भारतीयत्व की विस्मृति ही “इंडिया” है

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भारतीय चिंतन पूरे विश्व को हमारी देन है। इसे पहले और आज भी स्वीकार किया जा रहा है। फिर भी, हम अपने ही देश और अपने ही राजनीतिक उत्तराधिकारियों के बीच गत ७० सालों से बहिष्कृत क्यों हैं? यह एक यक्ष प्रश्न है कि, क्या आज का ‘इंडिया’ बौद्धिक गुलामी

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