घर-घर तैयार किए जाते हैं सजावटी फूल

 

एक ऐसा गांव, जहां कागज के फूल खिलते हैं। रंग-बिरंगे कागज से बने फूल मंदिरों से लेकर शादी के मंडप तक की शोभा बढ़ाते हैं। कागज की लड़ी, क्रिसमस ट्री, गुलाब, कमल, सूर्यमुखी, गेंदा, कमल के अलावा और भी बहुत कुछ तैयार किए जाते हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के सकरा प्रखंड स्थित विद्दीपुर गांव में घर-घर कागज के फूल बनाए जाते हैं।

लगन और पूजा-पाठ के त्यौहार के समय इसकी काफी मांग बढ़ जाती है। मांग पूरी करने के लिए घर-घर काम चलता है। इसकी मांग सूबे के अलावा पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, असम व उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आती रहती है। मांग पूरी करने के लिए कभी-कभी इन लोगों को दिन-रात एक करके काम करना पड़ता है।

– प्रश्चिम बंगाल, ओड़िशा, असम व उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहरों से मांग
– कागज के फूलों के रोजगार से जुड़े लोगों को दी जाती है सरकार की ओर से आर्थिक सहायता 

करीब एक हजार की आबादी फूल निर्माण में जुटी : करीब तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में करीब एक हजार लोग इस काम में लगे हुए हैं। 300 परिवारों का भरण-पोषण इसी से होता है। एक परिवार रोजाना 500 से एक हजार रुपये तक का फूल बना लेता है। लाहत हटाकर प्रति परिवार सालाना सवा लाख रुपये तक की कमाई कर लेता है। इससे गांव के लोगों को यह फायदा होता है कि आमदनी के साथ वे गांव में रहकर अपनी खेती भी कर लेते हैं। वरना नौकरी करने के लिए पलायन करने पर खेती-बारी पूरी तरह बंद हो जाता है। एक तरफ आमदनी होता है तो दूसरी तरफ नुकसान उठाना पड़ता है।

पंडाल, मंडप और स्टेज की होती है सजावट : फूल निर्माता साजन मंडल ने बताया कि यहां तैयार फैंसी फ्लावर पाट, गुलदस्ता व रोलेक्स से ड्राइंगरूम, बेडरूम, किचन, लाबी को सजाया जाता है। सरस्वती पूजा, दशहरा और शादियों में पंडाल, मंडप, वरमाला स्टेज आदि सजाने में इन फूलों का इस्तेमाल किया जाता है। कारीगर सत्यनारायण सहनी ने बताया कि वे इस रोजगार से 10 वर्षों से जुड़े हैं। फूल तैयार कर मुजफ्फरपुर के थोक विक्रेताओं को देते हैं। हरींद्र सहनी और संजीत सहनी ने बताया कि कोलकाता से कच्ची सामग्री मंगाई जाती है। महंगाई के कारण लागत खर्च अधिक है। कोरोना के कारण भी डिमांड पहले की तुलना में कम हुई थी। लेकिन, कोरोना महामारी का प्रकोप कम होने पर बाजार में फिर से तेजी आने के कारण डिमांड बढ़ गई है।

हर दिन तैयार हो रही 25 हजार लड़िया :  लगन को लेकर चमकदार कागज की लड़ी बनाने का काम जारी है। गांव में हर रोज करीब 25 हजार लड़ी तैयार हो रही है। इसके अलावा रेशम की माला व कागज के गुलाब की मांग सर्वाधिक है। इससे इस क्षेत्र के आर्थिक विकास में मदद मिलती है। कागज के फूलों के रोजगार से जुड़े लोगों को सरकार की ओर से आर्थिक सहायता भी दी जाती है। विद्दीपुर गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार मिल जाता है। इस कारण गांव में पलायन करने वालों की संख्या काफी कम है।

वर्ष 1960 में हुई थी शुरुआत :  गांव के रमेश और श्याम सिंह ने बताया कि वर्ष 1960 के आसपास कागज के फूलों का निर्माण शुरू हुआ था। यहां शादी के मंडप, डोली पर मोर, हंस, चिड़िया, हाथी, शेर सहित अन्य जानवरों की कागज से आकृति बनाते थे। उन्हें देखकर अन्य लोगों ने फूल बनाना सीखा। धीरे-धीरे यह व्यापक रूप ले लिया।

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