संगीत की साधक विद्याधरी देवी

भगवान भोले शंकर के त्रिशूल पर बसी काशी का नाम अनेक कारणों से भारत में ही नहीं, तो विश्व भर में प्रसिद्ध है। जहां एक ओर यह धर्मनगरी है, तो दूसरी ओर शिक्षा और तंत्र-मंत्र साधना के लिए भी यह महत्वपूर्ण स्थान है। इसी के साथ काशी ने अनेक कलाकारों को जन्म और आश्रय दिया। गायन और नृत्य के क्षेत्र में ऐसी ही एक कलाकार थीं विद्याधरी देवी।

विद्याधरी देवी का जन्म ग्राम जसुरी (वाराणसी) में 1881 ई. में हुआ था। बचपन से ही साहित्य, नृत्य और संगीत के प्रति इनका रुझान था। इन्हें संगीत की शिक्षा पंडित दरगाही मिश्र से मिली। पंडित रामसुमेर मिश्र (सुमेरू जी) तथा उस्ताद नसीर-बशीर खां के मार्गदर्शन से इनकी साधना में उत्तरोत्तर निखार आता गया। खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा और टप्पा आदि इन्हें सिद्ध थे। इसके साथ ही जयदेव रचित गीत गोविंद को वे इतना भाव विभोर होकर गाती थीं कि लोग समाधि जैसा अनुभव करने लगते थे।

उन दिनों लखनऊ भी ऐसे कलाकारों का गढ़ था। एक बार लखनऊ की प्रसिद्ध गायिका मुनीर बाई के घर हुई एक संगीत गोष्ठी में इन्होंने राग मालकौंस में विलंबित, द्रुत खयाल और तराना गाकर श्रोताओं के साथ ही उस समय की प्रसिद्ध गायिका गौहर जान का दिल जीत लिया। इसके बाद उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैलने लगी। उन्हें गायन समारोहों में बुलाया जाने लगा।

उस समय इन गायिकाओं को प्रायः अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था; पर धार्मिक विचारों से परिपूर्ण विद्याधरी देवी इसकी अपवाद थीं। गांधी जी के आह्नान पर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़ीं। उन्होंने सदा खादी पहनने का व्रत लिया और इसे आजीवन निभाया। गांधी जी के सुझाव पर अपने कार्यक्रमों में वे एक-दो देशभक्ति के गीत भी गाने लगीं। पंडित दरगाही मिश्र ने इसके लिए दो गीतों की धुन बनाईं, जिसे वे सभी संगीत समारोहों में गाती थीं।

पहली रचना भारतेंदु हरिश्चंद्र की थी –

अंदर-अंदर सब रस चूसें, बाहर से तन-मन-धन मूसें
जाहिर बातन में अति तेज, क्यों सखि साजन, नहिं अंगरेज।।

इसी प्रकार दूसरे गीत में वे गाती थीं –

चुन-चुन के फूल ले लो, अरमान रह न जाये
ये हिन्द का बगीचा, गुलजार रह न जाये।।

संगीत की साधक विद्याधरी देवी को काशी नरेश सहित अनेक राजाओं का आश्रय प्राप्त था। वे एक धनवान जौहरी की उपपत्नी थीं। उसके अनेक बहुमूल्य आभूषण इनके पास ही रहते थे। जब उस जौहरी का देहांत हुआ, तो विद्याधरी देवी ने उसके पुत्र को बुलाकर वह सब आभूषण उसे सौंप दिये।

उन्होंने कहा कि इस सम्पत्ति पर तुम्हारी मां का अधिकार है। उस समय उन आभूषणों की कीमत 80,000 रु. थी। जौहरी की मृत्यु के बाद उन्होंने शृंगार करना और समारोहों में गाना भी छोड़ दिया। इस प्रकार विधिवत विवाहित पत्नी न होते हुए भी उन्होंने विधवा जीवन स्वीकार कर लिया।

इसके कुछ समय बाद वे अपने पैतृक गांव जसुरी आ गयीं। वहां उनके भाई और भतीजे रहते थे। अब वे विरक्त भाव से भजन-पूजन में ही लीन रहने लगीं। मृत्यु से एक दिन पूर्व वे घर छोड़कर मिश्र पोखरा स्थित मुक्ति भवन आ गयीं। यहीं 10 मई, 1971 को प्रातः तीन बजे गीत गोविंद का गायन करते हुए उन्होंने अपनी स्वर साधना को सदा के लिए नाद ब्रह्म में लीन कर लिया।

–  विजय कुमार 

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