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प्रधानमंत्री मोदी ने महज चार साल की अवधि में विदेश नीति को एक नई धार दी है। वैश्विक स्तर पर भारत को नया स्वर दिया है। विभिन्न देशों से सम्बंधों में तेजी से सुधार के कारण भारत के आर्थिक विकास की ठोस नींव भी डाल दी है। यह सब रोमांचक है।

जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला आलोचकों ने सब से बड़ा प्रश्न यही उठाया कि एक प्रदेश के मुख्यमंत्री पद से सीधे यहां तक पहुंचनेवाले नेता के लिए वर्तमान जटिल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में विदेश नीति को नई धार देना कठिन होगा। वास्तव में नरेन्द्र मोदी विदेश नीति ठीक से संचालित कर पाएंगे ऐसा विश्वास करनेवाले कम लोग थे। चार वर्ष पूरा होने के बाद उनके विरोधियों को भी स्वीकार करना होगा कि मोदी सरकार ने विदेश नीति की दिशा में जो सफलताएं पाईं हैं वे वाकई अभूतपूर्व हैं।

आज की स्थिति में मोदी विश्व के उन प्रभावी नेताओं में शामिल हैं जिनकी बातें हर मंच पर ध्यान से सुनी जाती हैं। प्रमुख देशों के नेता मानते हैं कि मोदी के रूप में भारत को ऐसा नेता मिला है जिसके साथ कार्य-व्यवहार करना आसान है। कारण, उन्हें अपने देश की नीति को लेकर कोई संभ्रम नहीं है। यह सामान्य उपलब्धि नहीं है।

नरेन्द्र मोदी ने अपने चार वर्षों के दौरान 54 देशों की यात्रा कर कूटनीतिक सक्रियता का परिचय दिया है। साथ ही उनके नेतृत्व में विदेश मंत्रालय ने कुल 192 देशों में से 185 देशों की यात्राएं की हैं। यह अपने-आप में रिकॉर्ड है। संभव है जो बचे हुए देश हैं उन तक पहुंच कर वाकई इतिहास बना दिया जाए। इसका अर्थ है कि मोदी ने विदेश नीति पर पूरी योजना के साथ फोकस किया है तथा ज्यादातर देशों के साथ सीधे केवल कूटनीतिक नहीं राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक सम्बंध स्थापित करने की कोशिश की है। इसका असर भी दिख रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत इस समय दुनिया की एक प्रमुख आवाज है।

चार वर्ष पूर्व अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया के सभी देशों के नेताओं को आमंत्रित कर मोदी ने अपनी विदेश नीति का सिलसिला आरंभ किया। शपथ ग्रहण करने के दूसरे दिन ही सभी नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताएं हुईं। मोदी ने इसके लिए शब्द प्रयोग किया, ‘नेबर फर्स्ट’ यानी पड़ोसी पहले। हालांकि श्रेष्ठतम प्रयासों के बावजूद पाकिस्तान से रिश्तों में गिरावट आई। वैसे आरंभ में पाकिस्तान के साथ लगा कि रिश्ते बेहतर हो रहे हैं, नवाज शरीफ के साथ मोदी की पटरी बैठ रही है। परंतु ऐसा हुआ नहीं।

10 जुलाई 2015 को उफा में मोदी ने नवाज शरीफ से मुलाकात कर संबंधों को नई गति देने की कोशिश की; लेकिन पाकिस्तान की अंदरुनी राजनीति ने इस पर पानी फेर दिया। उसके बाद 25 दिसंबर 2015 को मोदी बिना पूर्व कार्यक्रम के नवाज के जन्म दिन पर लाहौर पहुंच गए और उनके घर गए। इन सबके बावजूद सीमा पार से आतंकवादी घटनाओं तथा बाद में कुलभूषण यादव को रॉ एजेंट बताकर की गई गिरफ्तारी से संबंधों में इतनी कड़वाहट आ गई कि भारत को इस्लामाबाद में होनेवाले दक्षेस सम्मेलन में न जाने का निर्णय करना पड़ा। उस समय भारत की कूटनीति इतनी सफल रही कि भारत के साथ नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और अफगानिस्तान ने भी सम्मेलन में जाने से मना कर दिया। इस कारण सम्मेलन आज तक नहीं हो सका है। नवाज शरीफ के पद से हटने के बाद तो भारत का पाकिस्तान के साथ केवल न्यूनतम कूटनीतिक संबंध तक ही संवाद है। हालांकि आतंकवाद रहते बातचीत नहीं करने पर दृढ़ता से अड़ने का परिणाम यह आया है कि वहां के सेना प्रमुख ने भी कहा है कि भारत के साथ हम अच्छे सम्बंध चाहते हैं।

इसके अलावा देखें तो मालदीव को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देशों के साथ इस समय भारत के रिश्ते सामान्य हैं। बांग्लादेश के साथ वर्षों पुराना भूमि विवाद सुलझाया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा तथा शेख हसीना की भारत यात्राओं ने दोनों के संबंधों को सामान्य स्तर से ऊपर उठा दिया है। संयोग से मोदी के आगमन के बाद श्रीलंका में नई सरकार आई जिसके साथ हमारे संबंध अब बिल्कुल सामान्य हैं। वह चीन के कर्ज में फंसा हुआ है जिससे निकालने की कोशिश भारत कर रहा है। उसने हंबनबटोटा बंदरगाह एक प्रकार से चीन को सौंप दिया था। मोदी की कूटनीति का प्रतिफल यह आया कि श्रीलंका ने दोबारा समझौता किया जिसके अनुसार चीन बंदरगाह का केवल वाणिज्यिक उपयोग कर सकेगा, सामरिक नहीं।

जपान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ

नेपाल से आरंभ में रिश्ते ठीक रहे लेकिन मधेस आंदोलन के समय नाकेबंदी का आरोप नेपाली नेताओं ने भारत पर लगाया और संबंधों में कटुता आ गई। नेपाल का झुकाव चीन की ओर तेजी से बढ़ा। हालांकि बाद में मधेस आंदोलन खत्म होने के बाद स्थितियां बदलीं, लेकिन चीन वहां एक चुनौती के रूप में खड़ा है। मोदी ने नेपाल की तीन यात्राएं कीं। उसे दी जाने वाली धन राशि बढाई तथा रेल, सड़क मार्ग सहित अनेक परियोजनाओं पर समझौते कर काम आगे बढ़ाया है। चीनी नेताओं के रवैये को देखते हुए मोदी ने इतिहास में पहली बार दोनों देशों की जनता को एक दूसरे से भावनात्मक स्तर पर जोड़ने के मूलाधार धर्म का आश्रय  लिया है। अपने अंतिम दौरे में जनकपुर से लेकर मुक्तिधाम में पूजापाठ एवं जनता के संबोधन से उन्होंने प्रभावी कूटनीतिक रास्ता अपनाया है। इसका वहां की जनता पर अच्छा असर हुआ है। भूटान के साथ डोकलाम मामले पर भारत ने चीन के विरुद्ध मोर्चेबंदी कर ऐसे अटूट सम्बंध का परिचय दिया जिसकी दुनिया कल्पना नहीं कर सकती थी। मोदी पड़ोसी देशों में केवल मालदीव नहीं जा सके हैं।

चीन के साथ रिश्ते एकदम सामान्य नहीं कहे जा सकते। चीन ने दक्षिण एशियाई देशों में अधिक से अधिक धन उड़ेलकर भारत को बड़ी चुनौती दी हुई है। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के माध्यम से भी भारत को उसने घेरने की रणनीति अपनाई है। मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा आतंकवादी घोषित कराने के प्रस्ताव को वीटो करना तथा नाभिकीय आपूर्ति समूह या एनएसजी की सदस्यता में रोड़ा बनना संबंधों के मार्ग की बाधा बना हुआ है। भारत ने भी रोड एंड बेल्ट इनिशिएटिव सम्मेलन का बहिष्कार कर अपना इरादा जता दिया। पिछले 27-28 अप्रैल को चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने वुहान शहर में मोदी को विशेष तौर पर आमंत्रित कर अनौपचारिक शिखर सम्मेलन किया। यह उनकी ओर से सम्बंध सुधारने की कोशिश थी। अभी इसके परिणामों के बारे में कुछ कहना कठिन है। हां, यह कहा जा सकता है कि चीन के प्रति अपनी नीतियों में स्पष्टता एवं दृढ़ता के कारण यह नौबत आई।

चीन की समस्या भारत के दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ गहराते सामरिक सम्बंध भी हैं। जापान से लेकर ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया सहित दक्षिण चीन सागर से जुड़े देशों के साथ भारत ने बेहतर सम्बंध बनाए हैं। उनके साथ नियत समय पर सैन्य अभ्यास होता है। अमेरिका भी इसमें शामिल है। वस्तुतः अमेरिका, जापान,  ऑस्ट्रेलिया एवं भारत के चतुष्पक्षीय सम्बंध तथा रक्षा सम्बंध चीन को खटक रहे हैं। दक्षिण चीन सागर पर चीन के रवैये के खिलाफ भारत का स्वर बिल्कुल स्पष्ट हैं।

मोदी की कूटनीति का परिणाम है कि इनमें से ज्यादातर देशों के साथ हमारे सम्बंध रणनीतिक स्तर पर पहुंच गए हैं। यह विदेश नीति की सफलता ही थी कि गणतंत्र दिवस पर आसियान के सभी 10 देशोंं के राष्ट्राध्यक्ष हमारे अतिथि थे। अमेरिका के साथ निकटतम सम्बंधों की पूरी चार वर्षों की कूटनीति के बेहतर परिणाम आए हैं। जहां अमेरिका ने हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत क्षेत्र में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को स्वीकार करते हुए हिन्द प्रशांत क्षेत्र नाम ही दे दिया। अपने सैनिक कमान का नाम भी हिन्द कमान नाम रख दिया।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ

पाकिस्तान के विरुद्ध डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन का कड़ा रुख हमारे लिए बिल्कुल अनुकूल है। हालांकि ट्रम्प की अमेरिका प्रथम की नीति के कारण एच-1 बी वीजा पर बंदिशें तथा आयात पर शुल्क बढ़ाने आदि के कारण भारत का आर्थिक हित बाधित हो सकता है। बावजूद इसके ट्रम्प प्रशासन भारत को अपना असली मित्र कहता है। अभी तक विश्व मंच पर अमेरिका कज्ञ भारत को साथ लगातार मिल रहा है। अमेरिका के न चाहते हुए भी रूस के साथ भारत ने अपने अच्छे सम्बंध बनाए रखे हैं। अमेरिकी विरोध के बावजूद रक्षा सौदे किए हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच 21-22 मई को सोची शहर में अनौपचारिक शिखर सम्मेलन से माना जा सकता है कि हर प्रकार की आशंकाओं का निवारण हुआ है। यह भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का परिणाम है। यूरोपीय संघ सहित यूरोप के सारे देशों के साथ भारत के संबंध गतिशील अवस्था में हैं। मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से लेकर, जी-20, ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, भारत आसियान एवं भारत पूर्वी एशिया जैसे बहुपक्षीय सम्मेलनों में शिरकत करके भारत के पक्ष को प्रबल किया ही है। उनका उपयोग करके नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं का भी कुशल प्रबंधन किया है। नई दिल्ली में भारत अफ्रीका शिखर सम्मेलन में सभी अफ्रीकी देशों के नेताओं की उपस्थिति, अंतरराष्ट्रीय सौर संगठन की नींव रखने से लेकर नई दिल्ली में उसका सम्मेलन कर मोदी ने इतिहास की शुरुआत की है। सौर संगठन मोदी के अपने मस्तिष्क की उपज है जो धीरे-धीरे रूपाकार ले रहा है। 100 के करीब देश इससे जुड़ चुके हैं।

मोदी ने अपनी विदेश नीति से इस आशंका को निर्मूल साबित किया है कि मुस्लिम देशों के साथ भारत के संबंध बिगड़ जाएंगे। बांग्लादेश की बात न भी करेंं तो सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, ईरान, जोर्डन, फिलिस्तीन आदि सभी देशों ने मोदी का दिल खोलकर स्वागत किया। संयुक्त अरब अमीरात तथा सउदी अरब ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान मोदी को दिया। ईरान के साथ चाबाहार बंदरगाह को विकसित करने तथा इस्तेमाल करने एवं वहां से अफगानिस्तान होते हुए मध्य एशिया तक सड़क और रेलमार्ग निर्माण की योजना भविष्य में भारत की व्यापारिक एवं सामरिक गतिविधियों को कितनी सुगम बनाएगी इसे बताने की आवश्यकता नहीं।

मोदी ने इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ अलग सम्बंध बनाए। स्वयं साहस दिखाते हुए इजरायल जाने वाले पहले प्रधानमंत्री बने। उसके प्रधानमंत्री को बुलाकर पूरी आवभगत की तो फिलिस्तीन के प्रधानमंत्री को भी बुलाया एवं स्वयं वहां गए। मोदी की फिलिस्तीन जाने के लिए विमान जॉर्डन के शाह ने दिया तो उनके विमान की सुरक्षा इजरायल के सैन्य विमान कर रहे थे। ऐसा क्षेत्र में किसी नेता के लिए पहली बार हो रहा था। यह एक नई किस्म की कूटनीति थी।

मोदी सरकार के सफल कूटनीतिक प्रयासों का ही परिणाम है कि भारत इंटरनेशल ट्रिब्यूनल फॉर द लॉ ऑफ द सी, इंटरनेशनल मैरिटाइम ऑर्गेनाइजेशन, इकोनोमिक एंड सोशल काउंसिल आदि में अपना प्रतिनिधित्व सुनिश्चत करने में सफल हुआ। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हमने अपने उम्मीदवार को विजय दिलवाने में सफलता पाई। इन चार सालों के अंदर भारत को एमटीसीआर यानी मिसाइल टेक्नोलॉली कंट्रोल रिजीम, वास्सेनर अरेंजमेंट तथा ऑस्ट्रेलिया समूह जैसे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समूह की सदस्यता मिली। यह सब कोई सामान्य उपलब्धि नहीं थी। एनएसजी की सदस्यता संबंधी बैठकों में भी ज्यादातर सदस्य भारत के साथ खड़े दिखते हैं।

इस तरह देखें तो मोदी के नेतृत्व में भारत का प्रभाव व्यापक रूप से फैला है। भारत में मोदी की वैदेशिक सफलताओं को देखते हुए वाकई रोमांच का अनुभव होता है। मोदी की कूटनीति के तीन विशिष्ट अंग और रहे हैं। पहला, उन्होंने सितंबर 2014 की अमेरिकी यात्रा से भारतवंशियों को संबोधित करने का सिलसिला आरंभ किया। इस कार्यक्रम को इतना प्रभावी ढंग से आयोजित किया जाता रहा है कि जिस देश में यह कार्यक्रम होता है उस पर भी इसका असर होता है और गूंज भारत तक आती है। इससे दुनिया भर में फैले भारतवंशियों को भारत के साथ भावनात्मक रूप से जोड़ने में अभूतपूर्व सफलताएं मिल रहीं हैं। पहले उनके कार्यक्रम में उस देश के कुछ नेंता आते थे। उसके बाद कई जगह वहां के प्रधानमंत्री तक उपस्थिति रहे। विदेशी दौरों में पहले भी कहीं-कहीं प्रधानमंत्री भारतवंशियों को संबोधित करते थे, लेकिन इतने व्यापक स्तर पर और प्रभावी तरीके से तथा विदेश नीति के एक स्थायी और प्रमुख अंग के रूप में नहीं। इसका चुम्बकीय प्रभाव पड़ा है। दूसरे, उन्होंने धर्म को भी कूटनीति के औजार के रूप में पेश कर अनेक देशों के नागरिकों को भारत के साथ जोड़ने की कोशिश की है। नेपाल की हमने ऊपर चर्चा की। दूसरी है बौद्ध कूटनीति। मंगोलिया से आरंभ कर मोदी म्यांमार, श्रीलंका, जापान, दक्षिण कोरिया आदि की यात्राओं मेंं बौद्व धर्म से जुड़े स्थानों पर गए, बोध गया का वृक्ष भेंट किया, बौद्ध भिक्षुओं व बौद्ध बिहारों के प्रमुखों से मिले तथा इस पर पूरा फोकस किया। यहां तक कि चीन में भी उन्होंने बौद्ध धर्म के स्थलों पर काफी समय लगाया। जिस बौद्ध सर्किट को मोदी मूर्त रूप दे रहे हैं उसमें ये सारे देश शामिल हैं। भविष्य में इसका असर दिखाई देगा। तीसरा पहलू है, भारतीय सभ्यता की ओर दुनिया का ध्यान खींचना। नेताओं से मुलाकात में तो उन्होंने भारतीय धर्मग्रंथ भेंट किए ही हैं, अपने संबोधनों में विश्व के प्रति भारतीय दर्शन की बात को प्रमुखता से रखा है। ऐसी कूटनीति पहले नहीं देखी गई। इसका असर देश के अंदर भी पड़ा है। भारत की कल्पना कैसे विश्व की रही है, किस तरह वह सम्पूर्ण विश्व को अपना परिवार मानता है, पृथ्वी को माता मानने के कारण सभी देश के लोग उसके सहोदर हो गए आदि बातें उन्होंने लगातार रखी है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ

विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मोदी ने जिस मेक इन इंडिया योजना की शुरुआत की, विकास की नीतियां बनाईं, व्यापार विस्तार का निर्णय किया उन सब में विदेश नीति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जितने देशों के तथा उन देशों की निजी कंपनियों के साथ आर्थिक एवं व्यापारिक करार हुए हैं, उन सबके परिणाम आने में समय लगेगा। किंतु एक आधार इन चार वर्षों मेंं कायम हो गया है। मई 2014 से फरबरी 2018 तक भारत को विदेशों से 14 लाख करोड़ का विदेशी धन प्राप्त हुआ है। यह अपने-आप में रिकॉर्ड है। ज्यादातर विदेशी दौरों में या विदेशी नेताओं की भारत यात्राओं में आर्थिक सहयोग संबंधी एवं व्यापारिक करार हुए हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटेन के साथ गंगा सफाई मिशन, कौशल विकास एवं रोजगार कार्य का समझौता हुआ। साथ ही नीति आयोग और ब्रिटेन के वाणिज्य, ऊर्जा एवं औद्योगिक रणनीति विभाग के बीच समझौता हुआ। आधारभूत संरचना के क्षेत्र में जो करार जापान और जर्मनी के साथ हुआ है वह धीरे-धीरे मूर्त रूप लेगा। इसी तरह इजरायल के साथ कृषि से लेकर अन्य क्षेत्रों में सहयोग संबंधी समझौतों ने मूर्त रूप लेना आरंभ कर दिया है। इजरायल के निवेशकों को भी भारत में निवेश के लिए प्रेरित किया गया।

मोदी ने अमेरिका की पांच यात्राएं कीं, पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा आए। इन दौरोें में आर्थिक एवं व्यापारिक करार ही तो प्रमुख थे। संयुक्त अरब अमीरात एवं सऊदी अरब ने भारत में निवेश करने के लिए अलग से कोष बना दिया है। जो रक्षा सौदे हुए हैं उन सब में अब उसके एक हिस्से का भारत में निर्माण भी शामिल है। अनेक देशों के साथ अंतरिक्ष सहयोग समझौता हुआ है। भारत इस समय एक बड़ी अंतरिक्ष शक्ति है। दूसरे देशों के उपग्रहों को प्रक्षेपित करना तथा अपने उपग्रहों से उन्हें सेवा देना इनमें शामिल हैं। ये सब विकास के वाहक बनेंगे। आज के आर्थिक ढांचे में विकास के यही मापदंड हैं। प्रत्यक्ष विदेश निवेश यद्यपि संतोषजनक नहीं है लेकिन पूर्व सरकार के चार वर्ष की तुलना में 60 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि है। चार वर्षों की कूटनीति का परिणाम अब आना आरंभ होगा। फिर भारत ने बौद्ध सर्किट की शुरुआत कर बौद्ध धर्मवावलंबी देशों के लोगों को जोड़ने की जो पहल की है उससे बौद्ध पर्यटन में भी व्यापक वृद्धि होगी। यह सब भारत के विकास में अहम भूमिका निभाएंगे।

भारत ने नेपाल, बंगालदेश, भूटान के साथ मोटर वाहन समझौता किया। इसे विस्तारित कर थाइलैंड, म्यांमार तथा पूर्वी एशिया के अन्य देशों को शामिल करने पर काम हो रहा है। मोटर कार से सड़क होते हुए इन देशों की यात्राओं का मतलब पर्यटकों एवं व्यापारिक सामग्रियों का आसानी से आदान-प्रदान। कहा जा सकता है कि मोदी ने अपनी विदेश नीति से भारत के आर्थिक विकास की ठोस नींव डाल दी है जिसके कुछ परिणाम दिखने लगे हैं, आने वाले समय में ये पूरी तरह फलीभूत होंगे।

 

 

 

 

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