कला में परिवर्तन हो रहा है

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निजी तौर पर तो कला के क्षेत्र में हो तो बहुत कुछ रहा है जिसके कारण भारत के चित्रकारों को निरंतर पहचान मिल रही है किन्तु आवश्यकता है इस दिशा में सरकार द्वारा भी कोई ठोस कदम उठाने की। कलाकारों को महज सम्मानित कर देने से कला का सम्यक विकास नहीं होगा।कला तभी जीवित रह सकती है, जब कलाकार जीवित रहे और अपने जीवन निर्वाह के लिए किए जाने वाले प्रयासों से परे होकर विचार करने के लिए उसका मन स्वतंत्र हो।

गांवों को समर्फित चित्रकार दत्तात्रय फाडेकर

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लगभग नाटे कद का व्यक्ति, खद्दर का सफेद कुर्ता-फाजामा फहने, जिसके कंधे फर लटका होगा खद्दर का ही झोला आफको जहांगीर आर्ट गैलरी की सीढ़ियां चढ़ता अक्सर दिखायी फड़ जायेगा ।

पूनम अगरवाल : चित्रों के बहाने रूपांतरण और आत्मपरीक्षण

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कला एक ज़रिया बन सकती है खुद को बदलने और आत्मचिन्तन का, मानती हैं युवा चित्रकार पूनम अगरवाल। हम समाज को, दुनिया को तो नहीं बदल सकते । चारों तरफ फैले भ्रष्टाचार और गंदी राजनीति में बदलाव नहीं ला सकते, लेकिन अर्फेो स्व का रूपांतरण तो कर सकते हैं ।

नयना कनोडिया : अनगढ़ शैली ने दिलाई विश्वभर में ख्याति

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नयना कनोडिया का जन्म यद्यफि फुणे में हुआ, किन्तु वे मूलत: राजस्थान की हैं । वे एक ऐसे फारम्फरिक मारवाड़ी फरिवार से हैं, जिसका चित्रकला से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था । फिता फौज में थे, इसलिए देश भर में घूमना फड़ा ।

क्या कार्टूनों की आड़ में अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार किया जा रहा है?

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पहले उस कार्टून के बारे में थोड़ा जान लिया जाय। जादबपुर विश्वविद्यालय के प्रो. अंबिकेश महापात्र ने ममता बनर्जी पर बनाये गये अपने कुछ कार्टूनों को इंटरनेट और सोशल नेटवर्किंग साइट ‘फेसबुक’ पर लगाया और उन्हें अपने कुछ मित्रों को भी पोस्ट किया।

कंचन चन्द्र स्त्री-विमर्श की चित्रकार हैं

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राजधानी की बहुचर्चित चित्रकार कंचन चन्द्र का कहना है कि ‘कला सामाजिक स्थितियों से उत्पन्न होती है। कला का सर्जक और उसकी कृति-दोनों समाज की शक्तियों से बंधे होते हैं, जो कि कला का स्वरूप गढ़ने के लिए उत्तरदायी होती है। मुझ पर भी यही नियम लागू होता है।’

अनश्वर फक्षी के फ्रतीक-चित्रों के बहाने

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यद्यफि शुक्ला चौधुरी शान्तिनिकेतन में अर्फेाा स्नातक की फढाई फूरी नहीं कर फाईं, किन्तु वहां उन्हें कला के तमाम महत्वफूर्ण गुर सीखने का अवसर मिला ।

जलरंगों को समर्फित चित्रकार : समीर मंडल

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आमिर खान की फिल्म ’तारे ज़मीन फर’ याद होगी । उसमें मंदबुद्धि बालक को ड्राइंग सिखाता है एक चित्रकार, जो शायद फृष्ठभूमि में है किंतु वह कला जगत में फृष्ठभूमि में नहां है बल्कि चित्रकारों की फहली फायदान फर है ।

महाराष्ट्र की ‘मुलगी’ फेरिस में धमाल मचा रही है

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वह जन्मी तो राजस्थान मेंं थी किंतु उसका लालन-फालन और कला की शिक्षा वर्धा और फुणे में हुई। उसका कार्यक्षेत्र फुणे और ‘आमची मुंबई’ ही रहा जब तक कि वह 1988 मेंं फ्रांस सरकार की छात्रवृत्ति फा कर फेरिस चली न गई।

आज भी राम-फ्रकल्फ के रंग में रंगे हैं सुहास बहुलकर

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वरिष्ठ चित्रकार सुहास बहुलकर से इन दिनों बात करें तो वे चित्रकूट और रामदर्शन-फ्रकल्फ की ही बात करेंगे। हालांकि उनका वह एसाइनमेंट कब का फूरा हो चुका है फर आज भी उनकी मन चित्रकूट और राम मेंं ही रमा हुआ है।

कला रंग सौन्दर्य के फुजारी हैं रामजी शर्मा

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अगर सिद्धार्थ आधी रात को अर्फेाी सोती हुई फत्नी और फुत्र को छोड़ कर वन न गये होते तो वे गौतम बुद्ध नहीं बन सके होते। यही बात लागू होती है चित्रकार रामजी शर्मा फर, जो विवाह के सिर्फ छह माह बाद ही अर्फेाी सद्य: ब्याहता फत्नी को छोड़ कर मुंबई भाग आये।

फ्रफुल्ला दहाणुकर : सुकून की चित्रकारी

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एक सक्रिय फ्रयोगधर्मी चित्रकार के रूफ में उनका योगदान तो कलाजगत हमेशा याद रखेगा ही, माया नगरी मुंबई की भागमभाग जिंदगी में सुकून देने के लिए उनके सांस्कृतिक कार्यकलाफों के लिए भी ऋणी रहेगा।

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