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वन्य जीवों का विलोपन पृथ्वी पर जीवन के लिए एक आपातकाल जैसी स्थिति के समान है और इस प्रक्रिया पर लगाम नहीं लगने से मानव सभ्यता और अस्तित्व को खतरा है, क्योंकि मनुष्य सहित सभी जीवों से बना पारितंत्र पृथ्वी पर जीवन को संचालित करता है।

मानव सभ्यता के विस्तार और बढ़ती आबादी के कारण जीवों के पर्यावास सिकुड़ते जा रहे हैं। विश्व के वन, आर्द्रभूमि, झील और अन्य पर्यावास कृषि, मकान, सड़क निर्माण, पाइपलाइन, उद्योग आदि के चलते लगातार नष्ट हो रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, वन उन्मूलन, खनन, शहरीकरण और औद्योगिक उत्पादन, कुछ प्रमुख मानवीय गतिविधियां हैं, जिनकी वजह से वन्य जीवों का आवास उजड़ता है। पर्यावास नष्ट होने से जीव जातियां पहले दुर्लभ होती हैं और यदि उचित संरक्षण प्रयास नहीं हुए तो वे धरती से लुप्त हो जाती हैं। जीव जातियों का स्थायी विलोपन एक तरफ प्रकृति के पारितंत्र को कमजोर बनाता है, तो दूसरी ओर पृथ्वी के समग्र परिवेश और मानव जीवन की गुणवत्ता को गहरे प्रभावित करता है।

वन्यजीवों के पर्यावास

प्रत्येक जीव को अपना अस्तित्व बनाए रखने और वंश वृद्धि के लिए एक अनुकूल परिवेश चाहिए होता है। पर्यावास ऐसे प्राकृतिक स्थान होते हैं जहां पौधे, जंतु और अन्य जीव रहते हैं, आहार प्राप्त करते हैं, संसर्ग करते हैं और सुरक्षा भाव से जीवनयापन करते हैं। मनुष्य का आवास किसी अनहोनी या आपदा के फलस्वरूप नष्ट हो जाए तो वह दोबारा रहने लायक घर बना लेता है। लेकिन वन्य जीव ऐसा नहीं कर सकते। पक्षी अपना घोंसला दोबारा बना लेता है मगर जंगल और पेड़ ही नहीं बचेंगे तो ये अपना घोंसला कहां बनाएंगे? इस लिहाज से पर्यावास को खोना वन्य जीवों के लिए संभवत: सब से बड़ी क्षति के समान है। जीवों के इन प्राकृतिक आवास में पर्याप्त भू या जल क्षेत्र, भोजन के स्रोत, पानी और आवश्यक भौतिक संरचना मौजूद रहते हैं जिनसे उन जीव जातियों का जीवन और अस्तित्व निरंतर कायम रहता है। यहां जिन भौतिक संरचनाओं की बात की गई है, उनमें शामिल अवयव होते हैं वृक्ष, पहाड़ियां, मिट्टी, झील, तालाब और दूसरे जीवों से बना पारितंत्र। जीवों के साथ ही साथ भौतिक दशाएं (अजीव) भी वन्य जीवों के अस्तित्व के लिए जरूरी होती हैं और सभी परस्पर निर्भर होते हैं। इसलिए पारितंत्र में किसी भी एक अवयव का अकेले कोई वजूद नहीं होता।

जब मनुष्य प्रकृति के स्थलीय या जलीय पर्यावास को नष्ट करके उसे अपने उपयोग या कैंजे में लेता है तो वहां के पारितंत्र में रहने वाले पेड़-पौधों के अलावा पशु-पक्षियों का अस्तित्व खतरे में आ जाता है। दुर्भाग्य है कि इस गंभीर मुद्दे पर हम बिल्कुल भी विचार नहीं करते। कृषि विस्तार, भवन व सड़क निर्माण और औद्योगिक विकास जैसी गतिविधियों के कारण विश्व भर के वन, दलदल, आर्द्रभूमि, नदियां आदि तेजी से समाप्त हो रहे हैं। मानव सभ्यता के आरंभ में पृथ्वी पर जितने वन हुआ करते थे, आज उसका आधा समाप्त कर दिया गया है। वृक्षारोपण के निरंतर प्रयास से इन्हें दोबारा हासिल किया जा सकता है लेकिन उसमें बहुत ज्यादा समय लगेगा क्योंकि वन उन्मूलन की दर वृक्षारोपण की दर से औसत रूप से दस गुना है।

वन्य जीवों के घटते प्राकृतिक आवास के कारण

वन्य जीवों के पर्यावास नष्ट होने के पीछे प्राकृतिक और मानवजनित दोनों तरह के कारण जिम्मेदार होते हैं। भूकंप, हिमपात, तूफान, भूस्खलन, आग और जलवायु परिवर्तन कुछ ऐसे प्राकृतिक कारण हैं जिनके द्वारा एक पृथक और स्थान विशेष के प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं। लेकिन मानवजनित कारणों का प्रभाव वैश्विक पैमाने पर और व्यापक भौगोलिक क्षेत्र के पर्यावास तथा उनके वन्य जीवों पर होता है।

बढ़ती मानव आबादी और उनकी जरूरतें वन्य जीवों का पर्यावास नष्ट करने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। विगत 50 वर्षों के दौरान मानव आबादी दुगुनी हुई है और 7 अरब से अधिक इस आबादी के आवास व भोजन का दबाव प्रकृति तथा पर्यावास पर बढ़ा है। कृषि के लिए पृथ्वी के वनों का उन्मूलन करना वन्य जीवों का पर्यावास नष्ट होने का प्राथमिक कारण होता है। खेती करने, इमारती लकड़ी, ईंधन और वन उत्पाद हासिल करने के उद्देश्य से हर साल पूरे विश्व में तकरीबन एक लाख 77 हजार वर्ग किलोमीटर वनों को समाप्त किया जाता है। एक अनुमान के अनुसार, 8 हजार साल की मानव गतिविधि के कारण पृथ्वी के लगभग आधे वन नष्ट हो गए हैं और वनों का यह विनाश पिछले कुछ दशकों के दौरान सर्वाधिक हुआ है। इमारती लकड़ी, ईंधन और वन उत्पादों के व्यापक दोहन के लिए वनों का उन्मूलन वहां रहने वाले वन्य जीवों के प्राकृतिक घर उजाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

मानव गतिविधियों के कारण भूमि पर पाए जाने वाले वन्य जीवों के अलावा जलीय जीवों के पर्यावास पर भी खतरा उत्पन्न हुआ है। पानी के जहाज, स्टीमर आदि से इंधन के रिसाव, विनाशकारी मत्स्य आखेट, गहरे ट्रालरों का प्रयोग और कोरल रीफ के दोहन से समुद्र का समूचा पारितंत्र बर्बाद हो गया है। समुद्र तटीय भूमि में विकास व निर्माण कार्यों से वहां के पर्यावास नष्ट हुए हैं। तटीय इलाकों में मानव बस्तियों के विकास और घरों से निकलने वाले प्रकाश से कछुआ जैसे जलीय जीवों का जीवन चक्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

प्राकृतिक आवास के उजड़ने के प्रभाव

जब कोई पर्यावास नष्ट होता है तो इसका नकारात्मक प्रभाव स्वाभाविक तौर पर वहां पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों, पौधों और छोटे-बड़े प्राणियों पर पड़ता है। इनकी आबादी प्रतिकूल वातावरण को कुछ अवधि तक झेलती रहती है। उसके बाद धीरे-धीरे ये संकटग्रस्त और दुर्लभ होते हैं और अंतत: इनके विलोपन की संभावना बढ़ जाती है।

पर्यावास नष्ट होने की स्थिति में, पक्षी और उभयचर अधिकतर कहीं और विस्थापित होकर अपने अस्तित्व की रक्षा करने में सफल नहीं होते। वहीं दूसरी तरफ, हर एक प्राणी समुदाय के कुछ जीव विश्व के किसी क्षेत्र या स्थान विशेष में ही पाए जाते हैं। इनके पर्यावास नष्ट होने से इनके अस्तित्व को सब से बड़ा झटका लगता है। इनकी उत्तरजीविता के अवसर सिमट जाते हैं क्योंकि ये खास पारितंत्र में जीवनयापन करने के अभ्यस्त होते हैं। इस तरह ऐसी जीव जातियों का प्रकृति से विलोपन सुनिश्चित हो जाता है। भारतीय चीता, जंगली भैंस (ओरोक्स), सुमात्रा के गैंड़े और गुलाबी सिर वाले बत्तख ऐसे कुछ भारतीय उपमहाद्वीप के प्राणी हैं जो अब विलुप्त हो चुके हैं।

वन्य जीवों का विलोपन

जीव वैज्ञानिक जीव जातियों के विलोपन को जलवायु परिवर्तन जितना घातक मानते हैं। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड के ताजा लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से लेकर आज तक मानवीय हस्तक्षेप ने 60 प्रतिशत वन्य जीवों का अस्तित्व हमारी धरती से खत्म कर दिया है।

एक अन्य ताजा अध्ययन के अनुसार, भारतीय उपमहाद्वीप की 50 से ज्यादा मछली की प्रजातियां अगले चंद वर्षों में पृथ्वी से लुप्त हो जाएंगी। पक्षियों की अनेक प्रजातियां जो विविध प्रकार के पर्यावासों में रहती हैं, उन पर भी विलोप का खतरा है। वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्षावनों में पाए जाने वाले उष्णकटिबंधीय आर्किड के अस्तित्व को भी गंभीर खतरा है। काकरोच, चूहे, दीमक जैसे कुछ ही जीव हैं जो मानवीय गतिविधियों से लाभ उठा कर मानव बस्तियों में रहने के आदि होते हैं और इनके पर्यावास नष्ट होने का प्रभाव इन पर नहीं होता। इस अध्ययन में इस बात की चेतावनी भी दी गई है कि वन्य जीवों का विलोपन पृथ्वी पर जीवन के लिए एक आपातकाल जैसी स्थिति के समान है और इस प्रक्रिया पर लगाम नहीं लगने से मानव सभ्यता और अस्तित्व को खतरा है। अभी यह हालत है कि धरती के जीवों को बचा लें या फिर मनुष्य अपने विलोपन के लिए तैयार रहे।

वन्य जीवों और मनुष्य का संघर्ष

हमें अक्सर तेंदुआ, बाघ, भालू जैसे वन्य जीवों के मानव बस्तियों में घुस आने की खबर सुनने को मिलती है। कई तेंदुए, बाघ और लकड़बग्घा तो आदमखोर बन जाते हैं। एक बात तो तय है कि ये जीव अनायास मानव बस्तियों की ओर रुख नहीं करते। इसमें कोई संदेह नहीं कि इनके पर्यावास तेजी से नष्ट हो रहे हैं और ये परेशान होकर मानव आबादी की तरफ आ रहे हैं। मानव आबादी अपने रहने, खेती और कार्य क्षेत्र का विस्तार करते हुए वन्य जीवों के पर्यावास (वन, पर्वत आदि) पर हस्तक्षेप या ओवरलैप करने लगते हैं मानव और वन्य जीवों का संघर्ष आरंभ हो जाता है। इस मानवीय हस्तक्षेप से वन्य जीवों के पर्यावास उजड़ जाते हैं, उन्हें भोजन की कमी होती है जिस कारण वे मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं। मनुष्य ने पहली बार जब कृषि और पशुपालन शुरू किया था तभी से इस संघर्ष का आरंभ हो गया था। इस संघर्ष के अनेक दुष्परिणाम सामने आते हैं जिनमें मनुष्य और वन्य जीव दोनों प्रभावित होते हैं। इसमें मनुष्य और वन्य जीव का घायल होना या मृत्यु भी हो जाती है। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप फसल नष्ट हो जाती है, पालतू पशु मारे जाते हैं और संपत्ति का नुकसान होता है।

वन्य जीव और मनुष्य के संघर्ष को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर अनेक प्रयास और प्रबंधन के उपाय अपनाए जा रहे हैं। इन उपायों में इलेक्ट्रिक फेंसिंग, समुदाय आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और अन्य स्थलीय समाधान उपाय अपनाए जाते हैं।

निष्कर्ष के रूप में इस बात पर बल दिया जा सकता है कि हमारी पृथ्वी एक है और इस पर जीवन अनोखा संयोग है। प्रकृति के सभी अवयव जिसमें वनस्पति, जीव-जंतु और मनुष्य आते हैं, ये सब एक दूसरे पर निर्भर होते हैं तथा इनका आपस में सह अस्तित्व है। हमें अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी और इसके जीवों के निरंतर अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अपने विवेक से काम लेना होगा। इसी में समूचे जीव जगत की भलाई है और यही मानवता है

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