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स्वाधीनता के बाद अदालतों में आए बदलावों, मुकदमों में होने वाली देरी, उनके कारणों, कसाब मामला व न्याय व्यवस्था की अन्य समस्याओं पर प्रसिद्ध अधिवक्ता उज्ज्वल निकम से हुई बातचीत के महत्वपूर्ण अंश प्रस्तुत है- 

गत 71 सालों में हमें कानून की अवहेलना ही अधिक होती हुई दिखाई दी है। आज न्यायपालिका की यह अवस्था क्यों है?

मैं नहीं मानता हूं कि कानून की अवेहलना होती है। यह बात जरूर है, कि कुछ मामलों खासकर दीवानी मामलों में फैसले बहुत देरी से होते हैं। कुछ फैसले जल्दी आते हैं। फैसले में होने वाली देरी के लिए सिर्फ कानून को जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है। कुछ समस्याएं हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर में भी हैं। परंतु अब हमारे इन्फ्रास्ट्रक्चर को सुधारने के लिए सरकार लगातार कोशिश कर रही है ताकि फैसले जल्दी आ जाए। मैं आपको उदा. दूंगा कि मुंबई में 26/11 में जो आतंकी हमला हुआ था वह मुकदमा मैंने चलाया था। उस मामले का फैसला हमने 8 महीनों के अंदर करवाया था। हाईकोर्ट में 8 महीने लगे, सुप्रीम कोर्ट में 4 से 5 महीने लगे। एक पाकिस्तानी आतंकवादी का पूरा फैसला डेढ़-दो साल में कर दिया गया। यह बात जरूर है कि आज भी दीवानी अदालतों में समय जरूर लगता है लेकिन इसकी अलग-अलग वजहें हैं। लेकिन अब मैं यह कह सकता हूं कि कानून के फैसले जल्दी होने लगे हैं।

समाज में आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ने के क्या कारण हैं? क्या लोगो में कानून का डर ख़त्म हो रहा है?

ऐसा नहीं है कि कानून के फैसले देरी से आने के कारण अपराधी मामले बढ़ रहे हैं। यह बात जरूर है कि जनसंख्या बढ़ने के कारण हमें आपराधिक मामले ज्यादा दिखाई देते हैं। हमारे देश में ही नहीं विदेशों में भी आपराधिक मामले बढ़े हैं। अमेरिका का ही उदाहरण देखें तो वहां तो हथियारों के बारे में फ्री लायसेंन्स पॉलिसी होने की वजह से वहां कोई भी हथियार रख सकता है और कभी भी अंधाधुंध गोलीबारी कर सकता है। लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होता। हमारे यहां अपराध के लिए कड़ी सजा का प्रावधान है लेकिन उस कड़ी सजा का क्रियान्वयन होने में अभी भी समय लगता है। मुझे लगता है कि अगर समाज में कानून का डर पैदा करना है तो सजा का जल्द क्रियान्वयन होना भी उतना ही जरूरी है।

सजा के क्रियान्वयन में देर होने के क्या कारण हो सकते हैं?

कारण तो कई होते हैं। हमारे यहां मुजरिम को अगर लोअर कोर्ट में फांसी की सजा दी जाती है तो वह हाईकोर्ट में अपील करता है, वहां भी अगर सजा कायम रही तो सुप्रीम कोर्ट में अपील करता है। उसके अपील करने पर कोई ऑब्जेक्शन नहीं ले सकता; क्योंकि यह उसका कानूनी हक है। सुप्रीम कोर्ट में फांसी की सजा तय होने के बाद वह राष्ट्रपति को दया की याचिका दे सकता है। मेरा यह अनुभव है कि राष्ट्रपति के यहां इस याचिका पर फैसला लेने में सालों लग जाते हैं। इसलिए हमारे संविधान में सुधार लाना चाहिए कि अगर तीन महीने के अंदर राष्ट्रपति कोई निर्णय नहीं लेते तो उसे खारिज समझ लेना चाहिए। सही मायने में कडी सजा का अर्थ केवल गुनाहगार को सजा देना नहीं है बल्कि उस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना है जिससे अन्य लोग अपराध करने से डरें।

आज संघ के द्वारा या भाजपा के द्वारा संविधान में परिवर्तन करने की चर्चा सुनाई देती है। क्या संविधान में परिवर्तन का प्रावधान है?

देखिए, संविधान में परिवर्तन करना बहुत मुश्किल बात है। क्योंकि उसके लिए दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है। हमारा संविधान एक ऐसा ढांचा है जिसमें दुनिया के विविध देशों की कई सारी बातें सम्मिलित की गईं हैं। इसे बनाते समय ही छोटी से छोटी परंतु आवश्यक सभी बातों को सम्मिलित किया गया है। अत: अगर संविधान में संशोधन करना है तो यह आवश्यक है कि वह देश के हित में हो।

राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका पर जल्दी फैसला सुनाने जैसे और अन्य कौन से संशोधन आप न्याय व्यवस्था में कराना चाहते हैं?

संविधान में कई ऐसी चीजें हैं जिनमें कानूनी परिवर्तन होने चाहिए, इंडियन पीनल कोड, इंडियन एविडेंस एक्ट में बदल होने चाहिए। ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी होनी चाहिए। उदाहरण के लिए अगर देखें तो ज्यूडिशियल अकाउंटिबिलिटी बिल सरकार ने लाने की कोशिश की थी, लेकिन वह पारित नहीं हो पाया। वह भी होना बहुत जरूरी हैै। क्योंकि समाज के सिस्टम के हर व्यक्ति की अकाउंटिबिलिटी होनी चाहिए। निरंकुश सत्ता किसी की भी न हो। न्यायपालिक समाज का महत्वपूर्ण स्तंभ है। परंतु उसकी भी कुछ जवाबदेही बनती ही है। अभी सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहा कि कोर्ट में चलने वाले केसेस का सीधा प्रसारण हो ताकि हर व्यक्ति जिम्मेदारी से काम करें।

न्यापालिका लोकतंत्र तीसरा स्तंभ है। वह शासनप्रशासन पर भी अंकुश रखने का काम करता है। लेकिन कई बार वह शासन से ही प्रभावित दिखता है। इसके दुष्परिणाम समाज पर क्या होते हैं?

हमारी न्यायपालिका की एक सुंदर और सख्त रचना है कि वह किसी से प्रभावित नहीं होती। यह एक स्वतंत्र सिस्टम है जो लोअर कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चरणबद्ध तरीके से कार्य करती है। अगर इसकी रचना के अनुसार ही हर व्यक्ति कार्य करे तो यह किसी से प्रभावित हो ही नहीं सकती।

आपने अजमल कसाब मामले में वकील थे। क्या कारण थे कि आतंकवादी होने के हर सबूत होने पर भी उसे सजा मिलने में इतनी देर हुई?

हमारी न्यायपालिका जिस एक सामान्य सिद्धांत के अंतर्गत कार्य करती है, जो यह है कि अपराध को कानूनी तौर पर साबित करना जरूरी है। सभी ने सीसीटीवी फुटेज में कसाब को देखा था। चूंकि वह एक विदेशी आंतकवादी था, इसलिए हमने पूरी दुनिया को दिखा दिया कि हमारी न्यायपालिका आरोपी को स्वयं को निरपराध साबित करने का हर मौका देती है। इसलिए यह मामला खुले रूप से चला था। लोगों ने देखा कि किस प्रकार उस पर केस चला और सभी सबूतों के आधार पर ही न्यायपालिका ने उसे फांसी की सजा सुनाई। इसमें थोड़ा वक्त लगा परंतु अपराधी को दंडित किया गया।

एक आतंकवादी के लिए रात को तीन बजे कोर्ट खुलवाने के क्या मायने हैं?

हम सभी जानते हैं कि अफजल गुरू किस अपराध की सजा काट रहा था। इतने संगीन अपराध की सजा सुनाने के लिए कोर्ट का रात को तीन बजे खुलना अति आवश्यक था। उस केस में निरंतर ट्विस्ट आ रहे थे। उसके बचाव की भी निरंतर कोशिशें चल रही थीं। केस के अंतिम दौर में यह मुद्दा उठाया जाने लगा कि चूंकि अफजल गुरू ने सरेंडर किया है, उसे गिरफ्तार नहीं किया गया है अत: उसे फांसी की सजा नहीं दी जा सकती। इसके पहले सुनवाई के दौरान यह बात कभी सामने नहीं आई। इस झूठ को सामने आने से रोकना और जल्द से जल्द रोकना अत्यंत आवश्यक था। अत: कोर्ट को रात को तीन बजे खोला गया और अफजल को फांसी की सजा सुनाई गई।

तो क्या हम यह कहें कि अगर सजा में देर होती तो शायद अफजल को बचाने का रास्ता खोज लिया जाता?

ऐसा करने के पूरे प्रयास चल रहे थे, परंतु हो नहीं सका।

एक ही खंडपीठ के न्यायाधीशों द्वारा अपने मतभेदों को मीडिया के सामने उजागर करना समाज को क्या संदेश देता है?

यह मेरा व्यक्तिगत मत है कि एक बहुत गलत और नकारात्मक संदेश उस दिन समाज के सामने गया है। व्यक्ति के रूप में मतभेद होते ही हैं। परंतु हम जिस दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं उसकी कुछ मर्यादाएं हैं। वे आपस में कुछ समय लेकर उसे सुलझा सकते थे, या राष्ट्रपति के सम्मुख जा सकते थे। परंतु इस तरह मीडिया के सामने आना मेरी राय में पूर्णत: गलत है।

समाज में आजकल मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। हम कहते हैं भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता, ऐसे में भीड़ पर कानूनी कार्रवाई करने का क्या प्रावधान है?

यह सही है कि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। परंतु आजकल तकनीक बहुत विकसित हो गई है और इंफ्रास्ट्रक्चर (सीसीटीवी आदि) में अधिक सुधार करने से ऐसी घटनाओं में असली अपराधी को पहचान कर उसे दंडित करना आसान होगा। यहां कई बार खतरा इस बात का होता है कि भीड़ में होनें के कारण कई ऐसे निरपराध लोग भी पकड़े जाते हैं जिनका इस घटना से कोई सम्बंध नहीं होता। कई बार तो लोग मोबाइल में रेकॉर्ड करने के लिए ही वहां खड़े होते हैं परंतु भीड़ के साथ वे भी गिरफ्त में आ जाते हैं।

महिलाओं के साथ होने वाले कुकर्मों के लिए विदेशों में सख्त कानून हैं। क्या भारत में भी इस तरह के सख्त कानूनों की आवश्यकता है?

सख्त कानूनों की आवश्यकता तो है ही; परंतु मेरा यह मानना है उससे भी अधिक आवश्यकता है कानून के सख्ती से पालन की, क्रियान्वय की और समाज जागृति की। आज भी महिलाओं के साथ होने वाले कुकृत्यों में केस दर्ज कराने में ही कई दिन लग जाते हैं। समाज के डर से, बदनामी के डर से महिलाएं सामने नहीं आतीं। यह जानते हुए भी कि गलती उनकी नहीं है वे कुछ भी बोलने से कतराती हैं। अत: समाज में जागृति लाना आवश्यक है।

हाल ही में सरकार ने नाबालिक बच्चियों के साथ होने वाले कुकर्मों के लिए मृत्युदंड का कानून पास किया है। यह कानून तो बहुत सख्त है परंतु पीड़ित का कोर्ट तक पहुंचना और सबूत मिलना भी उतना ही आवश्यक है।

भ्रष्टाचार ने न्यायपालिका को भी खोखला कर दिया है। समाज का विश्वास कायम रखने के लिए आप न्यायपालिका में क्या परिवर्तन चाहेंगे?

न्यायपालिका की एक आंतरिक व्यवस्था है, जो इन सभी पर अंकुश रखने का कार्य करती है। उसे अधिक मजबूत करना होगा। इससे अधिक कुछ कहना मैं उचित नहीं समझता।

अभी तक खोले गए फास्ट ट्रैक कोर्ट कितने सफल हुए हैं?

फास्ट ट्रैक कोर्ट काफी सफल हुए हैं। हालांकि अभी देश में इनकी संख्या बहुत कम है, तथा इनके लिए जो इन्फ्रास्ट्रक्चर आवश्यक होता है वह परिपूर्ण नहीं है, फिर भी फास्ट ट्रैक कोर्ट में केसेस चले हैं वे सभी सफल हुए हैं।

अपराध करके देश से बाहर भाग जाना अपराधियों की आदत बन गई है। इन पर किस तरह कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है?

वास्तविकता यह है कि विदेशों तथा भारत के नियम- कानूनों में  अंतर है। भारत में अपराध करके बाहर चले जाने के बाद उस व्यक्ति पर वहां के कानून लागू होते हैं। ऐसे में भारतीय कानूनों के हिसाब से वह व्यक्ति दोषी है इसलिए उसे भारत को सौंपा जाए इस आधार पर अपराधी को वापस लाने में बहुत देर लगती है।

तकनीक ने आज सभी क्षेत्रों को गति प्रदान की है। न्यायपालिका को तकनीक के क्या फायदे हुए हैं?

निश्चित ही तकनीक का बहुत फायदा हुआ है। हाथों से या साधारन मशीनों से किए जाने वाले कार्यों तथा कम्प्यूटराइज्ड वर्क में बहुत अंतर है। एक उदाहरण देना चाहूं तो अब अगर किसी महिला के साथ कुकर्म होता है तो उसकी गवाही वीडियो कांफ्रेमसिंग के द्वारा भी ली जा सकेगी। उसे स्वयं हर बार आने की आवश्यकता नहीं होगी।

कसाब या अन्य आतंकवादियों का केस लड़ते समय क्या आप पर किसी तरह का दबाव डाला गया था?

क्या आपको लगता है कि कोई मुझ पर दबाव डाल सकता है? असल में यह तो किसी व्यक्ति पर निर्भर होता है कि वह दबावों के आगे झुकता है या नहीं। मेरे सामने आकर अभी तक किसी ने कुछ प्रत्यक्ष रूप से कहा नहीं। और, अगर कोई कहता तो मैं झुकने वाला नहीं हूं।

फिल्मों में दिखाए जाने वाले कोर्ट के बारे में आप क्या कहेंगे?

फिल्मों का मुख्य काम मनोरंजन करना है। मैंने जॉली एलएलबी और अन्य फिल्मों में कोर्ट के सीन देखे हैं। उनमें केवल मनोरंजन होता है, वास्तविकता नहीं। वास्तविकता में कोर्ट बहुत अलग है।

 

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