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“आज जब मानव वन महोत्सव मनाता है, पर्यावरण दिवस मनाता है और वन्य जीवों को सुरक्षित रखने के अभियान चलाता है, तो हमें आशा की एक धुंधली किरण दिखाई देती है। हमें ऐसी अनुभूति होती है कि मनुष्य संभवतः सजग हो रहा है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि वह दिखावा मात्र करके स्वयं को और हमें छल रहा है।”

कैसे भूल जाएं वृन्दावन के  कुंजवनों में बजती श्री कृष्ण की बंशी की मधुर तान को, जिससे हम वनों का रोम-रोम खिल उठता था। यमुना का शीतल, निर्मल श्यामल जल, पशु-पक्षी, मंत्रमुग्ध सी गायें, ग्वाल-बाल, राधा रानी और प्रेम के देवता श्री कृष्ण का मधुर सान्निध्य आज भी हृदय को आह्लादित कर देता है।

भारतीय  संस्कृति में हम वनों को देवतुल्य माना गया है। वृक्षस्तुति करते हुए कहा गया है-

मूलतो ब्रम्हरूपाय, मध्यतो विष्णुरूपिणे।

अग्रत: शिवरूपाय,  वृक्षराजायते नम:॥

किसी समय कितना आदर, कितना सम्मान था वृक्षों का। ऋग्वेद में तो स्वयं ईश्वर ने वृक्षों, वन देवियों की पूजा अर्चना का विधान किया है। स्मृति और पुराणों में हमारा गौरवगान एवं महत्व बताया गया है। ऋषि, मुनि हम वनों को ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ उपहार मानते थे। वृक्ष काटने वालों को कठोर दंड का प्रावधान था। घर घर में तुलसी, नीम, पीपल, वट आदि अनेक वृक्षों की पूजा करने की संस्कृति प्रचलित थी। उस समय वन्य जीवों और मनुष्यों के बीच भी एक प्रेम का रिश्ता दिखाई देता था।

कितने गौरवमय दिन थे वे, जब चारों ओर हरीतिमा फैली हुई थी। स्थान-स्थान पर पर्वत शिखरों से झरने मधुर गीत गाते उतार आते थे। वनों में कल -कल छल -छल करती नदियां वृक्षों के चरण पखारती हुई बढ़ती जाती थीं, मानों वे हमसे आशीर्वाद लेने को आतुर रहती थीं। हम भी सदा से उनके तटों को मजबूती प्रदान करते। आदि काल से ही हम वनों का वन्य जीवों से अटूट रिश्ता रहा है। वन्य जीव हम वनों का आश्रय लेकर निर्भय होकर आहार, विहार किया करते थे। सिंह, चीता, हाथियों के झुंड, हिरण, बारहसिंगा, जंगली भेंसे, चीतल, खरगोश आदि का नयनाभिराम सौंदर्य देख कर हम मंत्रमुग्ध हो जाते थे। जब सिंह अपनी मंथर गति से नदी के तट पर पानी पीने निकल कर आता तो सारे पशु पक्षी पल भर में लुप्त हो जाते।

हम वन तो प्रकृति को हरी चूनर उढ़ा कर सदैव से प्राकृतिक सुषमा में चार चांद लगाते आए हैं। हमारे वन्य सौंदर्य को निरख कर सभी आनंदित हो जाते हैं। जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के समय गोदावरी के तट पर पांच वट-वृक्षों से युक्त पंचवटी पहुंचे थे, तब वे वहां के फल-फूलों भरे वन्य सौंदर्य को देख कर मुग्ध हो गए थे। वन्य पशुओं, पक्षियों की आवाज, उनका मनोरम दर्शन, उन्हें कितना लुभाता था। माता सीता के तो वे सब वन्य जीव साथी ही बन गए थे। आज भी हम वनों के हृदय में भगवान श्री राम, सीता और लक्ष्मण का वन सम्पदा और पशु पक्षियों के प्रति अतुलित प्रेम सजीव हो उठता है। उनकी मधुर यादें हमारे हृदय में सदा से बसी हुई हैं। राक्षसों का संहार कर उन्होंने हम वनों का भी उद्धार कर दिया था।

ऋषि मुनि भी वनों में ही आश्रम बना कर तपस्या किया करते थे। वन्य जीव- पशु,पक्षी- उनके आश्रमों में घूमा करते थे। मनुष्यों, वन्य जीवों के बीच अद्भुत प्रेम के दर्शन होते थे। शकुंतला पुत्र भरत तो सिंह शावक के साथ निडर हो कर खेला करते थे। उस समय पृथ्वी पर हम वनों का दूर दूर तक विस्तार था। मानव स्वयं वनों में घुमक्कड़ जीवन जीता था। वह हम से ही भोजन, आवास एवं वस्त्र की आवश्यकता की पूर्ति करता था और वन्य प्राणियों के साथ मेल मिलाप से रहता था।

साहित्यकार, चित्रकार, शिल्पकार, संगीतकार सभी हम वनों के अतुलित वन्य वैभव, वन्य जीवों आदि के निरूपम सौंदर्य को देख कर आकर्षित होते रहे हैं और अपनी कला में फल, फूल, आम्र मंजरी, पलाश, अशोक, नीम ,पीपल, वट, आदि तथा सिंह, चीता, हिरण, हाथी, मोर, चिड़िया आदि को किसी न किसी रूप में चित्रित करते रहे हैं।

प्राचीन काल से हम वन हर पल नवल उल्लास के साथ जन जन के उपकार में संलग्न रह कर गौरव की अनुभूति करते रहे हैं। अनगिनत वन्य पशु-पक्षी हमारी गोद में खेलते- खाते  बड़े हुए हैं। वन्य पशुओं के आहार, विहार और उनकी क्रीड़ाओ से हमें अतुलित आनंद की प्राप्ति होती रही है। चिड़ियों का मधुर कुंजन सुन कर तो हमारे कान तृप्त से हो जाते हैं। पक्षियों को अपने कोटर और डालियों में घोंसलों के लिए स्थान देकर, उन्हें फल-फूल आदि देकर जितनी प्रसन्नता हमें होती है, उसका वर्णन करने लिए हमारे पास शब्द कम पड़ जाते हैं। चिड़ियों का चहकना, उनका अपने बच्चों को दाना खिलाना अपने आप में एक उत्सव सा लगता है हमें।

हम स्वयं कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण कर ऑक्सीज़न देकर वायु को शुद्ध कर अतुलित सुख का अनुभव करते आए हैं। प्राणी मात्र को प्राणवायु प्रदान कर उन्हें जीवित देख कर हमें अलौकिक आनंद की प्राप्ति होती है। हमारे पीपल के वृक्ष तो सर्वाधिक प्राणवायु प्रदान करते हैं, तभी तो गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है-

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्

हम वन ही तो सदा से प्राकृतिक ऊर्जा के मुख्य स्रोत रहे हैं। हमारी जड़ें, लकड़ी, फल, फूल, औषधि, छाल, पत्ते सभी तो परहित में समर्पित हैं। केवल पशु पक्षियों को ही नहीं अपितु मानव को भी भोजन, आवास, वस्त्र, लकड़ी, औषधि और न जाने कितनी वस्तुएं देकर हम तृप्त होते आए हैं।

हमारी जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधियां जीवों को जीवन दान देती रही हैं। वह दिन याद आता है, जब भक्त हनुमान लक्ष्मण जी के जीवन की रक्षा हेतु संजवनी बूटी को पर्वत के साथ ही ले आए थे।

प्रकृति में संतुलन रखना, वर्षा लाना, भूस्खलन को रोकना आदि कार्य हम ही तो करते आए हैं। पर्यावरण को शुद्ध रख कर हमने वन्य प्राणियों एवं समस्त जीवों की सदैव ही रक्षा की है।

आदि कल से अब तक हम वन अनवरत रूप से प्राणी मात्र की सेवा में तत्पर हैं, परंतु कैसी विडम्बना है, जीवों में श्रेष्ठ मानव स्वार्थ के वशीभूत होकर, हमारे उपकारों को अनदेखा कर हम पर ही आरी चलाता जा रहा है। जैसे जैसे जनसंख्या में वृद्धि के साथ मनुष्य की आवश्यकताएं, औद्योगीकरण, शहरीकरण बढ़ता जा रहा है, वह देश की अमूल्य वन संपदा को नष्ट कर पर्यावरण को प्रदूषित करता जा  रहा है। स्वार्थी मानव वन्य जीवों की खाल, हाथी दांत, मांस, मृग छाल, चमड़े आदि के लिए निष्ठुर हो कर वन्य जीवों का शिकार कर रहा है। 

मनुष्य के विकास की लीला हमारे संहार के पृष्ठ पर लिखी जा रही है। मानव अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए हमारे आधार पर्वतों को काट कर सड़कें, आवास, पुल आदि बनाता जा रहा है। मनुष्य के द्वारा किए गए अतिक्रमण और अत्याचार से हमारे कष्ट दिन प्रति दिन बढ़ते जा रहे हैं और हमारी संख्या दिन प्रति दिन कम होती जा रही है। हमारी घटती संख्या के कारण वन्य जीवों को रहने, खाने की मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं। कई बार तो भागते भागते वे किसी गांव में भी पहुंच जाते हैं।

मनुष्य ने नदियों के जल को भी प्रदूषित कर दिया है, इससे हम सभी शुद्ध जल के लिए तरसने लगे हैं।

मनुष्य हम वनों की कटाई के लिए न तो समय देखता है, न ऋतु, न काल। गर्मी, सर्दी, वर्षा हो या बसंत, उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब बसंत ऋतु में पलाश के रंग से रंगा, महुए की मदमाती खुशबू से महकता, आम्र मंजरियों से सुशोभित, मोहक, मदमस्त वातावरण होता है, जब नव कोंपलें, नव कलियों का अनुपम सौंदर्य अपने पूर्ण विकास पर होता है, जब वृक्ष अपनी मधुर, मदिर लताओं के साथ आनंदमग्न  होते हैं, और वन्य जीव भी काम क्रीड़ाओं में मगन होते हैं, तब उस मधुरिम काल में भी मनुष्य वृक्ष काटने की मशीनें लेकर जंगल में बेधड़क घुस आते हैं। उस समय क्या हम, क्या वन्य जीव सब अपने अलौकिक आनंद को भूल कर भय से प्रकंपित हो उठते हैं। मनुष्य राक्षस का रूप धरण कर जब हम पर मशीन चलते हैं, तब हम लहूलुहान हो कर धराशायी हो जाते हैं। क्षण भर में पल्लवित, कुसुमित नव वल्लरियां आहत हो कर मुरझा जाती हैं। चारों ओर हाहाकार मच उठता है। वृक्षों में बने नीड़ टूट जाते हैं। चिड़ियों का रुदन, पशुपक्षियों का डर कर भागना हृदय को द्रवित कर देता है, पर स्वार्थी मानव संवेदन शून्य सा सब कुछ देखता रहता है। उस पर हमारी पीड़ा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

वह तो वृक्ष काट कर अपनी जीत का जश्न मनाता है। कुछ संवेदनशील मनुष्य हम वृक्षों की कटाई का विरोध भी करते थे। उन्होंने चिपको आंदोलन भी चलाया था। जब कोई हम पर कुल्हाड़ी चलता था, तब वे हमसे चिपक जाते थे। हम उनके आज भी ऋणी हैं, परंतु आज ऐसे लोगों का अभाव होता जा रहा है।

स्वार्थ के अंधे मनुष्य को हमारी और वन्य पशु-पक्षियों की पीड़ा का कोई भान नहीं होता। पशु ,पक्षियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। वनराज सिंह दिन-प्रति-दिन कम होते जा रहे हैं। जंगली जानवरों एवं पक्षियों की कई प्रजातियां तो लुप्तप्राय होती जा रही हैं। आज गौरैया के तो दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं। पुराने दिनों की याद करके हमारा हृदय रो उठता है। एक अजीब सी टीस पैदा होती है हृदय में। अपने आंगन में खेलते वन्य जीवों की यादें आज भी हमारे मन को गुदगुदाती हैं। पक्षियों के कलरव गान को सुनने को कान तरस जाते हैं। मयूर का नृत्य भी अब कितना कम देखने को मिलता है।

मनुष्य की इस असंवेदनशीलता एवं स्वार्थपरता के कारण धीरे- धीरे धरती की हरीतिमा समाप्त होती जा रही है। हमारा स्थान गगनचुम्बी अट्टालिकाएं छीनती जा रही हैं। कंक्रीट के जंगल जगह जगह उग आए हैं। वे हमसे हमारे हिस्से की धूप भी छीन लेना चाहते हैं। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए जिस बेरहमी से वृक्षों की कटाई कर रहा है, उससे तो लगता है कि एक दिन हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

भले ही मानव अपनी मानवता भूलता जा रहा है, पर हम तो मानवता के महाकाव्य के सृजन में ही लगे हुए हैं। यह सर्व विदित है कि हम वनों की रचना स्वयं ईश्वर ने परोपकार के लिए ही की है। कबीर दास जी की इन पंक्तियों को हम हमेशा से चरितार्थ करते आ रहे हैं-

वृक्ष कबहुँ न फल भखें, नदी न संचे नीर।

परमारथ के कारने, साधुन धरा सरीर।

आज भी जब हम मनुष्य के द्वारा की गई विनाशलीला को देखते हैं, तो हमें अपने दुखों से ज्यादा प्राणियों के दुखों की ही चिंता सताती है। हमें बहुत दुख होता है कि सभ्यता के विकास की दौड़ में स्वार्थ से अंधा हुआ मानव वनों का एवं वन्य जीवों का विनाश कर अपने भविष्य को अंधकारपूर्ण बनाता जा रहा है। यदि इसी तरह मनुष्य वनों को काटता जाएगा तो उसका सांस लेना भी दूभर हो जाएगा। वह शुद्ध हवा के लिए तरस जाएगा। उसका जीवन ख़तरे में पड़ जाएगा। हमारे बिना कौन बचाएगा उसे?

प्राकृतिक आपदाएं उसकी विजय को पल भर में निगल जाएंगी। वर्षा के अभाव में वह जल के लिए तरसेगा, आपस में लड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग, ऋतुओं के परिवर्तन आदि अनेक कारण उसका जीवन दुखों से भर देंगे। कैसी विडम्बना है-

वन्य-संपदा मेटते, करते बड़ा अनर्थ।

प्राणों को ये डालते, संकट में हैं व्यर्थ।

हम वन तो लाख दुखों को झेल कर भी प्राणी मात्र और कण कण का हित ही चाहते हैं। इसलिए हम वन मनुष्य से करबद्ध प्रार्थना करते हैं कि वे हम वनों का उन्मूलन न करें। नए वृक्ष लगाएं। नयनाभिराम सौंदर्य प्रदान करने वाले वन्य जीवों कीरक्षा करें। वन्य जीव ही धरती की शोभा हैं। वन्य प्राणियों के बिना वन अधूरे से हो जाते हैं और जब जंगल काट दिये जाते हैं, तब बेघर हुए वन्य प्राणी भटकने लगते हैं। अतः वन्य जीवों एवं वनों की रक्षा करना परम आवश्यक है।

आज जब मानव वन महोत्सव मनाता है, पर्यावरण दिवस मनाता है और वन्य जीवों को सुरक्षित रखने के अभियान चलाता है, तो हमें आशा की एक धुंधली किरण दिखाई देती है। हमें ऐसी अनुभूति होती है कि मनुष्य संभवतः सजग हो रहा है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि वह दिखावा मात्र करके स्वयं को और हमें छल रहा है।

जीवन को सुंदर, सुखद, निरोगी बनाने के लिए हम मानव को पुनः पुनः यही संदेश देना चाहते हैं-

कि हम वन ही जीवन के आधार हैं, धरती के श्रृंगार हैं। हमारे रहने से ही वायु शुद्ध होती है, और शुद्ध वायु से ही जीवन संभव  है।

वनों से करो प्यार, वनों को अपनाओ।

वन्य संरक्षण की, जग में अलख जगाओ।

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