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अच्छा आओ! मेरे पास बैठो! में तुम्हे एक होशियार बकरे की कहानी सुनती हूँ! दूर पहाड़ो में घने जंगलो के बीच एक गॉव में सभी लोग प्यार से रहते थे! वे खेती करते थे और जानवर भी पालते थे- गाय-बैल-घोड़े, भैंसे और भेड़-बकरियां! वे मिमियाती रहती थीं लेकिन कोई भी नहीं जानता था कि वे क्या बातें करती थी!

“अरे, वे बातें भी करती थीं?”

“और क्या, हमारी तरह वे भी अपनी बोली में आपस में सुख-दुःख कि बातें करती रहती थी!”

“वंहा तो उन्हें जंगल में खूब हरा-भरा चारा मिलता होगा! फिर दुःख किस बात का?”

“दुःख था बेटे बहुत दुःख था! वंहा चारा भी खूब था लेकिन वंहा के लोगो का एक ख़राब रिवाज़ था! वे बकरो कि बलि देते थे! सोचते थे, बकरो कि बलि देने से देवी-देवता खुश हो कर उनके दुःख दूर कर देंगे और बलि चढाने के नाम पर खुद खा जाते थे उनका मांस!”

“यंहा तो बहुत बुरी बात हुई!”

“हाँ बेटा यह बात भेड़-बकरियों को पता थी, इसीलिए वे मिमियाकर आपस में अपना दुःख बांटती थीं! उन्ही भेड़-बकरियों में से एक बकरे और बकरी कि कहानी मै तुम्हे सुना रही हूँ, सुनो!

“एक दिन उनमे से एक बकरे ने मिमिया कर अपना दुःख एक बकरी को सुनाया! बकरी तुम्हारी तरह आंसू टपकाने लगी! तब बकरे ने उसके कान मै कहा, “रोओ मत बकरी! रोने से थोड़े ही प्राण बचते है? हमें कुछ करना होगा!”

“हम क्या कर सकते है? हम तो इन लोगो कि दया पर रहते है?”

“अब नहीं रहेंगे इनकी दया पर! तुम साथ दो तो हम यंहा से बचकर भाग जायेंगे?”

“घने जंगल में? वंहा कैसे बचेंगे, वंहा तो जंगली जानवर रहते है!”

“फिर हम तो उन जानवरो की ही बिरादरी के है न, चार पैरो वाले?”

“यह बात तो है!”

“तो फिर चलो यहाँ से!”

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