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हिंदी-मराठी साहित्यिक एवं वरिष्ठ पत्रकार श्री गंगाधर ढोबले का ‘हरवलेलं गाव’ (गुम हो चुका गांव याने अंग्रेजी में The lost Village) मराठी कहानी संग्रह है. असल में ग्राम्य जीवन की दिल को छू लेनेवाली ये सत्यकथाएं हैं. भले काफी पहले ये कहानियां लिखी गई हों लेकिन वे आज भी उतनी ही तरोताजा है, आज भी अत्यंत जीवंत लगती हैं. सच है कि कहानी हमेशा ताजा होती है, कभी बासी नहीं होती. हालांकि लेखक का बचपन का वह गांव अब नहीं रहा; बहुत बदल चुका है. इस तरह वह गांव गुम हो चुका है; परंतु परिवर्तित गांव में भी वही पात्र हैं, वही संवेदनाएं हैं जिन्हें ये कहानियां पल पल उजागर करती हैं. विदर्भ के गांव और उनके बाशिंदों की ये चर्चित कहानियां हैं. लेकिन क्षेत्र की सीमा में इन कहानियों को नहीं बांधा जा सकता. ये तो देश के हर गांव की कहानियां हैं. ये कहानियां इतनी सहजता से आगे बढ़ती हैं कि पढ़ते समय पाठक इनमें खो जाता है और उसे लगता है कि अरे ये तो मेरी ही कहानी है, मैंने भी अनुभव की है. इन कहानियों को पढ़ते समय अनायास ही विदर्भ के ही प्रसिद्ध मराठी कवि सुरेश भट की मराठी पंक्तियां कानों में गूंजती रही, ‘‘मी बोललो जरा अन् जो तो मला म्हणाला… माझीच ही कहाणी! माझीच ही कहाणी.’’ (मैंने कहना शुरू क्या किया कि लोग कहने लगे, अरे यह तो मेरी ही कहानी है.) पुस्तक की भूमिका में भी प्रसिद्ध मराठी कहानीकार और अंतरराष्ट्रीय चित्रकार प्रकाश बाल जोशी ने यही बात कही है, ‘‘ये कहानियां पढ़ते समय पता ही नहीं चला कि कब मैं अपने बचपन के गांव पहुंच गया. कहानियों के नायक/नायिका जैसे लोग तो मेरे गांव में भी मैंने देखे हैं. वही प्रसंग हर क्षण देखे हैं.’’ इस तरह ये कहानियां पढ़ते-पढ़ते मैं भी बरबस अपने गांव में पहुंच गई.
 
इस कहानी संग्रह की एक और विशेषता ध्यान में आई कि हर कहानी अपने-आप में स्वतंत्र तो है ही; उनके अलग-अलग नायक-नायिकाएं हैं, फिर भी सभी कहानियों पर समग्र रूप से गौर करें तो सब की एक शृंखला बनती है. सारे बाशिंदे मिलकर गांव बन जाता है, किसी अकेले से गांव की कल्पना नहीं हो सकती, कोई वीरान गांव तो हो नहीं सकता. इस तरह एक गांव हैं, उसमें रहनेवाले पात्र हैं जो कभी गांव का हिस्सा थे, अब नहीं रहे. जो गये उनके स्थान पर नये आ गए. बातें वहीं हैं, नाम नये हैं. लोग आते-जाते रहते हैं, परिवेश और मनुष्य वही रहता है. इस तरह यह ग्रामीण उपन्यास भी बन जाता है. भारतीय ग्राम्य जीवन का उपन्यास! अतः मेरी राय में यह कहानी संग्रह भी है और उपन्यास भी!!
 
कोई चौदह कहानियां इसमें हैं. पहिली शाळा (पहली पाठशाल) और माकडं (बंदर) दूरदराज ग्रामों में रहनेवाले अध्यापक के मार्मिक निरीक्षण की कहानियां हैं. जिला परिषद के स्कूलों में कार्यरत ऐसे अघ्यापक आज भी मिलेंगे. चुली (भिल्ल युवती) की कहानी है उसकी घने जंगल में बसी बस्ती, वहां के रीतिरिवाज, परेशानियां, रिश्ते-नाते और भाई-बहन के निर्मल स्नेह की हृदयस्पर्शी कहानी. चुली भी भिल्ल परम्परा तोड़कर अन्यत्र शादी के लिए मजबूर हो जाती है. फिर भी अकेले रह चुके छोटे भाई और पति दोनों को उसी प्यार से सम्हालती है, जो वनवासी संस्कृति की देन है. शंकर्या तो चोर-उचक्के बने युवक और उससे इसी कारण मंगनी टूट चुकी युवती की प्रेम कहानी है. कहानी का अंत बड़ा दुखदायी है- जब शंकर्या सुधर जाता है तभी गांव की दुश्मनी उसका खात्मा कर देती है. भोल्या भी ऐसी ही कहानी है, तंत्रमंत्र और अंधश्रद्धा में उलझा भोल्या अंत में जब सुधर जाता है और जनसेवा शुरू कर देता है तब उसे अपनी जान गंवानी पड़ती है. कहानी के अंत में उसके पिता बड़ा मार्मिक वाक्य कहते हैं, ‘‘भोल्या दुनियादारी सीखा ही नहीं.’’ अन्य कहानी में मनहरलाल का जातिपाति के चक्कर में विवाह नहीं हो पाता और जब वह अतिपिछड़ी जाति की विधवा से विवाह कर लेता है और उसके बच्चो को भी पिता का साया देता है तो समाज उसका बहिष्कार कर देता है. सुलेमान पैलवान तो गांवों में आपसी रिश्तों और समरसता के सामाजिक तानेबाने की मिसाल है. ‘अडगळ’ (कबाडिया अटारी) तो गुम हो चुके गांव और अब अर्ध-शहर बन चुके गांव में निवृत्त हो चुके पेंशनधारी के दर्द को बयान करती है.
 
हरी बा हरी (हरी…ओ हरी) की नायिका तो समय के थपेड़े खाने के बावजूद हिम्मत नहीं हारती. भाग्य से वह हार चुकी है, परिवार में झगड़े हुए, खेती-बाड़ी बंट गई, पति-पुत्र कालकवलित हो गए. अंत में जनाधारित आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए उसने अपना घर छोड़ दिया. संसार से मोह त्याग दिया और संन्यासी बन गई, परंतु गांव नहीं छोड़ा. गांव के वातावरण में किस प्रकार से सभी प्रकार के लोगों को समाहित कर लेने की भावना होती है, इसका जीवंत वर्णन लेखक ने इस कहानी में किया है. सच है कि गांव का मूल तत्व अध्यात्म तब भी उतना ही सम्मानित था, जितना आज भी है.
 
पुंजीचं धन खाया (पुंजी का धन खानेवाला) शीर्षक कथा हमें सचमुच अंदर तक झकझोर देती है. इस कथा के नायक पुंजाराम को घर के ही लोग पागल करार देते हैं. पुंजी उसकी बहन का नाम है. पुंजाराम का बहनोई उसकी सम्पत्ति हड़प लेता है. लोग पुंजाराम को पुंजी अर्थात बहन का धन खानेवाला कहकर चिढ़ाते हैं. चिढ़ानेवाले को पुंजाराम पत्थर मारता है. इसी कारण लोग उन्हें पागल कहने लगे. अंत में परेशान होकर वह दूसरे गांव में चला जाता है. इस दूसरे गांव में याने लेखक के गांव में वह गांव सेवक के रूप में सराय में रहता है और गांववाले भी उससे बेहद स्नेह करते हैं. गांव में शादी-ब्याह से लेकर कुंए से पानी भर देने और हनुमानजी का मंदिर साफ करनेवाले पुंजाराम गांव के हर घर का मानो सदस्य बन जाता है. इस गांव के बिना पुंजाराम नहीं रह सकता और पुंजाराम के बिना गांव नहीं सह सकता. लेखक ने इन प्रसंगों का बहुत ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है.
 
लेखक श्री गंगाधर ढोबले हिंदी पत्रकारिता में एक उल्लेखनीय नाम है. हिंदी में लेखक की दो पुस्तकें ‘मरुभूमि से देवभूमि तक’ और ‘लोहित तीरे’ प्रकाशित हो चुकी हैं. ‘लोहित तीरे’ का मराठी अनुवाद ‘ब्रह्मपुत्रेच्या खोर्यात’ बहुत लोकप्रिय रहा है. उनके मराठी, अंग्रेजी, गुजराती से हिंदी में अनूदित ५० से अधिक ग्रंथ उपलब्ध हैं. महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने उन्हें ‘कांतिलाल जोशी हिंदीतर हिंदी लेखक पुरस्कार’ प्रदान करने की हाल में घोषणा की है. हिंदी साहित्य अकादमी से उन्हें मिला यह दूसरा पुरस्कार है. इसके अलावा पत्रकारिता के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं.
उम्मीद है कि ‘हरवलेलं गाव’ का भी पाठक पुरजोर स्वागत करेंगे. मन को कचोट देनेवाली इन सभी हृदयस्पर्शी कहानियों के लिए लेखक को बधाई. जिस संधिकाल प्रकाशन ने इस हिंदी लेखक को मराठी कहानीकार के रूप में प्रकाश में लाया उसे भी साधुवाद.
 
हरवलेलं गाव
लेखक : गंगाधर ढोबळे
मूल्य : १५०/-
प्रकाशक : संधिकाल प्रकाशन

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