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मानव सभ्यता के विकास के साथ ही धर्म और राजनीति एक-दूसरे के हाथ में हाथ डाले चल रही है। दोनों में संघर्ष भी शाश्वत है। धर्म बड़ा या राजनीति? राजनीति का माने राज्य की नीति या महज जोड़-तो़ड़ या कुटिलता? धर्म और राजधर्म का क्या अर्थ है? प्रस्तुत है विश्व भर के प्रमुख धर्मों के मुख्य सूत्रों और राजनीति पर प्रभाव का यह विहंगम अवलोकन।
 
धर्म और राजनीति का चोली-दामन का सम्बंध है। धर्म का अर्थ महज कर्मकाण्ड नहीं है, अपितु वह नैतिकता का अधिष्ठान है। धर्म का अर्थ है आचार-व्यवहार, सदाचार की स्थापना, व्यक्ति और समाज के बीच एकात्म-भाव की बुनियाद कायम करना। इस तरह धर्म एक जीवनशैली है। दूसरी ओर राजनीति का अर्थ है राज+नीति। ‘राज’ का शास्त्रों में मान्य अर्थ है शासन-व्यवस्था और ‘नीति’ उसके सुसंचालन के सूत्र हैं। दूसरे शब्दों में, शासन-व्यवस्था दुराचार पर अंकुश रखने के लिए है। इस तरह धर्म का लक्ष्य सदाचार की स्थापना से है; जबकि शासन-व्यवस्था का लक्ष्य दुराचार पर अंकुश रखकर सुशासन लाने से है।
 
राजनीति को वर्तमान समय में कूटनीति के अर्थ में लिया जाता है। असल में कूटनीति, राजनीति की दीदी है। भारतीय धर्म-सूत्रों ने इसे कृष्ण-नीति कहा है। कृष्ण-नीति पहले भी और आज भी सत्ता के गलियारों का हिस्सा रही है। इस वर्ग का दावा है कि सत्ता-स्पर्धा, युद्ध और प्रेम में सबकुछ क्षम्य है। इसमें प्राप्ति महत्व रखती है, सिद्धांतादि गौण होते हैं। विश्व का प्राचीन इतिहास इसका गवाह है। साजिश और कृष्ण-नीति में अंतर है। साजिश फरेब पर खड़ी होती, जबकि कृष्ण-नीति का आधार फरेब नहीं होता।
लगभग सभी धर्मों ने अपरिग्रह को अपने एक तत्व के रूप में स्वीकार किया है। लेकिन मोह है कि छूटता नहीं। मोह स्वार्थ को जन्म देता है। स्वार्थ स्पर्धा करवाता है। स्पर्धा में जीत के लिए तिकड़म को महत्व मिल जाता है। कुटिलता आ जाती है। धर्म-सूत्रों को त्याग दिया जाता है। इस तरह आधुनिक समय में सिद्धांतों की राजनीति शोभा की वस्तु बन गई है।
 
प्राचीन समय से लेकर अब तक शासन-व्यवस्था के विभिन्न रूप अस्तित्व में आए- १. वंशानुगत राजशाही २. योग्यता के आधार पर राजशाही ३. राजशाही के साथ गणतंत्र ४. विशुद्ध गणतंत्र, जहां कोई राजा नहीं ५. राजशाही समेत लोकतंत्र जैसे कि ब्रिटेन ६. निर्वाचन के आधार पर विशुद्ध लोकतंत्र। विचारधाराओं के आधार पर भी शासन-व्यवस्था कायम होती रही जैसे कि साम्यवाद, समाजवाद, पूंजीवाद आदि। प्राचीन समय में धर्म-सत्ता हावी थी। आज भी कई इस्लामिक देशों में वह है। वैटिकन तो कैथोलिकों का विशुद्ध धर्म-राष्ट्र है। धर्म-सत्ता और राज-सत्ता का यह संघर्ष शाश्वत है।
 
विश्व के सभी दर्शनों में शासन व्यवस्था तथा राज्य के कार्यों और व्यवस्था का जिक्र है। पूर्व और पश्चिम के राजनीतिक चिंतन में फर्क अवश्य है, लेकिन आधुनिक लोकतंत्र के कायम होने के पूर्व दोनों चिंतनों में राजा महत्वपूर्ण होता था किंतु उस पर धर्म सत्ता का नियंत्रण होता था। धर्म-सत्ता में भी शिष्य से लेकर आचार्य तक सीढ़ी होती थी। संघों में भी नियुक्तियों और चयन में तिकड़में चलती थीं। इस तरह राजनीति- कहीं कहीं इसे राजधर्म कहा गया है- धर्म-सत्ता की संरक्षक हुआ करती थी और धर्म-सत्ता राजनीतिक संस्था को अभय देती थी। इस तरह धर्म और राजधर्म एकसाथ चले हैं।
 
राजनीति का अंग्रेजी प्रतिशब्द “Politics” है। इसी प्रतिशब्द का सहारा लेकर सारा राज्यशास्त्र हमारे यहां सिखाया जा रहा है और स्वदेशी राजनीतिक चिंतन- ‘पौर्वात्य दर्शन’ या अंग्रेजी में कहे तो ‘इंडोलॉजी’ में सिमटकर रह गया है। शिक्षा नीति से जुड़ा यह विषय प्रदीर्घ, गंभीर और चिंतन का मुद्दा है। चूंकि वह इस आलेख का विषय नहीं है इसलिए इसे यहीं विराम देते हैं। बहरहाल, “Politics” शब्द का जनक यूनानी अर्थात ग्रीक शब्द “Polis” है। ‘Polis” का यूनानी भाषा में अर्थ है नगर। नगर अपने-आप में स्वतंत्र राज्य हुआ करता था, जैसे कि वर्तमान में सिंगापुर या वैटिकन है। अतः नगर-राज्य की शासन-व्यवस्था चलाने का अर्थ हुआ “Politics”। यूनान जैसे एशिया के पश्चिमी हिस्से में ही नहीं, एशिया के पूर्व हिस्से भारत में भी प्राचीन समय में नगर-राज्य हुआ करते थे। “Politics” का मतलब नगरवासियों के बीच अधिकारों और स्रोतों का वितरण तथा कर्तव्यों का प्रतिपालन कहलाता है। इसीसे ‘राष्ट्र’ बनता है।
 
पश्चिम में टोलियों का शासन हुआ करता था। टोलियों के अपने नियम या आचरण या धर्म हुआ करते थे। उनका शासन उसीसे चलता था। धर्म कर्तव्य तक सीमित न रहकर राज्य व्यवस्था का अंग बन गया। इजराईल के जेरूसलेम में तीन धर्मों का उदय हुआ- यहूदी (जू), ईसाइयत (क्रिश्चनिटी) और इस्लाम (मुहमदी पंथ)। ये धर्मसत्ता के संवाहक बने। ई.स. ६०० में इस्लाम के जुड़ जाने से कट्टरता उनमें आती गई। अर्थ यह कि पश्चिम में पिछले दो हजार वर्षों की राजनीति धर्मों ने चलाई अर्थात शासन-व्यवस्था उनके परोक्ष या अपरोक्ष रूप में उनके हाथ में रही। आज भी कैथालिक ईसाइयों का वैटिकन में नगर-राज्य मौजूद है, जबकि अधिकांश मुस्लिम देशों में राजशाही है और इस्लाम उनका राजधर्म है। धर्मसत्ता का यह इतिहास बेहद नरसंहार और युद्धों से उत्पन्न अराजकता और अस्थिरता का इतिहास है। सत्ता की लड़ाई में धर्मों ने भी अपने राजधर्म का पालन नहीं किया और भिन्न-भिन्न अवसरों पर सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी।
 
यहूदी चिंतन
बाइबल दो तरह के हैं- १. प्राचीन बाइबल हिब्रू (आर्मेनिक) भाषा में है और सिनाई की पहाड़ी पर ईश्वर ने मोजेस को जो वचन सुनाए वे उसमें उल्लेखित हैं। इस बाइबल को यहूदी मानते हैं। २. नया ईसाई बाइबल प्राचीन यूनानी भाषा स्पेतुआजिंत में है और इसमें ईश्वर का दूत ईसा बना हुआ है। दोनों-मोजेस और ईसा- को अब्राहम नामक देवदूत के जरिए ईश्वर के वचन प्राप्त होते हैं (मुहम्मद पैगंबर को भी इसी तरह देवदूत गैब्रियल से ईश्वर-वचन प्राप्त हुए हैं)। यहूदियत एवं ईसाइयत का मूल स्रोत एक होने के बावजूद दोनों के चिंतन में अंतर है। यहूदी धर्म ई.स. पूर्व दूसरी सदी का है और उसके २४ धार्मिक ग्रंथ हैं, जिन्हें ‘तोराह’ कहा जाता है। ईसाइयत- ईसा मसीह के पंथ- का बाइबल पहली सदी का है और उसमें यहूदी बाइबल के सभी वचनों को सम्मिलित किया गया है। ईसाइयत ने इसे ३९ धार्मिक ग्रंथों में बांटा है, जिसे ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ कहते हैं। उसमें बाद में संशोधन कर केवल ईसा के वचनोें को सम्मिलित कर ‘न्यू टेस्टामेंट’ बनाया गया, जिसमें २९ धार्मिक ग्रंथ हैं। इस तरह यह अवश्य कह सकते हैं कि ईसाइयत यहूदी धर्म से निकला एक पंथ या कहें तो धर्म है।
 
दोनों धर्मों में शासन व्यवस्था कमोबेश समान ही रही। राजसत्ता पर धर्मसत्ता हावी रही। यहूदियों को शासन का मौका बहुत कम मिला, इसलिए उन्हें अपने शासन में क्रमागत विकास का अवसर कम मिला। ईसाइयत के छत्र में दुनिया के विभिन्न देश थे और इससे उन्हें समय के साथ बदलने और जनोन्मुख शासन के क्रमागत विकास का अवसर मिला।
 
यहूदियों का राजनीतिक चिंतन नहीं के बराबर दिखाई देता है। उन्हें सत्ता से और इस तरह राजनीतिक अनुभवों से दूर रखने का यह परिणाम है। कुछ यहूदी चिंतकों का कहना है कि यहूदी धर्म में राजनीति को कोई स्थान नहीं है और इसलिए ‘तोराह’ में समाज और सरकार के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। लेकिन, इजरायली मनीषी येशायाहू लेईबोवित्ज ने स्पष्ट कहा है कि ‘‘..यहूदियों का कोई आचार-विचार नहीं है, कोई नीतिशास्त्र नहीं है और समाज के प्रति यहूदियों की कोई अवधारणा ही नहीं है, यह सोचना गलत है। राजनीतिक और सामाजिक प्रश्नों पर वे केवल ‘तोराह’ पर अमल करने का आग्रह रखते हैं। अतः सरकार के किसी स्वरूप विशेष का कोई महत्व नहीं है।’’ इसके विपरीत स्टुअर्ट कोहन का कहना है कि हिब्रू बाइबल में तीन राजनीतिक शक्ति-केंद्रों का विभिन्न स्थानों पर जिक्र आता है जैसे कि राब्बी (पुरोहित), राजशाही और देवदूत। लिहाजा, धर्म-सत्ता का अन्य जगहों की तरह यहां भी बोलबाला रहा। उनके धर्मग्रंथ ‘देउतेरोनोमी’ के अनुसार राजा यदि प्रजा का ठीक से पालन नहीं करता तो उसे हटा दिया जाना चाहिए। सेफर शोपेतिन का तो कहना है कि यहूदियत में राजशाही को गलत माना जाता है, क्योंकि इसमें जनता का भला नहीं होता।
 
ईसाई चिंतन
ईसाई चिंतन यहूदी चिंतन से विकसित हुआ। आरंभ में वह व्यक्ति ईसाई कहलाता था जो संसार से विरक्त हो। सेल्सस का कहना है कि, ‘‘आरंभ में ईसाई फौज से दूर रहते थे, कोई सार्वजनिक पद स्वीकार नहीं करते थे, और नगर शासन में भी किसी तरह का हिस्सा नहीं लेते थे।’’ लोग उन्हें ‘सज्जनों की भीड़’ कहा करते थे, जो केवल सम्राट और साम्राज्य की रक्षा की दुवा करते थे। समय के साथ वे फैलते गए, बदलते गए। धर्म ने संगठित रूप धारण कर लिया और गिरिजाघर शक्तिशाली हो गए। सत्ता की इस दौड़ में ईसाई बाद में किस तरह आक्रामक हो गए इसका बाइबल के इस वचन से पता चलता है- हे ईसाइयों संगठित हो, शासन की मदद करो और जरूरत हो तो तलवार हाथ में लो; क्योंकि आकाश के पिता ने सामाजिक व्यवस्था के लिए सरकारों की व्यवस्था की है। पॉल के रोमनों के संदेश के रूप में यह आया है (अध्याय १३ः वचन १-७)। आगे के युद्धों का इतिहास उनके ‘सज्जनों की भीड़’ से ‘दुर्जनों के भीड़’ में बदलने का इतिहास है।
 
पिछले दो हजार वर्षों में ईसाइयत बहुत बदली है। ईश्वर की सत्ता दोयम हो गई है, भौतिक सत्ता की लालसा हावी हो गई है। राजनीति और ईसाइयत हाथ में हाथ डालकर चलती है। इससे उसके कई स्वरूप बन गए हैं जैसे कि ईसाई साम्यवाद, ईसाई समाजवाद, ईसाई अतिवाद (अंग्रेजी में इसके लिए अनार्किज्म शब्द का इस्तेमाल होता है), ईसाई मुक्तिवाद तथा ईसाई लोकतंत्र। ईसाई साम्यवादी वस्तुओं और सेवाओं पर समाज के सामुदायिक अधिकार की बात करते हैं। याने, सबकुछ सरकार का, निजी सम्पदा का कोई अधिकार नहीं। ईसाई समाजवाद इस कट्टरता को कुछ कम करता है और कुछ सरकार के और कुछ जनता के हाथ की बात करता है। ईसाई अतिवादी धर्म पर जान न्योछावर करने की बात करते हैं। लियो टालस्टाय की किताब ‘किंगडम ऑफ गॉड इज विदिन यू’ में इस मुद्दे का सुंदर विश्लेषण है। टालस्टाय कहते हैं, ‘‘जो सरकारें युद्ध करती हैं और जो गिरजाघर उनका समर्थन करते हैं वे अहिंसा और अप्रतिकार के मूल ईसाई सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।’’ (इस वाक्य का निष्कर्ष यह है कि सिद्धांतों की राजनीति नहीं होती!) ईसाइयों का एक और वर्ग मुक्तिवाद का समर्थक है। ईसाई मुक्तिवादी कहते हैं कि चरित्र और नैतिकता के मामले में सरकार का हस्तक्षेप अवांछित है और इसके विपरीत परिणाम ही होंगे। आज की भाषा में यह ‘प्राइवसी’ अर्थात निजता का मामला है। नागरिकों के निजी जीवन में सरकार के अडंगे का कोई कारण नहीं है। (इस पर भारत के उच्चतम न्यायालय का हाल में फैसला आया है, जिसमें निजता को व्यक्ति का बुनियादी अधिकार माना गया है)। ईसाइयों के ‘बुक ऑफ रेवेलेशन’ (ईश्वरादेश) में कहा गया है कि ईश्वर की दृष्टि से सत्ता और राजनीतिक ताकत पशुता के समान है। एक और वर्ग है जो एनबाप्तिस्मा (anabaptism) अर्थात दुहरे राज की बात करता है। पहला राज ईश्वर का होगा और दूसरा राज भौतिक होगा। इसका अर्थ यह हुआ कि धर्म और राज दोनों पृथक विषय है और गिरजाघर को राजकाज में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
 
इस्लामी चिंतन
राजनीति को अरबी भाषा में ‘सियासाह’ (siyasah) कहते हैं। उर्दू में इसीको ‘सियासत’ कहते हैं, जो आजकल प्रचलित शब्द है। अरबी शब्द ‘सियासाह’ भिन्न-भिन्न अर्थों में आता है जैसे कि नेतृत्व या नेता (qiyadah / riashah) तथा आयोजना व प्रबंध (Tadbir) अर्थात शासन-व्यवस्था। कुरान में ‘सियासाह’ या उसके किसी स्वरूप का उल्लेख नहीं है, लेकिन उसकी अवधारण को समाधान या परिहार (Salah /Islah) तथा अच्छाई को मजबूती, बुराई का दमन, अल्लाह के हुक्म पर ध्यान देना (Subanahu vata ala) आदि के रूप में विभिन्न स्थानों पर स्पष्ट किया गया है। प्रसिद्ध अरब विचारक इब्ने खल्दुन (१३३२-१४०६) ने इस्लामिक राजनीति को निम्न रूप से परिभाषित किया है- राजनीति दो तरह की होती हैः १. विवेकी राजनीति या सिद्धांतों की राजनीति (siyasah aqliyyah), जिसमें शासन व जनकल्याण किसी व्यक्ति (सुलतान) के निर्णय पर निर्भर होता है। इसे नागरी राजनीति (siyashh madaniyyah) कहते हैं। २. शरीयत पर आधारित राजनीति, जिसमें धर्म का आधार लेकर या उसके नियमों की विद्वानों द्वारा की गई परिभाषा के आधार पर शासन व जनकल्याण का निर्णय किया जाता है। इसे धर्म-सत्ता कहा जा सकता है। इस्लामिक राजनीतिक चिंतन पर गेरहार्ड बॉवरिंग की एक किताब प्रिंसटन यूनिवर्सिटी ने छापी है। इसमें बॉवरिंग का कहना है कि इस्लाम दुनियाभर में फैलेगा यह पहले किसी ने नहीं सोचा था। उसने शरीयत पर आधारित शासन के रूप को अधिक पसंद किया। इससे मुल्ला-मौलवियों की बन आई। उसमें बेहद कट्टरता आ गई। इससे आतंकवाद पनपा। आतंकवाद से नरसंहार और विध्वंस हुआ। आधुनिक आतंकवाद की जड़ में खलीफा (इस्लामी सर्वोच्च धर्मगुरु) का राज्य स्थापित करने का पुराना सपना है। सीरिया में इसिस की बगावत से इसी तरह की ‘खिलाफत’ स्थापित की गई है, जिसे तोड़ने में विश्व की दोनों महाशक्तियां-रूस और अमेरिका- लगी हुई हैं।
 
भारतीय चिंतन
इसे हिन्दू चिंतन भी कह सकते हैं। हिन्दू की परिभाषा यहां संस्कृति के अर्थ में है; हिन्दू कभी धर्म नहीं था, आर्यावर्त की एक संस्कृति थी जिसमें पूजा पद्धतियों की विभिन्न चिंतन धाराओं का संगम था और आज भी है। बोलचाल की भाषा में भले हम हिन्दू धर्म कहें, लेकिन वह केवल हिन्दू संस्कृति है, हिन्दुस्थान की संस्कृति है, भारत की संस्कृति है। भारतीय चिंतन की आज मौजूद विचारधाराओं में जैन, बौद्ध और वैदिक या सनातन धर्म है। हिन्दू के नाम से हम जिस धर्म का पालन करते हैं वह वैदिक धर्म का ही संशोधित रूप है। भारतीय चिंतन में राजनीति का गहन मंथन है, जो आज भी हमारे राजनीतिक जीवन का अभिन्न पहलू है।
 
जैन चिंतन
महाराजा बिंबिसार (ई.पू. ५५८-४९१) के साथ जैन धर्म की राजनीतिक यात्रा का इतिहास उपलब्ध है। इसके पूर्व का इतिहास अस्पष्ट है। बिंबिसार के बाद अजातशत्रु, उदयन, चंद्रगुप्त मौर्य जैसे ई.पू. काल में हुए जैन राजाओं का उल्लेख मिलता है। कहते हैं कि मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त (ई.पू. ३२२-२९८) ने अंत में अपना राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और जैन आचार्य भद्रबाहू के शिष्य बन गए। (उनके पोते सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था।) ई.स. बाद पहली सदी के शालिवाहन से लेकर सातवीं सदी के हर्षवर्धन तक जैन धर्म के संरक्षक कई राजा हुए, जिनके राजनीतिक चिंतन का आधार जैन दर्शन था।
 
जैन चिंतन के छह प्रमुख तत्व हैं- १. अहिंसा, २. अनेकांत, ३. सत्य, ४. अस्तेय, ५. ब्रह्मश्चर्य, और ६. अपरिग्रह। जैनों ने कर्म को जीवन प्रमुख पाथेय माना है। राजकाज के संदर्भ में अहिंसा और अनेकांत का सीधा सम्बंध है। शेष तत्त्व राजाओं के व्यक्तिगत गुणों के रूप में लिए जा सकते हैं। अहिंसा का मूल बिन्दु यह है कि किसी को भी किसी तरह की चोट न पहुंचाना; लेकिन यदि कोई चुनौती उपस्थित करता है तो उससे युद्ध करना भी अहिंसा ही है। बलशाली को ही अहिंसा शोभा देती है। जैन राजा बलशाली ही थे। लेकिन अहिंसा का बाद में बहुत अतिरेक हुआ। अहिंसा की हालत यहां तक हो गई कि साध्वियां अपने बालों की जुएं तक नहीं मारती थीं। इससे क्षात्रतेज कम होता गया और विदेशियों को कालांतर में आक्रमण का अवसर मिल गया। अनेकांत के बारे में भी जैन सिद्धांत विविधता का पक्षधर है। किसी विषय को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है। उसके एक नहीं अनेक पहलू हो सकते हैं। (जैन और बोद्धों में इसी सिद्धांत पर मतभेद है। जैन सत्य को कहने के अनेकांत रूप मानते हैं, जबकि बौद्ध कहते हैं कि सत्य का रूप एक ही होता है।) जैन राजाओं की राजनीतिक व्यवस्था में भी यह परिलक्षित होता है।
 
राज्यशास्त्र प्राचीन समय में विद्या की अलग शाखा नहीं थी। उसे अर्थशास्त्र में शामिल किया जाता था। जैन काल में राजनीतिक व्यवस्था दो तरह की थी- १. आध्यात्मिक धरातल पर श्रावक, भिक्षु से लेकर आचार्य और संघ प्रमुख तक २. प्रशासन में सिपाही से लेकर अमात्य और महाराजा तक। (यही व्यवस्था बौद्ध काल तक जारी रही) लेकिन अहिंसा जैसे सद्गुण के अतिरेक के कारण लोग हथियार छोड़कर माला जपने लगे।
 
बौद्ध चिंतन
बौद्ध काल में (ईसा पूर्व ६०० से ईसवी सन २००) भारत में तीव्र राजनीतिक गतिविधियां रहीं। इस काल में गणतंत्रों की स्थापना हुई। वैशाली और लिच्छवी गणतंत्र प्रसिद्ध हैं। पाली और संस्कृत में लिखे गए तत्कालीन साहित्य में इन गणतंत्रों के सर्वव्यापी होने का जिक्र आता है। गणतंत्र याने संघतंत्र था। उसके स्वरूप के आधार पर उनकी श्रेणियां तय होती थीं। जैनों की तरह बौद्धों में आध्यात्मिक धरातल पर संघ हुआ करते थे और आचार्य उनके प्रमुख हुआ करते थे। उनसे ये गणतंत्र या राजा (कहीं हो तो) परामर्श पाते थे।
 
बौद्ध चिंतन व्यक्ति को किसी पारलौकिक शक्ति की अपेक्षा स्वयं पर विश्वास करने के लिए कहता है। उसके तीन प्रमुख सूत्र हैं- बुद्ध, धम्म और संघ। बुद्धत्व का मतलब है जागृति, ज्ञान, प्रकाश, विद्या; धम्म आचार-विचार और कर्तव्य को परिभाषित करता है, जबकि संघ व्यक्ति, समाज, शासन अर्थात राज्य व्यवस्था की ओर इंगित करता है।
 
बुद्ध ने दुःख से मुक्ति के चार सत्य बताए- १. दुःख सर्वदूर है २. दुःख तृष्णा से आरंभ होता है ३. तृष्णा से मुक्ति पाकर दुःख से मुक्ति पाई जा सकती है और ४. दुःख के निरोध का रास्ता अष्टांग मार्ग है। इसे बुद्ध ने चार आर्य सत्य माना है। अष्ष्टांग मार्ग ये हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि। मानसिक एवं नैतिक विकास के प्रति प्रतिबद्धता, हानिकारक बातें, हानिकारक कर्म, हानिकारक व्यापार न करना, झूठ न बोलना, स्वयं में सुधार करना, स्पष्ट ज्ञान के जरिए देखने की मानसिक योग्यता पाना और अंत में निर्वाण प्राप्त करना।
 
दुःख के मूल में व्यक्ति की तृष्णा है, जिससे व्यक्ति और समाज में बुराइयां फैलती हैं और जिसे शासन कुछ सीमा तक ही नियंत्रण कर पाता है। वैदिक धर्म में भी आसक्ति को ही दोषी माना गया है। इसलिए गीता में कृष्ण कहते हैं कि फल की अपेक्षा ही विषाद का कारण है। सम्यक शब्द का इस्तेमाल कर बुद्ध ने विवेक पर बल दिया है। यही विवेक, राज्य के शासन में भी अनिवार्य है।
दूसरी सदी के बौद्ध चिंतक नागार्जुन का कहना है कि बुद्ध के शांति मार्ग से ही उनके राजनीतिक चिंतन का पता चलता है, जिसका आधार है सादगी, विनम्रता और दया। बुद्ध कहते हैं कि व्यक्ति में सम्यक बदलाव के साथ सामाजिक न्याय स्थापित होता है। इसीसे अहिंसा और शांति स्थापित होगी। बौद्ध चिंतन की राजनीतिक दिशा पंचशील में परिलक्षित होती है।
 
वैदिक चिंतन
वैदिक चिंतन/हिन्दू चिंतन पौर्वात्य चिंतन का जनक है। हिन्दू चिंतन- साहित्य वेदों, पुराणों, उपनिषदों, स्मृतियों, संहिताओं, निर्णय-ग्रंथों, रामायण-महाभारत और गीता, तिरुक्कुरल जैसे नीति ग्रंथों से बेहद समृद्ध है। इनमें प्रजा से लेकर राजा तक, व्यक्ति से लेकर समाज तक, युद्ध नीति से लेकर विदेश नीति और व्यापार नीति तक सब के कर्तव्यों एवं जिम्मेदारियों को इतना विस्तृत रूप से विशद किया गया है कि अन्य किसी भी प्राचीन चिंतन में इतनी गहराई मिलना मुश्किल है।
 
हिंदुत्व के कुछ प्रमुख मूल तत्व हैं- १. सत्य सनातन है २. ब्रह्म सच्चाई है ३. वेद अंतिम वचन है ४. हरेक को धर्म का पालन करना चाहिए ५. आत्मा अमर है ६. अंतिम लक्ष्य मोक्ष्य है। डॉ. गंगाधर चौधरी ने सनातन धर्म के मूल तत्वों को इस तरह परिभाषित किया है- १. ईश्वर का अस्तित्व है। ओम् उसका स्वरूप है। त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अन्य देवताएं हैं। २. सभी ईश्वर के अंश हैं ४. प्रेम से एकात्म बनता है ५. सर्वधर्मसमभाव ६. तीन ‘ग’ का ज्ञान- गंगा, गीता, गायत्री। निम्न दस प्रमुख सूत्र हैं- १. सत्य २. अहिंसा ३. ब्रह्मश्चर्य ४. अस्तेय ५. अपरिग्रह ६. शौच (स्वच्छ दृष्टि) ७. संतोष ८. स्वाध्याय ९. तप और १०. ईश्वर भक्ति। इस तरह व्यक्ति से लेकर राष्ट्र और वहां से वसुधैव कुटुम्बकम् तक की वैदिक कल्पना है। भारतीय मनीषा के एकात्म-भाव करे ही पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ कहा है। उन्होंने व्यक्ति को व्यष्टि, समाज को समष्टि, प्रकृति को सृष्टि और परमात्मा को परमेष्ठि निरूपित किया है। मनुष्य का अंतिम लक्ष्य समाज और प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित कर परमेष्ठि तक पहुंचना है। शासन-व्यवस्था इसी पर आधारित होनी चाहिए।
 
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह हिन्दुत्व की सीढ़ी मानी गई है। व्यक्ति और समाज के व्यवहार इसीके अनुसार होते थे। अर्थ के अंतर्गत राजनीति समाविष्ट थी। वैदिक समय में राजनीति को अर्थशास्त्र का ही अंग माना जाता था। धर्म अनुशासन का हिस्सा था और उसके अंतर्गत दण्डनीति आती थी। काम कर्तव्य को इंगित करता था। मोक्ष अंत में परमात्मा से मिलन था। ॠग्वेद के १०वें मंडल की १९१वीं ॠचा के १ से ४ सूक्तों में गणतंत्र का जिक्र आता है। लोकतंत्र का यह सब से प्राचीन उल्लेख माना जाता है। ॠग्वेद में सभा, समिति, राजन या राजा इन शब्दों का उल्लेख है। (‘सभा’ शब्द के वेदों में इस्तेमाल के कारण ही हमारे यहां विधान सभा, लोकसभा, राज्यसभा जैसे शब्द निर्मित हुए हैं।) वेदों ने चुने गए राजा या नेता को हटाने के जनता के पूर्ण अधिकार को माना है। अथर्ववेद के १२वें मंडल के ‘पृथिवि’ सूक्त में राष्ट्र की संकल्पना स्पष्ट की गई है। चाणक्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में राजकाज और दण्डनीति को विस्तार से बताया है।
 
‘रामराज्य’ शब्द का हिन्दू चिंतन में बार-बार उल्लेख आता है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम माना गया है। धर्म के अधीन रहकर ही उन्होंने वनवास ग्रहण किया, जबकि युवराज होने से उनका राजगद्दी पर अधिकार बनता था। उन्होंने अधिकार की अपेक्षा कर्तव्य को याने धर्म को श्रेष्ठ माना है। इसी तरह महाभारत युद्ध में विजय के बाद जब युधिष्ठिर विरक्त हो गए और राजकाज छोड़कर जाने लगे तब भीष्म ने उन्हें उनके राजधर्म अर्थात राज-कर्तव्य के प्रति आगाह किया। कृष्ण की गीता तो कर्म, धर्म, युद्ध, नीति और राजनीति का विश्व का सब से अप्रतिम ग्रंथ है। किसी भी धर्म चिंतन में इस तरह की गहराई दिखाई नहीं देती। सत्य का जितना विस्तार वैदिक तत्वज्ञान में है, उतना अन्यत्र दिखना दुर्लभ है। अन्य चिंतनों में धर्म-विस्तार और इसके लिए सत्ता-विस्तार अर्थात तात्कालिकता- दूसरे शब्दों में मोह-माया- स्वार्थ के कारक अधिक हावी दिखते हैं।
 
विश्व के विभिन्न धार्मिक चिंतनों और उनके राजनीति पर प्रभाव पर यह सरसरी नजर है। इसके गहन विश्लेषण से और मोती हाथ लगेंगे और कुछ अवधारणाएं और अधिक स्पष्ट होंगी। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि सारे धार्मिक चिंतन एशिया में ही विकसित हुए। यहुदियत, ईसाइयत, इस्लाम और जोरास्ट्रियन पश्चिम एशिया की देन है; जबकि वैदिक, सनातन, जैन, बौद्ध आदि चिंतन भारत याने पूर्वी एशिया की देन है। याने एशिया ने सारी दुनिया को धार्मिक चिंतन और उसके अनुरूप जीवनशैली दी है। इस पर और एक नजरिये से गौर करें- सर्वाधिक विकसित सभ्यता कहां थी? अर्थात जम्बू द्वीप याने आर्यावर्त में, हिन्दुस्थान में, भारत में। सिंधु घाटी की सभ्यता आज से ५ हजार वर्ष पूर्व की मानी गई है। इससे एक बात तो सिद्ध होती है कि धर्म-सूत्र सब से पहले इसी क्षेत्र में विकसित हुए और यहीं से वे अन्यत्र फैले, नया स्वरूप लिया, नए सम्प्रदाय बने। फलस्वरूप, राजतंत्र भी यहीं सर्वप्रथम विकसित हुआ, जिसके भिन्न-भिन्न रूप आज विश्व भर में दिखाई देते हैं।

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