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मानव के विकास की भूख की बहुत बड़ी कीमत आसपास के प्राणियों को चुकानी पड़ती है। पिछले 45 वर्षों में कोई साठ फीसदी भूतल प्राणी नष्ट हुए हैं। प्राणी और मानव के बीच उत्पन्न यह संघर्ष यहीं नहीं थमा, और पर्यावरण की बेहिसाब लूटखसोट होती रही तो निश्चित मानिए कि एक दिन पूरी वसुंधरा संकटापन्न हो जाएगी, और हम हाथ मलते रह जाएंगे।

मेरा गांव सुरम्य है। प्रकृति ने वहां दिल खोलकर दौलत लुटाई है। इसलिए गांव में प्रकृति के सामीप्य में रहने का आनंद ही अद्भुत होता है। वन सम्पदा प्रचुर मात्रा में है। इसलिए वन्य जीव भी बहुत है। जंगल में गौर (इळीेप-जंगली भैसा), हिरण, बाघ, लकड़बग्घा, लोमड़ी, तेंदुआ हैं तथा उनकी मौजूदगी भी महसूस होती है। प्रकृति के इस सान्निध्य में भिन्न-भिन्न प्रकार के, भिन्न-भिन्न रंगों के और अनूठे ढंग से अपनी हाजिरी देने वाले सैंकड़ों पंछी कुछ साल पूर्व मुझे दिखाई देते थे। उन पंछियों की तरह-तरह की आवाजें सुनने, उनके आकाश में उड़ान भरने के तरीकों को देखने में ही प्रकृति का वास्तविक आनंद मिलता था।

पूरे ठाठ के साथ हवा में तैरते हुए सहज ही कीटकों कों मुंह में उठा लेने वाला लालसिर पतरिगा देखते ही बनता था।  कोई पगला जिस तरह भटकते रहता है उसी तरह यह पतरिगा भी सदा इधर-उधर मंड़राते रहता था। छरहरे बदन, तोते जैसा हरा रंग, उस पर धूसर रंग के कुछ पंख और पूंछ की तरफ एंटेना की तरह खड़ा इकलौता पंख उसकी शान थी। इस अनूठेपन के कारण यह खग सदा ध्यान आकर्षित कर लेता था। कभी-कभी इस पगले का एंटेना याने पिछला पर ही गायब दीखता था। गांव वाले बताते थे कि जिस तरह सांप केंचुल छोड़ देता है, उसी तरह ये पंछी भी पुराने पर झटक कर नए धारण कर लेते हैं। पुराना पर छोड़ने और नया आने में कुछ समय लगता है। इसी कारण वह छूछा भी दिखाई दे सकता है। गांव वालों से विभिन्न पक्षियों एवं प्राणियों की जीवन-शैलियों का पता चलता है। जंगल के असंख्य वृक्षों के बारे में भी इस तरह का ज्ञान उन्हें होता है।

इस सारे माहौल का आनंद लेकर शहर में आता हूं और जंगल, पंछी और प्राणियों की दुरावस्था के बारे में जानकारों के लेख पढ़ता हूं, कुछेक के विचार सुनता हूं तब मनुष्य के ये दो रूप देख कर ताज्जुब होता है। जंगल, पंछियों, प्राणियों के बारे में सहअस्तित्व की अनुभूति रखने वाला आदमी किसी गांव में ही क्यों होता है? शहरी माहौल में इसका अनुभव क्यों नहीं होता? अवनी नामक बाघिन को नरभक्षी करार देकर गोली मार दी गई। इस घटना की खबर पढ़ने पर मन में प्रश्न उठा कि वाकई दोष किसका है- भोजन की खोज में बस्तियों की तरफ आने वाली बाघिन का या अपने मौजूदगी की सीमा प्राणियों के निवास की सीमा तक फैलाने वाले आदमी का? कहीं, फसल बरबादी के नाम पर दो सौ से अधिक गौरों की विशेष शिकारी तैनात कर हत्या कर दी जाती है, तो कहीं चंद्रपुर जिले में बाघ और तेंदुए के हमले में नौ लोगों की मौत होने पर गांव की सीमा पर दिखे तेंदुए के बच्चों को क्रुद्ध लोग पाइप में बंद कर जला डालते हैं। ट्रेन की टक्कर से हाथियों और बाघों के मरने की खबरें तो रोजमर्रे की हो गई हैं। ये घटनाएं भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न-भिन्न कारणों से हुई हैं, लेकिन इससे मनुष्य और वन्य जीवों के बीच टकराव साफ तौर पर झलकता है। बिहार में गौरों, बंगाल में हाथियों, हिमाचल प्रदेश में बंदरों, उत्तराखंड में जंगली सूअरों और गोवा में मोरों को मारने की बीच में पर्यावरण मंत्रालय ने अनुमति दी थी। वन्य जीवों को उपद्रवी करार देकर उन्हें मार डालना पर्यावरण और मानव जाति को बहुत बड़ी हानि पहुंचाएगा। वन्य जीव शहरी इलाकों में घुसपैठ करते हैं, मनुष्य की जान को खतरा पैदा होता है इसलिए कुछ जगहों पर आदमी इन जीवों को जान से मार डालता है। यह अत्यंत भीषण और चिंता की बात है।

विश्व वन्य-जीव कोष की ओर से हाल में ‘लिविंग प्लैनेट’ रिपोर्ट पेश की गई। इस रिपोर्ट में मानव के विकास की कितनी बड़ी कीमत आसपास के प्राणियों को चुकानी पड़ती है इसका खुलासा किया गया है। पिछले 45 वर्षों में कोई साठ फीसदी भूतल प्राणी नष्ट हुए हैं। इसमें पक्षी, मछलियां, चौपाये, रेंगने वाले प्राणी आदि सभी घटकों को समावेश है। इन सभी प्राणियों के विनाश के लिए मानव और उसके विकास की अति-भूख जिम्मेदार है। इसीलिए इतनी अल्पावधि में ही केवल प्राणी ही नहीं, बल्कि जंगल भी नष्ट करने का चमत्कार आदमी कर रहा है। जिस गति और जिस भीषणता से पर्यावरण को तबाह करने का काम चल रहा है, वह मानव जाति के भविष्य के लिए चिंता की बात है। प्राणियों, पक्षियों, विभिन्न प्रकार के जंतुओं, विविध जैविक प्रजातियों के बीच की जंगल एक महत्वपूर्ण कड़ी है। ये जंगल ही विकास की मनुष्य की अति-भूख की चपेट में आ गए हैं। विकास के नाम पर हजारों हेक्टेयर जंगल नष्ट किए जाते हैं। रेलवे और सड़कों का विस्तार वन सम्पदा पर कुल्हाड़ी चला कर ही होता है। प्राणी भौगोलिक सीमा, विकास या प्रगति की बातें नहीं जानते। जंगल ही उनका जीवन है। और, आदमी ने उसी पर धावा बोल दिया है। इससे वनचरों के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले उनके संचार मार्ग तेजी से खत्म हो रहे हैं। रेल पटरियों या सड़कों को पार करते समय वन्य जीवों का मरना रोजमर्रे की बात हो गई है। जंगलों पर अतिक्रमण कर वहां के निवासी जानवरों को वहां से खदेड़ देते हैं। कभी मानवीयता पर भरोसा कर मानव के आसपास रहने वाले प्राणियों के लिए जीना अब बेभरोसे का हो गया है। आवारा कुत्तों के उपद्रवों के कारण आदमी कुत्तों से आजीज आ चुका है। बीच में, पुणे में भीड़ ने चार कुत्तों को जिंदा जला दिया और 16 कुत्तों को खाने में जहर मिलाकर मार डाला। यह घटना सब को बेचैन करने वाली है। घर की बिल्ली जब बच्चे पैदा करती है तो बिल्ली के उन मासूम बच्चों को रास्ते पर लाकर बेपरवाही और बेरहमी से छोडा जाता है। अधिकतर बच्चे गाडियों के नीचे कुचलकर मर जाते हैं। इसी तरह यह घटना मनुष्य के रूप में हमारे बीच की संवेदना खत्म होने का संकेत देने वाली है। इससे मनुष्य की यह सोच इंगित होती है कि इस धरती पर आदमी के अलावा अन्य किसी को जीने का हक ही नहीं है। कुत्तों के उपद्रवों के कारण कुत्तों के प्रति तिरस्कार भले ही बढ़ रहा हो, लेकिन इन प्राणियों को जीने का हक ही नकार देने का अधिकार मनुष्य अपने पास क्यों लें? यह पहेली अब दिन-ब-दिन अधिक मुश्किल होती जा रही है। कानून ने प्राणियों को जीने का आदमी जैसा ही हक दिया है। फिर भी, मानव इस अमानवीय दृष्टिकोण तक पहुंच गया है कि अन्य प्राणियों को जीने का अधिकार ही नहीं है। इससे मानव मानवीयता को अपने पैरों तले रौंद रहा है। मनुष्य प्रकृति के नियमों को बेशर्मी से ठुकरा रहा है और जीवों में अपने श्रेष्ठत्व का बेजा फायदा उठा रहा है। लेकिन प्राणी-जीवन में प्रकृति के नियमों का पालन किया जाता है। मनुष्य नामक दोपाये प्राणी की अपेक्षा चौपाये प्राणी, पक्षी अथवा पेड़-पौधें तक अधिक सुसंस्कृत लगते हैं।

व्यक्ति प्राणियों से कैसा बर्ताव करें, वन सम्पदा का किस तरह जतन करें इसके लिए कठोर कानून बनाने का अब समय आ गया है। वर्तमान कानूनों ने प्राणियों को अधिकार प्रदान किए हैं, प्राणियों एवं वन सम्पदा के बारे में व्यक्ति के कर्तव्यों की रूपरेखा भी निश्चित की है। फिर भी, आदमी कानून से बचने के रास्ते खोजता रहा है। लिहाजा, जंगल, प्राणी, पक्षी, जैविक सम्पदा को बचाने की हांक भर होती है, कोई इसे ओर गंभीरता से नहीं लेता।

मानव और प्राणियों में संघर्ष की तीव्रता कम करनी हो और पर्यावरण की लड़ी का जतन करना हो तो सब से पहले विकास की संकल्पना तय करते समय ही वन्य जीवों व जंगलों की रक्षा का गंभीरता से विचार करना होगा। वन्य जीवों की हत्याएं और उन पर होने वाले हमले अप्राकृतिक हैं, परंतु उसके पीछे के कारण प्राकृतिक ही हैं। मानव व वन्य जीव दोनों के लिए यह जीने का संघर्ष है। इसमें दोनों में एक-दूसरे पर विजय की भावना बिलकुल नहीं है। अपनी भारतीय परम्परा में वन सम्पदा, वन्य जीव तथा मानव के सह-अस्तित्व पर बल दिया जाता था। वर्तमान में विकास किस तरह का न हो इस पर सोचने और विकास को समावेशी बनाने पर बल देने की जरूरत है। इस वसुंधरा पर कीटकों-चींटियों, पशु-पक्षियों की अपेक्षा मनुष्य को सतर्क बुद्धि, दो हाथ, दो पैर, और कुछ अन्य विशेषताएं मिली हैं। इन थोड़ी सी विशेषताओं के कारण मनुष्य प्राकृतिक शृंखला में अपने को श्रेष्ठ मानने लगा है। मनुष्य का यह मानना कितना अधकचरा है इसकी अनुभूति भूकंप, जलप्रलय, सुनामी, भारी वर्ष जैसी बातों से प्रकृति ने उसे थपेड़े लगाकर समय-समय पर करा दी है। फिर भी, आदमी है कि सयाना नहीं हो रहा है। यह मनुष्य के रूप में हमें प्राप्त विशेषताओं पर कालिख पोतने जैसा है। भूमि की, वनों की, वन्य जीवों की, जलचरों की, पक्षियों की किसी की भी हमें फिक्र नहीं रही है। हमें केवल विकास चाहिए। हमारा विकास हो रहा है, फिर प्रदूषण की क्या चिंता, यह उसकी भूमिका बन गई है। प्राणी-पंछी भले मरे इसकी क्यों चिंता करनी है, इस तरह की हेकड़ी में मनुष्य चल रहा है। हमारी करतूतों से वसुंधरा को बरबाद करने की दिशा में हम जा रहे हैं, यह पूरी तरह जानने-समझने वाली यह पहली पीढ़ी है। लेकिन, हम ऐसी अंतिम पीढ़ी भी हैं, जो प्रकृति का विनाश रोकने के लिए कुछ कर सकती है।

यह केवल कुछ फीसदी सजीवों अथवा विविध जीवों का प्रश्न नहीं है। यह मानवी भविष्य का प्रश्न है। बचे-खुचे जंगलों के विनाश और वन्य जीवों की हत्याओं से जैविक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। गौर, मोर, सूअर, बंदर जैसे जो जीव उपद्रवी करार दिए गए हैं, वे बाघ जैसे मांसभक्षी प्राणियों के भक्ष्य हैं। एक ओर वन्य जीवों और कुल मिलाकर प्रकृति संवर्धन की योजना चलाते समय हम दूसरी ओर ऐसे निर्णय कर जैव विविधता की शृंखला ही खतरे में डाल रहे हैं। यही नहीं, इससे पिछले कुछ वर्षों में वनों और प्राणियों के संवर्धन के लिए हमारी कोशिशों पर भी पानी फिर रहा है, जिसे हमें ध्यान में रखना चाहिए। इन प्राणियों को उपद्रवी करार देते समय मनुष्य पर्यावरण के विरोध में कई गुना अपना स्वयं का उपद्रव मूल्य ध्यान में नहीं लेता, यह इस समस्या की असली जड़ है।

विश्व वन्यजीव कोष की रिपोर्ट मानवी समूहों की विफलता और उनमें अनुभूतियों के अभाव पर उंगली उठाती है। मानवी समूह याने उद्योग, समाज, समुदाय, देश, राष्ट्र-समूह या राष्ट्र संगठन। केवल विकास के चश्मे से अपने स्वार्थ की ओर देखने वाली वर्तमान पीढ़ी की आंखों में अंजन डालने वाले आंकड़ें वन्यजीव कोष ने प्रस्तुत किए हैं। इस आसन्न संकट की ओर आंखें मूंद लेना भविष्य में बड़े संकट को निमंत्रण देने जैसा है। अब मनुष्य और वन्यजीव दोनों के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी हुई है। विशेष रूप से अगले कुछ वर्षों में ही इस बारे में विदारक चित्र हमारे सामने उपस्थित होने वाला है। इससे इस सृष्टि के मनुष्य और प्राणी इन दो जीवों के बीच संघर्ष विश्व में एक बड़ी प्राकृतिक आपदा का संकेत दे रहा है। समय पर ही सचेत नहीं हुए तो यह निश्चित जानिए कि आने वाले समय में उत्पन्न होने वाली परिस्थिति पर किसी का भी नियंत्रण नहीं रह पाएगा।

मुझे गांव जाने पर दिखाई देने वाले विभिन्न पक्षियों के समूह अब बहुत कम परिलक्षित होते हैं। पंछियों के नाम जाने भी दें … परंतु अपने आंगन में आने वाली गोरैया भी क्या अब हमें दिखाई देती है? कल ये सभी नष्ट हो गए तो हम अपने बच्चों को गोरैया-कौवे की, बाघ की, हिरण की कथाएं क्योंकर सुनाएंगे? जिस मेरे गांव में वन सम्पदा, प्राणियों के संदर्भ में सविस्तार जानकारी रखने वाले लोग हैं, उसी गांव में जंगली सूअरों को पकड़ने के लिए लगाए गए फंदों में एक बाघिन फंस जाती है। मध्यरात्रि में कभी फंदे में फंसी यह बाघिन मुक्त होने की छटपटाहट में सुबह तक मर जाती है। उसकी दहाड़ से पूरा गांव जग जाता है। लेकिन, कोई भी उसकी सहायता नहीं करता। यह उन्हीं लोगों और गांव का दृश्य है, जिस गांव में प्राणियों के बारे में ज्ञान है, किंतु संवेदना नहीं है। प्राणियों के बर्ताव और आदतों का ज्ञान रखने वाले अनेक विशेषज्ञ हैं, लेकिन मनुष्य के बर्ताव का निश्चित अंदाजा कोई नहीं लगा पाता, यही सच है।

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