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एक भेड़िया था। बड़ा ही धूर्त। एक दिन उसे मोटा-ताजा बैल मरा पड़ा मिला। कोई दूसरा न आ जाए, यह सोचकर वह जल्दी-जल्दी उसका मांस खाने लगा। जल्दबाजी के कारण उसके गले में एक हड्डी अटक गई। उसे लगा, अगर जल्दी ही हड्डी बाहर न निकली तो प्राण त्यागने पड़ेंगे। वह भागा-भागा नदी किनारे रहने वाले एक दयालु सारस के पास पहुंचा और प्रार्थना की-‘‘सारस भाई ! मेरी मदद करो, मेरे गले में फंसी हड्डी निकाल दो, मैं तुम्हें इनाम दूंगा।’’

सारस लालची नहीं दयालू था। उसने फौरन अपनी चोंच भेड़िए के गले में डालकर हड्डी बाहर निकाल दी और बोला- ‘‘मेरा इनाम दो।’’

‘‘इनाम ? कैसा इनाम ?’’ भेड़िए ने कहा-‘‘भगवान का शुक्रिया अदा करो कि मैं तुम्हारी गरदन न चबा गया। इससे बड़ा इनाम और क्या होगा ?’’ कहकर धूर्त भेड़िया चला गया।
दरअसल, उसकी जान अभी भी बैल का माँस खाने में अटकी हुई थी।

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