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जब नरेन्द्र मोदी चुनाव अभियान के दौरान कहते थे कि भाजपा अपनी बदौलत 300 सीटें तथा राजग के साथ 350 सीटें प्राप्त करेगी तो सामान्यतः बहुत सारे लोग इसे एक प्रोपेगांडा मानते थे। परिणाम बिल्कुल ऐसा ही आया तो यह मानना होगा कि मोदी को जमीनी स्थिति तथा लोगों की धड़कनों का आभास था। 2014 के आम चुनाव में जब वे कहते थे कि भाजपा अपनी बदौलत पूर्ण बहुमत पाएगी और कांग्रेस दो अंकों तक सिमट जाएगी तब भी ऐसे लोगों की बड़ी संख्या थी जो इसे माहौल बनाने की रणनीति मानते थे। परिणाम ठीक वैसा ही आया था। कांग्रेस 44 सीटें तथा 19.5 प्रतिशत मत तक सिमट गई थी। इस चुनाव में अमित शाह से जब गठबंधन वाले उत्तर प्रदेश या अन्य राज्यों के बारे में पूछा जाता था तो वे कहते थे कि हम इस बार 50 प्रतिशत की लड़ाई लड़ेंगे। अनेक विश्लेषकों को यह ख्याली पुलाव लगता था। परिणाम देखिए, उत्तर प्रदेश में भाजपा अकेले 50 प्रतिशत मत के आसपास है तथा 12 राज्यों में उसने 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा मत पा लिया है।  महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़,हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा, कर्नाटक, दिल्ली, बिहार आदि राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले हैं। यह एक असाधारण स्थिति है।

पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में भी भाजपा 40 प्रतिशत मत को पार कर गई है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मतों में 18 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोत्तरी का अर्थ ही है कि यह आंधी थी। कांग्रेस का वोट 19.5 प्रतिशत की जगह केवल 20 प्रतिशत हुआ है। उसे 52 सीटें मिलीं हैं जिनके आधार पर कांग्रेस लोकसभा में विपक्षी दल का स्थान भी नहीं पा सकती। उत्तर भारत के 166 सीटों में से 135 सीटें, पश्चिम की 105 में से 94, पूरब में 142 में से 91 और दक्षिण की 129 में से 29 सीटों पर भाजपा एवं राजग की विजय बताती है कैसी अंतर्धारा चल रही थी। राजग को मिले कुल 348 में से भाजपा ने अकेले 303 सीटें जीतीं हैं। निश्चित रुप से यह विपक्षी पार्टियों एवं मोदी विरोधी पत्रकारों, बुद्धिजीवियों एवं एक्टिविस्टों के लिए ऐसा धक्का है जिससे वे शायद ही उबर पाएं।

ये सब यह मानकर चल रहे थे कि उत्तर प्रदेश में बसपा-सपा-रालोद का गठबंधन भाजपा को धूल चटा देगी और यहीं से उसका ग्राफ काफी नीचे आ जाएगा। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की विजय के बाद भाजपा की सीटें पिछले चुनाव से काफी घटेंगी। गुजरात में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में कड़ी टक्कर दी थी, इसलिए वहां भी इनका नीचे आना निश्चित है। बिहार में राजद के नेतृत्व में बना गठबंधन, झारखंड का गठबंधन और कर्नाटक में जनता दल-सेक्यूलर तथा कांग्रेस का गठबंधन भाजपा और राजग को हर हाल में सत्ता से बाहर कर देगा। रही सही कमी, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, पंजाब, आंध्र प्रदेश पूरा कर देगा। जरा सोचिए, ऐसी कल्पना करने वालों की आज क्या मानसिक दशा होगी। न वे हंस सकते हैं न रो सकते हैं। इनमें तमिलनाडु एवं केरल को छोड़कर भाजपा ने सभी राज्यों में या तो 2014 के प्रदर्शन को दोहराया है या उससे बेहतर किया है। कर्नाटक के 28 में से 25 सीटें तथा पश्चिम बंगाल में 18 सीटें भाजपा पा जाएगी यह कौन सोच सकता था। जिस उत्तर प्रदेश को भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती माना जा रहा था, उसी उत्तर प्रदेश में बसपा -सपा-रालोद धूल चाट गई। अजीत सिंह, डिम्पल यादव, धर्मेन्द्र यादव सब चुनाव हार गए। सपा की स्थिति 2014 के समान ही रहीं तो बसपा ने किसी तरह सपा की पीठ पर सवार होकर शून्य से उपर उठकर दहाई अंक प्राप्त किया, वह भी कई सीटों पर कांटे की टक्कर में। मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के अपने गढ़ से एक लाख से कम मतों से जीत पाए।

क्या कोई यह कल्पना कर सकता था कि राहुल गांधी अमेठी से हार जाएंगे ? अमेठी में पराजय से बुरी खबर कांग्रेस के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। स्मृति ईरानी के दावों का बहुत सारे लोग मजाक उड़ाते थे। जब राहुल वायनाड गए तो भाजपा ने यही आरोप लगाया कि अमेठी में अपनी बुरी स्थिति देखकर वे वहां गए हैं तो किसी ने विश्वास नहीं किया। अब तो इस आरोप को स्वीकार करना पड़ेगा।

इसे आप नरेन्द्र मोदी लहर नहीं तो और क्या कहेंगे ? भाजपा एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के 543 सीटों पर 80-85 प्रतिशत उम्मीदवार मोदी ही थे। मंत्रियों-सांसदों का काम या उम्मीदवारों की छवि का योगदान 15 से 20 प्रतिशत हो सकता था। यह साफ दिख रहा था कि मोदी के नाम से लोगों में आलोड़न पैदा हो चुका है। विपक्ष जितना मोदी की निराधार निंदा करता रहा उतना ही लोगों में विपरीत प्रतिक्रिया होती रही। इस पूरे चुनाव में मोदी मुख्य मुद्दा थे और शेष मुद्दे उसके अंग-उपांग।

मोदी को लेकर यह जनता की प्रतिक्रिया ही थी कि लोगों ने अमेठी में इतिहास बदल दिया। अगर राहुल गांधी मुस्लिम बहुत वायनाड नहीं गए होते तो वे इस बार लोकसभा से बाहर होते। राहुल की चर्चा यहां कई मायनों में जरुरी है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने चुनाव को मोदी बनाम राहुल में परिणत करने की रणनीति अपनाई थी। राहुल के रणनीतिकारों की सलाह एवं ट्रेनिंग पर वे मोदी पर निजी हमले कर रहे थे, जिसमें सबसे तीखा राफेल मामले में चौकीदार चोर का नारा था। मोदी और अमित शाह ने मैं भी चौकीदार के प्रचंड अभियान से सीधा मुकाबला कर अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इस मामले पर आक्रामक बनाया तथा चौकीदार चोर है का जगह-जगह जवाब मिलने लगा और उसका प्रभाव कमजोर होने लगा।

मोदी के प्रति आम लोगों का लगाव देखिए कि उनकी तीखी आलोचना करने वाले, निंदा करने वाले, गालियां देने वाले या इसकी संभावना वाले ज्यादातर नेता और दल बुरी तरह पराजित हो चुके हैं। मल्लिकार्जुन खड़गे अब हर विषय पर लोकसभा में उठ खड़े होने तथा मोदी विरोध करने के लिए उपलब्ध नहीं होंगे। वी. के हरिप्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, सुष्मिता देव, संजय निरुपम, सुशील सिंदे, शरद यादव, कन्हैया कुमार, आतिशी मार्लेना, चौधरी अजीत सिंह…..आदि को जनता ने रास्ता दिखा दिया है। भाजपा विरोधी मुहिम का अगुवा बनने में लगे चन्द्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम आंध्रप्रदेश से दिल्ली तक प्रभावहीन हो गई है। बिहार से राष्ट्रीय जनता दल सहित सारे विरोधी क्षेत्रीय दल खत्म हो गए हैं। वामपंथ लगभग साफ हो गया। पश्चिम बंगाल में उसका मत प्रतिशत इतना नीचे आ गया, जहां से उठने की संभावना भी आगामी अनेक वर्षों तक पैदा नहीं हो सकती।

मोदी का आम आदमी पर कितना असर था, इसका प्रमाण दिग्विजय सिंह की एक सभा में मिला। दिग्विजय सिंह ने अपने भाषण में सवाल पूछा कि यहां उपस्थिति लोगों में से किसी के खाते में 15 लाख रुपया पहुंचा ? एक नवजवान ने हाथ उठाते हुए कहा कि हां, हमें मिला है। उसे मंच पर बुलाकर कहा कि खाता नंबर बताओ। उस नवजवान ने जवाब दिया मोदी ने बालाकोट पर हवाई हमला किया, इसके पहले सर्जिकल स्ट्राइक किया और हमें 15 लाख रुपया मिल गया। उसके जवाब से मंच पर उपस्थित कांग्रेसी नेताओं के चेहरे देखने लायक थे।

यह एक उदाहरण बता रहा था कि मोदी का किस तरह लोगों पर जादुई असर था। यह मोदी का असर तथा अमित शाह का संगठन कौशल एवं आम कार्यकर्ताओं तक पकड़ थी कि पूरे पश्चिम बंगाल में कार्यकर्ताओं को इतना उत्प्रेरित कर दिया कि वो पार्टी की जीत के लिए तृणमूल कांग्रेस की सत्ता की ताकत से जगह-जगह टकराने लगे। यही स्थिति केरल में थी। आज की प्रोफेशनल होती राजनीति में यह साधारण बात नहीं थी। आजकल राजनीतिक दलों का विरोध प्रदर्शन सामान्यतः पूर्व निर्धारित मंचन मात्र रह गया है। इस दौर में कार्यकर्ताओं को करो या मरो तक की सीमा तक जाने को तैयार कर देना बहुत बड़ा परिवर्तन है। जो भाजपा की इस अंतःशक्ति को नहीं समझ रहे थे, उनके लिए पूरा चुनाव परिणाम ही भौचक्क करने वाला है। आप देखेंगे कि ज्यादातर जगह भाजपा का कार्यकर्ता पूरे जोश के साथ चुनाव अभियान में लगा था एवं सबकी कोशिश थी कि किसी तरह अपना सारा वोट गिर जाए। भाजपा ने रणनीति बनाकर अपने प्रभाव और कठिन संघर्ष वाले राज्यों में रिकॉर्ड मतदान कराया। 2014 में रिकॉर्ड 66.4 प्रतिशत मतदान हुआ था जो 2009 से आठ प्रतिशत ज्यादा था। उसके बाद सामान्यतः मतदान घटने की संभावना थी। लेकिन स्वयं अमित शाह ने इसका मोर्चा संभाला और सिंतबर-अक्टूबर 2018 से ही इस पर काम करना आरंभ कर दिया। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्त्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि सब जगह रिकॉर्ड मतदान हुआ।लेकिन यह यूं ही नहीं हुआ।

नरेन्द्र मोदी का चरित्र, विचार,कार्य और व्यवहार ने लोगों के अंदर एक साथ कई तरह की उत्प्ररेणायें पैदा कीं। 27-28 सिंतबर 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से ही सैन्य पराक्रम एवं राष्ट्रवाद का सामूहिक रोमांच पूरे भारत में पैदा हुआ। लोगों की स्मृति में यह पीछे चला गया था लेकिन पुलवामा हमले के जवाब में युद्धक विमानों का पाकिस्तान में घुसकर बालाकोट से लेकर अधिकृत कश्मीर में बमबारी करने के साथ पूरे देश में राष्ट्रवाद एवं सैन्य पराक्रम की लहर पैदा हो गई। आतंकवाद की मार झेलते हुए ऐसे पराक्रम के लिए भारतीय मानस न जाने कब से छटपटा रहा था। इस साहसिक कार्रवाई के निर्णय के कारण नरेन्द्र मोदी का कद इतना उपर उठ गया कि भारत का कोई नेता उसके आसपास भी नहीं ठहरता था।

इससे चुनाव का पूरा वातावरण बदल गया। इसी में एंटी सेटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण कर भारत दुनिया के चार प्रमख देशों में आ गया।

चुनाव के अंतिम तीन चरण के पहले भारतीय कूटनीति के सघन अभियानों की बदौलत जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। जम्मू कश्मीर में जमायत-ए-इस्लामी (जम्मू कश्मीर) पर प्रतिबंध लगाकर उसके नेताओं को जेल में डालने, हुर्रियत सहित अन्य भारत विरोधी नेताओं से सुरक्षा सहित सारी सुविधायें वापस लेना, आतंक के वित्त पोषण मामले में उनके खिलाफ जांच और गिरफ्तारियों ने एक साथ मिलकर नरेन्द्र मोदी की प्रखर राष्ट्रवादी, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता,आतंकवाद प्रायोजित करने वाले दुश्मन देश के घर में घुसकर मारने का साहस करने वाला, विश्व स्तर पर एक प्रभावी तथा जम्मू कश्मीर के समाधान के लिए कठोर कदम उठाने वाले नेता की छवि को सुदृढ़ किया। इसने पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक मोदी के प्रति अपार जन समूह का भावनात्मक लगाव पैदा किया। और भोपाल में दिग्विजय सिंह के खिलाफ साध्वी प्रज्ञा सिंह को उतारने के साथ बिना घोषित किए हिन्दुत्व का स्फुलिंग संदेश केवल मध्यप्रदेश नहीं देशभर में गया। इन सबको एक साथ मिलाकर इनके प्रभावो की कल्पना करिए आपको पता चल जाएगा कि लहर किस तरह पैदा हुई।

भाजपा का अपना एक वोट आधार है। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छता योजना के तहत शौचालय निर्माण, उज्जवला योजना के तहत रसोई गैस, सौभाग्य योजना के तहत बिजली, स्वास्थ्य के लिए आयुष्मान योजना, किसान कल्याण योजनाओं, छोटे-बड़े रियायती इन्श्योरेंस, पेंशन योजनाओं, मुद्रा कर्ज आदि के द्वारा एक बड़ा वोट आधार उसमें जोड़ दिया है। राष्ट्रवाद, सुरक्षा तथा जम्मू कश्मीर में कार्रवाई जैसे त्वरित असर डालने वाले पहलुओं ने ज्वार पैदा कर दिया। अगर तमिलनाडु में भाजपा ने दिनाकरण के साथ समझौता किया होता तो अन्नाद्रमुक टूटकर उसमें आ जाता एवं वहां द्रमक को थोड़ा ज्यादा टक्कर मिलता लेकिन उस पर भ्रष्टाचार के आरोप के कारण भाजपा ने ऐसा नहीं किया। इसलिए वहां का परिणाम प्रतिकूल हो गया।

मोदी और भाजपा की विजय में विपक्ष की भी बड़ी भूमिका थी। सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर, एअरस्ट्राइक, एंटी सेटेलाइट मिसाइल और मसूद अजहर जैसे मामलों में विप़क्ष ने पूरी तरह नकारात्मक रवैया अपनाया। सरकार को धन्यवाद देना तो दूर इन्होंने प्रश्नों के बौछ़ाड़ किए और यह उनके खिलाफ गया। लोगों में विपक्ष के ऐसे रवैये से गुस्सा पैदा होता रहा।

मोदी और भाजपा इसका बिल्कुल सधे हुए तरीके से जवाब देकर एवं विपक्ष को कठघरे में खड़ा कर लोगों को इनके खिलाफ आलोड़ित करने की रणनीति पर काम करते रहे। और सबसे बढ़कर विपक्ष द्वारा पूरे चुनाव अभियान को नरेन्द्र मोदी हटाओ पर केन्द्रित कर जीत भाजपा की झोली में डाल दी। इन सारी घटनाओं, मोदी सरकार के कदमों तथा उनके भाषण कला के बीच यदि लोगों के सामने प्रधानमंत्री के रुप में चुनने के लिए नरेन्द्र मोदी और दूसरे नेता उपलब्ध हो तो लोग मोदी को ही चुनेंगे। जाहिर है, जहां उनका जनाधार है वहां उनको भारी बहुमत मिलना ही था। मोदी शाह एवं पूरी भाजपा ने लोगों के सामने इस बात को रखा कि विपक्ष के पास मोदी हटाओ के अलावा कोई एजेंडा है ही नहीं। इससे लोगों को लगा कि सारे एक ही आदमी को हटाने में लगे हैं। इसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया हुई और लोग मोदी के ईर्द-गिर्द गोलबंद होने लगे। मोदी ने यह कहकर इसको और दृढ़ किया कि आपके जनादेश से हमने भ्रष्टाचारियों को जेल के मुहाने तक पहुंचा दिया है। अब आप दोबारा जनादेश दीजिए ताकि देश को लूटने वालो को जेल भेज सके। भ्रष्टाचार के विरुद्ध मानसिकता वाले देश को यह अपील कर गया। मोदी ने इसके अलावा एक और बात की- पिछले पांच वर्ष में हमने आपकी आवश्यकताओं को पूरा करने का काम किया है आगे इसमें जितनी कमी है उस पर काम करते हुए आपकी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए काम करना है। इस तरह उन्होंने चुनाव को राष्ट्र की आकांक्षाओं से जोड़ने जैसी सहमत कराने वाले वायदे व लक्ष्य के साथ जनादेश मांगा। अन्य नेताओं की सोच इतनी दूर तक जा ही नहीं पाई।

इस तरह आप देखें तो पूरा चुनाव दो विचारधाराओं के बीच तीखे विभाजन का बन गया था। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में देशद्रोह कानून खत्म करने, सैन्य विशेषाधिकार कानून यानी अफस्पा से यौन उत्पीड़न, गायब करने तथा टॉर्चर के आरोपों से सुरक्षा बलों को मिले तीन महत्वपूर्ण कवच समाप्त करने, सुरक्षा बलों के कथित अत्याचार के विरुद्ध अत्याचार निवारण कानून बनाने, जमानत का अधिकार देने, जम्मू कश्मीर में अफस्पा की समीक्षा करने, वहां से सुरक्षा बलों की संख्या में कटौती आदि की डरावनी घोषणाएं की तो भाजपा ने इसके विरुद्ध स्टैंड लिया।

भाजपा ने 35 ए हटाने तथा अनुच्छेद 370 पर कायम रहने के अपने पुराने स्टैंड को दोहराया तो कांग्रेस ने कह दिया कि वह 370 में किसी तरह का परिवर्तन नहीं होने देगी। यह राष्ट्वाद एवं राष्ट्रीय सुरक्षा तथा उसमें सेना सहित समस्त सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर बिल्कुल दो विपरीत विचारधारायें थीं। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया। बालाकोट से लेकर कश्मीर तक के उसके कदम इनके प्रति प्रतिबद्धता और दृढ़ता को प्रमाणित करते थे तथा सामने नरेन्द्र मोदी इसके शीर्ष प्रतीक थे, कांग्रेस और राहुल गांधी को लेकर आम मानस में आशंका थी। भाजपा के घोषणा पत्र में दो पंक्तियों में ही सही राममंदिर के प्रति प्रतिबद्धता दर्शायी गई थी। कांग्रेस ने हिन्दुत्व का चोगा धारण करने की पूर्व में कोशिश की थी, पर मुस्लिम मत खिसकने के भय से इस विषय पर वह खुलकर कुछ बोल ही नहीं सकती थी। चुनाव के पूर्व उच्चतम न्यायालय में केन्द्र सरकार द्वारा अविवादित भूमि को रामजन्म भूमि न्यास को वापस करने की याचिका का भी असर था। इस तरह भाजपा की विजय एक निश्चित विचारधारा की विजय है। बताने की आवश्यकता नहीं कि यह विचारधारा क्या है। इसका असर इतना था कि उसके एक प्रमुख सहयोगी जनता दल यू ने अपना घोषणा पत्र जारी नहीं किया। जारी करने पर उसे कुछ मामलों पर भाजपा के विपरीत दिखाना पड़ता और संभव था कि इससे उसकी जीत का ग्राफ गिर जाता। यह है बदलाव।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विजय के बाद कार्यकर्ताओं और देश को संबोधित करते हुए कहा भी एक समय था जब सेक्यूलरवाद के झूठे तमगे में इकट्ठे होने की बात होती थी और इस बार किसी ने सेक्यूलरवाद शब्द तक का प्रयोग चुनाव अभियान में नहीं किया। यह है परिवर्तन और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के प्रभाव का परिणाम। यह भी सत्य है कि आम चुनावों में हर बार की तरह महंगाई, भ्रष्टाचार इस बार कहीं मुद्दा था ही नहीं। कांग्रेस और राहुल ने बिल्कुल प्रमाणविहीन राफेल सौदे को भ्रष्टाचार का मुद्दा बनाने की कोशिश की लेकिन तथ्य कोई थे नहीं और नरेन्द्र मोदी की छवि इतनी साफ-सुथरी है कि जनता ने उसे अस्वीकार कर दिया।

इस तरह मोदी के नेतृत्व में भाजपा एवं राजग की जीत के मायने साफ है। यह जातीय-सांप्रदायिक समीकरणों तथा केवल सत्ता के लिए बने अनैतिक नकारात्मक गठबंधनों पर अब तक के सबसे बड़े आघात तथा इसके उपर जन कल्याणकारी कदमों, विकास की प्रतिबद्धता और इन सबके उपर हिन्दुत्व, प्रखर राष्ट्रवाद, देश की एकता अखंडता के प्रति संकल्पबद्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा को व्यवहार में प्राथमिकता देने, आतंकवाद-अलगाववाद के प्रति शून्य सहिष्णुता, आवश्यकतानुसार बेहिचक सैन्य पराक्रम, प्रभावी विदेश नीति के समुच्चय की विजय है। नरेन्द्र मोदी इस समुच्चय के साकार व्यक्तित्व के रुप में खड़े थे, जिनके आमने-सामने कोई था ही नहीं।

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