किसान आंदोलन : कृषि कानून से खुश थे 86% किसान

केंद्र की मोदी सरकार द्वारा किसानों के लिए लाए गए तीन कृषि कानूनों को पिछले साल भले ही वापस ले लिया गया हो, लेकिन इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने जो रिपोर्ट पेश किया है वह काफी चौंकाने वाला है।  केंद्र सरकार की तीन कृषि कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पैनल ने एक बड़ा दावा करते हुए कहा है कि, सरकार के कृषि कानून से 86% किसान संगठन खुश थे। बता दें कि ये किसान संगठन लगभग 3 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। बावजूद इसके इन तीनों कानूनों के विरोध में किसानों ने लगातार विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल गुरु नानक देव की जयंती यानी 19 नवंबर को इन तीनों कानूनों को वापस ले लिया।

बता दें कि जनवरी 2021 में तीनों कृषि कानून के लिए एक कमेटी गठन किया था।  जिसका उद्देश्य किसान कानून की जमीनी सच्चाई को जानना था। इस कमेटी में कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, किसान संगठनों से जुड़े अनिल धनवत और प्रमोद कुमार जोशी को शामिल किया गया था। जिसके बाद कमेटी ने मार्च 2021 में अपनी रिपोर्ट एक सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में कृषि कानून से जुड़े कुछ सुझाव भी सरकार को दिए गए हैं। इस रिपोर्ट को पेश करने के बाद कमेटी के सदस्य ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि अगर कानून रद्द होते हैं तो इसका असर एग्रीकल्चर निवेश पर पड़ेगा।

इसके अलावा SC की कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि, फसल खरीदी और अन्य विवाद सुलझाने के लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था की जरूरत है। और इसके लिए किसान अदालत जैसा निकाय बनाया जाना चाहिए। बताया जा रहा है कि कमेटी की रिपोर्ट जल्द ही सार्वजनिक हो सकती है।

हालांकि किसान कानून रद्द होने के बाद दिसंबर 2021 में किसान संगठनों और सरकार के बीच अंतिम दौर की बातचीत हुई थी, जिसमें कई मुद्दों पर सहमति बनी थी। इनमें फसलों के लिए MSP तय करने पर कमेटी बनाने, आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मौत हो गयी थी उन्हें मुआवजा देने और आंदोलन के दौरान किसानों पर लगे मुकदमे हटाने पर सहमति बनी थी।

आपको बता दें कि MSP जिसे न्यूनतम समर्थन मूल्य कहा जाता है। जिसके तहत केंद्र सरकार फसलों की एक न्यूनतम कीमत तय करती है. इसके अंतर्गत अगर बाजार में फसल की कीमत कम भी हो जाती है, तो भी सरकार किसान को MSP के हिसाब से ही फसल का भुगतान करेगी। इससे किसानों को अपनी फसल की तय कीमत के बारे में पता चल जाता है कि उसकी फसल के दाम कितने चल रहे हैं। ये एक तरह फसल की कीमत की गारंटी होती है।

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