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कल तक अमेरिका के तलवे चाटने वाला पाकिस्तान अब चीन की गोदी में जाकर बैठ गया है। स्वार्थी और धोखेबाज चीन के साथ रिश्तों के कारण भविष्य में उत्पन्न होने वाले संकट को पाकिस्तान की जनता समझ रही है, पर राजनीतिक नेता हैं कि पाकिस्तान को चीनी ड्रैगन के जबड़े में धकेलने से बाज नहीं आ रहे हैं।

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने नवाज शरीफ को अयोग्य ठहराते हुए प्रधान मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया है। न्यायालय द्वारा नवाज शरीफ पर यह कार्रवाई पनामा पेपर लीक के मामले में की गई है। इस कार्रवाई से पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति खुल कर सामने आ रही है। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान की सत्ता पर इस्लामी कट्टरपंथी और सेना का प्रभाव है। इस्लामी कट्टरपंथी और सेना को वहां लोकतंत्र की स्थापना कभी बर्दाश्त नहीं हुई। मजहबी पाकिस्तान में बार-बार लोकतंत्र का गला घोंटा गया है। वहां जनता द्वारा चुनी गई सरकार कम और सैन्य तानाशाह अधिक रहे हैं। एक बार फिर लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधान मंंत्री नवाज शरीफ को पनामा भ्रष्टाचार के कारण सत्ता गंवानी पड़ी है। यह घटना इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लोकतंत्र की जड़ें खोखला करने पर प्रकाश डालती है। इस प्रकरण ने विश्व के सामने पाकिस्तान की कमजोर राजनीतिक छवि प्रस्तुत की है।

लंबे समय से पाकिस्तान को तीन ‘ए’- ‘अल्लाह, अमेरिका और आर्मी’- संचालित करते रहे हैं। किंतु अब उसमें एक ‘ए’ के स्थान पर ‘सी’ अर्थात चीन आ गया है। चीन भारतीय सीमा पर अपनी लालायित नजरें रखे हुए है। फिर भी वह सिर्फ भारत विरोधी एजेंडे को लेकर पाकिस्तान की आर्थिक मदद नहीं कर रहा है बल्कि भविष्य में पाकिस्तान की आर्थिक नसें अपने हाथ में रखने का दोहरा मापदंड भी चीन अपने कुटिल मन में पाले हुए हैं।

चीन के नेशनल डेवलपमेंट एण्ड रिफॉर्म कमीशन और पाकिस्तान के योजना मंत्रालय ने मिल कर सी.पी.ई.सी. (चीन-पाकिस्तान इकोनामिक कारीडोर) योजना बनाई है। यह योजना बीस साल के कार्यकाल की है। बीस साल का यह प्लान अगर पूरा हो जाता है तो पाकिस्तान के प्रत्येक आर्थिक मसले में मात्र चीन की चलेगी। यह योजना आखिर क्या है? इस योजना में पाकिस्तान के कौन से क्षेत्रों को अहमियत दी गई है? अगर यह योजना पूरी होती है तो पाकिस्तान किस तरह चीन के हाथ का मोहरा बन जाएगा? और भारत के लिए यह योजना क्या मायने रखती है? इन बातों पर गौर करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस योजना का नाम चीन- पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरीडोर (सी.पी.ई.सी.) है। चीन के सिंजीयांग शहर से लेकर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक एक रोड का निर्माण होगा, जिसमें चीन सिंजीयांग से ग्वादर तक रास्ता बनाएगा, उसकी देखभाल करेगा। रेल लाइनों की मरम्मत करेगा। साथ ही साथ फर्टिलाइजर्स प्लांट और पावर प्लांट पर भी काम करेगा। इसमें पाकिस्तान के छह प्रमुख शहरों को ध्यान में रखा है। जिनमें से ज्यादातर के साथ भारत की सीमाएं जुड़ी हैं। इनमें गिलगिट, बाल्टिस्तान, नौशेरा, भिंवर खैबर, शेखपुरा, सिंध शहर शामिल हैं। इसके अलावा और ९ पावर प्लांट पर भी काम होगा जो पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेंगे। इसी के साथ पाकिस्तान चीन को खेती के लिए ६५०० एकड़ जमीन भी देगा, जिस पर चीन खेती के साथ फर्टिलायजर्स प्लांट भी लगाएगा, जिसका सालाना उत्पादन ८ लाख टन तक होगा।

असल में पकिस्तान के चीन के साथ जाने की सब से बड़ी वजह अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुआ आतंकी हमला था। उस आतंकी हमले का बदला अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला करके लिया है। इस हमले को अंजाम देने के लिए अमेरिका ने पाकिस्तान को भरपूर आर्थिक मदद दी थी। लेकिन अब बात अलग है कि अमेरिका पाकिस्तान से धीरे-धीरे अपने हाथ खिंचता जा रहा है तथा भारत से नजदिकियां और दोस्ती अनवरत बढ़ रही है। यही वजह है कि पाकिस्तान चीन का मुंह ताक रहा है।

इस योजना के चलते पाकिस्तान पूरी तरह चीन के कब्जे में आ जाएगा। पाकिस्तान में इतने बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन होने के बावजूद बिजली के दाम चीन तय करेगा। दोनों देशों में हुए एक करार के तहत अगर बिजली खरीदने वाला भुगतान नहीं करता है, तो पाकिस्तान सरकार को २२ प्रतिशत की दर से बिजली का भुगतान करना होगा। यहां तक कि पाकिस्तान से खेती के लिए ली हुई भूमि पर भी चीन का कब्जा होगा। बलूचिस्तान और खैबर प्रांत की सोने की खदानों पर भी चीन अपनी लालायित नजरें लगाए बैठा है। इस योजना के चलते पाकिस्तान चीन के कर्ज के नीचे दब जाएगा। पाकिस्तान के आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान को कर्ज के बदले में २०२० तक हर साल चीन को साढ़े तीन अरब डॉलर चुकाने पड़ सकते हैं। अगर पाकिस्तान यह कर्ज ना चुका पाया तो श्रीलंका की तरह पाकिस्तान को भी अपनी जमीन चीन को सौंपनी पड़ सकती है। इस कारण डर है कि भविष्य में पाकिस्तान कहीं चीन की जागीर न बन जाए।

इसमेंं चीन को इस योजना में असफल होने का डर भी सता रहा है क्योंकि वह इसमें अब तक ५ अबर डॉलर का निवेश कर चुका है। एक तरफ जहां पाकिस्तान में राजनैतिक उथल-पुथल हमेशा चलती रहती है वहीं चीन के तोते नवाब शरीफ को पनामा पेपर लीक के चलते पाकिस्तान के प्रधान मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा है।

सी पी ई सी योजना को लेकर भारत का नजरिया देखा जाए तो इस योजना के अंतर्गत होने वाला रास्ता पाक अधिकृत कश्मीर (पी ओ के) से जा रहा है। इस क्षेत्र पर मूलतः भारत का अधिकार है। अभी तक यह संघर्ष भारत और पाकिस्तान तक ही रहा है लेकिन सी पी र्ई सी योजना के चलते अब चीन भी उस संघर्ष में अपनी नाक घुसेड़ेगा। जब से इस योजना का काम शुरू हुआ तब से पाकिस्तान ने अलगाववादियों को पैसे देकर कश्मीर में अलगाववादी गतिविधियों को और बढ़ावा दिया है। चीन सिंजीयांग के पास पी.ओ. के. की सरहद पर पाकिस्तान के साथ संयुक्त गश्त लगा रहा है। यही क्यों, डोकलाम मुद्दे पर भारत को आंख दिखाने वाले चीन ने पी ओ के की सरहद पर चुपचाप अपने सैनिकों की तैनाती भी की है। सी.पी.ई.सी. योजना का केंद्र कहे जाने वाले ग्वादर पोर्ट के कारण अब चीन हिंद महासागर में भी भारत के मामलों में टांग अडाएगा।

‘पाकिस्तानी – चीनी, भाई-भाई‘ का अंजाम भविष्य में जो होने वाला है उससे पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अभी से परेशान हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसी प्रकार कोठियां बनाने का कारोबार शुरू करके, आखिर में पूरे भारत पर कब्जा जमा लिया था। पाकिस्तानी बुद्धिजीवियों का मानना है कि चीन प्रॉपर्टी डीलर है। वह आज ‘पाकिस्तानी-चीनी, भाई -भाई’ का नारा लगा रहा है तो १९६२ के पहले भारत से चीनियों का कौन सा अलग व्यवहार था? वह भी ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई‘ वाला व्यवहार था ना! पाकिस्तान और चीन के रिश्ते के संदर्भ में ‘शहद से मीठा, पहाड़ों से ऊंचा, सागर से गहरी दोस्ती’ जैसी घोषणाएं की जा रही हैं। ये सब बातें चीनियों का मायाजाल है। असल में चीन एक विस्तारवादी राष्ट्र है और चीन जैसा लालायित राष्ट्र पाकिस्तान से मोहब्बत के कारण ये रियायतें पाकिस्तान को नहीं दे रहा है बल्कि आने वाले भविष्य में ईस्ट इंडिया कंपनी की ही तरह पाकिस्तान पर राज करने की मंशा रखता है। यह चीनी ड्रैगन पाकिस्तान की सभी आर्थिक नसों को मरोड़ कर पाकिस्तान को अपने काबू में करेगा ही।

‘गरीब की जोरू, सबकी भाभी’ मुहावरे के तरह भूखा-कंगाल पाकिस्तान चीन का दोस्त हो गया है। आज पाकिस्तान का बच्चा- बच्चा कर्ज में डूबा हुआ है। भविष्य की पीढ़ी भी अपने सिर पर कर्ज का बोझ लेकर ही पैदा होगी। आज पाकिस्तान विनाश की ओर मुड़ रहा है। अपने गिरेबान में झाके बगैर पाकिस्तान ‘आ बैल मुझे मार’ वाले तरीकों से वर्तमान के प्रश्नों से पीछा छुड़ाने के लिए कल के गड्ढे खोद रहा है। पाकिस्तान में यह चर्चा आम है कि चीनी कंपनियां वहां बन रहे पावर ग्रिड में घटिया दर्जे के मटेरियल का इस्तेमाल कर रही हैं। जो नए पावर प्लांट लग रहे हैं उनमें उपयोग में लाया हुआ लचर मैटेरियल पांच साल के बाद उन पावर प्लांट की क्षमता को पूरी तरह खराब कर देगा।

इस स्थिति में वहां बिजली उत्पादन खतरे में पड़ जाएगा। जो नए पावर प्लांट चीनी कंपनियां स्थापित कर रही हैं उन पर पाकिस्तान सरकार का अपना नियंत्रण होना चाहिए यह भावना पाकिस्तान के नागरिकों की है। दोस्ती के नाम पर चीन पाकिस्तान को धोखा दे रहा है। चीन के साथ पाकिस्तान की दोस्ती ‘हिमालय से ऊंची, शहद से मीठी और सागर से गहरी है’ जैसी बातें महज बकवास हैं। चीन पाकिस्तान के साथ सिर्फ मुनाफे का व्यापार कर रहा है।

जब पाकिस्तान अमेरिका के करीब था तब पाकिस्तान अमेरिका से बड़े रोमांटिक संबंध जताता था। पर अमेरिका ने हमेशा एक हाथ में गाजर और दूसरे हाथ में छड़ी रखी थी। अमेरिका ने पाकिस्तान का उपयोग कर उसे पूरी तरह निचोड़ लिया है। अमेरिका ने अपने रिश्तें अपने राष्ट्रहित को ध्यान में रख कर रखे थे। उसमें पाकिस्तान से कोई रोमांस का भाव नहीं था। यह असल में विश्व के सभी देशों की विदेश नीति होती है। पर अपने हाथ में कटोरा लिए रिश्तें रखने वाले पाकिस्तान को गुलामी में ही रोमांस नजर आता है। आज वही बात चीन के साथ हो रही है। चीन की गोद में पाकिस्तान उसी तरह घुस गया है। पाकिस्तानी हुक्मरान राष्ट्रहित और भविष्य में दिखाई दे रहे गुलामी के संकेतों को पूरी तरह नजरअंदाज कर रहे हैं।

किसी भी देश की अस्मिता उसकी विकास नीति पर तय होती है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति अत्यंत खराब है। इस कारण विकास नीति का कोई सवाल ही नहीं आता है। इसीलिए उसकी विदेश नीति को दुनिया के अन्य राष्ट्र कोई अहमियत नहीं दे रहे हैं। जब से पाकिस्तान बना है तब से वहां ऐसी ही परिस्थितियां बनती रही हैं- मजहबी राजनीति और कटोरा लेकर विश्व की बड़ी ताकतों के द्वार पर सहायता के लिए खड़ा रहना। इस कारण पाकिस्तान हमेशा से किसी न किसी के सहारे को मजबूर रहा है। कल तक अमेरिका के तलवे चाटने वाला पाकिस्तान अब चीन की गोदी में जाकर घुस गया है। यही पाकिस्तान की नियति रही है। पाकिस्तान की जनता भविष्य में आने वाले संकट को समझ रही है, पर राजनीतिक नेता पाकिस्तान को चीनी ड्रैगन के जबड़े में धकेल रहे हैं। हालात अब उनके हाथ में नहीं रहें हैं।

व्यापार का एक अघोषित नियम होता है, वह है सिर्फ मुनाफा। चीन का भी मकसद वही है, जिसमें पाकिस्तान कसता जा रहा है। भारत ने जहां अपने मजबूत राजनैतिक इरादों के कारण दुनिया के ज्यादातर देशों के साथ बेहतर राजनैतिक संबंध बनाए हैं वहीं पाकिस्तान ने अपने आपको हमेशा कमजोर राजनीति में ही रखा। जिसकी बुनियाद पर पाकिस्तान के दुनिया के बड़े राष्ट्रों के साथ अच्छे व मित्रवत ताल्लुकात कभी न बन पाए। अमेरिका से २५ वर्ष के दोस्ताने से पाकिस्तान को कोई फायदा नहीं हुआ है। पाकिस्तान उसकी गोद में इतना घुस गया था कि अमेरिका ने उसे निचोड़ लिया। क्या चीन उससे कुछ अलग करेगा? कहते हैं ना, ‘गरीब की जोरू, सबकी भाभी’। पाकिस्तान की हालत ऐसी ही हो गई है।

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