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नामदेव महाराष्ट्र के पहले ऐसे संत हैं जिन्होंने विट्ठल नाम भक्ति का परचम महाराष्ट्र से बाहर भी फहराया। गुजरात, राजस्थान होते हुए पंजाब तक पहुंच कर संत नामदेव ने जो भी कार्य किया उसे महान राष्ट्रीय कार्य ही कहा जा सकता है। सिक्खों के धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहब में संत नामदेव द्वारा लिखित ६३ अभंगों (भजनों) का समावेश है। ये बात मराठी जनमानस के लिए तो गौरव की बात है ही, संपूर्ण भारत के लिए भी ये कम गौरव का विषय नहीं है।

 

संत नामदेव लगभग २०-२२ वर्ष तक पंजाब में रहे और भक्ति मार्ग का प्रचार-प्रसार किया। वहां विष्णुस्वामी, बहोरदास, जल्लो, लब्धा, केसों जैसे अनेक शिष्यों ने उनसे दीक्षा ली। यही उनकी सफल क्रियाकलापों का साक्ष्य है। बहोरदास द्वारा घुमान में बनाया गया संत नामदेव का मंदिर-गुरुद्वारा, आज भी संत नामदेव के राष्ट्र-कार्य की ध्वजा गर्व से फहरा रहा है। महाराष्ट्र के एक सपूत का, भगवान् पंढरीनाथ के अनन्य भक्त का यह पराक्रम शब्दातीत है। तलवार के बल पर धर्म-परिवर्तन और श्रद्धा-परिवर्तन के कई उदाहरण हम दुनियाभर में देखते हैं। किन्तु, प्रेम, परस्पर विश्वास और सद्भाव से सारा व्यवहार करने वाले संत नामदेव दुनिया में अद्वितीय हैं।

गुरु ग्रंथ साहब में उनके द्वारा लिखे गए भजनों का समावेश होना अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना है। न प्रांत का भेदभाव, न भाषा का और न कोई अड़चन संस्कृति की। दूसरे की भाव-भावनाओं के प्रति आदर रखकर, उसकी भाषा को स्वीकारते हुए, अपना विचार अपने प्रेम के बलबूते पर उसे स्वीकारने के लिए विवश कर देना, यही संत नामदेव की बहुत बड़ी कला थी। न द्वेष, न संघर्ष। केवल प्रेमभावना के बलबूते पर संत नामदेव ने इतना बड़ा क्रांतिकार्य किया। ऐसा इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है।

कोणा ही जीवाचा न घडो मत्सर।
मर्म सर्वेश्वर पूजनांचे।

(अर्थात- किसी भी जीव के प्रति ईर्ष्या न हो, यही हर पूजा का सार है।)
इस सूक्ति के अनुसार ही उन्होंने काम किया। पंजाब में संत नामदेव के भक्ति संप्रदाय से जुड़े लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें वहां बाबा नामदेवजी के नाम से जाना जाता है। घुमान के अलावा पंजाब में संत नामदेव के बहुत से गुरूद्वारे और मंदिर हैं। घुमान में हर वर्ष माघ शुद्ध द्वितीया के दिन बहुत भव्य यात्रा आयोजित की जाती है।

पंजाब में जाते समय, संत नामदेव गुजरात और राजस्थान में भी काफी समय तक रहे। वहां रहते हुए उन्होंने जो भक्ति-कार्य किया उसका प्रभाव हमें नरसी मेहता और संत मीराबाई के भजनों में भी देखने को मिलता है। इसके अलावा उत्तर भारत के कई महान संत जैसे रामानंद, कबीर, नानक, रैदास, पीपा आदियों ने अपने काव्य में संत नामदेव का वंदन किया है। संत कबीरदास जी तो बड़े प्रेम और आदर से संत नामदेव की गणना शुक, उद्धव, अक्रूर, हनुमान, आदि श्रेष्ठ भक्तों की श्रेणी में करते हैं। संत नामदेव का स्थान कवि जयदेव के समकक्ष मानते हैं। कहते हैं-

गुरु परसादी जैदेव नामा।
प्रगटिकै प्रेम इन्हे कै जाना॥

संत कबीर के ही समान राजस्थान के महान मुस्लिम संत दादू दयाल ने भी संत नामदेव की महानता का बखान अपने काव्य में किया है।
हिंदी भाषा के बड़े-बड़े अध्ययनकर्ताओं और शोधकर्ताओं ने संत नामदेव के कार्यों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है और आदि कालीन हिंदी साहित्य के योगदान के लिए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ.भागीरथी मिश्र, डॉ. राजनारायण मौर्य, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ.विनय मोहन शर्मा, देवीसिंह चौहान आदि विद्वानों ने अपने-अपने ग्रंथों में संत नामदेव के कार्यों का विश्लेषण किया है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि मराठी में सगुण-उपासना के काव्य का निर्माण करने में परमोच्च शिखर प्राप्त करने वाले संत नामदेव हिंदी में निर्गुणी भक्ति काव्य के आदिकवि माने गए हैं। डॉ. राजनारायण मौर्य कहते हैं- महात्मा कबीर के पहले, संत नामदेव एक ऐसे मनीषी महापुरुष थे जिन्होंने समन्वय के पथ को प्रशस्त करते हुए हिंदी संतमत का प्रवर्तन किया। इस मामले में डॉ.मौर्य द्वारा राष्ट्रवाणी में लिखित लेख हिंदी निर्गुण संत परंपरा में नामदेव का योगदान अवश्य पढ़ा जाना चाहिए। संत नामदेव द्वारा लिखा गया ग्रंथ अभंगगाथा, पंजाब तक उनके द्वारा की गई भक्ति पदयात्रा, इसके अलावा उनके द्वारा किए गए दो और महत्वपूर्ण कार्य हैं, जिन्हें हमें सदा स्मारण रखना चाहिए और उसका अनुकरण-आचरण करना चाहिए। संत नामदेव ने अपनी दासी जनाबाई को भी अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार किया था। यही दासी आगे चलकर संत जनी के नाम से प्रसिद्ध हुई। दासी जनाबाई से संत जनी तक उन्होंने उसके व्यक्तित्त्व को निखारा। स्वयं जनाबाई अपने एक भजन में अपने गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करती है। ‘स्त्री जन्म म्हणूनी न व्हावे उदास’ (स्त्री जन्म मिलने पर उदास न हों) इस आशय का एक भजन संत जनाबाई ने तेरहवीं शताब्दी में लिखा था। ये भजन आज भी कठिन परिश्रम करने वाले महिला वर्ग को आत्मविश्वास देता है।

हम हमारे घरों में काम करने वाली महिलाओं के साथ जैसा व्यवहार होता है, उसी से हमें संत नामदेव की महानता का आभास हो जाता है। संत नामदेव द्वारा किया गया एक और बड़ा कार्य यह है कि उन्होंने पंढरपुर के विट्ठल मंदिर के महाद्वार के सामने स्वयं अपने हाथों से संत चोखामेला की समाधि बनाई। संत चोखामेला एक पिछड़ी जाति के संत थे। संत नामदेव का यह कार्य उस समय की सामजिक-धार्मिक स्थिति को देखते हुए, एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कार्य कहा जाएगा। कई बार यह प्रश्न पूछा जाता है कि संतों ने समाज के लिए कौन-सा सामाजिक कार्य किया है। इस प्रश्न के लिए संत नामदेव का कार्य एक ठोस उत्तर है। पंढरपुर के विट्ठल मंदिर के महाद्वार के सामने संत चोखामेला की समाधि के आगे, मंदिर की पहली पायदान पर संत नामदेव की समाधि है। ‘नामा म्हणे आम्ही पायरीचे चिरे’ (नामा कहते हैं कि हम तो पायदान के पत्थर हैं), इसी भावना के साथ संत नामदेव ने महाद्वार की पहली पायदान पर समाधि ली है। इस पायदान पर विट्ठल भक्तों की संतों के चरणों की धूल पड़ती रहे यही इच्छा संत नामदेव ने अपने अभंग में व्यक्त की है। हर साल पुण्यतिथि के अवसर पर महाद्वार में समाधि के सामने संत नामदेव स्मरण सप्ताह आयोजित किया जाता है। संत ज्ञानेश्वर के पसायदान से सभी परिचित हैं। इसी प्रकार का पसायदान संत नामदेव ने भी अपने अभंग के माध्यम से विश्वात्मक विट्ठल से मांगा है। इसी पसायदान वाले अभंग से ही हम इस लेख का समापन करते हैं।

आकल्प आयुष्य व्हावे तया कुळा ।
माझिया सकळा हरिच्या दासा ॥
कल्पनेची बाधा न हो कोणे काळी ।
ही संतमंडळी सुखी असो ॥
अहंकाराचा वारा न लागो राजसा ।
माझ्या विष्णुदासा भाविकाशी ॥
नामा म्हणे तया असावे कल्याण ।
ज्या मुखी निधान पांडुरंग ॥

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