शानदार विजय स्मृतियां

14 दिसम्बर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्त्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन के बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं। बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिराए, जिससे मुख्य हॉल की छत ध्वस्त हो गई। गवर्नर अब्दुल मुतालेब मलिक ने कांपते हाथों से अपना इस्तीफ़ा लिखा।

स्वतंत्रता के 75 वर्षों में शायद ही किसी वर्ष हमें किसी न किसी रूप में सेना की मदद नहीं लेनी पड़ी हो। युद्ध हो या प्राकृतिक आपदा, पर अक्टूबर से जनवरी के चार महीनों ने भारतीय राष्ट्र-राज्य की अनेक परीक्षाएं ली हैं। हमारी सेनाओं के अधिकतर यादगार दिन इसी दौरान पड़ते हैं। सेना का लक्ष्य ही होता है विजय। हमारी सेना के दो ‘ऑपरेशन विजय’ और एक‘विजय दिवस’ प्रसिद्ध है। साल 1961 के गोवा अभियान और साल 1999 के करगिल अभियान को ‘ऑपरेशन विजय’ के रूप में याद किया जाता है। 19 दिसम्बर 1961 का ‘ऑपरेशन विजय’ गोवा अभियान के रूप में याद किया जाता है।

सन 1999 का कारगिल ‘ऑपरेशन विजय’ हालांकि मई से शुरू होकर जुलाई में जाकर पूरा हुआ मगर पाकिस्तान ने उसकी तैयारियां सर्दियों में कर ली थीं। इस मौसम में हिमालय पर बर्फ गिरती है और दुश्मन को उसकी आड़ में अपनी गतिविधियां चलाने का मौका मिलता है। वायुसेना 8 अक्टूबर 1932 को अपनी स्थापना की याद में हर साल 8 अक्टूबर को अपना जन्मदिन मनाती है। हर साल 4 दिसम्बर को भारतीय नौसेना दिवस मनाया जाता है, क्योंकि साल 1971 के युद्ध में इसी दिन ‘ऑपरेशन ट्रायडेंट’ के तहत भारतीय नौसेना की मिसाइल बोटों ने कराची के बंदरगाह पर हमला बोला था। 15 जनवरी 1948 को सर फ्रांसिस बूचर के हाथों से भारतीय सेना की कमान जनरल केएम करियप्पा के हाथ में आई थी, इसलिए 15 जनवरी को हम सेना दिवस मनाते हैं।

बांग्लादेश युद्ध

भारतीय सेना की गौरव-गाथा से जुड़ा एक ऐसा दिन भी है, जिसे केवल भारत ही नहीं हमारा पड़ोसी बांग्लादेश भी ’विजय दिवस’ के रूप में मनाता है। यह 16 दिसम्बर को 1971 के युद्ध में पाकिस्तान पर भारत की जीत के कारण मनाया जाता है। भारतीय सेना के सामने पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण के बाद वह युद्ध समाप्त हुआ और बांग्लादेश के नाम से एक नए देश का जन्म हुआ। हालांकि बांग्लादेश का ध्वज 23 मार्च, 1971 को ही फहरा दिया गया था, पर बंगबंधु मुजीबुर्रहमान ने स्वतंत्रता की घोषणा 26 मार्च की मध्यरात्रि को की थी। बांग्लादेश मुक्ति का वह संग्राम करीब नौ महीने तक चला और भारतीय सेना के हस्तक्षेप के बाद अंततः 16 दिसम्बर, 1971 को पाकिस्तानी सेना के आत्म समर्पण के साथ उस युद्ध का समापन हुआ। बांग्लादेश की स्वतंत्रता पर भारत में वैसा ही जश्न मना था जैसा कोई देश अपने स्वतंत्रता दिवस पर मनाता है। देश के कई राज्यों की विधानसभाओं ने उस मौके पर बांग्लादेश की स्वतंत्रता के समर्थन में प्रस्ताव पास किए थे।

पाकिस्तानी अहंकार

सन 1962 के बाद भारतीय सेना का तेज विस्तार हुआ। खासतौर से हिमालयी सीमा की सुरक्षा के लिहाज से। पर असली खतरा पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान ने पैदा किया। एड़ी से चोटी तक अमेरिका से हासिल किए गए चमकदार पैटन टैंकों और सैबर जेटों तथा दूसरे हथियारों से लैस पाकिस्तान को लगता था कि चीन से युद्ध के बाद भारत का मनोबल टूट चुका है। अब हम उसे दबा लेंगे। सन 1965 के अप्रैल-मई में पहले उसने कच्छ के रन में हमला बोला। फिर अगस्त में कश्मीर में ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ शुरू किया। इसके बाद सितंबर में अखनूर-जम्मू इलाके में ऑपरेशन ‘ग्रैंड स्लैम’ छेड़ा। उस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को मात दी, पर पाकिस्तानी इरादे खत्म नहीं हुए थे। 1965 की लड़ाई के छह साल बाद पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याह्या खां ने वैधानिक तरीके से चुनी हुई शेख मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग की सरकार नहीं बनने दी। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी बंगाल की जनता पर जुल्म ढाने शुरू कर दिए। पाकिस्तान में 1970 के दौरान चुनाव हुए थे, जिसमें पूर्वी पाकिस्तान में अवामी लीग ने बहुसंख्यक सीटें जीती। इंसाफ का तकाज़ा था कि अवामी लीग को सरकार बनाने का मौका मिलना चाहिए था, परन्तु याह्या खान इसके लिए तैयार नहीं हुए।

पूर्वी बंगाल का जनांदोलन

भारत के साथ युद्ध की पृष्ठभूमि 1971 की शुरुआत से ही बनने लगी थी। सैनिक तानाशाह याह्या ख़ां ने 25 मार्च को पूर्वी पाकिस्तान की जन भावनाओं को सैनिक ताकत से कुचलने का आदेश दे दिया। अवामी लीग के प्रमुख शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया। लाखों शरणार्थी भारत में आने लगे। भारत के प्रयासों के बावजूद शरणार्थियों की वापसी नहीं हो पाई। पाकिस्तानी सेना के दुर्व्यवहार की खबरें आईं, तब भारत पर दबाव पड़ने लगा कि सैनिक हस्तक्षेप किया जाए। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी अप्रैल में ही आक्रमण चाहती थीं, पर सेनाध्यक्ष जनरल मानेक शॉ ने सलाह दी कि मानसून आने वाला है। हमें इसके बाद कार्यवाही करनी चाहिए।

बरसात में पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश करना खतरे से खाली नहीं था। पूर्वी बंगाल के मैदानी इलाके में नदियों का जाल है, जिन्हें पार करने के लिए आवश्यक संसाधनों की जरूरत थी। दूसरी तरफ भारत के पीछे अंतरराष्ट्रीय समर्थन भी नहीं था। अमेरिका के पाकिस्तान को समर्थन को देखते हुए भारत ने 9 अगस्त 1971 को सोवियत संघ से रक्षा-समझौता किया। इसके साथ ही पूर्वी बंगाल में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ने के लिए मुक्ति वाहिनी तैयार हो रही थी, जिसमें कुछ समय लगा। पाकिस्तान के हौसले बढ़ते जा रहे थे। शायद उसे अमेरिका की शह भी थी, क्योंकि इस युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपनी नौसेना के सातवें बेड़े को हिंद महासागर में भेजा था। पाकिस्तानी वायुसेना ने 3 दिसम्बर 1971 को भारतीय वायुसेना के 11 स्टेशनों पर एक साथ हवाई हमले किए। इनमें पठानकोट, श्रीनगर, अमृतसर, जोधपुर, आगरा आदि शामिल थे। पाकिस्तानी वायुसेना की योजना थी कि एक साथ इतना जबरदस्त हमला किया जाए कि भारतीय वायुसेना पूरी तरह निष्क्रिय हो जाए। पर भारत ने उसी रोज जवाबी कार्यवाही शुरू कर दी। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सीमा के भीतर जाकर हमले बोले। थलसेना ने पश्चिमी और पूर्वी दोनों मोर्चों पर युद्ध शुरू कर दिया।

ऑपरेशन ट्रायडेंट

4 दिसम्बर, 1971 को भारत ने प्रसिद्ध ‘ऑपरेशन ट्रायडेंट’ शुरू किया, जिसने पाकिस्तानी नौसेना की कमर तोड़ दी। आईएनएस निपट, निर्घट और वीर ने कुछ अन्य पोतों की मदद से बाण की शक्ल बनाते हुए आक्रमण किया था। उधर भारतीय सेना ने पूर्वी बंगाल में प्रवेश कर लिया। 14 दिसम्बर को भारतीय सेना ने एक गुप्त संदेश को पकड़ा कि दोपहर ग्यारह बजे ढाका के गवर्नमेंट हाउस में एक महत्त्वपूर्ण बैठक होने वाली है, जिसमें पाकिस्तानी प्रशासन बड़े अधिकारी भाग लेने वाले हैं। भारतीय सेना ने तय किया कि इसी समय उस भवन पर बम गिराए जाएं। बैठक के दौरान ही मिग 21 विमानों ने भवन पर बम गिराए, जिससे मुख्य हॉल की छत ध्वस्त हो गई। गवर्नर अब्दुल मुतालेब मलिक ने कांपते हाथों से अपना इस्तीफ़ा लिखा। इस हमले से पाकिस्तानी सेना का मनोबल पूरी तरह टूट गया और जनरल एएके नियाजी ने हथियार डालने का प्रस्ताव भेज दिया। 16 दिसम्बर को दोपहर के करीब 2:30 बजे समर्पण की प्रक्रिया शुरू हुई और लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। भारतीय सेना की पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ ले जन जेएस अरोड़ा और बांग्लादेश की सेना ने इतिहास के सबसे बड़े आत्मसमर्पणों में से एक को स्वीकार किया। स्वतंत्रता के बाद भारतीय सेना ने जितने भी युद्ध लड़े हैं, उनमें यह विजय अलग से स्वर्णाक्षरों में लिखी जाती है।

 

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