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राजनीतिक घुसपैठ के बीच दब गई छात्रों की समस्या?

राजनीतिक घुसपैठ के बीच दब गई छात्रों की समस्या?

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, युवा, राजनीति
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लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उसमें नागरिकों को अपनी बात कहने, सरकार से प्रश्न पूछने और अपनी समस्याओं के समाधान के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार प्राप्त हैं। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक जनआंदोलनों ने देश और समाज को नई दिशा दी हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आपातकाल, छात्र, किसान, श्रमिक और सामाजिक आंदोलनों तक जनशक्ति ने समय-समय पर व्यवस्था को आत्ममंथन करने के लिए बाध्य किया हैं। लेकिन इतिहास का एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आंदोलन में राजनीतिक और राष्ट्रविरोधी गलत धारणा वाले प्रभाव के घुसपैठ के कारण अनेक बार आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक जाते हैं और जिन लोगों ने समाज के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन प्रारंभ किए थे, वही सबसे अधिक निराश होते हैं।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के नेतृत्व में प्रारंभ हुआ छात्र आंदोलन भी वर्तमान में इसी संदर्भ में विचार का विषय बन गया है। यह आंदोलन मूलतः NEET परीक्षा में कथित अनियमितताओं और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को लेकर उठी चिंताओं से प्रारंभ हुआ था। लाखों विद्यार्थियों ने वर्षों की कठिन मेहनत के बाद यह अपेक्षा की थी कि परीक्षा निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। इसलिए परीक्षा प्रणाली में सुधार, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और छात्रों के भविष्य की सुरक्षा जैसी मांगें पूरी तरह लोकतांत्रिक और न्यायसंगत थीं।

Delhi CJP Protest Live

किन्तु जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, उसका स्वरूप भी बदलता दिखाई देने लगा। विभिन्न छात्र संगठनों, सामाजिक समूहों, समय-समय पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियां चलाने वाले और सनातन हिंदू धर्म के विरोध में वक्तव्य देने वाले व्यक्तित्व आंदोलन पर छा गए, साथ में राजनीतिक दलों की भी सक्रियता बढ़ी। अरुंधति रॉय, शबाना आज़मी, नसीरुद्दीन शाह, दक्षिण के अभिनेता प्रकाश राज, कुणाल कामरा जैसे असंतुष्ट आत्मा आहिस्ता-आहिस्ता अपनी-अपनी धारणाओं को लेकर आंदोलन में सहभागी होने लगे। राम-सीता पर कठोर भाष्य होने लगा। देश के टुकड़े-टुकड़े करने की भारत को नेपाल, बांग्लादेश जैसे हिंसक आंदोलन में परावर्तित करने की घोषणा इस आंदोलन में गुंजने लगी। यहीं सावधानी की आवश्यकता होती है क्योंकि जब आंदोलन का केंद्र छात्रों की समस्याओं के स्थान पर राजनीतिक और गलत धारणा रखने वाले व्यक्तित्व का जमावड़ा बन जाता है, तब आंदोलन का मूल उद्देश्य पीछे छूटने लगता है।

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हाल के दो-तीन दिनों से दिल्ली परिसर में आंदोलन के दौरान हिंसा, पत्थर बाजी, तोड़फोड़ और पुलिस के साथ हिंसक टकराव करते युवा जैसी घटनायें लगातार देश के सामने आ रही है। आंदोलन स्थान पर ट्रक भर कर पत्थर लाए जा रहे हैं। कश्मीर आतंकवादियों की तरह युवक पुलिस पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। शिक्षा के विषय से जुड़ा यह आंदोलन कहां मुड़ रहा है? संपूर्ण देश चिंता से इस दृश्य को देख रहा है। यदि किसी आंदोलन में ऐसी घटनाएँ होती हैं, तो उसका सबसे अधिक नुकसान स्वयं आंदोलन की नैतिक शक्ति को होता है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, परंतु हिंसा किसी भी स्थिति में लोकतांत्रिक विरोध का स्वीकार्य माध्यम नहीं हो सकती।

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास से यह भी स्पष्ट होता है कि लंबे समय तक चलने वाले आंदोलनों में अनेक प्रकार के राष्ट्र विरोधी वैचारिक, अवसरवादी राजनीतिक और विदेशी फंडिंग के सहारे विदेशी नीतियों के हित पहचानेवाले संगठन आंदोलन में जुड़ने लगते हैं। 1974 का जेपी आंदोलन, 2011 का अन्ना हज़ारे आंदोलन, किसान आंदोलन तथा नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हुए आंदोलन, इन सभी के साथ अनेक राजनीतिक दल अपने वैचारिक उद्देश्य की पूर्ति हेतु जुड़ गए थे। इस कारण से आंदोलन का मूल मुद्दा कई बार पीछे चला गया और सार्वजनिक विमर्श का केंद्र कुछ और बन गया।

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आज जंतर-मंतर आंदोलन के संदर्भ में भी यही चिंता व्यक्त की जा रही है कि कहीं छात्रों की वास्तविक समस्याएँ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच दब तो नहीं रही हैं। यदि आंदोलन का संचालन करने वाले संगठन अपने नियंत्रण, अनुशासन और दिशा को बनाए रखने में सफल नहीं होते, तो अनेक ऐसे तत्व सक्रिय हो सकते हैं जिनका उद्देश्य छात्रों की समस्याओं का समाधान नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक या वैचारिक हितों की पूर्ति करना है। युवकों की शक्ति का नकारात्मक उद्देश्य हेतु उपयोग होना उचित नहीं है। यही चित्र इस आंदोलन में महसूस हो रहा है। केजरीवाल, शरद पवार, राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे जैसे अपना राजनीतिक अस्तित्व खो चुके और उसे पुनः स्थिर करने का मौका ढूंढने वाले अवसरवादी नेता अब इस आंदोलन के मंच पर दिखाई दे रहे हैं। ऐसी स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए चुनौती बन जाती है।

CJP protest Delhi violence: 70 detained, 118 police personnel injured -  India Today

इसी संदर्भ में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के निकट धरना देने के प्रयास ने भी नई बहस को जन्म दिया। लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार का विरोध करना और जनता की आवाज़ उठाना है। यह उसका संवैधानिक अधिकार भी है। लेकिन प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास देश के सर्वाधिक संवेदनशील सुरक्षा क्षेत्रों में आता है। वहाँ सुरक्षा संबंधी विशेष नियम लागू होते हैं, जिनका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखना होता है।

Rahul Gandhi protest: AAP-Congress row erupts near PM Narendra Modi  residence in Delhi amid Cockroach Janta Party protests - India Today

इसलिए विरोध का अधिकार और सुरक्षा संबंधी दायित्व, इन दोनों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। वास्तव में किसी भी आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी नैतिक विश्वसनीयता होती है। जब आंदोलन अनुशासित, शांतिपूर्ण और अपने मूल उद्देश्य पर केंद्रित रहता है, तब सरकार और देश की जनता भी उसे गंभीरता से लेने के लिए बाध्य होती है। इसके विपरीत यदि आंदोलन हिंसा, देश विरोधी उग्र नारों, राजनीतिक टकराव अथवा वैचारिक संघर्ष का माध्यम बन जाए, तो आंदोलन से जनता का विश्वास कम होने लगता है और मूल समस्या का समाधान भी दूर होता चला जाता है।

सरकार की जिम्मेदारी है कि वह परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और विश्वसनीय बनाए, दोषियों को कठोर दंड दे तथा छात्रों का विश्वास पुनः स्थापित करे। वहीं आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठनों और सोनम वांगचुक की भी समान जिम्मेदारी है कि वे आंदोलन को संयमित रखें, किसी भी प्रकार की हिंसा या अराजकता को स्थान न दें और जो हिंसा आंदोलन के आधार पर की जा रही है उसे रोकने का वह प्रयास करें और इसे केवल छात्रों के हितों तक सीमित रखें।। इसे प्रयास इसलिए कह रहे हैं कि अब इस आंदोलन का नियंत्रण आंदोलन के संयोजनकर्ता सोनम वांगचुक के हाथ में रहा है क्या? यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

लोकतंत्र में आंदोलन आवश्यक हैं, परंतु आंदोलन की सफलता हिंसक भीड़ से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य, अनुशासन और नैतिक शक्ति से निर्धारित होती है। जब आंदोलन अपने मूल लक्ष्य के प्रति ईमानदार रहता है, तभी वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनता है। लेकिन यदि वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है, तो उसका लाभ समाज को कम और गलत धारणा रखने वाली राजनीतिक एवं विरोधी ताकतों और अपनी राजनीति चमकाने की अवसर की तलाश में बैठे विभिन्न हित समूहों को अधिक मिलता है। इसलिए प्रत्येक जनआंदोलन के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए कि वह अंत तक अपने मूल उद्देश्य के प्रति कितना निष्ठावान बना रहता है?

– अमोल पेडणेकर

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Tags: cjpdeepkedelhiindiajantarmanyarprakashrajprotestsonamwanghchuk

अमोल पेडणेकर

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