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सौरमंडल का संक्षिप्त परिचय है, जो अलौकिक नेत्रों और संयत्रों से देखा और जाना गया है l महर्षियों के दिव्य चक्षु और यौगिक साधनों से प्राप्त इसका परिज्ञान इससे कहीं अधिक व्यवस्थित और गंभीर है l अत्यंत शक्ति सामर्थ्य संपन्न ग्रह तथा नक्षत्र मंडल के भाव, स्थिति और दृष्टि के अनुसार ही हमारी उत्पत्ति हुई है l

केतु की पृथ्वी से दूरी, व्यास, गति, चक्रत्व सभी कुछ राहु के समान ही है एवं राहु के ठीक सामने होता है l फल राहु से भिन्न होता है किंतु दुर्घटना, जलघात का प्रमुख कारक ग्रह होता है l इसका पैरों के तलवों पर विशेषाधिकार होता है l यह मेष राशि का स्वामी है एवं अत्यंत बली तथा मोक्षप्रद माना गया है l इसके अपने नक्षत्र अश्विनी, मघा तथा मूल हैं l यह नपुंसकलिंग और तामस स्वभाव वाला है l केतु की मित्र राशियां मिथुन, कन्या, धनु, मकर और मीन हैं l यह गुरु के साथ सात्विक तथा चंद्र एवं सूर्य के साथ शत्रु व्यवहार करता है l अपने स्थान से सप्तम स्थान को यह पूर्ण दृष्टि से देखता है l इसकी विंशोत्तरी महादशा काल 7 वर्ष की होती है l यह भी क्रूर ग्रह तथा कृष्ण वर्ण का माना गया है l चर्म रोग, हाथ-पांव के रोगों का अध्ययन इस ग्रह के माध्यम से होता है l

केतु के अशुभ प्रभाव से गुप्त बीमारियों, गुप्त चिंताओं का भय रहता है l बिच्छू अथवा सर्पदंश की संभावना भी रहती है l आग लगने एवं हड्डी टूटने का अंदेशा रहता है l इसका प्रभाव मंगल जैसा ही होता है l फर्क इतना होता है कि मंगल का स्पष्ट और सामने होता है जबकि केतु गुप्त रूप से आक्रमण करता है l केतु द्वारा उत्पन्न हुई बीमारी तो कभी-कभी सालों बाद पकड़ने में आती हैं जैसे कैंसर अथवा अल्सर l जिस व्यक्ति की कुंडली में केतु अरिष्ट हो उसे सतर्क हो जाना चाहिए एवं आवश्यक हो तो इसका उपाय करना चाहिए l कुछ ग्रहों के योग से केतु  नए रोग की उत्पत्ति भी शीघ्र ही करता है, जैसे कुंभ लग्न हो एवम इसमें केतु, दूसरे भाव में मंगल हो, चतुर्थ भाव में शनि, सप्तम भाव में राहु, अष्टम भाव में सूर्य हो तो ऐसे व्यक्ति के गुर्दा का ऑपरेशन होता है l विष्ठा विसर्जन की क्रिया खराब हो जाती है, उसके अंडकोषों पर आक्रमण होता है l उसकी पत्नी की मृत्यु आग लगने से होती है तथा व्यक्ति स्वयं भी आवारा होता है l यदि वृश्चिक लग्न हो, अष्टम भाव में शुक्र हो, उस पर केतु की दृष्टि तथा सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो  वीर्य दोष होता है l यदि सप्तमेश शनि एवं नीच के शुक्र के साथ केतु हो तो गुप्त स्थान में कैंसर होता है l यदि तुला लग्न, दूसरे में केतु शनि, अष्टम में  लग्नाधिपति शुक्र हो तो त्वचा संबंधित रोग होता है l यदि केंद्राधिपति मंगल शनि के प्रभाव में हो तो टांग काटनी पड़ती है l यदि लग्नेश सूर्य नीच का हो और चतुर्थ भाव में चंद्रमा, केतु और मंगल की युति हो तो उस व्यक्ति की कुंडली में जब शनि की महादशा काल एवं इस में मंगल की अंतर्दशा चलती है तो चेहरे पर गर्म पानी पड़ने से चेहरा खराब हो सकता है किंतु यदि लग्न अथवा लग्नेश पर बृहस्पति की दृष्टि हो तो चेहरा विकृत होने से बच जाता है l यदि अष्टम भाव में केतु अथवा शनि मंगल के साथ हो तो बवासीर अवश्य होती है l यदि मेष लग्न में चंद्र हो, सप्तम भाव में सूर्य बुध हो, षष्टम भाव में शनि हो, पंचम भाव में केतु एवं मंगल हो तो मूत्र रोग होता है एवं पांव भी कट जाता है l यदि मंगल अष्टम भाव में एवं बारहवें भाव में केतु हो तो पत्नी सुख नगण्य रहता है l यदि दूसरे भाव में केतु एवं शनि की युति एक साथ हो तो जातक  व्यंग बोलने में माहिर होता है l यदि लग्नाधिपति होकर केतु शनि सप्तम भाव में हो, अष्टम भाव में चंद्रमा,  किंतु द्वादश भाव में मंगल हो तो व्यक्ति की मृत्यु जहाज से गिरकर होती है l यदि द्वितीय भाव में केतु तथा द्वितीय क्रूर ग्रहों से प्रभावित हो, बुध अस्त हो तो व्यक्ति तुतलाकर बोलता है l यदि मेष लग्न में राहु एवं छठे भाव में मंगल सूर्य एवं बुध, सप्तम भाव में केतु, अष्टम भाव अर्थात मृत्यु स्थान में शनि हो तो व्यक्ति को शुगर, चेचक तथा गुप्त रोग होता है, उसकी हार्ट अटैक से मृत्यु होती है l केतु के दुष्प्रभाव के लिए केतु की शांति कराकर केतु निवारण यंत्र धारण करना सर्वश्रेष्ठ होता है l

 

This Post Has One Comment

  1. Maa Ma laude. Madarchod .Randi ke bete. Ketu sirf Marne ke leye hai . Kuch fayada nahi karwaaya hai Kya. Teri maa ki chut Randi ke bache. Bhosrike . Daarne ke leye bhetha hai log waaha Tere pass upay ke leye aate hai. Apni gand maarwa tu. Bhosrike ke.

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