स्त्री विमर्श: विभिन्न आयामों का दृष्टिकोण

जब स्त्री शोषण के खिलाफ स्त्री विमर्श जगाकर एक स्वर में समस्या का सही हल ढूंढ़ने का प्रयास करने लगी तब एक वर्ग स्त्रियों को ही विरोधी बनाने लगा। उपभोक्तावादी संस्कृति, भौतिकवादी संस्कृति के खेलें में आत्मनिर्भरता के नाम पर, आजादी के नाम पर स्त्रियों को उपभोग की वस्तु धीरे-धीरे कब बना दिया गया पता ही नहीं चला। स्त्रियों को घरों से निकालकर बाजारवादी संस्कृति की चंगुल में बड़े चतुराई से फंसा दिया गया है।

वर्तमान में हर क्षेत्र में कार्यरत स्त्री एक प्रबल बौद्धिक चिंतन, मनन का विषय हैं। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो, समाज, मनोरंजन या फिर साहित्य, विज्ञान, मनोविज्ञान से जुड़ा क्षेत्र हो। स्त्री को उससे जुड़े संदर्भों को विविध क्षेत्रों में उसके क्षेत्र अनुकूल दृष्टिकोण से देखा परखा जाता है। एक व्यक्ति के रूप में स्त्री का मूल्यांकन कभी भी उचित ढंग से नहीं हुआ है। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का उचित मूल्यांकन उसके बाह्य तथा आंतरिक पक्षों के विश्लेषण द्वारा ही संपन्न होता है जबकि स्त्रियों का मूल्यांकन उसके बाह्य पक्ष के विश्लेषण द्वारा ही संपन्न करने की परंपरा काफी लंबे अरसे से विशेषकर भारत में होती आई है। स्त्रियों के संदर्भ में सामाजिक दृष्टिकोण स्पष्ट करने वाले स्त्री विमर्श किताब में लेखिका डॉ. निलिमा खुंटे का यह वैचारिक दृष्टिकोण भारत के स्त्रियों की ओर देखने की हमारी दृष्टि स्पष्ट करता है। इस पुस्तक का मुख्य आकर्षण यह है कि एक महिला लेखिका होते हुए भी महिला के रूप में बंधनों को महसूस करने और उससे मुक्ति संदर्भ में उनका दृष्टिकोण स्वतंत्र है। स्त्री विषयक मुक्ति संदर्भ में लेखिका डॉ. निलिमा खुंटे के विचार आधुनिकता के नाम पर भटके हुए नहीं है। स्वतंत्र रूप में लेखिका अपने विचार एवं दृष्टिकोण प्रस्तुत कर रही है। भ्रमित आधुनिकता और नकली मुक्तिवाद को लेखिका जगह-जगह पर खंडित कर रही है।

जब भी स्त्री विमर्श की बात होती है तो भ्रांतियां आकर साथ खड़ी हो जाती है।  स्त्री विमर्श के अंतर्गत आने वाली बिंदुओं की सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों पक्ष भ्रम को घटाते और बढ़ाते रहते हैं। सर्वप्रथम तो स्त्री विमर्श के अस्तित्व को ही शंका की सूली पर आयातित कर टांग दिया जाता है। एक वर्ग ने इसे पश्चिम की नकल कहकर नकार दिया तो दूसरे ने यह सिद्ध किया कि यह भारत की भूमि में बना हुआ पौधा है, यहां पनपा हुआ है। जो समुचित विकास के लिए सही जगह और सही खाद की अपेक्षा रखता है। भारत की स्त्रियों में हो रही विकास को आयातित मानने की भूल हमारे अधूरे ज्ञान का दर्शन है।

हमारी संस्कृति ही विमर्शों के सागर मंथन से निर्मित है, जिसमें स्त्रियों की सुरक्षित एवं उचित भूमिका ही निर्धारित की गई है पर फिर भी इसे हम आयातित मानने की भूल करते ही रहते हैं। हमारी संस्कृति के प्रारंभ से ही स्त्री विमर्श होते रहे हैं। यह सत्य है कि काल एवं परिस्थितियों वश उसके स्वरूप में परिवर्तन अवश्य आए हैं। जितना मंथन स्त्री विषय को लेकर भारतीय संस्कृति में हुआ है उतना अन्यत्र नहीं हुआ है। स्त्रियों के विविध रूप, भारतीय संस्कृति में महिलाओं का स्थान, विविध परिप्रेक्ष्य और हिंदी कहानियों में स्त्री विमर्श इन 4 अध्यायों के माध्यम से यह बात इस पुस्तक में जगह-जगह पर बताई गई है।

स्त्री विमर्श का आंदोलन स्त्री मुक्ति, देह मुक्ति, समानता आदि को लेकर चला। पर जहां तक प्रश्न स्त्री मुक्ति का है, हमारे यहां देह मुक्ति यह शब्द स्त्री मुक्ति के पर्याय के रूप में आया। जबकि शारीरिक, मानसिक शोषण से मुक्ति, विकास के अवसरों को प्राप्त करना, सम्मान की प्राप्ति आदि में स्त्री मुक्ति यह शब्द अपेक्षित है। पर स्त्री मुक्ति को देह मुक्ति से जोड़कर कुछ शातिरों ने समाज में स्वच्छंदता के वातावरण का विषैला बीज बो दिया। स्त्री मुक्ति के आधुनिक चेतना के नाम पर आज एक ऐसे युवा वर्ग का निर्माण हो रहा है, जिसमें परिवार, समाज नाम की चीज का कोई महत्व नहीं रहा। ऐसे सटीक विषयों पर चिंता और चिंतन इस पुस्तक में लेखिका व्यक्त करती है।

स्त्री विमर्श समानता को भी लेकर चला है। जिसे सकारात्मक एवं नकारात्मक दोनों रूप में लिया गया है। मानों स्त्री होना या उससे जुड़ी चीजें ही हीनता पूर्ण है। कटे बाल, जींस जैसे छोटे-छोटे वस्तुओं से बात आचरण तक पहुंच गई है। फैशन में आकर अंग प्रदर्शन के साथ शराब, सिगरेट, किटी पार्टी, एकाकी जीवन, मातृत्व के प्रति उदासीनता जैसी चीजें समानता के नाम पर अपनाई जाती है। जबकि स्त्री विमर्श ऐसे किसी समानता को लेकर नहीं चला था बल्कि स्त्री विमर्श संपूर्ण स्त्री समाज को लेकर चला है। समानता का तात्पर्य गलत लगाया गया। समानता बाह्य तत्वों को लेकर नहीं सम्मान को लेकर चली थी। उनके श्रम के सही मूल्यांकन को लेकर उन्हें उचित अवसर उपलब्ध कराने की थी, न कि स्त्री सरोकार रखने वाले बिंदुओं को ही मिटा देने की थी। आज हम स्त्री समानता के मुद्दों को लेकर किस प्रकार से स्त्री सरोकार रखने वाले बिंदुओं को मिटाने चले हैं, इन विषयों पर इस किताब में चर्चा प्रस्तुत की गई है। अपनी धरती, अपनी ही खाद में खुद का स्त्री विमर्श तैयार किया जाए। पाश्चात्य सभ्यता, संस्कृति की आड़ में दैहिक स्वतंत्रता को हवा न दी जाए। स्त्री मूल्यांकन की सही दृष्टि का विकास होना चाहिए, यह विषय बिंदु स्त्री विमर्श पुस्तक में समर्थ रुप में उपस्थित किए गए है।

आज सभी क्षेत्रों में हो रहे शोषण, बलात्कार, सती प्रथा, विधवा समस्या को स्त्रियों का भाग्य या पाप की श्रेणी में रखकर समाधान प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। हमारी सामाजिक व्यवस्था ही कुछ ऐसी है जिससे स्त्री हीनता से ग्रस्त हो जाती है। जब स्त्री शोषण के खिलाफ स्त्री विमर्श जगाकर एक स्वर में समस्या का सही हल ढूंढ़ने का प्रयास करने लगी तब एक वर्ग स्त्रियों को ही विरोधी बनाने लगा। उपभोक्तावादी संस्कृति, भौतिकवादी संस्कृति के खेलें में आत्मनिर्भरता के नाम पर, आजादी के नाम पर स्त्रियों को उपभोग की वस्तु धीरे-धीरे कब बना दिया पता ही नहीं चला। स्त्रियों को घरों से निकालकर बाजारवादी संस्कृति की चंगुल में बड़े चतुराई से फंसा दिया गया है।

स्त्री विमर्श पुस्तक को पढ़ने पर ऐसा लगता है कि बहुत कुछ छूट रहा है। इस पर लेखिका का कहना ऐसा है कि स्त्री विमर्श में विचारों की लड़ी लगती है, एक पकड़ने जाते है तो दूसरी हवा के झोंके से दूर भाग जाती है। स्त्री जाति के जीवन का प्रवास एवं प्रभाव सतत गतिमान और अनंत रहा है। जिसके साथ संगत बनाए रखना बेहद कठिन काम है लेकिन लेखिका ने स्त्री विमर्श के माध्यम से स्त्रियों के अस्तित्व से सकारात्मक एवं नकारात्मक पक्षों से जुड़े हुए विभिन्न विषयों पर अपने सटीक विचार व्यक्त किए हैं।

क्रिया की प्रतिक्रिया भी होती रहती है। आजादी के बाद से हो रहे स्त्रियों की विभिन्न आंदोलनों के कारण अब स्त्रियों में मांग उठ रही है कि देश आजाद हो गया अब ‘हम‘ कब होंगे? समाज में हो रहे विभिन्न परिवर्तनों और आधुनिकता की वजह से ही आज स्त्रियों को समान अवसर मिलने लगे हैं। वह हर क्षेत्र में  आगे बढ़कर विशेष भूमिका निभाने लगी है। भारतीय संस्कृति की महानता से कौन अवगत नहीं हैं। स्त्रियों के संदर्भ में आदर, सम्मान, परोपकार जैसे बहुत सारे विषयों से लबालब भरी पड़ी है लेकिन आजादी के 73 साल बाद भी स्त्री पूरी तरह मुक्त महसूस नहीं कर रही है। इस प्रकार के अपने विचारों को व्यक्त करते हुए स्त्री विमर्श की लेखिका डॉक्टर नीलिमा कुंटे ने अपने विचार बहु आयामों से प्रस्तुत करने का प्रयास इस पुस्तक के माध्यम से किया है। यह पुस्तक स्त्री की संपूर्णता को समझाने का प्रयास करता है। स्त्री से जुड़े हुए सभी मायनों को परखता है। स्त्री जिन बंधनों में बंधी है, वह बंधन कैसे निर्माण हुए?  कब निर्माण हुए? अपनी आदर्श समाज व्यवस्था में भी देखते-देखते स्त्री पिछड़ कैसी गई? स्त्रियों के आरक्षण का भरपूर फायदा उठाकर ‘आरक्षण‘ स्त्रियों के शोषण का माध्यम कैसे बनता जा रहा है? इन सारे विषयों पर चर्चा उपस्थित करता है। स्त्रियों के मूल्यांकन का सही मानक क्या है? आज वर्तमान में उसकी सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं वास्तविक स्थिति क्या है? जैसे स्त्री विषयक प्रश्नों की लड़ी इस पुस्तक में एक के बाद एक हमारे सामने प्रस्तुत होती है। स्त्रियों को भारत की सफलता की सीढ़ी बनाने के लिए स्त्री संबंधित अपने दृष्टिकोण को विस्तारित करना आवश्यक है। श्री सप्तश्रृंगी पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित और डॉ.नीलिमा खुंटे द्वारा लिखित स्त्री विमर्श यह पुस्तक पाठकों को एक विस्तृत एवं विभिन्न आयामों का दृष्टिकोण देने में सफल रही है।

 

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