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कमलेश कुमार पाण्डेय मुख्य आयुक्त दिव्यांगजन

मोदी सरकार के आने के बाद दिव्यांगों के लिए कानून पारित हुआ। उनका आरक्षण बढ़कर 4% हुआ। भले ही यह राज्य का विषय हो परंतु हर राज्य में दिव्यांगों की योजनाओं और उन पर अमल के लिए पुनरावलोकन किया गया। इतने बड़े पैमाने पर पहली बार ऐसा काम हुआ है। असल में ‘दिव्यांग’ शब्द भी मोदी की ही देन है। दिव्यांगों, उनकी समस्याओं, इस क्षेत्र में कार्य करनेवाली संस्थाओं आदि पर मुख्य आयुक्त दिव्यांगजन श्री कमलेश कुमारपाण्डेय से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत है-

दिव्यांगों के प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है?

हम मानते हैं कि दिव्यांग लोग परिवार और समाज पर बोझ नहीं हैं। उनमेें योग्यता है, क्षमता है, प्रतिभा है। समाज उनकी क्षमता के विकास के लिए अवसर उपलब्ध करा दें तो वे स्वावलंबी हो सकते हैं और राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं। यही हमारी अवधारणा है। जिस जमाने में दिव्यांगों के लिए कोई भी कानून नहीं था। आरक्षण नहीं हुआ करता था उस जमाने में भी दिव्यांगों ने राष्ट्र के उत्थान में योगदान दिया है। इस कड़ी में संत सूरदास, अष्टावक्र, दीर्घात्मा जैसे ऐसे अनेक दिव्यांग हुए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दिव्यांग कभी समाज पर बोझ नहीं रहे। दिव्यांगता को हम समाज विविधता के रूप में मानते हैं। एक विविधता है प्रकृति की और उसकी क्षमता का ठीक से समाज के हित में उपयोग करना है- यह हमारी अवधारणा है।

भारत में दिव्यांगों के संदर्भ में दैवी प्रकोप की जो पारम्परिक धारणा है उसमें परिवर्तन लाने के लिए हमें किस प्रकार से दिव्यांगों की समस्या को देखना चाहिए?

दैवी प्रकोप की धारण गलत है, भ्रामक है। उसे दूर करने की आवश्यकता है। एक सामान्य व्यक्ति भी सड़क दुर्घटना में दिव्यांग हो जाता है। कुछ लोग मानते हैं उसने कोई पाप किया होगा इसलिए उसके साथ ऐसा हुआ। लेकिन पाप की यह कल्पना ही गलत है। इस कारण दिव्यांगों का समाज में अहित होता है। लेकिन यह गलत है। यह विज्ञान का युग है। किसी को कोई भी बीमारी हो सकती है। और यदि दिव्यांग को आधुनिक चिकित्सा की सुविधा उपलब्ध कराई जाए तो उसका जीवन सुकर हो सकता है। सामान्य व्यक्ति भी किसी दुर्घटना में दिव्यांग हो सकता है। इसलिए कौन दिव्यांग हो जाएगा यह कहा नहीं जा सकता।

दिव्यांगों के हित के संदर्भ में कमिश्नर के रूप में आपको उत्तरदायित्व मिला है। आपने इसका दिव्यांगों के हितों के लिए किस प्रकार उपयोग किया है?

1995 के Persons with Disabilities अलीं को आप देखें तो 1995 के पहले विकलांगता के क्षेत्र में कार्य करने का कोई प्रावधान नहीं था। कोई ऐसा विशेष कानून नहीं था। लेकिन 1995 का कानून लागू होने के पहले विकलांगता के क्षेत्र में कार्य करना याने धर्मार्थ कार्य हुआ करता था। बेचारे हैं, दिव्यांग हैं, सहायता की जरूरत है यह भावना थी। लेकिन 1995 के कानून के बाद यह उनका अधिकार बन गया। धारा 58 में प्रावधान है कि भारत सरकार इसके लिए चीफ कमिश्नर की नियुक्ति करेगी। उनके चार प्रकार के कार्य हैं। सरकार विकलांगों के विकास के लिए जिस एजेन्सी के माध्यम से धन मुहैया कराती है, उसकी निगरानी करना। राज्यों के हर कमिश्नर के साथ समन्वय स्थापित करना, दिव्यांगों की समस्या हल करना। इस पर वार्षिक रिपोर्ट भी बनानी होती है। इस तरह के कार्य होते है चीफ कमिश्नर के।

इन चार कार्यों के आधार पर आपने अब तक दिव्यांगों के हित में कौन से कार्य किए हैं?

प्रथम चीफ कमिश्नर की नियुक्ति 1 सितंबर 1998 को हुई थी। मेरी नियुक्ति 28 जनवरी 2016 को हुई। शुरुआत के 17-18 सालों में केवल 17 प्रदेशों का पुनरावलोकन हुआ था, जब कि मैंने 27 महीनों में 27 राज्यों का पुनरावलोकन किया। शिकायत निवारण के लिए मैंने ई-मेल से शिकायतें स्वीकार करना आरंभ किया। हम मोबाइल कोर्ट लगाते हैं। मोबाइल कोर्ट पहले से ही लगते हैं। मोबाइल कोर्ट की अवधारणा यह है कि दूरदराज के जिन जिलों में विकास, जागरूकता, सुविधाओं का अभाव है ऐसे स्थानों पर हम मोबाइल कोर्ट लगाते हैं। पिछले 17-18 वर्ष में 30 मोबाइल कोर्ट लगे। हमने 27 महीनों में 10 मोबाइल कोर्ट लगाए। उसकी शुरुआत बस्तर से की। 2005 से हमारे यहां कोर्ट में मामले विलम्बित थे। हमने 2015 तक के सारे मामलों को निपटाया है। अब जो शेष हैं वे 2016-2017 के मामले हैं।

ये मामले किस प्रकार के होते हैं? इसका दिव्यांगों से किस प्रकार से सम्बंध होता है?

मामले इस प्रकार के होते हैं जैसे कोई दिव्यांग छात्र था और उसने नौकरी के लिए आवेदन किया। पहले के कानून में 3%  आरक्षण था, लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली। कुछ विभाग ऐसा करते थे।3% स्थान तो दिव्यांगों को मिलने चाहिए। इनमें से 1% नेत्रहीन लोगों के लिए, 1% मूक-बधीर के लिए और 1% शारीरिक विकलांगों के लिए है। कई बार इस प्रतिशत को भरा नहीं जाता। ऐसी स्थिति में जो जागरूक दिव्यांग है, वह हमारी कोर्ट में मामला दायर करता है। यह मामले आते हैं कि फलां जगह रिक्तियां निकलीं, लेकिन उसमें किसी दिव्यांग को नहीं लिया गया; फलां जगह रिक्तियां निकलीं, लेकिन दिव्यांगों के लिए आरक्षण नहीं रखा गया। हम सम्बंधित विभाग से रोस्टर मंगाते हैं। इसमें विवरण देना होता है कि 1996 से अब तक कितनी जगहें खाली थीं, उसका 3% कितना हुआ। यदि इसे पूरा किया है या नहीं, यह देखते हैं। और नहीं किया हो तो हम उसे पूरा करने के लिए
निर्देश जारी करते हैं। दूसरा है दिव्यांगों को रूटिन तबादले से मुक्त रखना। कई बार इस तरह के तबादले के मामले होते हैं। कई बार प्रमोशन के मामले होते हैं। कई बार प्रताड़ना के मामले आते हैं।

आपके इस प्रयास का दिव्यांगों के हित में किस प्रकार का फायदा होता है?

देखिए, दिव्यांगता क्षेत्र जारूकता का क्षेत्र है। समाज में जितनी ज्यादा जारूकता होगी उतना ही समस्या का समाधान अधिक होगा। यह जारूकता समाज में बढ़े इसकी जिम्मेदारी सरकारों की भी है, एनजीओ की भी है, समाज के सामान्य जनों की भी है। जागरूकता लाने के हमारे प्रयास होते ही हैं। इसके अलावा हर राज्य के दिव्यांग मंत्रालय के सचिव से मिलते हैं। साथ ही सरकार के अन्य विभागों जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक कार्य, सड़क विकास आदि सभी विभागों के अधिकारियों से बैठकें होती हैं। हर विभाग में दिव्यांगता सेंटर में क्या हो रहा है, दिव्यांगों को वे सुविधाएं उसके माध्यम से मिल रही हैं या नहीं, इसे देखते हैं। फिर हम एनजीओ के साथ बैठकें करते हैं। एनजीओ से फीडबैक लेते हैं। उनकी क्या समस्याएं हैं, दिव्यांग सेंटर में दिव्यांगों की क्या समस्याएं हैं उन्हें सुनते हैं। इन तीनों बैठकों से जो बातें उभरती हैं उन पर चीफ सेक्रेटरी से वार्ता करते हैं। जिस राज्य में दिक्कतें हैं वहां सुधार के बारे में हम राज्यपाल से विचार-विमर्श करते हैं। इन सारी गतिविधियों से जागरूकता पैदा होती है।

27 महीनों में 27 राज्यों में आपने कार्य शुरू किया है। इन राज्यों का आपका अनुभव कैसा है?

एक ही सचिव सारे विभागों को नहीं संभाल सकता। इसलिए दिव्यांगों के लिए एक अलग विभाग बनाया जाना जरूरी लगा। सबसे पहले कर्नाटक में 1988 में अलग विभाग बना। 1993 में तमिलनाडु ने और 1915 में उत्तर प्रदेश ने ऐसा किया। मध्यप्रदेश, राजस्थान, ओडिशा जैसे कुल सात राज्य हैं जिन्होंने स्वतंत्र विभाग बनाए हैं। तमिलनाडु ने विकलांगों के लिए काफी अच्छा कार्य किया है। उनके अलावा कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश जैसे राज्य भी ‘ए’ श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। इसके बाद वे राज्य आते हैं जिन्होंने स्वतंत्र विभाग नहीं बनाया है, जैसे आंध्र प्रदेश का काम बहुत अच्छा नहीं रहा। तेलंगाना बन जाने के बाद थोड़ी और गड़बड़ी हुई है। महाराष्ट्र, राजस्थान, तेलंगाना और ओडिशा भी इसी श्रेणी में आते हैं। तीसरी श्रेणी ऐसी है जहां सरकार भी ठीक से कार्य नहीं कर रही है। दिव्यांगों पर ध्यान नहीं दिया जाता। दिव्यांगों के लिए प्रमाणपत्र भी कम दिए गए हैं। भारत सरकार की कोई योजना हो तो भी वे देर करते हैं। उस श्रेणी में प.बंगाल, बिहार, मणिपुर, केरल हैं।

केंद्र सरकार की योजनाओं और राज्य सरकारों के उस पर अमल के लिए किस प्रकार से समन्वय होना चाहिए?

‘दिव्यांग’ राज्य का विषय है। कई विषय ऐसे हैं जो राज्य सरकार के विषय हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, दिव्यांग ऐेसे ही क्षेत्र हैं। केंद्र सरकार कुछ नए कदम उठाती है, एक मॉडल देती है राज्यों को। राज्यों का कर्तव्य है कि जैसी वहां की जरूरत है, विजन है वैसे कदम वे उठाए। गोवा छोटा राज्य है, लेकिन वहां दिव्यांगों के लिए सर्वाधिक पेंशन है। 80% दिव्यांगों के लिए 3500 रु. प्रति माह पेंशन है। 40% से 60% के बीच विकलांग को 2000 रु. प्रति माह देते हैं। दूसरा राज्य पांडिचेरी है, जहां भी दिव्यांगों के लिए 3000 रु. पेंशन है। लेकिन कुछ ऐसे राज्य ऐसे हैं जहां 300 रु. ही पेंशन देते हैं; जब कि 300 रु. तो भारत सरकार भी देती है। अतः भारत सरकार के नियमों को लागू करना राज्यों की क्षमता, सोच पर निर्भर करता है।

दिव्यांगों के हित में कार्य करने के लिए राज्यों को आप किस प्रकार से दिशानिर्देश देते हैं?

मैं राज्यों में पुनरावलोकन के लिए जाता हूं। 27 राज्यों में 27 पुनरावलोकन कर मुख्य सचिव को रिपोर्ट भेजी। मैं पहल करता हूं कि दिव्यांगों के लिए अलग विभाग बने। यदि अलग विभाग न भी बन पाए तो एक अलग निदेशक की नियुक्ति हो। प्रत्येक जिले में जिला दिव्यांग कल्याण अधिकारी की नियुक्ति अवश्य होनी चाहिए। समावेशी शिक्षा हो ताकि इन्हें लाभ पहुंच सके। एक समय होता था जब दिव्यांगों के लिए विशेष स्कूल होते थे। अब अगला कदम है समावेशी  शिक्षा, समावेशी रोजगार हो और समाज भी समावेशी बने। यह दिव्यांगों की आवश्यकता है। इसके लिए हर राज्य में दिव्यागों के लिए अध्ययन केंद्र बनना चाहिए। दिव्यांगों को विशेष शिक्षा देने के लिए सरकार की ओर से प्रशिक्षण दिया जाए। जो मंतिमंद हैं उनके लिए भारत सरकार की ओर से 1999 के कानून के अंतर्गत दस योजनाएं हैं। बच्चे के जन्म से लेकर 10 वर्ष की अवस्था तक अलग योजना है। उसके बाद दूसरी योजना है 18 वर्ष तक के लिए। हर आयु वर्ग के लिए योजनाएं हैं। जीवन के अंतिम समय में माता-बाप को चिंता रहती है कि उनके बाद उनके बच्चे को कौन देखेगा। इसके लिए घरौंदा नामक योजना है। जीवन के अंत तक ऐसा व्यक्ति वहां रह सकता है। राज्य सरकार को नेशनल ट्रस्ट योजना को लागू करना चाहिए। नेत्रहीन लोगों के लिए नेत्रदान को बढ़ावा देना चाहिए। देश में प्रति वर्ष 30,000 बच्चे बधिर पैदा होते हैं। जिनमें से 15 हजार बच्चों को सुनने की मशीन लगाकर सामान्य बच्चों की श्रेणी में लाया जा सकता है। यह योजना सरकार ने पहले नहीं शुरू की थी। पर अब इस दिशा में कार्य कर रही है। आज सुनने की मशीन हम निःशुल्क दे रहे हैं। इसके लिए देश में 280 अस्पताल चुने गए हैं। इन सारी बातों पर हम काम कर रहे हैं।

मोदी सरकार आने के बाद विकलांगों की समस्याओं को सुलझाने के किस तरह प्रयास हो रहे हैं?

आज दिव्यांगों की पहली आवश्यकता है सहारा। नेत्रहीन है तो उसे छड़ी चाहिए। कोई हाथ पैर से दिव्यांग है तो उसे बैसाखी चाहिए। यह विभाग तो बहुत पुराना है। 1992 से 2014 तक पिछले 22 वर्षों में इस प्रकार के साधन मुहैया कराने के लिए कुल 57 शिविर लगाए गए हैं। एनजीओ की क्षमता सीमित होती है और कई बार पारदर्शिता भी नहीं रहती। 125 करोड रुपये सरकार देती थी, कभी खर्च नहीं हुए। पिछले 4 वर्षों में 6500 शिविर लगाए गए हैं। 50 करोड़ के साधन 10 लाख से ज्यादा दिव्यांगों में वितरित किए गए हैं। आज कोई भी दिव्यांग जिला कार्यालय में जाकर अपनी आवश्यकतानुसार साधन प्राप्त कर सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि वह अपना अधिकार जाने और उसका लाभ उठाए। इस क्षेत्र में कार्य करने के लिए एक योजना है दीनदयाल रेल्वे स्टेशन योजना। इस योजना के अंतर्गत उचित अनुदान भी दिया जाता है। भारत सरकार ने 2015 में पहली बार दिव्यांग छात्रों के लिए छात्रवृत्ति शुरू की। इसके तहत प्री-मैट्रिक  और मैट्रिक में पढ़नेवाले छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती है। कॉलेज और विदेश में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति है।

2016 में राइट ऑफ पर्सन विथ डिसेबिलिटी एक्ट के नाम से एक नया कानून लाया गया है। 2006 में दुनियाभर के देशों ने एक सम्मेलन बुलाया था। इसके सुझावों के आधार पर 2014 में सरकार ने विधेयक लाया था, लेकिन तब वह पारित नहीं हो सका।  14 दिसम्बर 2016 को वह पारित हुआ। 19 अप्रैल से लागू हुआ। नए नियमों के अंतर्गत दिव्यांगों के लिए आरक्षण 3% से बढ़ाकर 4% किया गया। दिव्यांगता की संख्या 7 से बढ़ाकर 21 कर दी गई।  प्रमाणपत्र के लिए नियम तय कर दिए गए हैं। स्किल इंडिया के अंतर्गत 2022 तक 25 लाख दिव्यांगों के कौशल्य के विकास का लक्ष्य है।

‘बेचारे विकंलांग से आत्मनिर्भर विकलांग’ इस प्रकार का जो परिवर्तन है वह कौशल विकास के माध्यम से किस प्रकार से किया जा सकता है? ऐसी कौनसी बातें उसमें हैं?

कौशल विकास के जो कार्य चल रहे हैं वे तीन से छह महीने के प्रशिक्षण के हिसाब से चल रहे हैं। ये सब एनजीओ के माध्यम से हैं और सरकार भी इसको लागू कर रही है। उसके छोटे-छोटे नमूने देख सकते हैं। हिमाचल प्रदेश में वहां की सरकार ने दिव्यांग बच्चों को हाउसकिपिंग का प्रशिक्षण दिया और उन्हें होटलों में नौकरी दिलवाई। नाशिक में भी सामाजिक संस्था से जुड़े बालासाहब अहिरे ने कुल 12 नेत्रहीन लोगों को नौकरी दिलवाई थी अपने संपर्क के आधार पर। तीन महीने बाद वे मालिक सेे मिलने गए और पूछा कि ये लोग कैसा काम कर रहे हैं? उन्होंने बताया बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। एक ने कहा, मैं सामान्य लोगों को 3000  वेतन देता हूं, परंतु दिव्यांग को 3500 रु.। ऐसा क्यों यह पूछने पर उन्होंने कहा कि जो सामान्य लोग ंहै वे बहुत छुट्टी मारते हैं, लेकिन विकलांग पूरी ईमानदारी से काम करते हैं।

कृष्णगोपाल तिवारी पहला नेत्रहीन आईएएस था। मध्यप्रदेश में नियुक्त हुआ। ऐसे बहुत नाम हैं। दिव्यांग समाज पर बोझ नहीं हैं यह सिद्ध हो रहा है। ऐसे लोगों की प्रतिभा को समाज में सामने लाने के लिए प्रति वर्ष भारत सरकार राष्ट्रीय पुरस्कार देती है। इस तरह  आज वे बेचारे नहीं हैं, स्वावलंबी हैं और समाज के हित में भी कार्य करने के लिए को उत्सुक हैं।

सौ प्रतिशत विकलांगों और विकलांग महिलाओं के लिए हर राज्य में, जिले में शेल्टर होम की अत्यंत आवश्यकता है। लेकिन उस प्रकार का चित्र पूरे देश में दिखाई नहीं दे रहा है। उसके लिए क्या किया जा सकता है?

जो 80% से ज्यादा दिव्यांग हैं उन लोगों के लिए जगह- जगह पर शेल्टर होम आवश्यक हैं। कई जगह राज्य सरकारें चलाती भी हैं। मध्यप्रदेश में भोपाल, इंदौर, ग्वालियर में ऐसी योजना भी है। लेकिन ज्यादा से ज्यादा राज्य सरकारों को इस पर कार्य करना चाहिए। बहुत सारे लोग अपने दिव्यांग जनों को किसी केयर सेंटर में भेज देना चाहते हैं। यह बहुत गलत प्रवृत्ति है। केयर सेंटर में एक व्यक्ति को बीसों लोगों की देखभाल पड़ती है, जबकि घर में कई लोग होते हैं। दिव्यांग एक ही होता है इसलिए उसकी देखभाल ज्यादा अच्छी हो सकती है। इसलिए समाज को यह मनोवृत्ति बदलनी होगी।  आज तो ओल्ड एज होम की अवधारणा घर कर रही है। उनके लड़के देशविदेश में काम करते हैं। उन्हें वृद्ध मां-बाप बोझ लगते हैं। इसलिए वे उन्हें ओल्ड एज होम में छोड़ आते हैं। ओल्ड एज होम में जिनकी अच्छी स्थिति है वे पैसा देते हैं। लेकिन फिर भी उनकी स्थिति  अच्छी नहीं होती। जिसका कही कोई नहीं है उसके लिए ओल्ड एज होम ठीक है। समाज को प्रयास करना चाहिए कि उन्हें अपने साथ परिवार में रखे।

दिव्यांगों के हित में कार्य करने वाली सामाजिक संस्थाएं सरकार से सहायता की आस लगाए हुए हैं। सरकार उन्हें किस प्रकार की सहायता दे रही है या देना जरूरी है।

दिव्यांगता की क्षेत्र में जो संस्थाएं कार्य करना चाहती हैं उन सारे कार्यों के लिए सरकार के पास योजनाएं हैं। सारे कार्यों के लिए सरकार अनुदान देती है। आज सब ऑनलाइन हो गया है। औपचारिकताएं पूरी कीजिए बस, कार्यालय का चक्कर लगाने की जरूरत नहीं है। घर बैठे आज आपको योजना मिल जाएगी। किसी को कोई अगर अपलोड करके भी नहीं होता तो जरूर उसमें कोई न कोई कमी होगी। सरकार की ये योजनाएं सबके लिए हैं। सरकार के संसाधन सीमित होते हैं। समाज के संसाधन सीमित नहीं होते। इसलिए जो संस्थाएं सरकार की सहायता से कार्य कर रही हैं, उनका स्वागत है। जो बिना सरकारी सहायता औरे समाज की सहायता से कार्य कर रहे हैं उनका भी स्वागत है। अच्छे लोगों को इस कार्य में जोड़ने की आवश्यकता है।

आप विकलांगों की समस्याओं को समझकर हल करने के कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि मोदी सरकार का विकंलागों के प्रति दृष्टिकोण किस प्रकार से आपको महसूस हो रहा है?

एक जमाने में गांव में जो विकलांग थे उसके लिए बहुत नकारात्मक शब्द था। उससे उनके अंदर बहुत हीन भावना विकसित होती थी। इसलिए समाज ने एक नया शब्द दिया विकलांग। आगे जाकर विकलांग में कमी लगने लगी तो कुछ सरकारों ने दूसरे शब्द खोजे। लेकिन मोदी जी ने शब्द दिया ‘दिव्यांग’। आप देखिए कि किसी हॉल में कोई कार्यक्रम होता है और जूतें-चप्पल बाहर निकालकर जाना है तो एक दृष्टिबाधित व्यक्ति वहीं जाता है जहां उसकी चप्पल रखी होती है। बोलने भर से वह भाप लेता है। इसलिए मोदी जी ने ‘दिव्यांग’ शब्द दिया है। मोदी सरकार क्या सोचती है, क्या कर रही है उन का क्या विजन है इस शब्द से ही पता चलता है। इसलिए आज की तारीख में यह शब्द पिछले सभी शब्दों से उत्कृष्ट शब्द है।

 

 

This Post Has One Comment

  1. बहुत सुंदर

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