आन्दोलनजीवियों का नया एजेंडा!

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देश में हर साल बाल विवाह होते हैं और इसे रोकने के लिए सख्त कानून भी बना हुआ।क्या बाल विवाह की संख्या को देखते हुए देश में बेटियों के विवाह की आयु 18 से घटाकर 16 कर दी जानी चाहिए? लेकिन सरकार तो विवाह की आयु अब बढ़ाकर 21 करने…

पॉक्सो की आड़ में आन्दोलनजीवियों का एजेंडा!

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देश में हर साल बाल विवाह होते हैं और इसे रोकने के लिए सख्त कानून भी बना हुआ।क्या बाल विवाह की संख्या को देखते हुए देश में बेटियों के विवाह की आयु 18 से घटाकर 16 कर दी जानी चाहिये? लेकिन सरकार तो विवाह की आयु अब बढ़ाकर 21 करने…

देशविरोधी-भ्रष्टाचार का अड्डा चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया

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चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया के बिशप एवं मॉडरेटर पीसी सिंह पर देश भर में हजारों करोड़ की संपति को भी कूट रचना कर बेचने के आरोप है। हाल ही में इसके सहयोगी पीटर बलदेव समेत 16 लोगों पर लखनऊ के सिविल लाइंस थाने में धोखाधड़ी समेत अन्य आरोपों में मुकदमा…

पूरे भारत को ग्रसता जिहाद

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केंद्रीय एजेंसियों की लगातार कोशिशों के बावजूद पीएफआई ने देश के ज्यादातर हिस्सों में अपनी मजबूत शैतानी पकड़ बना ली है। झारखंड में तो इसके बांग्लादेशी सदस्य आदिवासी महिलाओं से विवाह कर स्थायी नागरिक भी बन गए हैं। सरकार को इस दिशा में व्यापक स्तर पर कार्रवाई कर इन्हें नेस्तनाबूत करने की आवश्यकता है ताकि भारत के भविष्य को बेहतर बनाया जा सके।

एनजीओवाद की कोख से उपजे आन्दोलनजीवी…!

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वे हर उस बदलाब के विरुद्ध है जो भारत के स्वत्व से जुड़ा हुआ हो।भारत की लोक परम्पराओं औऱ सांस्कृतिक अस्मिता से उन्हें इस हद तक नफरत है कि वे अपने एजेंडे के लिए भारत के विरुद्ध भी खड़े होने में संकोच नही करते हैं।वे 70 साल से अमरबेल की तरह भारत की राजनीति,प्रशासन,न्यापालिका,मीडिया से लेकर बौद्धिक जगत में छाए रहे हैं।

मी लार्ड!क्या आज से देश में ईश निंदा को लागू माना जाए….

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नूपुर शर्मा के बयान से देश में अप्रिय हालात निर्मित हुए सुप्रीम कोर्ट का यह अभिमत स्वीकार्यता के साथ मेरिट पर भी उचित कैसे कहा जा सकता है।क्या देश और दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के पीछे सिर्फ नूपुर शर्मा जैसे बयान जिम्मेदार है? क्या सुप्रीम कोर्ट का यह रुख…

डिलिस्टिंग :संविधान और कन्वर्जन का षड्यंत्र

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म.प्र का मालवा औऱ निमाड़ इन दिनों एक अलग ही आंदोलन से गुंजित है। डीलिस्टिंग।इस मुद्दे को लेकर धार,झाबुआ,अलीराजपुर,रतलाम बड़वानी जिलों में बड़ी बड़ी रैलियां हो रही है। 40 से 44 डिग्री तक तपती दुपहरी में भी हजारों की संख्या में जनजाति समाज के लोग डिलिस्टिंग की मांग करते हुए…

सामाजिक न्याय के नैतिक प्रश्न और आंबेडकर

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आज जब भारतीय जनता पार्टी डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में सामाजिक न्याय पखवाड़े मना रही है, तब मन में यह विचार आता है कि सामाजिक न्याय के मामले में भारतीय जनमानस की अवधारणा क्या है। इस विषय पर यदि गहरी दृष्टि डाली जाए तो हम तय कर…

ध्वस्त होता गणन शास्त्र और एलीट इंटलेक्चुअल

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उप्र के चुनाव परिणाम केवल राजनीतिक विश्लेषण का विषय भर नही हैं।यह बहुजन राजनीति के ध्वस्त होने का निर्णायक पड़ाव भी हैं।यह जातियों के गणन शास्त्र की विदाई भी है जो पस्चिमी समाजशास्त्र से किराए पर लेकर भारत के ज्ञानजगत में स्थापित की गई। और लंबे समय तक इस ज्ञान…

गुलामी के प्रतीकों से लगाव की दूषित मानसिकता !

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भारत में विभिन्न राष्ट्रीय पर्वों पर ढोए जाने वाले गुलामी के प्रतीक चिन्हों को देश के प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा तेजी से  बदला जा रहा है। इससे गुलाम मानसिकता और भारत के बाहर स्थित अन्य राष्ट्रों में अपनी निष्ठाएं रखने वाले दलों व उनके नेताओं में बेचैनी का…

आधुनिक एवं धर्मनिरपेक्ष संविधान और सनातन भारत

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(26 नबम्बर1949) हम भारतीयों का संविधान बनकर तैयार हुआ था। आज 72 बर्ष बाद हमारा संविधान क्या अपनी उस मौलिक प्रतिबद्धता की ओर उन्मुख हो रहा है जिसे इसके रचनाकारों ने  भारतीयता के प्रधानतत्व को आगे रखकर बनाया था।आज इस सवाल को सेक्यूलरिज्म औरआधुनिकता के आलोक में  विश्लेषित किये जाने…

भारतबोध का अभ्युदय और वामपंथ का उखड़ता कुनबा

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सूचना क्रांति ने भारत के करोड़ों नागरिकों के मन मस्तिष्क से उन जालों को हटाने का काम किया है जिसे वामपंथियों ने नकली बौद्धिक गिरोहबंदी से खड़ा कर दिया था। ध्यान से देखा जाए तो भारत अब भारतबोध के साथ जीना सीख रहा है। पश्चिमी मीडिया के लिए भारत के हिन्दू तत्व औऱ दर्शन सदैव उसी अनुपात में हिकारत भरे रहे हैं जैसे कि भारत के वाम बुद्धिजीवियों का बड़ा वर्ग प्रस्तुत करता आया हैं।

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