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उत्तर प्रदेश का कोना-कोना पर्यटन केन्द्र है। उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले प्रत्येक नगर और प्रत्येक गांव को पर्यटन का केन्द्र माना जा सकता है; क्योंकि यहां गांव, नगर, जनपद सब की अपनी अलग विशेषताएं हैं। ऐतिहासिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आधार पर सभी के अपने वैशिष्ट्य हैं।

पर्यटन शब्द परि+अटन के योग से बना है। अर्थात, चारों ओर घूमना ही पर्यटन है। पहले देशाटन को बड़ा महत्व दिया जाता था; क्योंकि ‘देशाटन’ देश में घूमना था। इस पर्यटन अथवा देशाटन की परम्परा भारत में बहुत पुरानी है। प्राचीन ऋषि-मुनि पर्यटन के लिए यात्राएं किया करते थे। पर्यटन के उद्देश्य से ही महर्षि अगस्त पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण की यात्राएं करते हुए विंध्याचल पर्वत के पार पहुंचे थे। इतना ही नहीं वे वर्तमान भारत के बाहर के देशों तक पहुंचे थे। इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण एशिया और यूरोप में मानव कल्याण के पथ को प्रचारित किया था। पर्यटन के द्वारा ही उन्होंने वेदों, उपनिषदों एवं भारतीय शास्त्रों का ज्ञान चारों दिशाओं में पहुंचाया था।

भगवान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का वनवास काल उनके पर्यटन का ही समय था। पर्यटन के उद्देश्य से ही माता जानकी ने वन-वन भटकने के पश्चात महर्षि वाल्मीकि के आश्रम को आश्रय स्वरूप स्वीकार किया था। महाभारत काल के आदि से लेकर अंत तक योगेश्वर भगवान कृष्ण की यात्राएं भी पर्यटन का ही स्वरूप थीं।

पर्यटन का उद्देश्य प्राय: मानव कल्याण, ज्ञानार्जन, ज्ञान के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ मनोरंजन एवं आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक लाभ प्राप्त करना होता है। इसीलिए पूरे विश्व से लोग पर्यटन यात्राएं करते रहे हैं। चीनी यात्रियों (फाइयान एवं हवेनसांग) का भारत आगमन, वास्कोडिगामा, कोलम्बस एवं मैगेलन की यात्राएं भी पर्यटन के ही विभिन्न रूप थे।

उत्तर प्रदेश, पर्यटन का अति महत्वपूर्ण एवं विश्व स्तरीय केन्द्र है। यहां पर्यटन के द्वारा करोड़ों लोग अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं। पर्यटन के द्वारा उत्तर प्रदेश के करोड़ों परिवारों का जीवन यापन होता है। महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ने तो पर्यटन को मानव जीवन के लिए अनिवार्य एवं आवश्यक बताया है। उन्होंने अपने एक कथन में कहा है कि इस दुनिया को जो भी मिला है, सब घुमक्कड़ों ने दिया है। मानवीय मूल्यों के विकास का कारण भी वे पर्यटन तथा घुमक्कड़ों को ही स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं कि यदि पर्यटन न होता, यदि घुमक्कड़ न होते तो यह दुनिया इतनी खूबसूरत नहीं होती।

उत्तर प्रदेश का कोना-कोना पर्यटन केन्द्र है। उत्तर प्रदेश के प्रत्येक जिले प्रत्येक नगर और प्रत्येक गांव को पर्यटन का केन्द्र माना जा सकता है; क्योंकि यहां गांव, नगर, जनपद सब की अपनी अलग विशेषताएं हैं। ऐतिहासिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक आधार पर सभी के अपने वैशिष्ट्य हैं। सुविधा की दृष्टि से हम उत्तर प्रदेश के पर्यटन को दो वर्गों में वर्गीकृत करेंगे-१) आध्यात्मिक पर्यटन, २) सामान्य पर्यटन।

१) आध्यात्मिक पर्यटन
उत्तर प्रदेश में कुल पिचहत्तर जनपद हैं। ये सभी जिले पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं, इनमें कुछ जिले आध्यात्मिकता के आधार पर उत्तर प्रदेश ही नहीं अपितु विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हैं। ये सभी पर्यटन केन्द्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात हैं। इनमें से अधिकतम देवनदी गंगा, यमुना, सरयू तथा गोमती के किनारे स्थित हैं। उत्तर प्रदेश में इनके अतिरिक्त घाघरा, चंबल अदि नदियां भी इस प्रदेश को सींचती हैं। इस प्रकार सपूर्ण उत्तर प्रदेश एक मैदानी क्षेत्र है।

उ.प्र. के मथुरा, इलाहाबाद, वाराणसी, हाथरस, फैजाबाद, गोरखपुर, सीतापुर, प्रतापगढ, मिर्जापुर, संमल, हापुड, बुलस्थर, लखनऊ, ललितपुर, कुशीनगर, शहाजहांपुर, चित्रकूट, बांदा, बलिया, फतेहपुर एवं आगरा आदि जनपद आध्यात्मिक पर्यटन के केन्द्र हैं।

मथुरा– इसे ब्रज कहा जाता है। मथुरा योगीराज भगवान श्री कृष्ण की जन्म भूमि है। यहां भगवान कृष्ण ने अवतार लेकर कंस एवं दुर्दान्त दैत्यों का वध किया था। मथुरा में भगवान श्री कृष्ण के अनेक दिव्य मंदिर हैं जिसमें श्री कृष्ण जन्म स्थान, द्वारिकाधीश मंदिर, कंसनिकंदन एवं श्री केशव देव मंदिर प्रमुख हैं। मथुरा वृंदावन नगर निगम का एक भाग वृंदावन कहलाता है। वृंदावन में श्री कृष्ण ने अनेक लीलाएं की थीं। इन लीलाओं के प्रत्यक्ष गवाह चीर घाट, केसी घाट तथा काली दह हैं। काली दह पर भगवान श्री कृष्ण ने कालियवन का दमन किया था। वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में हैं – मंदिर श्री गोदा रंग नन्नार (यह दक्षिण शैली का मंदिर है।) गोविंद देव मंदिर (इसे भूतों र्का मंदिर कहा जाता है।) प्रेम मंदिर, कांच का मंदिर, बिहारी जी मंदिर, इस्कॉन मंदिर तथा प्रिया कान्त जू मंदिर तथा विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर चंद्रोदय मंदिर (लगभग सात सौ फीट ऊंचा) है।

इनके अतिरिक्त मथुरा वृंदावन में हजारों मंदिर हैं। मथुरा-वृंदावन में बंगला मुखी, कंकाली, चंद्रावली काली, चामुण्डा, अन्नपूर्णा, कालरात्रि एवं कात्यायनी शक्तिपीठ हैं। माता वैष्णो देवी का मंदिर एवं मां गायत्री जी का मंदिर (गायत्री तपोभूमि) देश-विदेश के भक्तों की श्रद्धा के केन्द्र हैं।

मथुरा के शिव मंदिरों में भूतेश्वर, गर्तेश्वर, रंगेश्वर, पिप्लेश्वर तथा गोकर्णेश्वर एवं गोपेश्वर (वृंदावन) प्रमुख हैं। ये मंदिर मथुरा-वृंदावन के संरक्षक माने जाते हैं। इसीलिए, भगवान शिव को मथुरा का कोतवाल कहा जाता है।

मथुरा से २० किमी. दूर गोवर्धन नामक तीर्थ है। यह वही स्थान है जहां भगवान श्री कृष्ण ने गिरिराज पर्वत को उठाया था। यहां सप्तकोषी परिक्रमा कर भक्त स्वयं को धन्य समझते हैं। गोवर्धन के निकट राधा कुण्ड है, जहां श्री राधा जी स्नान करती थीं। गोवर्धन से पन्द्रह किमी बरसाना है। बरसाना श्री राधे रानी की जन्मभूमि है। यहां श्री जी का दिव्य मंदिर विश्व विख्यात है। बरसाना से पन्द्रह किमी आगे नंदगांव है। नंदगांव को नंदबाबा ने बसाया था। यहां श्री कृष्ण का भव्य मंदिर है। मथुरा नगर में गोकुल बैराज को पार करते ही श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात बसुदेव उन्हें गोकुल नंदराम के घर छोड़ आए थे। गोकुल में श्रीकृष्ण के दिव्य मंदिर हैं। गोकुल से कुछ ही दूरी पर महावन है। यह चन्द्रावली देवी के निकट है। इसे पुराना गोकुल कहा जाता है। यहां रमण रेती में अनंत विभूषित कार्ष्णि गुरु शरणानन्द जी का दिव्य एवं भव्य आश्रम है जहां पशु-पक्षियों को निर्भय विचरण करते हुए देखा जा सकता है। मथुरा नगर के मध्य में प्रसिद्द जैन तीर्थ-चौरासी है। इसके अतिरिक्त मथुरा में पुरातत्व विभाग के दो राजकीय संग्रहालय हैं; जो ऐतिहासिक ज्ञान के प्रमुख केन्द्र हैं। यहां अनेक शोधार्थियों का आगमन वर्षभर होता रहता है।

मथुरा से पंन्द्रह किमी बल्देव है। यह भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई बलभद्र जी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। मथुरा के पेड़े व बल्देव के माखन मिश्री व महावन के खीर मोहन विख्यात हैं। मथुरा के निकट ही हाथरस नगर है। हाथरस मथुरा से ३० किमी दूर है। यहां भगवान बलभद्र का विशाल मंदिर है।

मथुरा मुंबई-दिल्ली रेल मार्ग का प्रमुख जंक्शन है। मथुरा बड़ी सरलता से देश के किसी भी कोने से पहुंचा जा सकता है। यह दिल्ली-आगरा एन.एच.२ पर पड़ता है। मथुरा में पर्यटन के लिए सिटी बस, ऑटो, टैक्सी आदि हैं तथा यहां रुकने के लिए बृजवासी लैण्ड इन, बृजवासी सेन्ट्रल; बृजवासी रॉयल, अगिनंदन, बसेरा, विंगस्टन, मधुवन आदि होटल प्रसिद्ध हैं।

अयोध्या- यह फैजाबाद जिले में है। अब इसे फैजाबाद में मिला कर नगर निगम बनाया गया है। अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की जन्मभूमि है। यहां भगवान श्री राम का जन्म स्थल, सीता रसोई, हनुमान मंदिर आदि प्रसिद्ध हैं। यहीं गोस्वीमी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की रचना की थी।

चित्रकूट- यह वह स्थान है जहां वनवास के उपरांत भगवान श्री राम ने अपना आश्रम बनाया। यहां भगवान श्रीराम ने अनेक ऋृषि मुनियोें से भेंट की। केवट एवं निषाद से मिलन यहीं हुआ। यहीं प्रभु श्री राम को मनाने के लिए भरत पहुंचे थे। भरत यहीं से उनकी चरण पादुकाएं सिर पर धारण कर अयोध्या लौटे थे।

बांदा- यह गोस्वामी तुलसीदास जी से सम्बन्धित क्षेत्र है। गोस्वामी जी का जन्म बांदा जिले का राजापुर ग्राम माना जाता है।
बलिया- कहते हैं बलिया जिला भी गोस्वामी तुलसीदास जी के जन्म से सम्बंधित है।
कासगंज- यह भी ब्रज क्षेत्र में ही आता है। यहां का सोरों नगर प्रसिद्ध तीर्थ है। सोरों गंगा के कछला घाट के निकट स्थित है।
काशी- काशी विश्व विख्यात तीर्थ स्थल है। मोक्षदा सप्तपुरियों में काशी प्रमुख है। काशी को बनारस अथवा वाराणसी भी कहा जाता है। यहां भगवान विश्वनाथ का भव्य ज्योतिर्लिंग स्थित है। सिद्ध, नाथ, शैव सम्पदाय के लोगों ने यहां साधना की है।
काशी में मां अन्नपूर्णा, काली मां तथा संकटमोचन हनुमान के प्रसिद्ध मंदिर हैं। स्वामी विवेकानंद भी साधना हेतु काशी पहुंचे थे। काशी में एयरपोर्ट भी है। इस प्रकार वायुयान, रेलवे तथा सड़क मार्ग द्वारा काशी पर्यटन हेतु पहुंचा जा सकता है। काशी का प्रमुख होटल है रेवाटासबाय आइडियल। यहां के मंदिर व घाटों का दृश्य विलक्षण होता है। शास्त्रों में काशी तथा मथुरा को तीन लोक से न्यारी कहा गया है।

नैमिषारण्य तीर्थ- हिंदुओं का सुप्रसिद्ध तीर्थ नैमिषारण्य (जिसे अब नीमसार कहा जाता है।) सीतापुर जिले में हैं। यह शौनकादि अठासी हजार ऋषियों की तपस्थली है। यहीं शौनकादि ऋृषियों को मुनिश्रेष्ठ सूत जी ने सत्यनारायण व्रत का महत्व बताया था। इसी स्थान पर राजर्षि वेदव्यास ने महाभारत एवं अठारह पुराणों की रचना की थी। यह स्थान दर्शनीय है। यही भगवान श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ किया था।
प्रतापगढ़- प्रसिद्ध बौद्ध तीर्थ है। यह महात्मा बुद्ध की तपस्थली है।
गोरखपुर- यह उत्तर प्रदेश के प्रमुख आध्यात्मिक पर्यटनों में प्रमुख है। यहां नाथ पंथ के संस्थापक गुरु गोरखनाथ द्वारा प्रतिष्ठित सुप्रसिद्ध गोरक्ष पीठ है। गोरखपुर को इसीलिए गुरु गोरखनाथ की पुण्यभूमि कहा जाता है। गोरखपुर अच्छा नगर है। यह नैपाल की सीमा पर है। यहां भगवान शिव का विशाल मंदिर है। विश्वविख्यात गीता प्रेस गोरखपुर में ही है। गीता प्रेस के द्वारा हिंदू धर्म, संस्कृति एवं आध्यात्म का अद्वितीय प्रचार – प्रसार किया गया है।
संभल- इसे प्राचीन काल में सत्यव्रत कहा जाता था। यहां तीन प्रमुख शिवलिंग स्थित हैं। पूर्व में चन्द्रशेखर, उत्तर में भुवनेश्वर तथा दक्षिण में सम्भलेश्वर हैं। ये मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध हैं। यहां पुराणों में कल्कि अवतार होने की घोषणा की गई है।
गढ़ मुक्तेश्वर- यह हापुड़ जिले में है। पहले इसका नाम गण मुक्तेश्वर था; क्योंकि यहां गंगा किनारे शिव आराधना से शिव गणों की पिशाच योनि से मुक्ति हुई थी।
मगहर – यह संत कबीर नगर जनपद में है। पहले मान्यता थी कि मगहर में मरने से नर्क मिलता है इसलिए अध्यात्मरत्न संत कबीर मगहर चले गए। वही उन्होंने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। अब मगहर एक तीर्थ है। यहां कबीर साहब का मंदिर है।
कर्णवास- यह बुलन्दशहर जिले में स्थित है। यहां दानवीर कर्ण ने निवास किया था। यह गंगा किनारे स्थित है।
चुनार- यह मिर्जापुर जिले में है। यहां महाराजा विक्रमादित्य का बनवाया हुआ विशाल किला है। सामान्य पर्यटन की दृष्टि से ऐतिहासिक किला होने के कारण यह स्थान महत्व पूर्ण है।
कपिलवस्तु- यह एक प्रसिद्ध बौद्धतीर्थ है।
कुशीनगर- कुशीनगर भी बौद्धतीर्थ के रूप में विख्यात है।
कार्लिरज- यह स्थान बुंदेलखण्ड में है। यहां सीतासेन नामक स्थान आध्यात्मिक स्थल है; क्योंकि यहां एक मकान में पत्थर के बिस्तर-तकिया आदि लगे हैं। लोगों का विश्वास है कि यहां गौरी जी ने कभी शयन किया था। मां यहां ठहरी थी।
देवगढ़- यह बुंदेलखण्ड में ही ललितपुर जिले में है। यह सुप्रसिद्ध जैन तीर्थ है। यहां भारत प्रसिद्ध दशावतार मंदिर है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों के एकसाथ दर्शन हैं।
प्रयाग- प्रयाग को अब इलााहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-यमुना-सरस्वती का त्रिवणी संगम है। यहां प्रत्येक बारह वर्ष में कुंभ का मेला लगता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने मोहिनी अवतार धारण कर दैत्यों से अमृत कलश प्राप्त कर लिया। जब अमृत कलश आकाश मार्ग से ले जा रहे थे तब अमृत की कुछ बूंदें यहां गिरी थीं। इसीलिए यहां कुंभ का महापवर्र् होता है। इसे अमृत पर्व भी कहा जाता है।
शहाजहांपुर- यह रामचन्द्र मिशन के संस्थापक महात्मा रामचन्द्र (बाबूजी) की जन्मस्थली एवं कर्मस्थली है। यही उन्होंने अपने पूज्य गुरु देव महात्मा श्री रामचन्द्र (नानाजी) महाराज की स्मृति में रामचन्द्र मिशन की स्थापना की थी।
फतेहगढ़- फतेहगढ़ को भी रामचन्द्र मिशन का आध्यात्मिक क्षेत्र माना जाता है; क्योंकि यह महात्मा रामचन्द्र (लालाजी महाराज) की कर्मस्थली है।
कन्नौज- इसे रेणुका क्षेत्र भी कहा जाता है। यहां भगवान परशुराम का अवतार हुआ था। यहां गौरी शंकर तथा अन्नपूर्णा के भव्य मंदिर हैं।
फर्रुखाबाद- यह स्थान भीष्मनगर के नाम से पुराणों में संबोधित हुआ है। भीष्म मितामह द्वारा इसकी स्थापना की गई थी।
हरदोई- हरदोई शब्द हरिद्रोही का अपभ्रंश है। यह वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार धारण कर हरि द्रोही हिरण्यकशिपु का वध किया था। यहां भगवान नृसिंह एवं भक्त प्रल्हाद का मंदिर है
इनके अतिरिक्त अन्य भी अनेक आध्यात्मिक पर्यटन केन्द्र उत्तर प्रदेश में हैं।

२) सामान्य पर्यटन
सामान्य पर्यटन की दृष्टि से भी उत्तर प्रदेश एक अति महत्वपूर्ण प्रदेश है क्योंकि सामान्य पर्यटन के अनेक महत्वपूर्ण स्थाल यहां है; आइए देखे:-

आगरा- यहां विश्व का एक आश्चर्य ताजमहल स्थित है। इसके अतिरिक्त अकबर द्वारा निर्मित लाल किला, एतमाउदौला, चीनी का रौजा, मरियम टॉम्ब, सिकन्दरा, लाल ताजमहल आदि दर्शनीय स्थल हैं। इनके अतिरिक्त यहां विशाल कीठम झील एवं कीठम पक्षी विहार हैं जहां हजारों प्रकार के पक्षी कभी भी देखे जा सकते हैं। यहां दयालबाग तथा मनकामेश्वर मंदिर एवं गुरु का लाल गुरुद्वारा भी दर्शनीय है।
लखनऊ- यह उत्तर प्रदेश की राजधानी का नगर है। यहां विधान सभा भवन, दारुल सफा इमामबाड़ा आदि इमारतें अति भव्य एवं दर्शनीय हैं। लखनऊ का चिड़ियाघर भी प्रसिद्ध है। यह अदब का शहर है। यहां चिकन-जरी का काम होता है।
झांसी- रानी लक्ष्मीबाई की राजधानी झांसी थी। झांसी का किला एवं महल दर्शनीय है।
महोबा- रियासत होने के कारण दर्शनीय है। महोबा का संबंध आला ऊदल से है।
नोएडा- आधुनिक नगर नियोजन, स्पोर्ट्स स्टेडियम तथा बॉटोनिकल पार्क के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां फिल्म निर्माण भी होता है।
रुडकी- यहां आई.आई.टी. स्थित है। यहां का रेलवे बाजार अच्छा है।
सहारनपुर- दर्शनीय नगर है।
मेरठ- यह प्राचीन हस्तिनापुर का नया स्वरूप है। यहां हस्तिनापुर के अवशेष दर्शनीय हैं। बेगम ब्रिज एवं किला प्रसिद्ध हैं।

इसी प्रकार अन्य अनेक सामान्य पर्यटन स्थल उत्तर प्रदेश में हैं। उत्तर प्रदेश में पर्यटन हेतु सड़क पथ, रेल पथ तथा वायु पथ की उत्तम व्यवस्था है। रेल पथ एवं सड़क द्वारा प्राय: सभी स्थान जुड़े हुए हैं। जिन स्थानों पर रेलवे स्टेशन नहीं हैं वहां से अधिकतम २० किमी के अंदर रेलवे स्टेशन है। राष्ट्रीय राजमार्ग २, २५, २६, २७, २९ तथा ४५ उत्तर प्रदेश से होकर ही गुजरते हैं। उत्तर प्रदेश में वर्ष के पूरे बारह महीने पर्यटन की समुचित व्यवस्था है।

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