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वि वेक रूरल डेवलपमेंट सेंटर’ इस मुख्य संस्था की ‘राष्ट्र सेवा समिति’ उपसंस्था है। समिति के ग्राम विकास केंद्र का निर्माण कार्य भालिवली गांव में किया जा रहा है और उसमें विशेष रूप से पांच सूत्रों को केंद्र में रखते हुए आगामी कार्य का स्वरूप निश्चित किया गया है। वह इस प्रकार है-

१) स्वास्थ्य

२) कृषि आधारित रोजगार

३) शिक्षा

४) संस्कार

५) क्रीड़ा

इस कार्य की आज की स्थिति इस प्रकार है :

स्वास्थ्य : चार बरस पहले एक मोबाइल एम्बुलन्स खरीद कर उसमें दवाखाना बनाया गया और डॉक्टरों के साथ उसे ग्रामीण क्षेत्र में भेजा गया। नि:शुल्क जांच तथा दवाइयां देना यह उस समय कार्य का स्वरूप था। धीरे-धीरे उसी को विकसित करते हुए आज ४ चल दवाखाने पालघर जिले की ८ तहसिलों में से ६ तहसिलों में अविरत अपनी सेवा दे रहे हैं। उनमें बी. ए. एम्. एस् और बी. एच्. एम्. एस्. उपाधि धारी कुल ५ डॉक्टर, साथ में ५ पी. आर. ओ. और ५ ड्रायवर, इस प्रकार एक बड़ा समूह कार्यरत है। उसी तरह ६ तहसिलों में से ६० देहात और २५० बस्तियां यह उसका कुल क्षेत्र हैं उनमें से ६५ देहातों- बस्तियों में संस्था के स्वास्थ्यरक्षक किसी भी रूप से मानधन न लेते हुए दिनरात नि:शुल्क काम कर रहे हैं। उसमें वे संबंधित देहातों/बस्तियों में रहने वाले लोगों के किसी साधारण बीमारी पीड़ित होते ही दिन-रात किसी भी समय प्राथमिक स्तर पर चिकित्सा कर नि:शुल्क औषध योजना करते हैं। उस हेतु संस्था की ओर से उनका प्रशिक्षण कर, एक प्राथमिक स्वास्थ्य संदूक दी जाती है, जिसमें खासकर आयुर्वेदिक दवाइयां होती हैं। संस्था के अहाते में भी एक स्थायी दवाखाना चलाया जाता है।

रोजगार : उपर्युक्त विषय के संदर्भ में समाज को हम नि:शुल्क सेवा दे रहे हैं, परंतु क्या सारी जिंदगीभर इस प्रकार की सेवा देते चले, यह हमारे सामने सवाल था। असल में समाज को निरंतर नि:शुल्क सेवा देना और समाज के भी उसे मुफ्त में स्वीकार करना, यह क्रिया कालांतर में हानिकारक हो सकती है। इसलिए उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने में सहयोग देते हुए बड़े पैमाने पर रोजगार उपलब्ध किया जाए, ऐसा संस्था ने सोचा। उसके अनुसार भालिवली गांव की समिति उसका प्रत्यक्ष मॉडल बनाने में जुट गई। उसकी आज की अवस्था ऐसी है कि समिति खुद ही खेती कर रही है। उसमें पिछले दो बरसों से अलग-अलग फसलें लगाई गईं। साथ ही भालिवली केंद्र में पूरी तरह जैविक सूत्र अपनाकर खेती की जा रही है। फिर भी समिति की ओर से अन्य खेतिहरों को पहले ही प्रयास में जैविक खेती करने की सलाह नहीं दी जा रही, तो सिर्फ खेती करने के लिए प्रवृत्त किया जा रहा है। खेती करते समय किसानों को एक पूरा कृतिचक्र (सायकल) बनाना पडता है, तभी जाकर खेती में सफलता मिल सकती है। इसी क्रम में प्रकल्प में पशुपालन के अंतर्गत गोपालन, कुक्कुट पालन, बकरी पालन, खाद निर्माण करना आदि प्रकार का कार्य किया जाता है, साथ ही उसका प्रशिक्षण भी दिया जाता है। आगे चलकर समिति में घर के पिछवाडे में कुक्कुट पालन का विषय आते ही ‘गिरिराज’, ‘वनराज’ नस्ल की मुर्गियों का पालन करने के संदर्भ २५० से अधिक लोगों को प्रशिक्षण दिया गया तथा बँक से उन्हें कर्जा दिलवा कर मुर्गियां भी लाकर उन्हें सौंप दी गईं। ५० किसानों को केंचुआ खाद बनाने का, गोबर से खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। आगे चलकर बैंक गारंटी दिलवा कर गांव-गांव में खाद निर्माण बड़े पैमाने पर करने की योजना है। बालासाहब कृषि विश्वविद्यालय ने ‘कोकण कन्याल’ नस्ल की बकरी, जो लंबी जिंदगी जीती है, उसे विकसित किया गया। समिति इस बकरी का पालन-पोषण करना आरंभ कर ‘सुरक्षित बकरी पालन’ का मॉडल विकसित कर रही है। अगले छह महीनों में वह काम प्रत्यक्ष रूप में आरंभ होगा। समिति पिछले डेढ़ वर्ष से इसी उद्देश्य से कार्य कर रही है।

भारतीय गोवंश में से गीर नस्ल की गाय से दुग्धोत्पादन का विषय स्वीकार करते हुए समिति ने दस गायों की गोशाला निर्माण कर सुनियोजित पद्धति से दुग्धोत्पादन करने का अध्ययन-परीक्षण करना आरंभ किया है। उसके अंतर्गत गोवंश किस जाति के हो, घास किस जाति की पैदा कर खिलाई जाए आदि विषय हैं।

उसके पश्चात् ‘बांस’ के संदर्भ में ‘बांस हस्त व्यवसाय एवं फर्नीचर’ विषय के लिए प्रशिक्षण केंद्र खोला गया है, जिसमें एक प्रधान प्रशिक्षक के साथ और ९ लोगों का समूह कार्य कर रहा है। आगे चलकर संस्था के प्रांगण में एक रोप वाटिका तैयार कर उसके अंतरविभाग तथा बाह्यविभाग इस प्रकार दो विभाग बनाए गए हैं। उसमें दो हॉर्टिकल्चरिस्ट और तेरह अन्य लोगों का समूह काम कर रहा है।

शिक्षा : आज ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत सभी गांवों देहातों में छठी कक्षा तक की शिक्षा सुलभता से उपलब्ध होती है। लेकिन कक्षा ८वीं से १०वीं तक के छात्रों को बहुत सारी दौड़धूप करने पर वह उपलब्ध न होते देख कर संस्था ने ऐसे छात्रों के लिए पिछले तीन वर्षों से एक अभ्यासिका का आयोजन किया है। उसमें आज ६३ लड़के-लड़कियां और ४ अध्यापक हैं, जिन्हें सवेरे वहां लाने से लेकर दोपहर का भोजन और शाम को फिर घर तक छोड़ने आदि का प्रबंध किया जाता है। उसके साथ ही बच्चों को केवल शालेय शिक्षा न देते हुए खेती, पशुपालन, खाद निर्माण, रोपवाटिका, बांस का फर्नीचर, रंगावली, वारली चित्रकला आदि में से बच्चों की विशेष रुचि देखकर उसके अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है।

संस्कार : रोजगार निर्माण होने पर उसे अच्छे ढंग से निभाया, तो उससे ग्रामीणों को बहुत सारा पैसा उपलब्ध होगा। उस समय वे वह पैसा बुरी आदतों पर और दूसरे किसी गलत ढंग से खर्च न करते हुए ग्राम विकास करने के इरादे से शिक्षा अभियान में लगाएं, इस उद्देश्य से ‘संस्कार’ को महत्वपूर्ण मानते हुए समिति ने गांव-गांव में विकास समूहों का गठन करना आरंभ किया। आज ६ विकास समूह निर्माण किए गए हैं, जिनके द्वारा दूसरे कुछ विषयों के साथ संस्कार करने का कार्य किया जाएगा। वैसे आजतक संस्कार करने का कार्य आरंभ हुआ नहीं है।

क्रीडा : अभी हाल में ठाणे जिले का विभाजन होकर पालघर यह नया जिला बन गया है। उस पर गौर करते हुए पूरे पालघर जिले में क्रीड़ा विषय के संदर्भ में कार्य करना समिति ने तय किया है। उसमें विशेष रूप से कबड्डी को प्रधानता देकर उस दृष्टि से मार्गदर्शक के रूप में श्री अमित पडेणेकर का हमें लाभ हुआ है। श्री पेडणेकर जी ही समिति की ओर से इस विषय को आगे बढाने वाले हैं। उस दृष्टि से ६ पंच तथा २ प्रमुख और साथ ही ३ पूर्ण कालीन कार्यकर्ताओं की नियुक्ति इसी सप्ताह में हो रही है।

सेवा स्नैक्स सेंटर : हाल में एक परिचित होटल मालिक को पूरी स्वाधीनता देकर संचालित करने के लिए यह अल्पाहार गृह सौंपा गया है। इसमें अगर हानि हुई, तो संस्था उसका जिम्मा स्वयं उठाने वाली है तथा किसी हद तक लाभ हुआ तो उसमें संस्था की साझेदारी होगी, इस सूत्र पर उसकी कार्यवाही है। वर्तमान स्थिति में लाभहानि बराबरी में है। इसी सूत्र पर प्रकल्प के अंदर ‘क्षुधा शांति भोजनालय’ चलाया जा रहा है और उसमें इस महीने से लाभहानि की स्थिति समान है।

प्रॉडक्शन विभाग : इसमें संस्था की ओर से गोमूत्र अर्क, तुलसी अर्क, शरबत, धूपबत्ती आदि बहुत से उत्पाद बनाए जाते हैं। वैसे ही बाहर के बचत गुट और अन्य महिलाओं द्वारा बनाई चकली, चिवड़ा, शकरपारा आदि चीजें बनाने का प्रशिक्षण देकर उन्हीं से वे बनवा ली जाती हैं। उन्हें खरीदकर अच्छे खासे आवरण में लपेट कर अपने ही महामार्ग की दुकानों में बेची जाती हैं। इस कारोबार में इसी महीने मुनाफा मिलना शुरू हुआ है, जो पिछले ८ महीनों में लगभग रु. २०,०००/- के घाटे में था।

विवेक ग्रामोन्नति बाजार : उपर्युक्त प्रॉडक्शन हाऊस में बना हुआ और बेचने भेजा गया सब कुछ यहां बेचा जा रहा है और उसका संचालन योगेश पाटील नामक युवक को सौंपा गया है। उपर्युक्त समझौते के अनुसार नर्सरी (रोप वाटिका) प्रकल्प पर हमने रोपवाटिका का काम शुरु किया है, जिसके प्रमुख दो भाग हैं-

१) रोपवाटिका- अंतर्विभाग

२) रोपवाटिका- बाह्यविभाग

ये प्रकल्प महामार्ग क्र. ८ के पास ही होने से ‘ग्रीन गोल्ड नर्सरी’ नाम धारण कर अंतर्विभाग का काम चलता है। उसमें कुल ६ आदमी काम कर रहे हैं। बाह्य विभाग में बाहरी लैंडस्केपिंग, डिवायडर गार्डन आदि का काम किया जाता है। ये दोनों विभाग अब अपने पैरों पर खडे हैं तथा संस्था के लिए उनकी अवस्था लाभहानि समान होने की ही है। इन सभी विषयों को लेकर सबसे बड़ी आवश्यकता किस बात की है, इस पर सोचने पर दिखाई देता है कि इनमें से हर एक विषय आसमां जितना विशाल है, ऐसा मुझे लगता है। इसीलिए हर एक विषय अलग- अलग अच्छे-कार्यक्षम आदमी को अगर सौंपा गया, तो संस्था का कार्य बड़ी तेजी से पूरे जिले को फैलते हुए, महाराष्ट्र एवं देश के समक्ष एक बढ़िया मॉडल खड़ा किया जा सकेगा, ऐसा मुझे लगता है।

इस दृष्टि से अच्छे कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है।

१) लुकेश बंड नामक प्रबंधक को एक अच्छा सहायक उपलब्ध

कराना।

२) अकाउंटेंट की नियुक्ति करना।

३) पी. आर. विभाग के लिए प्रमुख अधिकारी पद पर ज्येष्ठ महिला की नियुक्ति करना।

४) कृषि पर्यटन हेतु कृषि प्रबंधक नियुक्त करना।

अनुमानित आवश्यकताएं : इसके अंतर्गत प्रकल्प में से सभी कर्मचारियों में सुसूत्रता लाना, उन्हें प्रोत्साहन देते चलना, संपूर्ण संघ के रूप में उन्हें विकसित करना, उन्हें उनके लक्ष्य का दर्शन कराना आदि का समावेश होता है। साथ ही आज संस्था के कार्यकर्ताओं की संख्या १३० तक पहुंची है और आगामी दो बरसों में उसमें और २०० जुड़ जाने का अनुमान है। उस दृष्टि से अभी से ही संपूर्ण कार्यपद्धति पर चिंतन करते हुए उसे विकसित किया जाए।

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