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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की असाधारण और अभूतपूर्व विजय ने भारत ही नहीं विश्व की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ा है। अन्य देशों में ऐसा मौलिक परिवर्तन लाने में सैकड़ों वर्ष और हिंसक क्रांतियों की आवश्यकता हुई थी। भारत की हिंदू सांस्कृतिक धारा ने अंगुली पर तिलक लगाकर भारत को बदलने का आरंभ कर दिया।

इस चुनाव परिणाम ने भारत के विकास को तो राजतिलक लगाया ही पर इससे बढ़कर यह सिद्ध किया कि भारतवर्ष में हिंदुओं के अपमान को राजनीति और सेक्यूलरवाद का आधार बनानेवालों का युग समाप्त हो गया। आश्चर्य इस बात का है कि कम्यूनिस्ट पार्टियों के संपूर्ण वाष्पीकरण की कहीं चर्चा तक नहीं है। ऐसा लगता है कि माकपा और भाकपा कभी भारत में जन्मी ही नहीं थीं। बधाई।

निश्चित रूप से इसका श्रेय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयं सेवकों नरेंद्र मोदी और अमित शाह की संगठनात्मक कुशलता और एकाग्रचित धारदार नेतृत्व को जाता है जिन्होंने असंभव से दिखने वाले परिणाम संभव कर दिये तथा सेक्युलर माफिया का अंधेरा युग पराभूत किया जो भारत में हिंदुओं के अपमान तथा विरोध का पर्याय बन गया था।

यह चुनाव परिणाम सभ्यतामूलक है तथा राष्ट्रीय समाज की मानसिकता को विदेशी गुलामी से स्वदेशी गौरव की ओर ले जानेवाले सिद्ध होंगे। सरकार अच्छी चलेगी। पहले से बेहतर परिणाम लायेगी, पर जो सामाजिक परिवर्तन इस राजनैतिक परिवर्तन के असर से स्वत प्रारंभ होंगे वे दूरगामी परिणाम देंगे जो सरकारी कामकाज से परे और उसके असर से भी असरहीन रहेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाजपा मुख्यालय से विजय उद्बोधन एक विनम्र उदार और सर्वस्पर्शी नेता का राष्ट्रीय उद्बोधन था जो कटूता। विद्वेष तथा राजनीतिक अस्पर्श्यता से मीलों दूर एक विराट दृष्टि वाले भारतीय नेता का उद्गार था। यह उस हिंदू मन की तड़फ, वेदना और सपनों का समुचय था जिसके भीतर सदियों से इस देश में हिंदुओं पर होनेवाले आघातों, आक्रमणों और अपमान की स्मृति थी और यह भी स्मृति थी कि 1947 में देश विभाजन के बाद मिली आज़ादी के 70 वर्ष उस सेक्यूलर व्यवस्था केनफरत भरे प्रहारों से गुजरे हैं जब हिंदू आत्म गौरव का भाव ही अपराध था और भारतीय राष्ट्रीय एवं देशभक्ति के लिए जीनेवाले कार्यकर्ताओं को लोकतंत्र की मशाल जलाए रखने के लि, कश्मीर से केरल और केरल से बंगाल तक अपने बलिदान देने पड़े। वर्तमान युग में राष्ट्रीय सेवक संघ की विचारधारा से प्रेरित सैंकड़ों कार्यकर्ता जिन्होंने भरी जवानी में अपने धर्म, संविधान और तिरंगे झंडे के लिए सेक्यूलर बर्बर हमलावरों जिन्में जिहादी और कम्यूनिस्ट प्रमुखतया शामिल हैं, विजय की इस घड़ी में कोटि कोटि नमन के अधिकारी हैं।

कांग्रेस, कम्यूनिस्ट और वे तमाम छुटका सेक्यूलर दल केवल नपरत, गाली गलौज और अभद्रता के आधार पर मोदी और हिंदुत्वनिष्ठ कार्यकर्ताओं का विरोध कर रहे थे। ऐसे-ऐसे शब्द बोले गए जिनको लिखा नहीं जा सकता, नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत अभद्र प्रहार किए गए, बंगाल में भाजपा के 68 कार्यकर्ताओं की हत्या की गयी। उनके शव पेड़ों से लटकाए गए। उनको शारीरिक यातनाएं दी गयीं। दुर्गा पूजा विसर्जन पर प्रतिबंध लगे, लेकिन मुहर्रम के लिए विशेष छुट्टियाँ और व्यवस्थाएँ दी गयीं। केरल में हिंदुओं के धर्म स्थान सबरीमाला की मर्यादा को भंग किया गया। संघ के सेवकों और भाजपा के कार्यकर्ताओं की नृशंस हत्या की गयी।

ऐसा लगता था ये सेक्यूलर माफिया गैंग अपने धन-मन और दशकों से चली आ रही सत्ता के अहंकार में इतना चूर था उसे लगता था मीडिया की सुर्खियाँ बना लें, बेसिरपैर के झूठे आरोप लगाते रहे, चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाते रहे तो वे जनता को मूर्ख बना सकते हैं और जीत सकते हैं। लेकिन संग की व्यवस्था पद्धति, अनुशासन और एकचित भाव से लक्ष्य प्राप्ति के लिए संधान करनेवाले भाजपा नेतृत्व ने राष्ट्रीय संगठन से लेकर सबसे निचले स्तर के पन्ना प्रमुख तक की ऐसी सुघड़ व्यवस्था जिसमें कोई चूक होने की संभावन ही नहीं थी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी अपने विजय उद्बोधन में पन्ना प्रमुखों का जिक्र किया।

     ये कौन हैं कार्यकर्ता

ये वो हैं जो पीढ़ियों से भारत को बदलने की उद्दाम जिद मन में संजोए चुपचाप शालीनभाव से विचारधारा के लिए काम करते आ रहे हैं। इन्हें पद प्रतिष्ठा अलंकरण नहीं चाहिएं, बल्कि अपनी आंकों से बदलते भारत की तस्वीर देखना चाहते हैं। ये वो लोग हैं जो निम्न मध्यम श्रेणी के नागरिक, जो स्वयं या जिनके बेटे-बेटियाँ भाई देश के विभिन्न कोनों में भारत भक्ति और राष्ट्रीय एकता की अलख जगाने विभिन्न संगठनों के माध्यम से वर्षो से कम करते आ रहे हैं। इनमें वे लोग भी बहुत बड़ी संख्या मे जुड़े हैं जिनके लिए विचारधारा का अर्थ केवल दो शब्द रहे – भारत उदय। ऐसा भारत जहां गरीबी न हो, किसान खेती से धन और प्रतिष्ठा पाए, अस्पताल और सड़कें विश्वस्तरीय और शानदार हों, भारतीयता, हिंदू धर्म पर आघात बंद हों, विद्यालयों में सही इतिहास और पूर्वजों का यश पढ़ाया जाए, सत्ता से वैचारिक भेदभाव का अंत हो। मोदी ने यह सब करने का साहस दिखाने का भरोसा दिलाया, बालाकोट में पाकिस्तान के भीतर घुसकर उसकी ऐंठ निकाली, चीन को अहंकार छोड़ मसूद अजहर पर भारत के साथ खड़ा किया, इजरायल से प्राचीन हिंदू यहूदी संबंध पुनर्जीवित किए। अमरीका को भारत से बराबरी से बात करने का सलीका सिखाया। तो भारत की जनता भाजपा में भारत की जयकार क्यों न देखती।

नरेंद्र मोदी ने इनके मन को छू लिया और उन्हें विश्वास दिलाया कि वह हिंदुस्तान बदल सकते हैं और स्वयं फकीर की तरह रहेंगे, लेकिन जन-जन को समृद्ध करने का सपना साकार करेंगे।

पर यह याद रखना होगा कि विजय का मुकुट उन अनाम अजान कार्यकर्ताओं के रक्त, पसीने और बलिदान से रंगा है और पार्टी के शिखर से सामान्य स्तर तक के कार्यकर्ताओं की एकजुटता ने विजय का उद्घोष प्रबल किया। आखिरकार अरुणाचल से लेकर कन्याकुमारी और गुजरात से लद्दाख तक विराट राजमार्गों तथा जलमार्गों का जो संजाल बिछा, गांव गांव बिजली और सौर ऊर्जा, गरीब महिलाओं को उज्ज्वला गैर, बेटियों को सुरक्षा और अच्छे विद्यालय, जीएसटी द्वारा कर वंचना पर रोक, इनसोलवैंसी एक्टदिवालिया कंपनियों की जालसाजी रोकने का कानून, भ्रष्टाचार पर नकेल और विदेश नीति की इतनी अपार सफलता कि पहली बार स्वदेश के चुनाव पर विदेशी नीति का प्रभाव महसूस किया। यह सब टीम का काम था। मंत्रिमंडल के कुच ऐसे गौरवशाली नाम जन जन में भाजपा सरकार का यश बढ़ाते ही गए और यह विश्वास भी गहराते गए कि मोदी है तो मुमकिन है।

राहुल की अमेठी में पराजय विजय के मोदक पर देवी के तिलक की तरह शुभ कही जा सकती है। स्मृति ईरानी ने पिछले पाँच साल अमेठी को अपने विशेष संसदीय क्षेत्र के नाते पाला पोसा और संरक्षित किया। वास्तव में अमेठी से न चुने जाने के बावजूद अमेठी की सांसद के नाते स्मृति ने ही काम किया राहुल ने नहीं। स्मृति की मेहनत को अमेठी ने स्वीकार किया और राहुल को वायनाड के कौने तक भागना पड़ा। विष और हिंदु विद्वेश से भरे दिग्विजय सिंह के समक्ष सेक्यूलर सत्ता की नृशंसता का शिकार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को लड़ा कर भाजपा ने संताप और वेदना से तड़फ रहे हिंदू हृदय को शांति की ठंडक दी जिसके लिए भाजपा नेतृत्व का बहुत-बहुत आभार।

चंद्रा बाबू नायडू जैसे कचरा जुबान और भ्रष्टाचारी व घमंडी नेता को आंध्र ने सबक सिखाया पर उससे भी बढ़कर खुशी रजाकारों के नए विषैले संस्करण ओवैसी को हैदराबाद में हारते देखकर हुई। कश्मीर से धुर दक्षिण तक कांग्रेस और उसका परिवारवाद शून्य, शून्य और शून्य डूबता चला गया। इसे मात्र राजनीतिक परिवर्तन नहीं बल्कि हिंदुओं के प्रति की गई शब्द हिंसा और विश्वासघात का लोकतांत्रिक प्रतिशोध ही कहा जाएगा। जम्मू कश्मीर से महबूबा की हिंदू और हिंदुस्तान विद्वेशाी राजनीति भी इसी तुफान में मिट्टी में मिल गई।

इस मुकुट पर मयूर पंख की तरह शोभायमान उत्तर प्रदेश की विजय कही जा सकती है, जहाँ मायावती और अखिलेश का हिंदू समाज को विघटित तथा घोर कट्टर हिंदू विद्वेशी मुस्लिम समर्थक राजकारण चकनाचूर हो गया। मायावती ने सपा के हाथों एक अपमान पहले करवाया और दूसरा अब।

नरेंद्र मोदी ने एक परम निष्ठावान शिवभक्त के नाते काशी का ही कायान्तरण और रूपांतरण नहीं किया जिसका पुण्य उन्हें बाबा केदारनाथ ने अवश्य दिया लेकिन साथ ही हिंदु मन की वेदना पर अपनी भक्ति और श्रृद्धा से जो राहत का स्पर्श किया वह उन्हें हजार साल बाद हिंदु मन की वास्तविक विजय का प्रतीक बना गया। इस संपूर्ण उपक्रम में शिखर रणनीतिकार के नाते स्थापित किया है।

काम तो अब शुरू हुआ है। सबसे बड़ा लक्ष्य अर्थव्यवस्था को बढ़ाना, आठ प्रतिशत तक की विकास दर को लंबे समय तक टिकाए रखने की क्षमता हासिल करना और उसे डबल डिजिट यानि दस तक ले जाना, किसान को भारत के विकास का केंद्र बिंदू बनाना, शिक्षा में परिवर्तन को सैन्य शक्ति बढ़ाने के समान महत्व देना और इंफ्रास्ट्रक्चर यानि ढाँचागत विकास की गडकरी निति को सशक्त करना यदि तात्कालिक प्रमुख एजेंडा है तो अब जनता सवाल यह भी पूछेगी कि 370 हटाने के लिए अब कोई बहाना नहीं चलेगा और राम मंदिर निर्माण की तारीख शपथ ग्रहण के बाद कब बतायी इसका इंतजार रहेगा। अब किंतु परंतु, करेंगे, जल्दी करेंगे थोड़ा इंतजार करो, वगैरह वगैरह सुनने का मूड कम होगा। विजय का उत्साह उन्माद में न बदले, जनता का श्रद्धामय अलंकार अहंकार में न बदले, सत्ता के पाँच साल पलक झपकते बीत जाते हैं, पर अपने साथियों और कार्यकर्ताओं के अपमान की गंध जीवन भर जिंदा रहती है। प्रशंसा के साथ मित्रों के कल्याणकारी आलोचक स्वर जब तक सम्मान पाएंगे तब तक भारत राष्ट्र की नवीन विकास गाथा का यह सफर अविरोधेन, निर्बाध अश्वमेध यज्ञ के अश्वों की तरह विजय पथ पर बढ़ता रहेगा।

 

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