वामपंथी मीडिया : शुतुरमुर्ग या भेड़िया?

देश में मीडिया का एक वर्ग ऐसा है जिसे आज तक आरएसएस, भाजपा और नरेंद्र मोदी का बढ़ता कद कभी पसंद नहीं आया। मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस समय से इस वर्ग ने हर कदम पर उन्हें असफल घोषित करना शुरू किया जो अब तक जारी है। इसके लिए कई बार झूठ गढ़े गए और उन्हें अपने प्रचार तंत्र का उपयोग कर सही साबित करने का प्रयास किया गया। लेकिन बार-बार साबित हुआ कि मीडिया के इस वर्ग का झूठ बेनकाब होता रहा, वहीं अपनी आलोचनाओं से बेपरवाह मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे और अब देश के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके हैं। उनकी धमक अंतरराष्ट्रीय स्तर तक सुनी जा रही है।

वामपंथी मीडिया की अब वही कोशिश (साजिश) योगी आदित्यनाथ के खिलाफ भी जारी है। योगी आदित्यनाथ सरकार को बदनाम करने के लिए कोरोना काल में गंगा में हजारों लाशें दफनाने का झूठ प्रचारित कर दिया जाता है तो कभी हाथरस कांड में पीड़ित परिवार की एक महिला सदस्य बनकर झूठा इंटरव्यू देकर सरकार को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। लेकिन इन वामपंथी मीडिया के लिए दुख का विषय है कि सोशल मीडिया के इस युग में हर बार उनका झूठ बेनकाब हो रहा है, और मोदी की ही तरह योगी आदित्यनाथ का कद लगातार बढ़ता जा रहा है।

इस चुनाव के पहले चरण से ही मीडिया का एक वर्ग भाजपा और योगी आदित्यनाथ सरकार को हारता दिखाता रहा है। एक TV चैनल के पूर्व एडिटर के एक यू-ट्यूब चैनल पर लगातार समाजवादी पार्टी की लहर बताकर भाजपा को सौ सीटों से भी कम पर सिमटने की बात कही जाती रही है। चैनल के कुछ हेडलाइन देखें- सौ सीटों से कम पर सिमट सकती है भाजपा, डेढ़ सौ सीटों को क्रॉस नहीं कर पाएगी भाजपा, तीन चरणों के बाद भाजपा के लिए चुनाव में कुछ नहीं, 10 जिलों में एक सीट के लिए तरस जाएगी भाजपा। ….आदि…आदि। इस चैनल पर एक बड़े चैनल के पूर्व संपादक भाजपा को पहले ही चरण से लगातार हारता हुआ बताते रहे। एक सबसे बड़े अखबार के दो दशकों तक संपादक रहे पत्रकार बताते रहे कि अखिलेश यादव की सरकार पहले तीन चरणों में ही बन चुकी है। बाकी चरणों में केवल लीड लेने की लड़ाई है।

मजे की बात यह है कि भाजपा के लिए इन पत्रकारों की ग्रंथि केवल एक चुनाव में ही नहीं दिखाई पड़ी। 2014 में ये भाजपा को 150 से 170 के बीच समेट रहे थे, भाजपा ने 282 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। 2019 में ये सत्ता विरोधी लहर के कारण सरकार के हार जाने की बात कह रहे थे, भाजपा ने 303 का आंकड़ा छू लिया। 2017 में ये बीजेपी को यूपी में 200 से ज्यादा सीटें देने को तैयार न थे, भाजपा+ 325 पर पहुंच गई। यदि किसी एक ही पार्टी के लिए बार-बार आपके आंकड़े गलत हो रहे हैं तो क्यों न माना जाए कि आपके आंकड़े नहीं, आपकी नीयत गलत है।

जबकि इसी चुनाव के बीच, मैं लगातार Umesh Chaturvedi और संजय तिवारी मणिभद्र जी से लगातार बातचीत करता रहा। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने पहले दिन से ही बता दिया था कि भाजपा की सरकार बननी तय है, सीटें 250 से 300 के बीच कुछ कम या ज्यादा हो सकती हैं। विशेष जानकारी पर मेरा अनुमान था कि भाजपा के वोट शेयर में तीन से चार फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। मेरे ये दोनों वरिष्ठ इस बात के साक्षी हैं। मेरी बात सही प्रमाणित हुई है। ऐसी स्थिति में इन वामपंथी मीडिया की नीयत पर सवाल क्यों नहीं उठना चाहिए।

भारतीय चुनावों में विविधता इतनी ज्यादा है कि मतदाताओं के बारे में सौ फीसदी पूर्वानुमान कोई नहीं लगा सकता। इसीलिए चुनावी सर्वे, एग्जिट पोल और पोस्ट पोल सर्वे बार-बार गलत साबित होते रहे हैं। लेकिन इस मीडिया को किसने यह अधिकार दिया कि वह बीच चुनाव में ही किसी पार्टी को सौ सीटों से कम पर आने की घोषणा करने का अधिकार दे दे? सही बात तो यह है कि इस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन इस पर न तो अभी भाजपा का ध्यान गया है और न ही चुनाव आयोग का। इन दोनों की निष्क्रियता का लाभ उठाते हुए मीडिया के कुछ दिग्गज लगातार भाजपा को हारता हुआ बताते रहे।

हम जैसे सामान्य लोगों को भी यह साफ दिख रहा था कि राशन योजना, पीएम आवास योजना और पेंशन योजना का लोगों को लाभ हुआ है, लोग इसके पक्ष में मतदान कर सकते हैं और भाजपा को इसका फायदा हो सकता है। तब मीडिया के कथित दिग्गज पत्रकारों को यह बात क्यों नहीं दिख रही थी? क्या आप जनता की बात नहीं पढ़ पाए…. यदि आप जनता के मन की बात को इतना भी नहीं पढ़ सकते तो आप मीडिया के दिग्गज किस बात के? और यदि आप सच्चाई पढ़ पा रहे थे, लेकिन इसके बाद भी आप भाजपा को हारता हुआ दिखा रहे थे तो इसका मतलब आप साजिश रच रहे थे। गंगा में तैरती लाशों की तरह आप एक और झूठ गढ़ रहे थे।

वामपंथी मीडिया ने अपनी इन्हीं तरह की साजिशों से पत्रकारिता की विश्वसनीयता गिराई है। आम जनता का समाचार माध्यमों पर भरोसा घट रहा है। इसके पीछे वही ‘’क्रांतिकारी…बहुत ही क्रांतिकारी’’ पत्रकार जिम्मेदार हैं जो बार-बार हाथ मलते हुए प्रचंड इतिहास रचने जा रही पार्टी को हारता हुआ बताने की कोशिश कर रहे थे। यदि कल को कोई सरकार इनके ऊपर कार्रवाई करे तो भला किसी को इनसे कोई सहानुभूति क्यों होनी चाहिए???

इन पत्रकारों ने कभी पत्रकारिता को विश्वसनीय बनाने के लिए काम ही नहीं किया। वे अपनी रणनीति बनाकर एक पार्टी के लिए प्रचार तंत्र बने रहे तो दूसरी पार्टी को बदनाम करते रहे। ये जनता की पत्रकारिता करने की बजाय एक पार्टी के लिए पत्रकारिता करते रहे। मुझे लगता है कि मीडिया के इस वर्ग ने झूठ बोलकर अपना, विपक्ष का और इस देश का बड़ा नुकसान किया है। यदि ये लोग विपक्ष को हिंदुत्व की ओर करवट लेती राजनीति का सच बताते तो शायद राहुल गांधी का आज ये हश्र न होता। जनता के बीच विपक्ष की अविश्वसनीयता का श्रेय इस शुतुरमुर्ग और भेड़िया की हरकत करने वाली वामपंथी मीडिया को भी दिया जाना चाहिए। (शुतुरमुर्ग इसलिए क्योंकि इन्होंने जानबूझकर सच देखना पसंद नहीं किया, और भेड़िया इसलिए क्योंकि अपने फायदे के लिए इन्होंने लगातार झूठ बोला और देश का नुकसान किया।)

मामला पूरी तरह एकतरफा भी नहीं है। तथाकथित राष्ट्रवादी पत्रकार वर्ग भी अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। वह भी महंगाई, बेरोजगारी पर तथ्यात्मक खबरें नहीं दिखा रहा है। इससे उसकी साख भी कम हुई है। पत्रकार कब समझेंगे कि उनका कार्य जनता के हित के लिए मुख्य मुद्दे उठाना है। आपकी पत्रकारिता एक पार्टी के लिए नहीं, जनता के लिए होनी चाहिए। किसी पार्टी के जीतने-हारने से किसी पत्रकार को कोई फर्क क्यों पड़ना चाहिए? यह देश जीतना चाहिए, जनता की जीत होनी चाहिए…इंसानियत जीतनी चाहिए।

जय हिंद!

 – अमित शर्मा

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