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घुसपैठ कई तरह की है। सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक जैसे उसके कई आयाम हो सकते हैं। इसके प्रति सरकार और जनता दोनों को सतर्क रहने की आवश्यकता है। हमारी ढिलाई भविष्य की एक बड़ी और न सुलझने वाली समस्या को न्योता दे रही है इसे नहीं भूलना चाहिए।
 
मानव इतिहास इस वास्तविकता का साक्षी है कि हमारे राष्ट्रीय, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, शैक्षणिक, जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्याओं का एकमात्र कारण घुसपैठ ही होता है। घुसपैठ का असर राष्ट्रीय, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक व आर्थिक जीवन पर अवश्य ही पड़ता है। अनेक बार परिवर्तन लाने के लिए ही घुसपैठ की जाती है। घुसपैठ के परिणाम दूरगामी, दीर्घगामी होते हैं। घुसपैठ के आयाम, माध्यम अलग-अलग हैं परन्तु एकमात्र प्रभाव परिवर्तन ही होता है। आज विश्व में व विशेषत: भारत में घुसपैठ की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। अलग-अलग क्षेत्र के लोग, विचारधारा के लोग घुसपैठ को अलग-अलग रूपों में देखते हैं। रामायण में कहा है- ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’’ अर्थात- ईश्वर को लोग अपनी भावनाओं के अनुरूप ही देखते हैं। यही बात घुसपैठ की समस्या पर भी लागू होती है।
भारत में घुसपैठ को समस्या को हम एक विशेष समुदाय, धर्म के लोग जो हमारे पड़ोसी देशों से भारत में अनधिकृत रूप से आते हैं तथा भारत में स्थायी हो जाते हैं; से जोड़ कर ही देखते हैं। इस विचारधारा में अध्ययन, मनन तथा परिवर्तनात्मक रूप से विचार करने की आवश्यकता है। केवल धर्म, समुदाय के साथ ही यदि इस समस्या को देखा गया तो हम राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक सुधार नहीं कर पाएंगे। यह समस्या विकराल ही होती जाएगी। इस लेख में घुसपैठ की समस्या को एक अलग रूप से देखने का प्रयत्न किया है।
घुसपैठ होती क्यों है? किसी भी समाज मे,ं धर्मविशेष मे,ं राजनैतिक पक्षों में, उद्योग जगत में, यदि परिवर्तन लाना है तो हमें उस धर्म में, समुदाय में, विचारधारा में, राजनैतिक पक्ष में, संगठन में, राष्ट्र में अपना प्रभावशील स्थान बनाना पड़ता है। घुसपैठ एक कल्पना है। चूंकि वह काल्पनिक होती है उसे हम देख नहीं पाते है। इसीलिए हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं। परन्तु इस घुसपैठ के परिणाम, दुष्परिणाम एक कालावधि के बाद दिखाई पड़ते हैं। तब तक समस्या विकराल रूप धारण कर लेती है। भारत में आए हुए शरणार्थी तथा अनधिकृत रूप से आए हुए करोड़ों लोग इस वास्तविकता का स्वरूप तथा परिणाम हैं।
घुसपैठ के कारण क्या हैं? घुसपैठ के अनेक कारण हैं। सब से पहला होता है जीवन यापन करना। लोग अपनी आर्थिक परिस्थिति सुधारने के लिए गांव से शहर में, शहर से महानगरों तथा एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र में जाते हैं। आज भारत में विश्व के लगभग ४८ राष्ट्रों से अनधिकृत रूप से आए हुए लोग निवास कर रहे हैं। इनमें बांग्लादेश, श्रीलंका, पाकिस्तान, अङ्गगानिस्तान, ब्रह्मदेश, मध्यपूर्व एशिया तथा अङ्ग्रीका के देशों से आए हुए लोग प्रमुख हैं। पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से आए हुए घुसपैठिए केवल जीवन यापन के लिए नहीं आए हैं। ऐसी घुसपैठ एक दीर्घकालीन रणनीति, धर्मनीति के कारण की जाती है। इन बांग्लादेशी घुसपैठियों के माध्यम से एक नए समुदाय को तैयार किया जा रहा है जिसका सूत्र संचालन मध्यपूर्व एशिया, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश से किया जाता है। रोजगार प्राप्ति के लिए, नौकरी पाने के बहाने भारत में विशेष कर बंगाल, बिहार, तथा उत्तर पूर्व के असम, नगालैंड, मिजोरम, अरुणाचल, त्रिपुरा, मेघालय जैसे राज्यों में आते हैं और यहीं बस जाते हैं। इन घुसपैठियों को एक धर्म विशेष, समुदाय के लोग आश्रय देते हैं। कानून व्यवस्था से इन्हें बचाते हैं। पुलिस कर्मियों को पैसे देकर जाली जन्म प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, आधार कार्ड आदि दस्तावेज तथा प्रमाण खरीद लेते हैं। ज्यादा संख्या में पहले पुरुष वर्ग ही घुसपैठ करता है। कुछ अवधि के बाद इनके परिवार के लोग भारत में आ जाते हैं। कम मजदूरी, वेतन में काम करते हैं। नौकरी करते हैं। भारत में सक्रिय राजनैतिक तथा उनकी सहायता करने वाले असामाजिक, धार्मिक संगठन इन घुसपैठियों की सहायता करते हैं तथा संरक्षण देते हैं। असम तथा बंगाल में इन घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में भी आ गए हैं। अब ये घुसपैठिए ‘मतदाता’ बन गए हैं। इनका उपयोग हर राजनैतिक दल (इस सत्य में एक भी अपवाद नहीं है) करता है। घुसपैठियो को राज्यों से बाहर भेजने के नाम पर वोट मांगते हैं, इनके माध्यम से सत्ता में आते हैं, सरकार चलाते हैं तथा इन्हीं का उपयोग सत्ता में बने रहने के लिए करते हैं।
जब मैं पूर्वोत्तर भारत में कार्यरत था तब मैंने १९९८ में लिखित रूप से शासन (राज्य शासन – केंद्र शासन), खुङ्गिया संगठन, पुलिस को आगाह किया था कि यदि घुसपैठ की समस्या का हल नहीं निकाला गया तो २०२६ में होने वाले चुनावों में बांग्लादेश में जन्मा व्यक्ति, जो असम तथा त्रिपुरा में स्थायी हो गया है, असम मंत्रिमंडल का सदस्य होगा या मुख्यमंत्री भी बन सकता है। यह संभव होगा क्योंकि बांग्लादेश से आए विस्थापित, घुसपैठिए बड़ी संख्या में मतदाता होंगे। इस वास्तविकता को कोई नहीं टाल पाएगा। पिछली असम सरकार में तीन मंत्री घुसपैठियोें के मतों के आधार पर ही चुनाव जीते थे। इसी सत्य से असम के दो राज्यपालों ने अपनी रिपोर्ट से भारत के राष्ट्रपति तथा केन्द्र शासन को अवगत कराया था। दुर्भाग्य यह है कि भारतीय शासन व्यवस्था कुंभकर्णीय नींद से कभी जागी ही नहीं।
बांग्लादेश, म्यांमार, अङ्ग्रीका, पाकिस्तान से आए अनधिकृत नागरिक- घुसपैठिए आज भारत के सभी प्रातों में ङ्गैले हुए हैं। लद्दाख में भी पाकिस्तान, मध्य एशिया से कई लोग आकर बस गए हैं। लेह में तो लोगों ने दुकानें भी खरीद ली हैं। लेह से लेकर लेखापानी (असम) तक तथा जयरामपुर (असम) से लेकर जामनगर, द्वारिका, भुज तक घुसपैठिए ङ्गैल गए हैं। समुद्री किनारों पर गुजरात से लेकर बंगाल तक घुसपैठिए ङ्गैल गए हैं। यह राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत चिंता का विषय है। महाराष्ट्र के अलीबाग से लेकर सावंतवाडी, गोवा, कर्नाटक, केरल में मध्य पूर्व एशिया तथा रूस से लगे आर्मेनिया, चेचन्या राष्ट्रों के एक विशेष धर्मसमूह तथा समुदाय के लोग आकर बस रहे हैं। मालदीव के निवासी भी पश्चिमी समुद्री तट पर आकर बस रहे हैं। आने वाले भविष्य में अब पाकिस्तान से आने वाले आतंकवादियों को मुंबई तट पर उतरने की आवश्यकता नहीं होगी। मुंबई से १० किलोमीटर दूर से ही आतंकवादी आक्रमण करके भाग जाएंगे। बचा हुआ विध्वंसक कार्य, दंगा ङ्गसाद, तोड़ङ्गोड़ शहरों में रह रहे घुसपैठिए करेंगे। हमारे राजनैतिज्ञ तथा शासकीय अधिकारियों को उन तमाम समस्याओं का अध्ययन, विचार-विमर्श करके योजनाबद्ध तरीके से निदान करने का समय ही नहीं है। ना ही वे विशेषज्ञों की राय लेना चाहते हैं। समय आने पर हम सब कुछ करेंगे इस प्रकार के झूठे आश्वासन देते हैं। एक पाखंडी अपराधी व्यक्ति को, जो स्वत: को सच्चा भगवान बताता है, न्यायालय से अपराधी घोषित होने के केवल एक घंटे में ही पंजाब तथा हरियाणा में योजनाबद्ध तरीके से दंगा, ङ्गसाद, मारपीट, शासकीय सम्पत्ति का नुकसान होना एक मिसाल है। यह दर्शाता है कि घुसपैठिए किस प्रकार से योजनाबद्घ रूप में अपनी विघ्वंसक कार्रवाई करके भाग जाते हैं। यह राजनैतिक तथा शासकीय संरक्षण के बिना संभव नहीं हो सकता था।
कुछ समय से म्यांमार (ब्रह्मदेश) से भाग कर आए रोहिंग्या समुदाय के लोग जम्मू तथा काश्मीर में आकर बसने लगे हैं। ये धर्म तथा समुदाय के नाम पर म्यांमार में ङ्गैली हिंसा के कारण वहां से भाग रहे हैं। ये घुसपैठिए हैं। ये अनधिकृत रूप से चोरी-छिपे भारत में घुसे हैं। महत्वपूर्ण प्रश्न है कि ये जम्मू-काश्मीर तक कैसे व क्यों आए? क्योंकि यहां इन्हें सामुदायिक तथा धार्मिक संरक्षण मिलेगा। जो कश्मीर के सक्रिय अलगाववादी, भारतद्रोही, गद्दार तथा आतंकवादी तत्व व उनके मुखिए इन रोहिंग्या समुदाय के लोगों को धर्म तथा समुदाय के नाम पर संरक्षण तथा आर्थिक सहायता देंगे। सीमा पार से पाकिस्तान इन तक आसानी से पैसा, विस्ङ्गोटक सामग्री तथा शस्त्र पहुंच सकेगा तथा योजनाबद्घ तरीके से इन घुसपैठियो के जरिए भारत विरोधी कार्रवाइया करवाई जाएंगी। इसमें बिलकुल शंका नहीं है।
घुसपैठ अब केवल व्यक्तियों तक ही सीमित नही हैं। २१वीं सदी में घुसपैठ के प्रकार, कल्पना, व्याख्या तथा गहराई बदल रही है। पिछले दो सालों में लीबिया, सीरिया, इराक, अङ्गगानिस्तान, पाकिस्तान से लाखों की संख्या में विस्थापित लोग यूरोप में पहुंच गए हैं। इसमें बच्चे, महिलाएं भी हैं। आज ५ वर्ष का बच्चा जब कुछ साल में वास्तविकता से परिचित होगा तब उसके मन में अवश्य ही बदले की भावना जागृत होगी। केवल १० वर्षों के अंतराल में यूरोपीय देशों में आतरिक असुरक्षा तथा कलह ङ्गैलेगी यह निश्चित है। भविष्य में जर्मनी के मंत्री व चांसलर भी एक विशेष धर्म तथा समुदाय के हो सकते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे आने वाले दस वर्षों में ही असम का मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्री बांग्लादेश में जन्मा भारतीय नागरिकता प्राप्त करने वाला व्यक्ति हो सकता है। इस कल्पना को साकार करने वाले लोग असम, बंगाल के ही कुछ लोग हो सकते हैं।
नगालैंड में साम्य सीमा से लगे कुछ जिलों में जहां सीमा जाति के हमारे ही नागरिक हैं उन क्षेत्रों में ‘सीमिया’ नाम का एक समुदाय बन रहा है। सीमा जाति की महिलाएं बांग्लादेश से आए घुसपैठियोें से पैसे के प्रलोभन में शादियां कर रही हैं तथा अपना धर्म परिवर्तन भी कर रही हैं। इन सीमा जाति के लोगों के भोलेपन तथा सरलता का ङ्गायदा योजनाबद्घ तरीके से हो रहा है। मिजोरम-असम तथा मिजोरम-त्रिपुरा राज्यों के सीमा क्षेत्र में भी यही हाल है। क्या यह माने कि पिछले दस वर्षों में राज्य शासन इस वास्तविकता को नहीं जानता है? उत्तर पूर्व भारतीय राज्यों में धर्म तथा समुदाय के नाम पर एक नई दूरगामी कार्य योजना चल रही है। असम गण परिषद, असम विद्यार्थी यूनियन ने बांग्लादेशी घुसपैठियो को बांग्लादेश वापस भेजने के लिए आंदोलन किया था। १९७८ में उल्ङ्गा नामक आतंकवादी संगठन भी तैयार हुआ। उल्ङ्गा ने भी यही मांग की थी कि बांग्लादेश के घुसपैठिए वापस जाएं। परन्तु आश्चर्य की बात है कि बांग्लादेश में सक्रिय चीन तथा पाकिस्तान समर्थक तत्वों की सहायता से उल्ङ्गा नामक संगठन के मुख्यालय का संचालन बांग्लादेश से ही किया जाता है। वहां उल्ङ्गा ने अनधिकृत रूप से एकत्रित करोड़ों रुपया व्यवसाय में लगाया। आज भी उल्ङ्गा आतंकवादी संगठन के अड्डे बांग्लादेश तथा चीन में सक्रिय तथा सुरक्षित हैं। वर्तमान बांग्लादेश शासन उल्ङ्गा संगठन पर कठोरता से कार्रवाई कर रहा है। परंतु बांग्लादेश में सक्रिय पाकिस्तान समर्थित धार्मिक तथा सामुदायिक संगठन अभी भी उल्ङ्गा आतंकवादियों की चोरीछिपे सहायता करते हैं।
२१वी सदी में घुसपैठ के प्रकार- कार्यपद्घति तथा आयाम बदल रहे हैं जो इस प्रकार हैं-
आर्थिक घुसपैठ – जाली मुद्रा को भारत में भेज कर भारतीय आर्थिक व्यवस्था पर आघात करना आर्थिक घुसपैठ है। हमारे ही बंगाल प्रांत की वर्तमान सरकार की अकर्यव्यता, अक्षमता, अयोग्यता के कारण यह हो रहा है।
व्यापारिक घुसपैठ – चीनी वस्तुओं की भारत में भारी संख्या में बिक्री एक बड़ी आर्थिक समस्या का रूप धारण कर चुकी है। कम कीमत पर मिलने वाली चीनी वस्तुओं का आयात अनधिकृत रुप से पड़ोसी राष्ट्रों के मार्गों से ही होता है। मणीपुर-असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघायल – राज्यों से बड़ी मात्रा में चीनी वस्तुएं भारत में आती हैं। यह भी एक आर्थिक तथा औद्योगिक घुसपैठ ही है जिसके दुष्परिणाम भारतीय मानसिकता, तथा अर्थव्यवस्था पर पड़ रहे हैं। हमें इसका प्रतिकार तथा बहिष्कार करना चाहिए। जिस सैन्य तथा सामरिक के शक्ति आधार पर चीन भारत तथा अन्य पड़ोसी देशों पर घौंस जमाता है, विस्तारवादी नीति चलाता है, युद्ध की धमकी देता है उसका मूल आधार चीन की आर्थिक शक्ति है। चीन की आर्थिक शक्ति तथा सम्पन्नता का आधार उद्योग है। उद्योग का आधार चीनी वस्तुओं का निर्यात है। यदि हम भारत में चीनी वस्तुओं का उपयोग, आयात बंद कर दें तो इसके आर्थिक परिणाम चीन पर अवश्य ही होंगे। यदि चीन की आर्थिक स्थिति सक्षम न रही तो चीन की सेना में सक्षमता रहेगी क्या? हमें योजनाबद्ध तरीके से चीनी आयात पर अंकुश लगाना पड़ेगा। यह कार्य शासन नहीं कर पाएगा। शासकीय पद्धति की अपनी सीमाएं होती है। यह कार्य जनता को ही करना होगा। यदि हम चीनी वस्तुओं का उपयोग ही नहीं करेंगे तो आयात कौन करेगा?
शिक्षा के माध्यम से घुसपैठ करके मानसिकता पर आक्रमण किया जाता है- अंग्रेज शासकों ने लार्ड मैकाले द्वारा प्रतिवेदित शिक्षा पद्घति के माध्यम से पूरे भारत की मानसिकता बदल डाली तथा हमें बाबू तथा गुलाम बना कर हम पर शासन किया। यही मानसिकता हमें आज भी गुलामी की विचारधारा से मुक्त नहीं होने दे रही है। आज भी हमारे यहां एक समृद्घ तथा प्रभावशाली वर्ग ऐसा है जो विदेशी भाषा, सामग्री, शासन प्रणाली, शिक्षण पद्घति, आचार-विचार को प्रधानता देकर विदेशी ताकतों को मजबूत कर रहा है। हम अपने आपको भारतीय ना मान कर अंग्रेजी तथा पाश्चात्य पद्घति के गुलाम रहने में गर्व महसूस करते हैं। हमें इसमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है!
राष्ट्रीय व सामाजिक विचारधारा में घुसपैठः इंटरनेट, मोबाइल ङ्गोन आदि माध्यमों से आप लोगों की मानसिकता, राष्ट्रीय भावना, सामाजिक शांति पर आघात कर सकते हैं। अङ्गवाहें ङ्गैला कर झूठी खबरें ङ्गैला कर सामाजिक, धार्मिक, सामुदायिक द्वेष ङ्गैला सकते हैं। माओवाद, अलगाववाद, कट्टरवाद, आंतकवाद को प्रोत्साहित करके राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आतंरिक शांति व्यवस्था पर आघात कर सकते हैं।
संरक्षण क्षेत्र में घुसपैठ आज दुनिया में अनेक देश हैं जो युद्ध साधन शस्त्र, युद्घ विमान, मिसाइल आदि का निर्माण करते हैं तथा निर्यात करते हैं। अत्यंत चतुराई से वे दो देशों में वाद-विवाद, शत्रुता करा सकते हैं तथा युद्धात्मक स्थिति निर्माण कर सकते हैं; यह सब राष्ट्रीय शासन, राष्ट्रीय नेतृत्व, सैन्य नेतृत्व तथा सेनाओं की कार्यप्रणाली में घुसपैठ करके संभव होता है। अङ्गगानिस्तान का आतंकवाद, अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता, चीन-पाकिस्तान मैत्री, चीन-पाकिस्तान मैत्री करार तथा भारत के प्रति शत्रुता, अमेरिका का इराक पर मार्च २००३ आक्रमण,लीबिया में सत्ता परिर्वतन, कर्नल गद्दाङ्गी की हत्या, मिश्र में हिंसा तथा सत्ता परिवर्तन, अरब क्रांति, सीरिया में सत्ता परिवर्तन कराने के लिए ङ्गैलाया गया गृह युद्ध, तथा तालिबान, अल कायदा, इसिस नामक आतंकवादी संगठन राष्ट्रीय विचारधारा, सैन्य व्यवस्था, सैन्य नेतृत्व की मानसिकता में घुसपैठ तथा विदेशी हस्तक्षेप के कारण ही हुआ है। भारत में हमें अत्यंत सतर्क तथा सक्षम रहने की आवश्यकता है।
निदान क्या है?ः सीमा पार से घुसपैठ रोकने के लिए केन्द्रीय शासन से ज्यादा महत्वपूर्व भूमिका राज्य शासनों की होती है। घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी केवल सेना या अर्धसैनिक बल पर ही डाल सकते हैं। बांग्लादेश तथा अन्य पड़ोसी देशों से जो घुसपैठिए भारत में प्रवेश करते हैं वह अपना निवास सीमावर्ती राज्य जैसे असम, बंगाल, बिहार, झारखंड, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, तमिलनाडु, केरल आदि प्रांतों में ही करते हैं। शांति व्यवस्था राज्य शासन के अंतर्गत आती है। इसमें केन्द्र शासन का हस्तक्षेप राज्य शासन को मान्य नहीं होता है। इसलिए घुसपैठ रोकने तथा घुसपैठियों को शरण, प्रोत्साहन, स्थानीयता ना देने में राज्य शासन तथा केन्द्र शासन में समन्वय होना आवश्यकता है। खुङ्गिया व्यवस्था, सूचना व्यवस्था तथा कानून व्यवस्था में समन्वय की आवश्यकता है। पाकिस्तान से जो आतंकवादी, अलगाववादी, काश्मीर में प्रवेश करते हैं, उन्हें आश्रय, सूचना, आर्थिक सहायता तथा आतंकवादी आक्रमण के लिए आवश्यक जानकारी स्थानीय लोग ही देते हैं। मैं अपने चार दशक के सैन्य अनुभव तथा उत्तर पूर्व भारत, पंजाब का आतंकवाद तथा कश्मीर के आतंकवाद पर काबू पाने के अनुभव आधार पर पूर्ण विश्वास से कह सकता हूं कि पंजाब, असम तथा विशेषत: कश्मीर में स्थानीय लोगों के साथ-साथ कुछ शासकीय कर्मचारी तथा अधिकारी भी अपना कार्य चुस्ती, सजगता तथा कर्तव्य परायणता से नहीं करते हैं। इसीलिए यहां आतंकवाद, अलगाववाद, कट्टरवाद पनपता रहता है और चलता रहता है। हमें इसमें रोक लगाने की आवश्यकता है।
आर्थिक कारण तथा नौकरी पाने के लिए आने वाले लोग पूरी तरह रोके नहीं जाएंगे। परन्तु उनका दुरुपयोग करके वोट की राजनीति कर चुनाव जीतना ही मुख्य उद्देश्य नहीं हो सकता है और ना ही होना चाहिए।
यदि भारत विकसित है, शांत है, सुशासित है, औद्योगिक, व्यापारिक, आर्थिक प्रगति करेगा तभी लोग खुशहाल, समृद्घ, सुखी तथा सुरक्षित होंगे। राष्ट्रीय संरक्षण तथा सुरक्षा सर्वोपरि है और हम सब भारतवासियों को सहयोग करना चाहिए तथा अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। इसलिए कहा है-
ङ्गसल गर बाकी है तब मिले तकसीम का हक।
ङ्गसल गर राख हुई क्या मिले मजदूर का हक?
इस लेख के माध्यम से मैं तमाम भारतीय जनमानस का आह्वाहन करता हूं आइए हमारे अपने भारत को समृद्घ, कुशल तथा सुरक्षित बनाएं। किसी भी प्रकार की घुसपैठ ना होने दें।

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