महापुरूषों की उत्तराखंड यात्राएं

हिमालय के इस मध्य भूभाग यानी आज के उत्तराखंड में महत्वपूर्ण हस्तियों की निरंतर यात्राएं होती रही हैं। इनमें साधु-संत, समाज सुधारकों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्वकर्ताओं तक और राजनीति से लेकर साहित्य जगत के दिग्गज तक शामिल हैं।

हिमालय सदियों से देश-दुनिया के लोगों को आकर्षित करता रहा है। इसके धवल हिमाच्छादित शिखर, नदियां-झरने, हरियाले जंगल, जीव-जंतु भीड़भाड़ से दूर असीम सुकून प्रदान करते हैं। यूं तो समूचा हिमालयी क्षेत्र विशिष्टताओं से भरा है, लेकिन उत्तराखंड औरों से अलग, कुछ ज्यादा समृद्ध है। पतित पावनी गंगा-यमुना का उद्गम, बदरी-केदार समेत चारधाम जैसी विशिष्टताओं ने इसके महत्व में वृद्धि की है। स्वाधीनता आंदोेलन से लेकर चिपको, नशा नहीं-रोजगार दो, उत्तराखंड राज्य प्राप्ति जैसे तमाम जनांदोलन इसके सामाजिक रूप से जागृत होने का प्रमाण हैं। यही कारण है कि हिमालय के इस मध्य भूभाग यानी आज के उत्तराखंड में महत्वपूर्ण हस्तियों की निरंतर यात्राएं होती रही हैं। इनमें साधु-संत, समाज सुधारकों से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के नेतृत्वकर्ताओं तक और राजनीति से लेकर साहित्य  जगत के दिग्गज तक शामिल हैं। कई तो यहां एक बार आने के बाद ऐसे रमे कि यहीं के होकर रह गए।

उत्तराखंड के ज्ञात इतिहास और लोकमानस में प्रचलित कथाओं के आधार पर महान हस्तियों की विभिन्न कारणों से हुई यात्राओं की अगर बात करें, तो उसकी जड़ें रामायण और महाभारत काल तक जाती हैं। प्राचीन काल में सती अहिल्या और गौतम ऋषि से जुड़ा होने के कारण आज भी देहरादून के चंद्रबनी क्षेत्र में गौतम कुंड स्थित है। महाभारतकालीन गुरू द्रोणाचार्य ने उत्तराखंड में आकर तप किया था, ऐसा माना जाता है। देहरादून कैंट में स्थित टपकेश्वर मंदिर और रायपुर ब्लॉक स्थित द्वारा गांव का सम्बंध गुरू द्रोण से बताया जाता है। यही नहीं, पांडवों ने अपना अज्ञातवास यहीं जौनसार क्षेत्र के लाखामंडल में व्यतीत किया था। लाखामंडल को ही लाक्षागृह के तौर पर देखा जाता है। पांडवों ने स्वार्गारोहण के लिए भी उत्तराखंड का रूख किया था। माना जाता है कि बदरीनाथ के नजदीक सीमांत गांव माणा में स्थित व्यास गुफा में ही वेदव्यास ने महाभारत लिखा था।

प्राचीन उत्तराखंड में सबसे महत्वपूर्ण यात्रा करीब सवा 13 सौ साल पहले जगद्गुरू आद्यशंकराचार्य की हुई। यह आध्यामिक चेतना और इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व बढ़ाने वाली रही। 696 ई. के आसपास शंकराचार्य जब ऋषिकेश, श्रीनगर से लेकर बदरी-केदार तक की यात्रा पर आए, तब इस क्षेत्र में बढ़ते बौद्ध प्रभाव से सनातन खराब स्थिति में था। बदरीनारायण से लेकर तमाम मठों-मंदिरों की देव प्रतिमाओं को नदियों-कुंडों में छिपाया जा चुका था। आचार्य शंकर ने ऋषिकेश के प्राचीन भरत मंदिर और बदरीनाथ धाम समेत इनके पूर्व स्थानों पर इन प्रतिमाओं को पुनर्स्थापित किया। गढ़वाल क्षेत्र में यह मान्यता भी है कि देवी दुर्गा के क्षमास्तोत्रम, ‘न मंत्रं न यंत्रम…..’ का सृजन शंकराचार्य ने ही अपनी उत्तराखंड यात्रा के दौरान श्रीनगर गढ़वाल में की थी।

शंकराचार्य के बाद भी अनेक महामनीषी ज्ञान की खोज या तप के लिए जब हिमालय की ओर आए, तो उत्तराखंड उनकी यात्राओं का केंद्र रहा। कुमाऊं की तराई स्थित ऊधम सिंह नगर और चंपावत जिलों में क्रमशः गुरूद्वारा नानकमत्ता और रीठा साहिब का संबंध गुरूनानक देव से बताया जाता है। गुरूनानक देव ने 16वीं सदी के शुरूआती दशक में यहां की यात्रा की थीं। सातवें सिख गुरू हरराय के ज्येष्ठ पुत्र और उदासीन संप्रदाय के संस्थापक गुरू रामराय 1676 में यात्रा करते हुए देहरादून आए और यहीं बस गए। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के नामकरण और नगरीय स्वरूप में इसकी स्थापना को गुरू रामराय से जुड़ा ही माना जाता है। 10वें गुरू गोविंद सिंह ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की। चमोली जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ हेमकुंड साहिब की मान्यता गुरू गोविंद सिंह की तपस्थली के रूप में ही है। प्रख्यात समाज सुधारक और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1855 में हरिद्वार, टिहरी, श्रीनगर, जोशीमठ, बदरीनाथ धाम तक कई स्थानों की यात्रा की। 1879 को वे देहरादून की यात्रा पर आए। उनकी यात्रा के कुछ ही दिन बाद देहरादून में आर्य समाज की स्थापना हुई, जिसने इस क्षेत्र में लोक जागरण और शिक्षा के प्रसार का मार्ग प्रशस्त किया। स्वामी विवेकानंद भी चार बार उत्तराखंड क्षेत्र की यात्रा पर आए। पहली बार 1890 में उन्होंने नैनीताल, अल्मोड़ा, रूद्रप्रयाग, टिहरी, देहरादून और ऋषिकेश में करीब चार माह बिताए। इस दौरान ध्यान और तप के अतिरिक्त अपने विचारों से लोगों को जागृत भी किया। इसके बाद 1897, 1898 और 1901 में भी उन्होंने इस क्षेत्र की यात्रा की।

स्वाधीनता संग्राम का दौर आरंभ हुआ, तो राष्ट्र नायकों की यात्राओं का सिलसिला भी उतरोत्तर शुरू होता चला गया। अलग-अलग अवसरों पर देशबंधु चितरंजन दास, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय, राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, मोती लाल नेहरू, डॉ. एसडी किचलू, आचार्य जेबी कृपलानी समेत कई बड़े नेताओं ने इस क्षेत्र की यात्रा कर स्वाधीनता आंदोलन को ऊर्जा दी। उत्तराखंड क्षेत्र इस मायने में सौभाग्यशाली रहा कि यहां के स्वाधीनता सेनानियों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेतृत्व का निरंतर मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। गांधी ने 1915 के कुंभ के मौके पर हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा की। इसके बाद वे 1916 में हरिद्वार, 1929 में हल्द्वानी, ताकुला, नैनीताल, भवाली, ताड़ीखेत, कौसानी, हरिद्वार, देहरादून, मसूरी की यात्रा पर आए। 1931 में कुमाऊं और 1946 में मसूरी की यात्रा भी बापू ने की। अपनी इन यात्राओं के दौरान महात्मा गांधी ने अनेक कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। दूसरी ओर, जवाहर लाल नेहरू की उत्तराखंड क्षेत्र में आजादी पूर्व यात्राएं और जेल यात्राएं दोनों ही हुईं। 1920 और 1929 में नेहरू ने देहरादून में हुई पॉलीटिकल कांफ्रेंस में हिस्सा लिया। वे देहरादून और अल्मोड़ा जेल में भी अलग-अलग मर्तबा बंदी रहे।

आजादी के बाद प्रधानमंत्री के तौर पर भी जवाहर लाल नेहरू की निरंतर उत्तराखंड यात्रा होती रहीं। यहां तक कि 26 मई 1964 को अपने जीवनकाल की आखिरी यात्रा देहरादून में पूरी करके ही दिल्ली लौटे थे। तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा तिब्बत के हजारों लोगों के साथ 1959 जब भारत आए, तो मसूरी में ही उन्होंने निर्वासित तिब्बत सरकार का गठन किया।

साहित्यिक जगत के मनीषियों को भी हिमालय हमेशा से अपनी ओर खींचता रहा है। खासकर, कुमाऊं के प्राकृतिक सौंदर्य ने उन्हें काफी प्रभावित किया। यही कारण है कि हिंदी साहित्य में छायावाद की महत्वपूर्ण स्तंभ महादेवी वर्मा नैनीताल जिले के रामगढ़ क्षेत्र के नैसर्गिक सौंदर्य से इस कदर प्रभावित हुईं कि 1936 में यहां घर ले लिया। वे जीवनपर्यंत साल में कुछ महीने अपने इसी घर में बिताते हुए साहित्य सृजन करती थीं। रामगढ़ आने से पूर्व महादेवी ने 1934 में बदरी-केदार समेत गढ़वाल और कुमाऊं की यात्रा की थी। जन-गण-मन के रचयिता महान रचनाकार गुरूदेव रविंद्र नाथ टैगोर 1903-4 में नैनीताल जिले के रामगढ़ आए और काफी समय यहां रूके। इसके बाद भी उनकी दो कुमाऊं यात्राओं का जिक्र मिलता है। कहा जाता है कि टैगोर ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ का काफी हिस्सा रामगढ़ प्रवास के दौरान ही लिखा था। घुम्मकड़ी साहित्य के महान सृजनकर्ता राहुल सांकृत्यायन ने भी गढ़वाल और कुमाऊं में अपना काफी वक्त बिताया। इस दौरान उन्होंने यहां के परिवेश पर कुछ पुस्तकों का लेखन भी किया। वे कई वर्ष मसूरी स्थित हैप्पीवैली में रहे। मसूरी में प्रख्यात हास्य कवि काका हाथरसी भी काफी अर्सा रहे। उनकी कई रचनाओं में देहरादून और मसूरी का जिक्र मिलता है।

 

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