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भारत से विलुप्त हो चुका चीता हो या फिर विलुप्ति की कगार पर पहुंचे स्याहगोश और गोडावण हो, ये तीनों ही शुष्क और झाड़ी व घसियाले मैदानों वाले जंगलों में रहा करते थे। इनके जीवन पर आए संकट से इस तरह के जंगलों का किस कदर खात्मा हो रहा है, इसे समझा जा सकता है।

अगर मैं यह कहूं कि भारत का सबसे बड़ा पक्षी कौन है, तो आप लोगों में शायद कोई मोर का नाम लेगा और शायद कोई सारस क्रेन का नाम लेगा। कुछ लोग शायद गिद्ध का नाम भी लें। लेकिन, भारत का सबसे बड़ा पक्षी होने का खिताब ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण को प्राप्त है। हालांकि, अब शायद सिर्फ एक-दो साल का वक्त ही बचा है जब यह सच्चाई बदलने वाली है। अगर जल्दी ही कुछ जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो गोडावणों की अंतिम पीढ़ी बस अंतिम सांस लेने वाली है। इसके बाद हमारे देश के लोग सिर्फ तस्वीरों में गोडावण के दर्शन किया करेंगे।

यूं तो भारत में पक्षियों की तमाम प्रजातियां मौजूद हैं। लेकिन, उनमें भी गोडावण का रुतबा कुछ खास है। इसे भारत का शुतुरमुर्ग भी कहा जाता है। गोडावण का वजन आमतौर पर 15 से लेकर 18 किलो तक हो सकता है। भारी वजन के चलते यह पक्षी ज्यादा ऊंचाई वाली उड़ान नहीं भर पाता और जमीन पर घोसले बनाता है। एक समय में गोडावण भारत के एक बड़े भू-भाग पर पाए जाते थे। लेकिन, अब इनकी संख्या बहुत ही सीमित रह गई है। कुछ गोडावण गुजरात में तो कुछ राजस्थान में बचे हुए हैं। इनकी उपलब्धता और इनके रुबते के चलते राजस्थान ने इसे अपना राज्य पक्षी घोषित किया है। लेकिन, हालिया कुछ शोध बताते हैं कि अब राजस्थान में इनकी संख्या सिर्फ 24 रह गई है। जबकि, भारत में इनकी कुल आबादी अब डेढ़ सौ से भी कम बची है।

रेगिस्तान या शुष्क क्षेत्र में रहने वाला यह पक्षी बहुत सख्त जान और जीवट वाला होता है। लेकिन, इंसानों के आगे किसकी चली है भला! माना जाता है कि वर्ष 1969 में इनकी संख्या 1260 थी। जो 1978 में घट कर 745 रह गई। 2001 तक यह संख्या और घट कर 600 पर पहुंच गई। 2006 में इनकी संख्या 300 से कम थी और वर्ष 2018 इस पक्षी की संख्या डेढ़ सौ से भी कम रह गई। जिस गति से यह पक्षी मर रहा है, उससे अनुमान यही है कि यह साल-दो साल में भारत से विलुप्त हो जाएगा।

इंसानी आबादी के विस्तार ने हर जगह वन्य जीवों से उनका जंगल छीन लिया है। गोडावण की मौत के पीछे यह एक बड़ी वजह है। इसके अलावा, मांस खाने के लिए भी इसका जम कर शिकार किया जाता रहा है। जबकि, जमीन पर बनाए गए घोसले और पक्षी की प्रजनन आदतों के चलते भी इसकी संख्या सीमित होती गई। हाल के दिनों में हुए अध्ययन इसमें एक वजह के जुड़ने की तरफ भी संकेत देते हैं। वाइल्ड लाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया का हालिया शोध बताता है कि ओवर हेड पॉवर ट्रांसमीशन की लाइन भी इनकी मौत की एक बड़ी वजह बन चुकी है। यह पक्षी बहुत ऊंचाई पर नहीं उड़ता और बिजली के इन तारों की चपेट में आने से इनकी मौत हो रही है। वर्ष 2007 से 2017 के बीच इस तरह से दस गोडावणों की मौत हो चुकी है। इसके चलते ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या गोडावणों के इलाके से ओवर हेड ट्रांसमीशन लाइनों को जमीन के नीचे से बिछाने की मांग की जा रही है। हालांकि, फिलहाल इस पर काम शुरू नहीं हुआ है और पता नहीं जब तक इस पर निर्णय लिया जाएगा, तब तक गोडावण बचेंगे भी या नहीं।        भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां पर एशिया में पाई जाने वाली सभी छह बड़ी बिल्लियां पाई जाती रही हैं। जबकि, भारत एकमात्र ऐसा देश है जहां पर शेर और बाघ दोनों पाए जाते हैं। ऐसा किसी अन्य देश में नहीं है।

दुनिया में कुल मिला कर आठ बड़ी बिल्लियां पाई जाती हैं। इनमें से छह बड़ी बिल्लियां एशिया में और दो बड़ी बिल्लियां अमेरिकी महाद्वीप में पाई जाती हैं। एशिया में शेर, बाघ, तेंदुआ, चीता, क्लाउडेड या बादली तेंदुआ और स्नो या हिम तेंदुआ पाया जाता है। जबकि, अमेरिकी महाद्वीप में जगुआर और प्यूमा या माउंटेन लायन पाए जाते हैं। एशिया में पाई जाने वाली सभी छहों बड़ी बिल्लियां पहले भारत में पाई जाती थीं। लेकिन, आजादी के साथ ही इनमें से एक को हमने खो दिया। जी हां, सूखी जमीन पर सब से तेज दौड़ने का रुतबा जिस जानवर को हासिल है, उसे हमने अपने जंगलों से खो दिया।

एक समय भारत के बड़े भू-भाग पर चीता पाया जाता था। लेकिन, आजादी के तुरंत बाद हमने उसे खो दिया। माना जाता है कि भारत के अंतिम तीन चीते 1947 या 1948 में एक राजा ने मार डाले थे। उसके बाद से भारत में चीते नहीं दिखे हैं। चीता भारत से विलुप्त हो गया। भारत में पाए जाने वाली एशियाई चीतों की यह प्रजाति अब सिर्फ ईरान में बची है और वहां भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। माना जाता है कि ईरान में भी इनकी संख्या 50 से भी कम रह गई है।

चीता भी उसी शुष्क और घसियाले जंगलों में रहता था, जिसमें ग्रेट इंडियन बस्टर्ड रहता है। इस तरह के जंगल का एक और बाशिंदा है जिसका जीवन बुरी तरह से संकट में पड़ा हुआ है। काराकल या स्याहगोश मध्यम आकार वाली एक बिल्ली होती है। पक्षियों के शिकार में माहिर काराकल का बेहद चुस्त और फुर्तीले जीवों में शुमार किया जाता है। कान पर निकले हुए कनमुच्छों के चलते इन्हें अन्य बिल्लियों की तुलना में अलग से पहचाना जा सकता है। माना जाता है कि इनकी संख्या भी अब भारत में डेढ़ सौ से नीचे रह गई है। यानी अब सिर्फ यह वक्त की बात है कि इन स्याहगोश कब हमारे देश से विलुप्त होता है।

भारत में चीता और स्याहगोश को पालने की एक पुरानी परंपरा रही है। नवाब और राजा-महाराजा प्रशिक्षित चीतों के जरिए शिकार किया जा करते थे। आज से सौ-डेढ़ सौ साल पहले शिकार ही राजा-महाराजाओं के मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करता था। उस समय की पेंटिग आदि में भी इसकी बहुत झलक मिलती है। इसमें राजा को हाथी या रथ पर शिकार करते हुए जाते हुए दिखाया जाता है। साथ में उसके बहुत सारे हरकारे होते हैं जो शिकार को घेरने के लिए हांका लगाते थे और हिरन को दौड़ कर दबोचने के लिए प्रशिक्षित चीते हुआ करते थे। अभी मौजूद तमाम जंगलों में राजा-महाराजाओं द्वारा बनवाई गई शिकारगाहों के चिह्न अभी भी दिख जाते हैं। चाहे सरिस्का हो या रणथंबौर। राजा-महाराजा यहां पर शिकार के लिए आते थे और उन्होंने अपने शिकार के लिए ऐसी जगहें बनवाई हुई थीं। दिल्ली में भी कुछ एक जगहों पर शिकार के लिए ऐसे मंच मौजूद हैं। खैर, पुराने जमाने में चीते को शिकार करने के लिए प्रयोग किया जाता था। लेकिन, अंग्रजों के आने के बाद इस स्थिति में खासा बदलाव भी आया। अंग्रेजों ने शेर और बाघ के साथ-साथ चीतों का शिकार भी शुरू किया। उनके पास बंदूकें मौजूद थीं। जिसके चलते ज्यादा संख्या में जानवर मारे जाने लगे। इसके साथ-साथ जंगलों को भी इंसान ने जानवरों से तेजी के साथ छीनना शुरू कर दिया। जंगल काट कर तमाम जगहों पर खेती की शुरूआत की गई।

कुछ लोग ऐसा भी कह सकते हैं कि कोई प्रजाति खत्म हो जाए, उससे भला फर्क क्या पड़ता है। शेर, बाघ और तेंदुए जैसे जीव जिनसे इंसानों को खतरा हो सकता है, अगर खत्म हो जाएं तो नुकसान क्या है। लेकिन, ऐसे लोगों को प्रकृति की पूरी बनावट को ध्यान से देखना चाहिए। हमारी पूरी पृथ्वी का एक ईकोसिस्टम (पारिस्थितिक तंत्र) है। इस ईकोसिस्टम में हर जीव एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। इससे कुल मिला कर एक खाद्य श्रृंखला बनती है। खाद्य श्रृंखला में सब से ऊपर मौजूद बाघ-शेर जैसे जीव इस खाद्य श्रृंखला और जीवों की तादाद को नियंत्रित करते हैं। उनकी गैर मौजूदगी में पूरा जंगल एक ऐसे असंतुलन के भंवर में फंस सकता है, जिससे निकलना किसी के बस की बात नहीं होगी। इसे गिद्धों के उदाहरण से समझा जा सकता है।

गिद्धों को कुदरत ने साफ-सफाई का काम सौंपा हुआ है। कहीं भी कोई जानवर मरता है तो ऊपर आसमान से टकटकी लगाए गिद्ध उसे देख लेते हैं और फिर उसकी लाश को खाकर साफ-सफाई कर देते हैं। गिद्धों के नहीं होने पर मृत जानवर का शव वहीं पड़ा सड़ता रहेगा, जिसके कई पश्चपरिणाम होंगे। लगभग बीस सालों पहले अचानक से गिद्धों की संख्या में बड़ी तेजी से गिरावट आनी शुरू हुई। माना जाता है कि कुछ ही सालों के भीतर गिद्धों की आबादी का 95 फीसदी तक हिस्सा समाप्त हो चुका था। जांच पड़ताल के बाद पता चला कि जानवरों को दी जाने वाली एक खास दवा के चलते गिद्धों की किडनी फेल हो रही है और वे मर रहे हैं। दरअसल, लोग अपने पालतू पशुओं को बीमार होने पर यह दवा खिलाते हैं, बाद में अगर उस पशु की मौत हो गई और उस मृत पशु का मांस गिद्ध ने खा लिया तो गिद्ध की किडनी फेल हो जाती है। बाद में पशुओं के इस्तेमाल के लिए इस दवा पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन, जब तक ऐसा किया जाता तब तक गिद्धों की आबादी का ज्यादातर हिस्सा साफ हो चुका था। अब प्रकृति के सफाई कर्मी मौजूद नहीं थे या फिर उनकी बहुत ही कम तादाद बच रही है। ऐसे में साफ-सफाई का काम कौन करें?

जी हां, गांवों और शहरों के किनारे ऐसे पशुओं के शरीर सड़ते हुए दिख जाते हैं। जिनसे तमाम किस्म के जहरीले प्रदूषण पैदा हो रहे हैं। जबकि, कई जगहों पर आवारा कुत्ते या फिर सियार जैसे जानवर मृत पशुओं को खा रहे हैं। लेकिन, सड़ते हुए मांस को पचाने की गिद्ध जैसी क्षमता इनमें नहीं होती है। इसके चलते वे रेबीज व अन्य बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। जिसके बाद वे इंसानों पर भी हमला कर देते हैं। इंसानों को भी इस प्राकृतिक असंतुलन का खामियाजा भुगतना पड़ता है। हर साल सरकारों को इस पर करोड़ों का बजट खर्च करना पड़ता था। जिस काम को गिद्ध बिना फीस लिए किया करते थे, उसी काम के लिए अब करोड़ों रुपये का बोझ अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ता है।

इसलिए, संदेश साफ है, हम तभी बचेंगे, जब कुदरत बचेगी।

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