कहानी वैक्सीन के जन्मदाता की

2019 की शुरुआत में पूरी दुनिया एक नयी बीमारी कोविड-19 की चपेट में आ गयी थी। साल के उत्तरार्ध में लगभग हर बड़े देश और दवाओं पर अनुसंधान करने वाली कम्पनी को उपचार के तौर पर बस एक ही विकल्प दिखाई दे रहा था। सबको पता था कि इस बीमारी के समूल नाश के लिए इकलौता विकल्प है कि दुनिया के हर इंसान को वैक्सीन लगाई जाए। भारत सरकार की सहायता से बनी कोवैक्सीन नाम की वैक्सीन ने न केवल देश बल्कि दुनियाभर के तमाम देशों के नागरिकों को कोविड के कहर से बचाया।

लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि वैक्सीन की अवधारणा दुनिया में कैसे आई। एक इंग्लिश वैज्ञानिक एडवर्ड जेनर ने दुनिया को सबसे पहले वैक्सीन का तोहफा दिया था, जिसकी बदौलत चेचक जैसी महामारी का दुनिया से नामोनिशान ही मिट गया। वैक्सीन के जनक एडवर्ड जेनर का जन्म आज ही के दिन यानी 17 मई सन्‌ 1749 को बर्कले, इंग्लैंड में हुआ था।

एडवर्ड के पिता रेवरेंड स्टीफन जेनर एक पादरी थे। जेनर की प्रारम्भिक शिक्षा सडबरी नाम के एक छोटे से गांव में हुई। इसके बाद उन्होंने लंदन के प्रख्यात सर्जन जॉन हंटर की देखरेख में लगभग 21 वर्ष की उम्र तक शिक्षा ग्रहण की। 1772 में जेनर ने अपनी डॉक्टरी की शुरुआत की और पहली वैक्सीन बनने की कहानी भी यहीं से शुरू होती है। दरअसल यह वो समय था जब ज्यादा चिकित्सकीय सुविधाएं ना होने से छोटी-छोटी बीमारियां भी महामारी का रूप ले लेती थीं। इन बीमारियों से लाखों लोग मारे जाते। चेचक जैसे संक्रामक रोगों को लेकर जेनर बेहद गम्भीर थे और लगातार रिसर्च करते रहते थे। अपनी एक रिसर्च के दौरान उन्होंने पाया कि चेचक का असर दूध का व्यवसाय करने वाले ग्वालों और उनके परिवार पर कम होता है। जेनर ने अपनी रिसर्च जारी रखी और पाया कि गायों में होने वाली चेचक के फफोलों के मवाद से ग्वाले संक्रमित हो जाते थे।

काउ पॉक्स नाम की इस बीमारी से संक्रमित ग्वाले जल्दी ठीक हो जाते थे लेकिन इसका एक सकारात्मक पहलू भी था। फिर उन ग्वालों को चेचक की बीमारी नहीं होती थी। 1796 में उन्होंने पहली बार अपनी अवधारणों को लेकर प्रयोग शुरू किया। इसे दुनिया की पहली वैक्सीन की नींव कहा जा सकता है। जेनर ने अपने प्रयोग में गाय में होने वाली चेचक के फफोलों का मवाद लिया और आठ साल के जेम्स फ्लिक नाम के बच्चे की बांह में चीरा लगाकर डाल दिया। इसके बाद जेम्स को हल्का बुखार हुआ लेकिन वो ठीक हो गया। प्रयोग को आगे बढ़ाते हुए एडवर्ड ने जेम्स के शरीर में चेचक का जीवाणु डाला लेकिन जेम्स को बीमारी नहीं हुई। जेनर ने कुछ साल बाद फिर यही प्रक्रिया दोहराई लेकिन जेम्स को फिर से कोई बीमारी नहीं हुई। इसका मतलब था कि जेम्स में शरीर में एंटी बॉडी बन चुके थे।

जेनर के इस प्रयोग से उनके समकक्ष वैज्ञानिक और धर्म गुरू खुश नहीं थे। उन्हें इसके लिए कड़े विरोध का सामना करना पड़ा। उनकी हंसी उड़ाई गई और कार्टून भी बनाए गए। इन सब की परवाह किए बिना एडवर्ड जेनर ने अपना प्रयोग जारी रखा। शुरुआत में द रॉयल सोसाइटी ने भी उनके प्रयोग को मान्यता देने से इनकार कर दिया था। बाद में जेनर ने अपने 11 साल के बेटे समेत कई बच्चों पर इसी टीके का प्रयोग किया। इन सभी प्रयासों के बाद आखिरकार उन्हें सफलता मिली। साल 1798 को उनका शोधपत्र प्रकाशित किया गया और उनके टीके को मान्यता मिल गई।

जेनर के उनके इस काम के लिए इंग्लैंड की संसद ने सम्मानित किया। उन्हें सरकार की तरफ से एक बार दस हजार और दोबारा बीस हजार डॉलर की आर्थिक मदद भी की गई। साल 1803 में उनके नाम से चेचक उन्मूलन टीकाकरण की शुरुआत की गई। बाद में इसे देशभर में लागू किया गया। 19वीं सदी की शुरुआत से ही जेनर विश्व विख्यात हो गए। उनकी खोज की कहानी जल्द ही यूरोप भर में फैल गई। इसके बाद अमेरिका, चीन, फिलीपींस, और अन्य देशों में भी जेनर का टीका पहुंचाया जाने लगा और सभी अभियान पूरी तरह से सफल रहे। इस बीच वे ब्रिटेन से दूर भी रहे और साल 1811 में वापस ब्रिटेन लौटे और उन्होंने वहां टीका लगने के बाद भी होने वाली बीमारी का अध्ययन भी किया।

वैक्सीन शब्द एडवर्ड जेनर के प्रयोग की ही देन है। दरअसल लैटिन भाषा में गाय को वैका कहा जाता है। इसी शब्द से वैक्सीन शब्द की उत्पत्ति हुई। 1821 में जेनर किंग जॉर्ज चुतर्थ के विशेष चिकित्सक बना दिए गए। उन्हें बर्केले का मेयर भी बनाया गया। यहां तक कि नेपोलियन, जिनका अंग्रेजों से युद्ध चल रहा था, ने अपने सभी सैनिकों को टीका लगवाया और जेनर को मेडल से सम्मानित भी किया। 1841 में ब्रिटिश सरकार ने चेचक के टीके को मुफ्त कर दिया। वैक्सीन सफल होने के बाद जेनर ने मेडिकल के कई और विषयों में भी शोध किए। 26 जनवरी 1832 को दुनिया का पहला टीका देने वाले एडवर्ड जेनर दुनिया से चले गए।

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