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उत्तर प्रदेश भारत का एक विशिष्ट राज्य है। इस राज्य की विशेषताएं इसे अन्य प्रदेशों की अपेक्षा अलग एवं विशेष राज्य बनाती हैं। पौराणिक काल से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश ने भारतीय जीवनशैली, धर्म और संस्कृति में अपनी विशेष छाप छोड़ी है। पिछले दस साल के बाद आए राजनीतिक परिवर्तन और भाजपा की बहुमत की सरकार बनने से लोग उम्मीदें सजा रहे हैं।

राज्य किसी राष्ट्र के अन्तर्गत सब से बड़ी सामाजिक इकाई है। यद्यपि परिवार, पड़ोस, गांव/नगर, तहसील तथा जनपद भी सामाजिक इकाइयां हैं। परन्तु ये सभी इकाइयां राज्य से छोटी इकाइयां हैं तथा सभी राज्य के अधीन हैं। जिस तरह भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियां एक राष्ट्र को दूसरे से अलग दर्शाती हैं और उसकी पहचान बनती हैं, उसी प्रकार भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक व राजनैतिक परिस्थितियां एक राज्य को दूसरे राज्य से पृथक कर उसे एक विशेष पहचान देती हैं। इस प्रकार यह भी कहा जा सकता है कि राज्य एक स्वायत्त संगठन है, जो राष्ट्र के अन्तर्गत अपना विशिष्ट अस्तित्व एवं महत्व रखता है।

उत्तर प्रदेश भारत का एक विशिष्ट राज्य है। इस राज्य की विशेषताएं इसे अन्य प्रदेशों की अपेक्षा अलग एवं विशेष राज्य बनाती हैं। उत्तर प्रदेश का भूगोल अद्वितीय है। यह भारत के उत्तर पूर्व में स्थित है। इस राज्य की सीमाएं उत्तर में उत्तराखण्ड; पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान; दक्षिण में मध्यप्रदेश तथा पूर्व में बिहार से मिलती हैं। यह राज्य गंगा-यमुना, गोमती-घाघरा, ब्रह्मपुत्र, चंबल आदि नदियों से सिंचित मैदानी राज्य है। नदियों के किनारे विभिन्न तीर्थ स्थल स्थित हैं। हिमालय क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की सीमा नेपाल से लगती है अत: यहां पर्वतीय मनोरम झांकियां भी दृष्टव्य हैं।

फसलों में यहां गेहूं, जौ, बाजरा, मक्का, चावल, गन्ना एवं चुकन्दर प्रमुख हैं। उद्योग के स्तर पर भी उत्तर प्रदेश का अपना महत्व हैं। यहां सूती एवं रेशमी वस्त्र, चमड़ा, कांच, चीनी, चीनीमिट्टी, मिष्ठान्न, इत्र, सुपारी एवं चांदी, पीतल आदि का उद्योग विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान रखता है।

राज्य का पुराणकालीन महत्व
पुराणकाल में देखने को मिलता है कि भारत वर्ष के प्रत्येक राज्य का अपना अलग महत्व था। पौराणिक समय से लेकर लगभग पांचवीं-छठवीं शताब्दी तक भारतवर्ष शब्द का प्रयोग हिमालय के दक्षिण में तथा सागर के उत्तर में स्थित विशाल भू-भाग के लिए किया जाता रहा है परन्तु एक राष्ट्र के रुप में नहीं। यथा-

‘‘उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रैश्चैत दक्षिणम्।
वर्ष तद भारतम् नाम भारती सत्र सन्तति॥

दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि पुराणकाल में भारत एक अलग दुनिया का नाम था। यह वह दुनिया थी जिसमें दिव्यता, भव्यता एवं श्रेष्ठता विद्यमान थी। अर्थात दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में जब लोग निर्वस्त्र रहते थे अथवा खाल या छाल लपेटते थे तब भारत में रेशमी वस्त्र पहने जाते थे। दुनिया के दूसरे हिस्सों में तब लोग जानवरों का कच्चा मांस खाकर नदियों- झीलों के किनारे खानाबदोशी जीवन व्यतीत करते थे तब भारतवर्ष में लोग छप्पन भोग एवं छत्तीस प्रकार के व्यंजनों का उपभोग करते हुए भव्य भवनों में रहा करते थे।

उत्तर प्रदेश भारतवर्ष की उसी दिव्यता, भव्यता एवं श्रेष्ठता का केन्द्र है। भारत वर्ष में पुराणकाल में सोलह महाजनपद हुआ करते थे। जिनके नाम हैं क्रमश:-कौशल, शूरसेन, काशी, चेदि, मगध, पांचाल, गंाधार, अवंती, मिथिला, मत्स्य, वत्स, वज्जि, अंग, कुरु, काम्बोज, अश्मक। इन सोलह महाजनपदों में से कुरु, पांचाल, शूरसेन, काशी, वत्स तथा चेदि महाजनपद उत्तर प्रदेश में ही थे। बाद में इनमें एक नाम ‘मल्ल’ और जुड़ गया। इस तरह उत्तर प्रदेश में कुल आठ महाजनपद थे। इनमें कुरु महाजनपद हस्तिनापुर, मेरठ से लेकर हरियाणा में कुरुक्षेत्र तथा इन्द्रप्रस्थ तक फैला हुआ था। इसकी राजधानपी वर्तमान मेरठ (प्राचीन हस्तिनापुर) के बाद वर्तमान दिल्ली (प्राचीन इन्द्रप्रस्थ) रहे। पांचाल महाजनपद का क्षेत्र बरेली, बदायूं से होते हुए फर्रुखाबाद तक था। कौशल महाजनपद आयोध्या, फैजाबाद से श्रावस्ती तक फैला हुआ था। शूरसेन महाजनपद में मथुरा एवं ब्रज का क्षेत्र था। मथुरा यहां की राजधानी थी। काशी महाजनपद वर्तमान वाराणसी के चारों ओर का क्षेत्र था। इस क्षेत्र की राजधानी बनारस थी। ‘वत्स’ नामक महाजनपद प्रयाग से कौशाम्बी तक था। ‘चेदि’ महाजनपद के अर्न्तगत बुंदेलखंड आता था तथा मल्ल महाजनपद का क्षेत्र वर्तमान देवरिया एवं आसपास के जनपद थे।

पुराणों में काशी को पतित पावणी मोक्षदायिनी कह कर संबोधित किया गया है। मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान शिव ने अपने त्रिशुल की नोंक पर की थी। कौशल साम्राज्य में अयोध्या सूर्य के पुत्र इक्क्षाकु-वंश के राजाओं की राजधानी है। महाराजा मांधाता, शिवि, हरिश्चन्द्र, दिलीप, रघु, भगीरथ, दधीचि एवं श्री राम (जिन्हें कि हम मर्यादा पुरुषोत्तम एवं ईश्वरीय अवतार स्वीकार करते हैं) की भी राजधानी अयोध्या ही रही है। श्री राम के भाई शत्रुघ्न ने मधु नामक दैत्य का वध करके मधुबन में परम वैभवशाली अर्ध चंद्राकार नगरी मधुपुरी (मथुरा) की स्थापना की। महाराज शत्रुघ्न के पुत्र शूरसेन के नाम पर इस राज्य को शूरसेन प्रदेश कहा गया। ब्रज चौरासी कोस का क्षेत्र भी इसी महाजनपद का क्षेत्र है। इसे बाद में ब्रज कहा गया तथा इसी मथुरा में अंहकारी कंस के वध हेतु श्री कृष्ण का अवतार हुआ। इसी क्षेत्र में योगेश्वर श्री कृष्ण ने अपनी लिलाएं कीं। कुरु साम्राज्य में कौरव एवं पाण्डवों के मध्य राज्य के विवाद के कारण प्राचीन काल का सब से बड़ा युद्ध महाभारत हुआ जिसमें तब लगभग अड़तालीस लाख लोगों की मृत्यु हुई। पांचाल महाजनपद में द्रुपद नाम के प्रतापी राजा हुए। इन्हीं की पुत्री का नाम द्रौपदी था। द्रौपदी महाभारत के कारणों में प्रमुख थीं। यदि सभा के मध्य द्रौपदी का अपमान न होता तो महाभारत भी न होता। वत्स नामक महाजनपद में तीर्थराज प्रयाग से लेकर कौशाम्बी तक का क्षेत्र था। इस राज्य से भगवान श्रीकृष्ण से लेकर महाराज श्री हर्ष तक अनेक राजाओं का विशेष सम्बन्ध रहा है। मल्ल साम्राज्य में पौराणिक वराह अवतार की कथा प्रचलित है। यहीं बलिया जनपद में वराह क्षेत्र है जबकि कुछ विद्वानों के अनुसार ब्रज क्षेत्र के अंतर्गत सोरों (कासगंज) को वराह क्षेत्र स्वीकार किया जाता है। प्राचीन चेदि साम्राज्य का सम्बंध भी महाभारत काल से है। चेदिराज ने महाभारत के युद्ध में सहभागिता की थी। वर्तमान बुंदेलखंड ही चेदि साम्राज्य है।

इस प्रकर पुराणकाल में उत्तर प्रदेश राज्य अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्राचीन नगरियों में से (जिन्हें कि अविनाशी कहा जाता है) अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार (वर्तमान में उत्तराखंड में चला गया है) काशी आदि इस प्रदेश का गौरव बढ़ाती हैं। भगवान के अवतारों में वराह अवतार, नृसिंह अवतार, परशुराम अवतार, श्रीराम अवतार, बलराम अवतार एवं श्री कृष्ण अवतार से बुद्ध अवतार तक उत्तर प्रदेश में ही हुए हैं। अत: उत्तर प्रदेश भारतवर्ष में अपना विशिष्ट एवं अद्वितीय महत्व रखता है।

स्वतंत्रता संग्राम
भारतवर्ष पर देशी सियासतों की आपसी शत्रुता एवं लड़ाई-झगड़ों के कारण अनेक विदेशियों के आक्रमण होने लगे और इस तरह हूण, शक, पठान, अरब, तुर्क, मंगोल, मुगल, अफगान आदि बर्बर जातियों ने भारतवर्ष की धन संपदा को लूटा तथा भारत पर अधिकार करने के हर संभव प्रयास किए गए। इस तरह लगभग १२६० वर्ष तक भारतवर्ष को गुलामी की बेड़ियों में जकड़ कर रहना पड़ा। सोने की चिड़िया को लूटा गया और व्यापार के बहाने पुर्तगाल, डच, फ्रेंच एवं अंग्रेजों ने इस देश पर अत्याचार किए। अंग्रेजों का शासन भी अत्यंत दारुण दुख पहुंचाने वाला सिद्ध हुआ। अत: ११७० वर्ष की गुलामी के बाद क्रांति की संभावनाएं बनीं।

पहले स्वाधीनता संग्राम ( १८५७ की क्रांति) में उत्तर प्रदेश का योगदान अति महत्वपूर्ण था। क्योंकि रहीमपुर फैजाबाद उत्तरप्रदेश के मंगल पाण्डेय ने पहला विद्रोह किया जिसमें ८ अप्रैल १८५७ को मंगल पाण्डेय को फांसी दी गई। इसके बाद क्रमश: आगरा, इलाहाबाद, अंबाला, मेरठ और दिल्ली में क्रांति हुई। आगरा, इलाहाबाद और मेरठ उत्तर प्रदेश में ही हैं। इसके बाद रामपुर में उत्तर प्रदेश में क्रांति की चिंगारी भड़क उठी। फिर आगरा, बनारस और इलाहाबाद की क्रांति के फलस्वरुप बहादूर शाह जफर को दिल्ली के तख्त पर बिठाया गया। इसके पश्चात ३० जुलाई १२५७ को विद्रोहियों ने रेडन बॅटरी लखनऊ पर आक्रमण किया। इसके पश्चात क्रांति की आग कानपुर व बरेली तक पहुंची।

इस स्वाधीनता संग्राम में झांसी में विद्रोहियों (क्रांतिकारियों) का नेतृत्व झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किया। बिठुर में नेतृत्व नानासाहब पेशवा ने किया। अवध का नेतृत्व बेगम हजरत महल तथा महाराष्ट्र का स्वयं तात्या टोपे ने किया। अर्थात मेरठ से आरंभ होने वाली सन १८५७ की क्रांति में उत्तर प्रदेश ने अग्रणी भूमिका निभाई थी जिसने अंग्रजों की नाक में दम कर दिया और उनके पैर भारत से उखड़ने लगे। यह वह समय था जब ईस्ट इंडिया कंपनी की विफलता को देख कर ब्रिटिश सरकार ने भारत पर सीधे शासन शुरू कर दिया जो ९० वर्ष तक चला।

सन १८५७ की ज्वाला सही अर्थों में ठण्डी नहीं हुई थी। यह धीरे-धीरे सुलगती रही। इसके बाद पं.राम प्रसाद बिस्मिल, पं. चन्द्रशेखर आजाद जैसे महानायकों ने आजादी के लिए अपना विशिष्ट योगदान दिया। इन्होंने हिंन्दुस्थान सोशलिस्ट रिपब्लिकन फौज की स्थापना की। इनकी यह क्रांतिकारी सेना स्वाधीनता के लिए सशस्त्र क्रांति की उन्नायक बनी। पं. राम प्रसाद बिस्मिल तथा चन्द्रशेखर आजाद ने क्रांति की जो ज्वाला प्रज्वलित की वही भारतवर्ष को १५ अगस्त सन १९४७ को स्वाधीन कराने के लिए श्रेयस्कर है। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश ने महामना मदनमोहन मालवीय, पं. जवाहरलाल नेहरू तथा इसी प्रकार के अनेक महानायकों को जन्म दिया। सन १९४७ से पहले की क्रांति में उत्तर प्रदेश का महान योगदान रहा क्योंकि आगरा, मेरठ, बरेली, मुरादाबाद, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ तथा कानपुर के साथ-साथ बनारस भी स्वाधीनता संग्राम के केंद्रबिन्दु बने। कानपुर के उग्र प्रदर्शन आगरा व मेरठ में क्रांतिकारियों के हथियार बनाने का काम तथा इलाहबाद के अल्फ्रेड पार्क में स्वाधीनता के महानायक चन्द्रशेखर आजाद का बलिदान एवं बनारस में पं. मदनमोहन मालवीय के प्रयासों से हिन्दू विश्वविद्यालय (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) की स्थापना भी अति महत्वपूर्ण हैं। मथुरा में पं.श्रीराम भक्त द्वारा स्वाधीनता आंदोलन अति महत्वपूर्ण रहे हैं।

स्वतंत्रता संग्राम में सभी भारतीयों ने अपने-अपने तरीके से अपना योगदान दिया। कलमकारों ने यह लड़ाई कलम के माध्यम से लड़ी। इस क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश के कलमकारों का योगदान विशेष है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सियारामशरण गुप्त जैसे स्वाधीनता के दीवाने लेखक उत्तर प्रदेश में ही जन्मे।
इस तरह भारतीय स्वतंत्रता के संग्राम में उत्तर प्रदेश के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

राज्य का राजनैतिक महत्व
वर्तमान भारतवर्ष में यद्यपि प्रत्येक राज्य का अपना राजनैतिक महत्व है तथापि उत्तर प्रदेश के राजनैतिक महत्व पर दृष्टि डालना अत्यंत आवश्यक है। स्वाधीनता संग्राम के उपरांत १५ अगस्त १९४७ को भारत अंग्रेजी पराधीनता की बेड़ियों को तोड़ कर स्वतंत्र राष्ट्र बना। लाल किले पर पहली बार तिरंगा ध्वज फहराया गया। भारत के प्रथम प्रधान मंत्री बने पं. जवाहरलाल नेहरू जो कि उत्तर प्रदेश के ही निवासी थे। इस तरह तिरंगा ध्वज भी उत्तर प्रदेश के नागरिक के हाथों ही फहराया गया। भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री का जन्म भी मुगलसराय उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके अतिरिक्तत भारत के चौधरी चरणसिंह, श्रीमती इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह तथा अटल बिहारी वाजपेयी का भी सम्बंध उत्तर प्रदेश से ही रहा है। अत: यह कहना भी उचित ही होगा कि उत्तर प्रदेश ने देश को सर्वाधिक और सबसे महत्वपूर्ण प्रधानमंत्री दिए हैं।

इतना ही नहीं यह भी देखने में आता हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुडे नेता ही राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में रहे हैं। वर्तमान समय में भारत के केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं।
उत्तर प्रदेश की कुल लोकसभा सीटों में सर्वाधिक लोकसभा सीटें अकेले उत्तर प्रदेश की हैं। अत: उत्तर प्रदेश की राजनीति विशेष महत्वपूर्ण है।
प्रथम महिला आई. पी.एस. किरण बेदी ने तो यहां तक कहा था कि भारतीय राजनीति को सुधारने के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीति को सुधारने की आवश्यकता है। यदि उत्तर प्रदेश में सुधार होता है तो पूरा देश सुधर जाएगा।
विधान सभा चुनाव के समय माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने भी स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश का विकास भारत के विकास के लिए परम आवश्यक है क्योंकि उत्तर प्रदेश देश का सब से बड़ा राज्य है। देश की कुल जनसंख्या की २०% जनसंख्या केवल उत्तर प्रदेश में निवास करती है।

विगत दस वर्ष की स्थिति:
विगत दस वर्ष उत्तर प्रदेश के लिए बड़े दुर्भाग्य पूर्ण सिद्ध हुए। इन वर्षों में प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी तथा समाजवादी पार्टी का शासन रहा जो कि अत्यंत भयावह रहा। इन वर्षों में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति रही। हिंदुओं (प्रदेश के बहुसंख्य कहलाने वाले वर्ग) पर अत्याचार हुए। बेरोजगारी और गरीबी का ग्राफ बढ़ा। इतना ही नहीं साम्प्रदायिक दंगे हुए जिनमें हिंदुओं का शोषण तथा मुस्लिमों का पोषण हुआ। जातिवाद की राजनीति हावी रही। दलितों के नाम पर मुस्लिमों के नाम पर तथा यादवों के नाम पर उत्तर प्रदेश में आतंक व्याप्त रहा। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई। महिलाओं के प्रति अपराध अप्रत्याशित गति से बढ़े। शिक्षा का प्राय: नाश हो गया। माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश नकल अफवाओं का अड्डा बन गया। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी अभूतपूर्व भ्रष्टाचार हुआ। नौकरी के नाम पर ऊंची सिफारिशें और घूसखोरी रही। भू माफियाओं ने अवैध कब्जे किए। मथुरा के प्रसिद्ध जवाहर बाग में रामवृक्ष यादव और उसके गुर्गों ने जवाहर बाग में मुकुल हवेदी और इस्पेक्टर संतोष यादव की निर्मम हत्या कर दी। इस घटना में भंयकर गोलीबारी हुई जिसमें कई दर्जन लोगों की जान गईं। तत्कालीन सरकार ने इस घटना को केवल इसलिए अनदेखा किया कि यहां के बर्बर आंतकी यादव थे और उनका उत्तर प्रदेश की यादव सरकार से संबंध था। जवाहर बाग कांण्ड देश का भीषण कांड था। फिर भी यादव सरकार ने उसे भीषण नहीं माना। विकास के बड़े-बड़े वादे करने वाली सरकार ने नारा दिया ‘‘काम बोलता है’’ लेकिन प्रदेश की जनता ने केवल और केवल तानाशाही माना तथा २०१७ के चुनाव में ब.स.पा और सपा उत्तर प्रदेश से पूरी तरह से साफ हो गई।

वर्तमान स्थिति
२०१७ के चुनाव के पश्चात उत्तर प्रदेश के राजनैतिक जीवन में बड़ा परिवर्तन आया है। समाजवादी पार्टी के काले शासन के अंत के बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। इस सरकार में गोरक्ष पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद ही कुछ क्रांतिकारी निर्णय लिए। इन निर्णयों ने उत्तर प्रदेश की बिगड़ी दशा और दिशा को सुधारने के लिए मील के पत्थर का काम किया है। शिक्षा की दशा सुधारने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। जिनमें उत्तर प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में कॉन्वेन्ट के समान शिक्षा दिए जाने का प्रावधान, बेटियों को उच्च शिक्षा तथा चिकित्सा विभाग में डॉक्टरों की नियुक्ति, मशीनों की व्यवस्था एवं स्टाफ द्वारा मरीजों की संरक्षण और सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाए गए है।

विवादों एवं भीषण कांडों पर सी.बी.आई. जांच बिठाई गई है। भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी को दूर करने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। अवैध बूचड़खाने बंद किए गए हैं। गायों की सुरक्षा की जा रही है तथा उत्तर प्रदेश के विकास के पूर्ण प्रयास किए जा रहे हैं।
आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आगे के साढ़े चार साल में उत्तर प्रदेश का भव्य विकास होगा तथा यह प्रदेश अपने गौरव को प्राप्त कर सकेगा।

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