राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख

सम्पूर्ण जीवन में अपनी देह को कष्ट दे देकर समाजजागरण करने वाले राष्ट्रऋषि नानाजी ने मृत्युपूर्व इच्छापत्र लिखकर अपनी मृत देह चिकित्सकीय अनुसंधान हेतु दधिची संस्थान हेतु दान कर दी थी। नानजी को पद्म विभूषण व भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। ये सभी सम्मान निश्चित ही हमारे राष्ट्र का उनके कृतित्व व व्यक्तित्व को कृतज्ञता ज्ञापन ही है, तथापि यह भी सत्य ही है कि उनके व्यक्तित्व को इन सम्मानों से नहीं मापा जा सकता है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की असीम संभावनाओं के भय से कांग्रेस ने षड्यंत्रपूर्वक कुत्सित राजनीति करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर गांधी जी की हत्या के आरोप में प्रतिबंध लगाए थे। उसके बाद संघ के सभी संगठन विशेषतः इसकी राजनैतिक इकाई जनसंघ लंबे समय तक अघोषित बहिष्कार का दंश झेलती रही थी। नानाजी देशमुख उन चंद व्यक्तियों में से एक थे जिन्होंने संघ के प्रति अन्य राजनैतिक दलों का मानस परिवर्तित किया। इस राष्ट्रऋषि ने ही जनसंघ के साथ अन्य राजनीतिक दलों के गठबंधन की राह खोली। आपातकाल के पूर्व व बाद तक कांग्रेस एवं सभी विपक्षी दल और यहां तक की स्वयं जयप्रकाश भी आरएसएस व भारतीय जनसंघ से दूरी बनाए रखते थे। इस राजनैतिक अस्पृश्यता को नानाजी ने ही दूर किया था। आज भारतीय जनता पार्टी का देश भर में जो सर्वस्वीकार्य, सर्वस्पर्शी, सर्वव्यापी रूप दिख रहा है वह नानाजी देशमुख की ही देन है। राजनीति उनका स्वभाव नहीं था किंतु जब उन्होंने राजनैतिक क्षेत्र में काम किया तो निस्संदेह सर्वस्वीकार्य होकर ही किया।

भारत की दूसरी स्वतंत्रता का वाहक कही जाने वाली जयप्रकाश जी नारायण की संपूर्ण क्रांति के सूत्रधार थे वे। आपातकाल के बाद समाजवादी, सर्वोदयी व अन्य दलों के साथ भारतीय जनसंघ का गठबंधन बनाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1977 में जब यह गठबंधन सत्ता में आया तो प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में मंत्री पद का प्रस्ताव दिया किंतु नानाजी ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। संपूर्ण क्रांति के दिनों में वे पूरा समय छाया बनकर जेपी के साथ रहते थे। एक बार जब इंदिरा सरकार ने जेपी पर निर्ममतापूर्वक लाठियां बरसाई तो उन प्राणघातक लाठियों को नाना जी ने अपने ऊपर झेल लिया था।

चंडिकादास अमृतराव देशमुख नानाजी का मूलनाम था। बाल्यकाल से ही संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाले नानाजी ने अपने जीवन में युगांतरकारी संयोजन किए। ये संयोजन भारतीय समाज में कभी जनता पार्टी के नाम से दिखे तो कभी उनके वैचारिक आधार पर खड़े ग्रामोदय विश्वविद्यालय व दीनदयाल शोध संस्थान के रूप में। जयप्रकाश जी की स्मृति में गोंडा जिले में उनके द्वारा विकसित जयप्रभा ग्राम आज भी ग्राम स्वावलंबन का एक अद्भुत प्रतीक है। जयप्रभा ग्राम के प्रवेश द्वार पर उनका ध्येय वाक्य लिखा हुआ है – मैं अपने लिए नहीं अपनों के लिए हूं। अपने वे हैं जो पीड़ित हैं उपेक्षित हैं। इसी जयप्रभा ग्राम में नानाजी मानस झील के तट पर बांस की कुटी बनाकर रहते थे। उन्होंने जयप्रभा ग्राम के विकास के माध्यम से देश के समक्ष ग्रामविकास का एक अद्भुत उदाहरण या यूं कहें की रोलमॉडल प्रस्तुत कर दिया था। ग्राम विकास का यह माडल केवल राजनीति में ही नहीं बल्कि अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवा के मंसूरी स्थित प्रशिक्षण केंद्र लबासना में भी पढ़ाया जाता रहता है।

नानाजी देशमुख चुनावी राजनीति के योग्य व्यक्ति नहीं थे किंतु जब उन्होंने यह कार्य किया तो निस्संदेह पूर्ण दक्षता के साथ किया। उन्होंने अविश्विस्नीय रूप से राजमाता बलरामपुर को चुनाव हराया। बाद में इन्हीं राजमाता ने 50 एकड़ भूमि नाना जी को दान के रूप में दे दी, जहां नानाजी ने स्वावलंबी ग्राम का एक देशप्रसिद्ध उदाहरण स्थापित कर दिया। यह दैवीय संयोग ही था कि इस मेघावी, श्रमसिद्ध व संघर्षशील युवा की भेंट संघ के शिल्पी  डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई और इस भेंट ने देश को एक अद्भुत समाजविज्ञानी, समाजसेवक व राजनीतिज्ञ दे दिया। यद्दपि इस प्रज्ञावान किंतु संघर्षशील युवा ने अध्ययन हेतु भी डॉ. हेडगेवार द्वारा प्रस्तावित सहयोग लेने से मना कर दिया, तथापि वे डाक्टर साहब से सदा ही जुड़े रहे व उनकी ही प्रेरणा से नानाजी ने संघ के शिक्षा वर्गों में विधिवत प्रशिक्षण भी लिया। डॉक्टर साहब व नानाजी का यह योग बाद में मणिकांचन योग बनकर देश के सामने आया। डॉ. हेडगेवार जी के स्वर्गवास के बाद महाराष्ट्र में जन्में नानाजी को उत्तरप्रदेश जैसे अपरिचित क्षेत्र में भेजा गया जहां उन्होंने चमत्कार कर दिखाया। यहीं उनकी भेंट एकात्म मानववाद के सिद्धांत प्रणेता दीनदयाल जी उपाध्याय व अटलबिहारी वाजपेयी जी से हुई। वे देश की प्रमुख राष्ट्रीय पत्रिका पांचजन्य, राष्ट्रधर्म व स्वदेश समाचार पत्र के प्रबंधन का कार्य भी देखते रहे। उनके कुशल प्रबंधन में ये तीनों प्रकाशन देश भर में प्रसिद्ध हुए। उत्तरप्रदेश में उनके द्वारा किए गए सांगठनिक, वैचारिक व राजनीतिक उपक्रमों का प्रतिफल था कि 1960 के दशक में भारतीय जनसंघ एक बड़ा राजनैतिक दल बनकर उभरा। राजनीति में आने के बाद भी ग्रामविकास उनका प्रिय विषय रहा, फलस्वरूप मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के लगभग 500 ग्रामों को उन्होंने नया रूप दे दिया। उत्तरप्रदेश में ही देश की विश्वप्रसिद्ध विद्यालय श्रृंखला सरस्वती विद्यालय के प्रथम विद्यालय की नीव भी नानाजी ने ही रखी थी।

आज चित्रकूट नानाजी देशमुख का पर्याय हो गया है। चित्रकूट देश के आराध्य व आदर्श श्रीराम के 14 वर्षीय वनवास में से 12 वर्षों का साक्षी रहा है। विकास में पिछड़े चित्रकूट को देखकर दुखी हुए नानाजी ने 1969 में चित्रकूट को अपनी कर्मस्थली बना लिया और फिर जीवनपर्यंत वे चित्रकूट से समूचे देश को अपनी दिशा व मार्गदर्शन देते रहे। चित्रकूट के ग्रामीण विश्वविद्यालय के वे कुलाधिपति भी रहे।

सम्पूर्ण जीवन में अपनी देह को कष्ट दे देकर समाज जागरण करने वाले राष्ट्रऋषि नानाजी ने मृत्युपूर्व इच्छापत्र लिखकर अपनी मृत देह चिकित्सकीय अनुसंधान हेतु दधिची संस्थान हेतु दान कर दी थी। नानजी को पद्म विभूषण व भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। ये सभी सम्मान निश्चित ही हमारे राष्ट्र का उनके कृतित्व व व्यक्तित्व को कृतज्ञता ज्ञापन ही है, तथापि यह भी सत्य ही है कि उनके व्यक्तित्व को इन सम्मानों से नहीं मापा जा सकता है।

 

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