजगार युवक की कहानी है जिसने दहेज के लिए अपनी भाभी के साथ पूरे परिवार की बेरुखी को देखा है और इसीलिए वह फैक्टरी की छोटी नौकरी करते हुए अपनी शादी नहीं करना चाहता। लेखक के शब्दों में देखिए-

‘शादी हुए दस दिन भी नहीं बीते थे कि जाने कहां से शोला भड़क उठा। मां ने भाभी जी की छोटी सी बात को तूल देकर घर में हंगामा खड़ा कर दिया। वह हंगामा छोटी सी उस भूल के कारण उठाया था मां ने, मैं नहीं मानता। निश्चय ही इसका मूल कारण दहेज कम मिलना था।”

ऐसी दशा में कहानी के पात्र का मोहभंग हो जाता है और उसे संसार मोहमाया के बंधनों में बंधा, व्यर्थ और भ्रम लगता है। यथा-

‘कभी-कभी वह स्वत: ही वय की प्याली में दर्दों का कालकूट पीता हुआ सा एकदम सहज हो जाता, खुली आंखों से सब कुछ देखते हुए भी न देखता सा। सांसारिकता से विरक्ति सी होने लगती।’

दूसरी कहानी ‘लोकतंत्र का दर्द’ में दिखाई देता है कि ग्रामीण क्षेत्र में भी राजनीति, भ्रष्टाचार एवं हिंसा से अछूती नहीं है। वहां ईमानदार व्यक्ति बिना प्रचार-प्रसार किए और बिना खर्च किए ही विजयी हो जाता है लेकिन वह षड़यंत्रों का शिकार होता है। लेखक ने इसे इस तरह दर्शाया है-

‘अंत में वोटों की गिनती हुई तो नेमसिंह व टेकसिंह आश्चर्यचकित रह गए। बाबूजी रामसिंह ग्राम प्रधान ही नहीं बने बल्कि अपने प्रतिद्वंद्वियों से काफी अधिक वोटों से विजयी हुए।’

और इसका परिणाम यह हुआ कि-

‘सांझ के अंधेरे में एक चिंगारी उत्पन्न हुई और ठांय की आवाज के साथ ही एक दर्दनाक चीख भी। सड़क पर पड़े बाबूजी के चारों ओर खून का ढेर लग गया।”

कहानी ‘संदेह का दंश’ में, पत्नी के विवाहेतर सम्बंध का चित्रण हुआ है। इस कहानी में पत्नी नौकरीशुदा है और वह अपने पति के रहते हुए भी अपने प्रेमी के साथ अपना स्थानांतरण कराती रहती है जिससे पति स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है। यथा-

‘कुछ दिन बाद मेरा ट्रांसफर झांसी से दिल्ली हो गया और उस दिन मुझे सीमा के एक पत्र द्वारा ज्ञात हुआ कि उसका ट्रांसफर भी दिल्ली हो गया है। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। लेकिन उसके साथ ही ग्रोवर का ट्रांसफर भी दिल्ली हो गया है, वाली खबर पढ़ कर मेरी खुशी आधी रह गई। ’

कथाशिल्पी डॉ.दिनेश पाठक ‘शशि’ ने इस कहानी का समापन भी अति विशिष्ट उक्ति के साथ किया है-‘वाह रे तकदीर, कुछ लोग शादीशुदा होकर भी कुंवारे की तरह जीवन बिताते हैं और कुछ कुंवारेवारे रहकर भी….।’

‘टेसू के फूल’ कहानी में लेखक ने स्पष्ट किया है कि पति पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर कई बार विवाहिता पत्नी को अनदेखा करते हैं परन्तु जब पता चलता है कि पत्नी ने स्वयं को उनके अनुकूल बना लिया है तो वे आश्चर्यचकित रह जाते हैं। परन्तु स्वयं पति के अनुकूल बनाने वाली स्त्रियां कम ही मिलती हैं। देवेश, शारदा को अपने योग्य नहीं समझता था क्योंकि वह कम पढ़ी-लिखी थी। लेकिन जब शारदा ने उसे समाचार पत्र दिखाते हुए कहा कि मैं बी.ए. में प्रथम श्रेणी में पास हो गई हूं तो शारदा उसके लिए टेसू के फूल की जगह, सुगंधित चमेली का फूल हो गई।

संग्रह की अगली कहानी-‘दोहरे मापदण्ड’ मेंं बाबूजी ने जहां अपनी जिंदगी को शुद्ध आदर्शों में गुजारा है वहीं वे बेटी को सहशिक्षा में केवल इसलिए पढ़ाना चाहते हैं कि इस तरह वह अपनी पसंद का लड़का देख कर प्रेम विवाह कर ले जिससे दहेज के झंझट से बचा जा सके।

‘आहत’ कहानी में शराबी बारातियों द्वारा की गई पिटाई से लहूलुहान करीमा जब राय बहादुर से पूछता है-‘अब किसलिए आए हो राय बहादुर साब? अभी कुछ और बाकी है क्या?’ तो राय बहादुर कहते हैं-‘नहीं करीमा , ऐसा मत कहो। घायल तुम नहीं, हम दोनों हुए हैं, हम दोनों।’ इस प्रकार यहां गरीब, अमीर के भेद को नकारते हुए मानव धर्म की पक्षधरता दिखाई गई है।

‘अनुत्तरित’ कहानी, मंहगाई और प्राइवेट नौकरी की चक्की में पिस रहे उन करोड़ों बेरोजगाारों की कहानी है जिनके लिए एक सुनिश्चित भविष्य की व्यवस्था तो करना दूर है ही, वर्तमान जरूरतों की पूर्ति करना भी उनके लिए बहुत मुश्किल होता है।

‘एक दिन तो वह चौक ही गया जब पत्नी ने फरमाइश की बजाय नम्रता पूर्वक उससे निवेदन किया कि हो सके तो उसके लिए एक साड़ी ला दें। ये वाली काफी घिस चुकी है।’

कहानी ‘दर्पचूर्ण’ नारी सश्क्तिकरण और नारियों के व्यक्तिंत्व को उभारती हुई कहानी है। ‘सम्बंध’ कहानी हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता से ऊपर उठ कर, इंसानियत को सम्बल देती कहानी है।

‘निरीह’ कहानी में पुत्री के विवाह के लिए मजबूर पिता, अपनी दूसरी पुत्री के लिए उसी व्यक्ति के सामने दूसरी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखने को मजबूर है जो कि उस निरीह की पहली पुत्री की हत्या के षड़यंत्र में शामिल था। कथाशिल्पी डॉ.दिनेश पाठक‘शशि’ ने इसे इस प्रकार व्यक्त किया है-

‘कुंआरी पुत्री का पिता, जो उनके रिश्ते के लिए मेरे पास आए हैं, और इस समय सबसे आगे हैं मेरे भूतपूर्व ससुर जी, जो मेरी मृत पत्नी की छोटी बहन के रिश्ते के लिए मेरे सामने गिड़गिड़ा रहे हैं, एक पिता की तरह, बिल्कुल निरीह पिता की तरह।’

‘संकल्प’ कहानी में नौकरी के कारण बिछड़े हुए गांव में बसने की लालसा तथा बच्चों के शहर में रहने की इच्छा का द्वंद्व है। इसी तरह कालचक्र, प्रतिपुरक,नावालिग, एक और अभिमन्यु तथा पहल आदि कहानियां भी अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानियां हैं।

ताबीज कहानी में लेखक ने बताया है कि किस तरह तंत्र-टोटके से जुड़े हुए लोग निजी स्वार्थ के लिए हंसते-खेलते परिवारों को शक-संदेह की आग में भस्म कर देते हैं। ‘तिरिया चरित्र’ में घरेलू काम-काज से बचने के लिए स्त्री, चुड़ेल होने का ड्रामा करती है और उसके लिए अपने ही परिवार की आर्थिक हानि कराती है।

‘रोहित तुम निर्दोष हो’ कहानी एकतरफा अव्यक्त प्रेम की कहानी है। इसी तरह ‘धूप-छांव’ व ‘अभिशप्त’ कहानी भी लेखक द्वारा बुनी गई उत्तम कहानियां हैं।

इन सभी कहानियों की संवाद-शैली पात्रों के अनुकूल तथा विषय परक है। लेखक ने छोटे वाक्यों में ही गहरी बात कह कर कहानियों को गंभीर बना दिया है। फासले कहानी के कुछ वाक्य देखें-

‘लेकिन ॠचा, वृद्ध शरीर है उनका। बुढ़ापे में तो अच्छे-अच्छे सठिया जाते हैं।’

‘मैं कब मना कर रही हूं, पर बुजुर्गों जैसी बात भी तो कहनी चाहिए न उनको।’

क्हानी संग्रह -‘निरीह’ की कहानियों में लेखक ने देश-काल-परिस्थिति का सजीव निरूपण किया है। इतना ही नहीं उन्होंने पात्रों के भी सजीव भव्य चित्र खींचे हैं।

भाषा व्यवहारिक खड़ी बोली हिन्दी है जो विषय एवं देशकाल-परिस्थिति के अनुरूप है। शैली चित्रात्मक एवं भावात्मक है जो इन कहानियों को और भी उत्कृष्ट बना देती है।

सभी कहानियां अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल हैं। इस तरह रंगीन, आकर्षक आवरण वाली यह पुस्तक ‘निरीह’ एक उत्तम कथाकृति है। 128 पृष्ठीय इस पुस्तक का मुद्रण साफ-सुथरा है। सही मायने में कहा जाय तो यह कथाकृति वर्तमान युग के मानवीय सम्बंधो का दर्पण है जो पठनीय, संग्रहणीय और प्रशंसनीय है।

 

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